नीरा देसाईः वीमंस स्टडी के क्षेत्र का एक जाना-पहचाना नाम| #IndianWomenHistory
नीरा देसाईः वीमंस स्टडी के क्षेत्र का एक जाना-पहचाना नाम| #IndianWomenHistory
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नीरा देसाई, वह नाम हैं जिन्होंने भारत में महिलाओं की शिक्षा के लिए पहला रिसर्च सेंटर स्थापित किया था। देश में विश्वविद्यालय प्रणाली में महिलाओं के अध्ययन (वीमंस स्टडी) को शामिल करने का श्रेय इन्हीं को जाता है। वह बीसवीं सदी की एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री, इतिहासकार, शोधकर्ता और नारीवादी थीं। नीरा देसाई ने अपने सामाजिक और अध्ययन के शोध कार्य में मुख्य रूप से महिलाओं के सवालों को उठाया। इन्हें उनके सहयोगी ‘नीराबेन’ के नाम से भी पुकारते थे।

उन्होंने महिलाओं के मुद्दों को लेकर कई किताबें और रिसर्च पेपर लिखे थे। उन्होंने महिलाओं की समस्याओं पर न केवल लिखा बल्कि उनके समाधान निकालकर उस दिशा में काम भी किया। अपनी किताब ‘वीमेन इन मॉडर्न इंडिया’ में उन्होंने भारतीय महिलाओं की वास्तविक स्थिति दिखाने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों में से एक माना जाता है। इस किताब में उन्होंने महिलाओं की दुर्दशा को लेकर समाज की व्यापक आलोचना भी की।

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शुरुआती जीवन

नीरा देसाई का जन्म 1925 में अहमदाबाद, गुजरात में हुआ था। जब वह एक साल की थी जब उनका परिवार मुंबई आकर रहने लगा था। वह मुंबई में ही पली-बढ़ी थीं। वह अपने माता-पिता की तीन संतानों में से दूसरे नंबर की थीं। उनके पिता एक वकील थे। उनकी माता एक प्रगतिशील विचारों वाली महिला थीं। वह शिक्षा और स्थानीय गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। उन्होंने साल 1930 में ‘असहयोग आंदोलन’ में भी भाग लिया था। नीरा देसाई की प्रांरभिक शिक्षा फेलोशिप स्कूल से हुई थी। नीरा का परिवार सक्रिय रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ था।

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तस्वीर साभार: wikipeacewomen.org

राजनीतिक जीवन

नीरा ने खुद स्वतंत्रता आंदोलन से अपने स्कूल के समय में ही जुड़ गई थीं। वह इंदिरा गांधी द्वरा गठित ‘वानर सेना’ से जुड गई थी। यह संगठन राजनीतिक संदेश को गुपचुप तरीके से पहुंचाने का काम करता था। साल 1942 में इन्होंने एलफिन्स्टन कॉलेज, मुंबई में आगे की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। उन्होंने कॉलेज की फीस नहीं देने का फैसला किया क्योंकि उस समय ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ ज़ोर पकड़े हुए था। नीरा देसाई ने उन्हीं दिनों भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और कम्यूनिस्टों की मीटिंग में भाग लेना भी शुरू कर दिया था। यहीं नहीं, चौपाटी बीच पर एक मीटिंग में शामिल होने पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया था।

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नीरा देसाई, वह नाम हैं जिन्होंने भारत में महिलाओं की शिक्षा के लिए पहला रिसर्च सेंटर स्थापित किया था। देश में विश्वविद्यालय प्रणाली में महिलाओं के अध्ययन (वीमंस स्टडी) को शामिल करने का श्रेय इन्हीं को जाता है। वह बीसवीं सदी की एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री, इतिहासकार, शोधकर्ता और नारीवादी थीं।

