भारत की मेंस्ट्रुएशन नीतियां: क्या पीरियड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवाधिकार मुद्दा मानती हैं हमारी सरकारें? 
तस्वीर साभार: BBC
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पीरियड्स एक महत्वपूर्ण लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में सबसे ज्यादा नजरअंदाज़ किए जाने वाले मुद्दों में से एक है। पीरियड्स और इससे संबंधित मुद्दों पर चुप्पी के पीछे हमारे सामाजिक मानदंड हैं, जो इसे अवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखते हैं। आज भी पीरियड्स एक संवेदनशील विषय है जिसके बारे में खुलकर बात नहीं की जा सकती। देश के दूर-दराज इलाकों में पीरियड प्रॉडक्ट्स की उपलब्धता तो दूर, कई बार व्यक्ति के पीरियड्स शुरू होते ही उसे ‘अशुद्ध या गन्दा’ मानते हुए घर के बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। यह गौर करनेवाली बात है कि क्यों एक साधारण जैविक प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी सोच में जकड़ी चली आ रही है। पीरियड्स से जुड़ी हमारी अवधारणा इतनी अवैज्ञानिक है कि न सिर्फ आम लोग बल्कि कई बार डॉक्टर खुद पीरियड्स के दर्द और असहजता को सामान्य और बच्चे पैदा करने को इसका हल बताते हैं।

पीरियड्स को हमारा समाज किस तरह अपनाता है, यह काफी हद तक देश में लाए गए मेंस्ट्रुएशन नीतियों पर भी निर्भर करता है। भारत में मेंस्ट्रुएशन से जुड़ी कई नीतियां बनाई जा चुकी हैं। भारत में आज भी पीरियड्स एक मानवाधिकार और सामाजिक मुद्दा नहीं बन पाया है। यूनाइटेड नेशन्स ह्यूमन राइट्स के विशेषज्ञों के अनुसार मेंस्ट्रुएशन के जुड़े पर्वाग्रह से पैदा होनेवाली शर्म और रूढ़ि मानवाधिकारों को प्रभावित करती है। इसमें समाज में समानता, स्वास्थ्य, आवास, पानी, स्वच्छता, शिक्षा, रोजगार, किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता, काम करने की सुरक्षित जगह या बिना किसी भेदभाव के सांस्कृतिक और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने जैसे अधिकार शामिल हैं।

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पीरियड्स सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्वास्थ्य मुद्दा भी है। पीरियड्स में बुनियादी जरूरतों के पूरा होने और अवैज्ञानिक सोच को बदलने से बेहतर समाज और सार्वजनिक स्वास्थ्य की नींव रखी जा सकेगी। इसलिए मेंस्ट्रुएशन नीतियां भी व्यापक और हर समुदाय और लिंग को ध्यान में रखकर बनाने की जरूरत है। 

भारत में लाए गए मेंस्ट्रुएशन या मेंस्ट्रुएशन में स्वच्छता (हाइजीन) से जुड़ी नीतियां

भारत में मेंस्ट्रुएशन से जुड़ी सभी नीतियां मूलतः किशोरियों और महिलाओं को कम कीमत पर सैनिटरी पैड प्रदान करने और मेंस्ट्रुएशन हाइजीन मैनेजमेंट (एमएचएम) पर ज़ोर देती हैं। लेकिन पीरियड्स को लेकर समाज में फैली अवैज्ञानिक सोच, झिझक और अज्ञानता का प्रचलन सार्वजनिक नीतियों के बहुआयामी न होने के संकेत हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने सबसे पहले साल 2011 में ग्रामीण क्षेत्रों में 10 से 19 साल की किशोरियों में पीरियड्स स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए 17 राज्यों के चुनिंदा जिलों में मेंस्ट्रुअल हाइजीन योजना लागू की। इस योजना में पीरियड्स के दौरान स्वच्छता पर जागरूकता बढ़ाने, ग्रामीण क्षेत्रों में किशोरियों का अच्छा और सस्ता सैनिटरी नैपकिन के उपयोग को बढ़ाने और पर्यावरण के सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उसके निपटान (डिस्पोजल) पर ज़ोर दिया गया।

