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प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (PMS) और प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर (PMDD) एक मूड डिसऑर्डर है जिसके कारण पीरियड्स से ठीक पहले सप्ताह में भावनात्मक और शारीरिक लक्षण देखे जा सकते हैं। दुनिया भर में लगभग 5 से 8 प्रतिशत महिलाए पीएमएस का सामना करती हैं। भारत में सार्वजनिक रूप से पीरियड्स पर बात करने या जानकारी साझा करने पर सामाजिक और सांस्कृतिक पाबंदी है। ऐसे में इससे जुड़ी शारीरिक तकलीफ का सामान्यीकरण और मानसिक परेशानियों को नजरअंदाज़ किया जाता है। पीरियड्स हर किसी के लिए अलग अनुभव लाता है। हर महीने की सामान्य लगने वाली इस प्रक्रिया में, पीरियड्स होने पर इसकी चिंता और तनाव से गुज़रना पड़ता है। कई लोग शारीरिक तकलीफ के कारण इन दिनों मूड स्विंग्स महसूस करते हैं। हमारा पितृसत्तात्मक समाज लोगों के पीरियड्स के दिनों में भी अपने समस्याओं को नजरअंदाज़ कर उनसे घरेलू या दफ्तर के काम जारी रखने की ही उम्मीद करता है। साथ ही, अधिकतर कामकाजी लोगों के पास पीरियड्स लीव की सुविधा नहीं होती।

प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (PMS) क्या है ?

पीएमएस उन भावनात्मक और शारीरिक लक्षणों को चिन्हित करता है जो नियमित रूप से हर बार पीरियड्स की शुरुआत से एक से दो सप्ताह पहले होते हैं। सामान्य लक्षणों में चिड़चिड़ापन, तनाव, उदासी, चिंता, अशांति या हर वक्त मूड बदलना जैसे लक्षण शामिल हैं। इसमें शरीर से जुडी शिकायतें जैसे मुंहासे, स्तनों में कोमलता या सूजन और थकान हो सकती है। हालांकि अलग-अलग लोग अलग-अलग लक्षणों का अनुभव करते हैं लेकिन पीरियड्स की शुरुआत के आसपास ये लक्षण ठीक हो जाते हैं। यह गौर करने वाली बात है कि कई बार ये लक्षण पीएमएस के बिना भी पाए जाते हैं। जैसे-जैसे मानव जाति विकसित हो रही है, पीरियड्स शुरू होने की उम्र पहले से कम होती जा रही है। आज भारत में भी पीरियड्स की औसत उम्र 12 से 14 वर्ष हो गई है। हालांकि पीएमएस या पीएमडीडी से ग्रसित होने की अबतक कोई ठोस वैज्ञानिक कारण नहीं मिले हैं। लेकिन जानकारी की कमी में छोटी उम्र में पीरियड्स जैसी सामान्य शारीरिक प्रक्रिया किशोरियों और महिलाओं के लिए मानसिक या शारीरिक तौर पर कठिन बन जाती है और मानसिक तनाव पैदा कर सकती है। इससे जुड़ी शारीरिक तकलीफ का ज्ञान न होने के कारण उसका समाधान न कर पाना ही स्वाभाविक होता है। पीएमडीडी के तुलना में पीएमएस लोगों में अधिक पाया जाता है लेकिन इससे कोई खास नुकसान नहीं होता।

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प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर (PMDD)

पीएमडीडी, पीएमएस का ही एक हानिकारक और विकसित रूप है। जागरूकता की कमी के कारण हज़ारों लोग इसका शिकार होते हैं जिससे उनके पीरियड्स के दिन और मुश्किल हो जाते हैं। साल 2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर को रोग और संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकीय वर्गीकरण में जोड़ा ताकि इसे दुनिया भर में मान्यता मिले और इसका इलाज हो सके। शारीरिक और मानसिक अवस्था को दुर्बल कर देने वाले इस सिंड्रोम की जानकारी के अभाव में यह एक गंभीर स्थिति बन सकती है। पीएमडीडी पीरियड्स के पहले केवल मूड स्विंग्स से कहीं बढ़कर है। कभी-कभी दर्दनाक ऐंठन के कारण बोलना या काम करने जैसी साधारण चीज़ें भी मुश्किल हो जाती है। लंबे समय तक ऐसे परेशानियों से जूझने पर भावनात्मक कठिनाई हो सकती है। 

