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कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया की रफ़्तार धीमी कर दी थी। धीरे-धीरे ही सही अब जिंदगियां पहले की तरह सामान्य होने की कोशिश कर रही हैं। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश में अब स्कूल पहले की तरह खुलने लगे हैं। कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए एहतियात के साथ बच्चे अब स्कूल जाने लगे हैं। शुरुआती दौर से ही कोरोना महामारी और लॉकडाउन का प्रभाव शिक्षा पर पड़ा है। स्कूल पूरी तरह बंद हो गए और कुछ समय बाद ही स्कूलों ने ऑनलाइन शिक्षा को शुरू किया। शहर, गांव के बड़े-छोटे स्कूलों ने अपने पाठ्यक्रम के क्रम को बनाए रखने के लिए ऑनलाइन शिक्षा का विकल्प चुना।

ऑनलाइन शिक्षा के दौरान जिन पाठ्यक्रमों को पूरा किया गया, अब स्कूल खुलने के बाद उसके आगे की पढ़ाई की शुरू की गई क्योंकि स्कूल ने कहीं न कहीं ये मान लिया कि जितनी मेहनत से स्कूल के टीचर ने ऑनलाइन क्लास में बच्चों को पढ़ाया वे सब बच्चों को जैसा का तैसा समझ में आ गया, पर वास्तव में हमारा देश शुरू से ही ऑनलाइन शिक्षा को लेकर सुस्त रहा है। अगर मैं बात करूं ग्रामीण क्षेत्रों की तो यहां महंगे प्राइवेट स्कूलों में ही कंप्यूटर की शिक्षा उपलब्ध है। लेकिन बाक़ी के स्कूलों में कहीं भी कंप्यूटर की शिक्षा नहीं है। ऐसे में एक समय के बाद जो बच्चे कंप्यूटर सीखने के इच्छुक होते है वे अलग से कंप्यूटर प्रशिक्षण के केंद्रों पर एडमिशन लेते हैं। मैं खुद भी गांव में मुसहर बच्चों को पढ़ाती हूं, जो कोरोना से पहले सरकारी स्कूलों में ज़ाया करते थे। एक़ बार जब उन्हें हम लोगों ने एक विडियो लैपटॉप पर दिखाया तो वह लैपटॉप उनके लिए किसी अजूबे से कम नहीं था। उन्हें लैपटॉप तो क्या कंप्यूटर तक का नाम नहीं पता था। आज भी हमारे क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर और तकनीकी शिक्षा को किसी दूसरे ग्रह की तकनीक के रूप में देखा जाता है।

कोरोना काल के बाद लंबी स्कूल बंदी और फिर ऑनलाइन क्लास के बाद स्कूल। इस पूरे क्रम ने गांव की लड़कियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पहले भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के लिए पढ़ाई करना किसी विशेषाधिकार से कम नहीं था, लेकिन कोरोना महामारी ने इस विशेषाधिकार से अधिकतर लड़कियों को दूर किया है।

ओआरएफ संस्था में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, 30 जनवरी 2020 तक देश के केवल सात उच्च शिक्षण संस्थान ऐसे थे जिनके पास यूजीसी की 2018 गाइडलाइन्स के अनुसार ऑनलाइन कोर्स उपलब्ध करवाने की इजाज़त थी। कोविड-19 की महामारी फैलने से पहले देश के लगभग 40 हज़ार उच्च शिक्षा संस्थानों में से अधिकतर के पास ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरू करने की अनुमति नहीं थी। इसीलिए, जब केंद्र और राज्य सरकारों ने इन संस्थानों को ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से अपने छात्रों को पढ़ाई कराने का आमंत्रण दिया, तो ये संस्थान इसके लिए तैयार नहीं थे। यह तो मई महीने के मध्य में जाकर वित्तमंत्री ने एलान किया था कि देश की नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) के तहत टॉप के 100 शिक्षण संस्थानों को स्वत: ही ऑनलाइन शिक्षण कार्यक्रम करने की इजाज़त मिल जाएगी। लेकिन, सरकार के इस क़दम से छात्रों के एक छोटे से वर्ग को ही लाभ मिला।

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लॉकडाउन लगने के बस दो दिन बाद ही, यूजीसी ने सरकार के ICT यानी सूचना और प्रौद्योगिकी तकनीक पर आधारित संसाधनों के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में पहल की एक लिस्ट जारी की थी। यूजीसी का कहना था कि इसके माध्यम से छात्र, लॉकडाउन के दौरान मुफ़्त में पढ़ाई जारी रख सकते हैं। इसमें स्वयं (SWAYAM) और नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी जैसे विकल्पों का ज़िक्र किया गया था। ऑनलाइन उच्च शिक्षा की बात करें तो अभी भी ये बहुत देर से और कुछ ही छात्रों के लाभ के लिए उठाए गए क़दम हैं।

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यह तो बात हुई सरकार की गति की लेकिन जब हम इस गति के प्रभाव को सरोकार और ख़ासकर ग्रामीण परिवेश के संदर्भ में देखते है तो बेहद निराशा हाथ आती है। जो समाज पहले ही लड़कियों की शिक्षा के नाम पर पितृसत्तात्मक सोच का परिचय देता था और उन पर काम का बोझ उम्र से ज़्यादा बढ़ाने पर विश्वास करता था, वहां कोरोना काल में इस ऑनलाइन शिक्षा ने बहुत-सी लड़कियों को पढ़ाई से कोसो दूर कर दिया। जो लड़कियां बची रह गई, अब स्कूल खुलने के बाद वे पढ़ाई से जुड़ाव महसूस ही नहीं कर पा रही है।

हाल ही में मैं जब अमिनी गांव में किशोरियों के साथ बैठक करने गई तो वहां किशोरियों ने अपनी पढ़ाई और स्कूल के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि पढ़ाई छूटे हुए इतने दिन बीत गए हैं कि अब स्कूल जाने पर कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। टीचर लोग अपनी रफ़्तार से अपना कोर्स पूरा करवाने में लगे है लेकिन वे लोग बहुत पीछे हो रही हैं। वहीं एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाली किशोरी ने बताया, “पहली लहर के बाद से स्कूल पूरा बंद था। लेकिन फिर जनवरी से ऑनलाइन क्लास शुरू हुई। अब स्कूल खुलने के बाद टीचर उसके आगे से पढ़ा रहे है, लेकिन मोबाइल न होने की वजह से मैं बहुत कम क्लास ही दूसरों के फ़ोन से कर पाई।”

कोरोना काल के बाद लंबी स्कूल बंदी और फिर ऑनलाइन क्लास के बाद स्कूल। इस पूरे क्रम ने गांव की लड़कियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पहले भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के लिए पढ़ाई करना किसी विशेषाधिकार से कम नहीं था, लेकिन कोरोना महामारी ने इस विशेषाधिकार से अधिकतर लड़कियों को दूर किया है। जो लड़कियां बची रह गई हैं उनके लिए दोबारा पढ़ाई के उसी क्रम में लौटना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इसके लिए ज़रूरी है कि ग्रामीण स्तर पर लड़कियों की शिक्षा में सहयोग के लिए केंद्र खोले जाए, जो उन्हें दुबारा पढ़ाई के उसी क्रम से जोड़ने में मदद कर सके।

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तस्वीर साभार : PTI

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