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साल 2014 में इस योजना को राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत देश के सभी जिलों में विस्तार किया गया। सूची योजना और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का सबला कार्यक्रम भी पिछली योजनाओं के तरह किशोरियों में स्वच्छता आदतों को बढ़ावा देने और सब्सिडी युक्त सैनिटरी पैड्स मुहैया कराने पर जोर देती है। बात ग्रामीण महिलाओं तक सस्ते सैनिटरी पैड्स तक पहुंच की करें, तो ग्रामीण विकास मंत्रालय का राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन स्वयं सहायता समूहों और छोटे निर्माताओं को सैनिटरी पैड बनाने में मदद करता है।

इसके बाद, स्वच्छ भारत मिशन में मेंस्ट्रुएशन हाइजीन मैनेजमेंट को शामिल भी किया गया। साथ ही, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने मेंस्ट्रुएशन हाइजीन मैनेजमेंट का दिशानिर्देश जारी किया। इन योजनाओं के अलावा, केंद्र सरकार की कई अन्य योजनाओं के अंतर्गत स्कूली बच्चियों को शौचालय और पानी की व्यवस्था देने पर भी जोर दिया जा रहा है जिससे उन्हें पीरियड्स के दौरान स्कूल आना बंद न करना पड़े। गौरतलब हो कि विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के अलावा, ओडिशा और केरल जैसे कई राज्यों ने स्कूली छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड्स प्रदान करने की योजना शुरु की है। हाल के समय में, महिलाओं के लिए स्वास्थ्य के मद्देनज़र, देश भर में जनऔषधि केंद्रों में एक रूपए में ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन बिक्री करने की महत्वाकांक्षी योजना भी शुरू की गई।

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मेंस्ट्रुएशन से जुड़ी नीतियां कितनी सफल है  

हालांकि, मोदी सरकार के शासन में मेंस्ट्रुएशन को सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा बनाने की कोशिश की गई, लेकिन देश की सभी मेंस्ट्रुएशन नीतियां मूल रूप से सस्ते पैड के प्रयोग और स्वच्छता पर ही जोर देती हैं। मेंस्ट्रुएशन को सार्वजनिक नीति का हिस्सा बनने के एक दशक बाद भी, देश में, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में किशोरियां और महिलाएं सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल नहीं करती। न ही पीरियड्स के दौरान साफ पानी या शौचालय की उनकी बुनियादी ज़रूरत पूरी होती है। अक्सर किशोरियों को पीरियड्स की जानकारी नहीं होती। आम तौर पर, पीरियड्स पर जानकारी की एक मात्र स्रोत माँ या घर की कोई महिला होती है जिससे पीरियड्स को लेकर पीढ़ी दर पीढ़ी अवैज्ञानिक सोच आगे बढ़ती जाती है।

आंकड़ों पर जाएं, तो जहां एनएफएचएस-4 में 57.6 फ़ीसद 15 से 24 साल की महिलाएं पीरियड्स के दौरान स्वच्छता के लिए सुरक्षित तरीकों का उपयोग करती थीं, वहीं एनएफएचएस-5 में यह बढ़कर 77.3 फ़ीसद पाया गया। लेकिन, बिहार, गुजरात और मेघालय जैसे कई राज्यों में यह 70 फीसद से कम है। स्कूली बच्चियों को सैनिटरी पैड्स देने के प्रावधान के बावजूद, दिल्ली के सरकारी स्कूलों पर किया गया एक अध्ययन देश के स्कूलों में बच्चियों का हाल बयान करती है। इस रिपोर्ट में 65 फीसद लड़कियों ने पीरियड्स के दौरान स्कूल में सामान्य गतिविधियों में भाग नहीं ले पाने और शर्म या झिझक के कारण क्लास छूटने की जानकारी दी। वहीं, 40 फीसद लड़कियों ने बताया कि वे पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जा पाती। गैर-सरकारी संस्था दासरा की एक रिपोर्ट बताती है कि 23 फीसद लड़कियां युवा होने पर स्कूल छोड़ देती हैं। इसके अलावा, ऐसी लड़कियां जो स्कूल नहीं छोड़ती, वे हर महीने पीरियड्स के दौरान औसतन पांच दिन स्कूल नहीं जा पाती।