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पीएमएस की तरह, प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर भी एक अनुमानित पैटर्न की तरह होता है। यह महिलाओं को उनकी किशोरावस्था से लेकर मेनोपॉज़ तक प्रभावित कर सकता है। पीएमडीडी में महिला को ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई हो सकती है। इस दौरान अत्यधिक भावनात्मक महसूस करना या नियंत्रण से बाहर होने का भी अनुभव हो सकता है। पीएमडीडी से ग्रसित महिलाओं में आत्महत्या का खतरा अधिक होता है। यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन की डिजिटल आर्काइव पबमेड सेंट्रल के मुताबिक पीएमडीडी से जूझ रहे महिलाओं में आत्महत्या के विचार का दर सामान्य महिलाओं से 2.8 गुना अधिक है। ऐसी महिलाओं में आत्महत्या की योजना बनाने का इतिहास आम महिलाओं के तुलना में 4.15 और आत्महत्या करने का प्रयास 3.3 गुना अधिक है। पीएमडीडी के लक्षण बहुत गंभीर होते हैं जो किसी के सामान्य कामकाज में बाधा डाल सकते हैं। लंबे अर्से तक पीमडीडी से जूझना विकलांगता, इलाज में होनेवाला खर्च और काम करने की कम होती क्षमता को बढ़ावा देती है। प्रजनन आयु की 13 से 18 प्रतिशत महिलाओं में पीरियड्स से पहले होने वाले डिस्फोरिक लक्षण गंभीर और नुकसानदेह हो सकते हैं।

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बुनियादी सुविधाओं से जूझती आबादी कैसे करेगी पीरियड्स से संबंधित समस्याओं की पहचान ?

देश में आज भी पीरियड्स के विषय में चर्चा या बात करना शर्म का विषय है। अधिकांश लोगों को अपने पीरियड्स शुरू होने तक इसकी जानकारी या समझ नहीं होती। गैर-सरकारी संस्था दासरा की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 71 फीसदी लड़कियों ने अपनी पहली पीरियड से पहले पीरियड्स के बारे में कोई जानकारी नहीं होने की सूचना दी। अधिकांश लड़कियों के लिए, यह एक जटिल और भयानक अनुभव था जिसमें उन्हें आम तौर पर एक ही घर में सोने, खाने, किसी चीज़ को छूने या नहाने से भी रोका गया। आदर्श रूप से उनकी मांएं ही उनका मार्गदर्शन करती हैं जिन्हें अमूमन पीरियड्स से जुड़ी बीमारियों, स्वच्छता उत्पादों या प्रक्रियाओं की खुद भी कोई जानकारी नहीं होती है। स्पॉट ऑन के अनुसार 70 फीसदी मांएं पीरियड्स को ‘गंदा’ मानती है। ऐसा पीरियड्स जैसी सामान्य प्रक्रिया को शर्म और अज्ञानता की संस्कृति से जोड़े रखने के कारण ही है।

लड़कियों के लिए घर या स्कूल में शौचालय का न होना पीरियड्स में तनाव का बहुत बड़ा कारण है। दसरा की ही रिपोर्ट अनुसार भारत में 63 मिलियन किशोरी लड़कियां बिना शौचालय के घरों में रहती हैं। पांच में से दो स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है। घरों में शौचालय न होने की वजह से लड़कियां अपने पीरियड्स को हानिकारक, असुरक्षित और अस्वास्थ्यकर तरीके से गुज़ारती हैं। भारत में किशोरियों पर यूनिसेफ और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स के साल 2020 के अध्ययन के अनुसार शहरी इलाकों में गरीबी में रह रही किशोरियां उचित पीरियड्स स्वच्छता सुविधाओं से वंचित है। यह अध्ययन बताता है कि आर्थिक तंगी के कारण हर दो में से एक लड़की अपने पीरियड्स के दौरान सैनिटरी नैपकिन या टैम्पोन का उपयोग करने में असमर्थ है। साथ ही भारत में 88 फीसदी महिलाएं अपने पीरियडस में पुराने कपड़े, खपरैल, रेत, राख, लकड़ी की छीलन, अखबार, सूखे पत्ते, घास और प्लास्टिक जैसे खतरनाक और अस्वास्थ्यकर विकल्पों का उपयोग करती हैं। हालांकि द डाउन टू अर्थ के एक रिपोर्ट अनुसार राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस -5) के पहले चरण में पिछले डेढ़ दशक में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पीरियड्स के दौरान स्वच्छता उत्पादों का उपयोग करने और स्वच्छता का पालन करने वाली महिलाओं के प्रतिशत में बढ़ोतरी पाई गई लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह पर्याप्त नहीं।

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कोरोना ने बढ़ाई चुनौतियां

कोविड-19 के दौरान स्कूलों में लड़कियों को मिलने वाले स्वच्छता उत्पादों के बंद हो जाने से आर्थिक रूप से वंचित तबके बुरी तरह प्रभावित हुए। ऐसे में पीरियड्स के दिनों में परेशानी स्वाभाविक है। कोरोना महामारी से उपजी आर्थिक तंगी और नौकरी में अनिश्चितता ने लोगों के स्वास्थ्य को नकारात्मक तरीके से प्रभावित किया है। चूंकि आय, व्यवसाय या स्वास्थ्य के मामले में पुरुषों की तुलना में महिलाएं पहले से ही कमज़ोर स्थिति में थी, उन्हें कोरोना काल में पीरियड्स में अत्यधिक बदलाव या परेशानियों का सामना करना पड़ा। गौरतलब हो कि पीसीओएस या एंडोमेट्रिओसिस से जूझने वाली महिलाओं के लिए लॉकडाउन में डॉक्टरों या स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्थाओं की कमी मूड स्विंग्स या अवसाद का कारण बन सकता है। हमारे देश में भले आज सरकार सैनिटरी नैपकिन को जरूरी उत्पाद बता रही है, लेकिन स्वच्छता उत्पादों तक सब की पहुंच समान नहीं है। आय, जाति और शिक्षा का सीधा संबंध स्वच्छता उत्पादों तक पहुंच और उसके इस्तेमाल से है। पीरियड्स के दौरान सैनिटरी नैपकिन के बजाय घरेलू उपायों का इस्तेमाल न सिर्फ शरीर के लिए हानिकारक है बल्कि मानसिक रूप से असहज रहने का प्रमुख कारण है।

चूंकि पीएमएस को समझने के लिए कोई तय शारीरिक जांच नहीं हैं, इसलिए पीएमएस से जुड़े भावनात्मक लक्षणों की शिकायत को ही मान्यता दी जाती है। ये लक्षण प्रीमेंस्ट्रुअल चरण के दौरान अनुमानित रूप से दिखाई देते हैं। पीरियड्स से कुछ समय पहले या उसके दौरान यह कम या गायब हो जाते हैं और प्रीओवुलेटरी चरण में मौजूद नहीं रहते हैं। अकसर, पीएमएस या पीएमडीडी से ग्रसित लोगों की शारीरिक और मानसिक तकलीफों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ या नकार दिया जाता है। काम पर उनके कष्ट या असहज अनुभवों का मज़ाक उड़ाया जाना और छुट्टी की मांग पर उन्हें अव्यवसायिक घोषित कर देना भी आम है। पीएमएस या पीएमडीडी में यह महत्वपूर्ण है कि हम लोगों के अनुभवों को ख़ारिज न करें, उसे माने और विशेषज्ञ की सलाह लें।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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