गौरतलब हो कि हमारे नीतियों में ट्रांस समुदाय या नॉन-बाइनरी लोगों के पीरियड्स से जुड़े मुद्दों का कोई ज़िक्र नहीं है। केवल स्कूली बच्चियों के लिए योजनाएं बनाने से ऐसी लाखों महिलाएं भी लीक से अलग हो जाती हैं जो स्कूली उम्र के दायरे से बाहर हैं। देश के सबसे बड़े स्वास्थ्य सर्वेक्षण में भी हमें केवल 15 से 24 साल की महिलाओं की पीरियड्स के दौरान आदतों की सीमित रिपोर्ट मिलती है। ग्रामीण भारत में पीरियड्स के दौरान स्वच्छता के लिए सुरक्षित तरीकों का उपयोग; शहरी इलाकों से लगातार कम पाया जाता है। न सिर्फ ग्रामीण भारत बुनियादी जरूरतों की कमी से जूझ रहा है, बल्कि पीरियड्स को लेकर अवैज्ञानिक सोच और झिझक को बदली नहीं जा सकी है। हालांकि, मेंस्ट्रुएशन से जुड़ी मौजूदा नीतियों में पीरियड्स को लेकर जागरूकता की बात की गई है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर अवैज्ञानिक सोच, मिथक और रूढ़ियों को खत्म करने की निश्चित योजनाओं की बात नहीं की गई है।

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पीरियड्स में अक्सर, माँए खुद बेटियों को अलग रहने की सीख देती हैं, धार्मिक कामों या पूजा-पाठ, रसोई जैसे जगहों से दूर कर देती हैं और ऐसे में उनका सामान्य जीवन प्रभावित होता है। यहां यह समझना जरूरी है कि पीरियड्स से अलग-अलग समुदाय, धर्म और नस्ल की हज़ारों मिथक, नियम और रूढ़िवाद जुड़े हुए हैं। आम जनता के लिए पीरियड्स से जुड़े सदियों से चले आ रहे किसी रिवाज पर सवाल खड़ा करना अपने धर्म या समुदाय के खिलाफ आवाज़ उठाने जितना गंभीर कदम हो सकता है। इसलिए यहां सरकार की भूमिका और भी अहम हो जाती है।

इतिहास में जाएं तो, पोलियो और चेचक को लेकर समाज में ऐसी ही अवधारणाएं मौजूद थीं जिन्हें सार्वजनिक नीतियों और वैज्ञानिक सोच से माध्यम से दूर किया गया। बात जन औषधि केंद्रों में सस्ते पैड्स की बिक्री की करें, तो इस योजना की जानकारी की कमी के कारण आम जनता का इस सुविधा का लाभ नहीं उठा पाना ही स्वाभाविक है। पीरियड्स से लड़कों और पुरुषों को सामाजिक तौर पर दूर रखने से पीरियड्स से जुड़े पितृसत्तात्मक मानदंडों को खत्म कर पाना और भी मुश्किल हो सकता है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन में भारत के तीन राज्यों के स्कूली लड़कों के  पीरियड्स को लेकर उनकी सोच पर एक शोध प्रकाशित किया गया। इस शोध के अनुसार अधिकतर लड़कों ने न सिर्फ इस विषय को जानने की इच्छा जाहिर कि बल्कि पीरियड्स से गुज़र रही अपने बहन या सहपाठी को लेकर संवेदनशील पाए गए।  

हालांकि, पीरियड प्रॉडक्ट्स को टैक्स मुक्त करने से लेकर स्कूली बच्चियों को मुफ्त पैड प्रदान करने के प्रयास तक एक लम्बा रास्ता तय करने की कोशिश की जा चुकी है। लेकिन क्या सिर्फ टैक्स रहित स्वच्छता उत्पाद पीरियड्स से जुड़े अवैज्ञानिक अवधारणाओं को बदलने में कारगर हो सकते हैं? इसके अलावा, पीरियड्स को हमेशा से केवल ‘महिलाओं का मुद्दा या समस्या’ के रूप में देखा जाता रहा है। पीरियड्स होना अपनेआप में कोई समस्या नहीं है, और न ही यह सिर्फ महिलाओं तक सीमित है। पीरियड्स सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्वास्थ्य मुद्दा भी है। पीरियड्स में बुनियादी जरूरतों के पूरा होने और अवैज्ञानिक सोच को बदलने से बेहतर समाज और सार्वजनिक स्वास्थ्य की नींव रखी जा सकेगी। इसलिए मेंस्ट्रुएशन नीतियां भी व्यापक और हर समुदाय और लिंग को ध्यान में रखकर बनाने की जरूरत है। 

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तस्वीर साभार : BBC

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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