एक साल बाद उन्होंने दोबारा एलफिन्सटन कॉलेज में अपनी पढ़ाई शुरू की। इस दौरान देसाई राजनीतिक तौर पर बहुत मुखर हो गई थी। कॉलेज दोबारा शुरू करने के बाद वह अरूणा आसफ अली और कमला चटोपाध्याय से जुड़ी। कांग्रेस नेता पुष्पा मेहता का उनके जीवन पर बहुत गहरा असर पड़ा था। वह अपने काम की प्रेरणा का स्रोत पुष्पा मेहता को ही मानती थीं। उन्होंने महिलाओं के लिए एक रेस्क्यू घर की शुरुआत की थी। जहां वह महिलाओं को शिक्षा और रोज़गार के साधन उपलब्ध करवाती थी।

वह एक स्टडी सर्किल में उनकी मुलाकात अक्षय रामलाल देसाई हुई। वह एक मार्क्सवादी समाजशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता थे। वह बॉम्बे यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे। साल 1946 में इन दोनों ने शादी कर ली थी। शादी के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। भारत में महिलाओं की भूमिका के आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक पहलूओं पर शोध किया।

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शिक्षा और करियर

साल 1954 में वे मुंबई के पहले महिला विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की प्राध्यापक बनीं थी। साथ ही वह एसएनडीटी वीमेंस यूनिवर्सिटी में ‘रिसर्च सेंटर फॉर वीमेंस स्टडीज’ की संस्थापक थीं। साल 1974, वीमंस स्टडीज़ पर आधारित यह भारत का पहला सेंटर था। उन्होंने इसी यूनिवर्सिटी में ‘सेंटर फॉर रूरल डेवलपमेंट’ की भी स्थापना की थी। महिला विषय पर खुली चर्चा, अध्ययन, सम्मेलन और बहसें आयोजित करने के लिए उन्होंने कई काम किए।

वीमंस स्टडीज़ से जुड़े अध्ययन को दूसरे विश्वविद्यालयों में दर्जा दिलाने के लिए उन्होंने उनके पाठ्यक्रम, अध्ययन सामग्री, विषयवस्तु और रिसर्च सामग्री भी तैयार की। नीरा देसाई ने एमए समाजशास्त्र की थीसिस ‘द इमपैक्ट ऑफ ब्रिटिश रूल ऑन द वीमेन ऑफ इंडिया’ पर की थी। भारत में ब्रिटिश राज खत्म होनेवाला था उस समय शायद ही महिला किसी गहन अध्ययन का विषय थी। वह आज़ादी से पहले भारतीय महिलाओं की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में हुए बदलावों का अध्ययन करना चाहती थी। 70 के दशक उन्होंने अपनी पहचान एक नारीवादी के रूप में की थी। 1977-1979 के बाद उन्होंने विदेश जाकर विभिन्न इंटरनेशनल वीमेंस स्टडीज कॉफ्रेंस में हिस्सा लिया था। वहां उन्होंने उदारवादी, कंटरपंथी और समाजवादी नारीवादियों के साथ बातचीत हुईं।

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उपलब्धियां और उल्लेखनीय कार्य

साल 1974 में देश में महिलाओं की स्थिति के विश्लेषण के लिए के लिए गठित समिति की नीरा देसाई एक प्रमुख सदस्य थीं। इस समिति ने ‘समानता’ के शीर्षक से बहुचर्चित रिपोर्ट जारी की थी। साल 1981 में कई अन्य महिला विचारकों के सहयोग से उन्होंने महिलाओं से संबंधित अध्ययनों पर पहला राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया। साल 1982 में गठित ‘इंडियन एसोसिएशन ऑफ वीमेंस स्टडीज’ की वे संस्थापक सदस्य थीं। 1987 में ‘नेशलन कमीशन ऑन सेल्फ एमप्लॉयड वीमेंस (इनफार्मल सेक्टर) की सदस्य बनीं।

नीरा देसाई ने अंग्रेजी और गुजराती दोनों भाषा में लिखा था। उनके द्वारा लिखी प्रमुख किताबें- ‘वीमेंस इन मॉडर्न इंडिया (1957), द मेकिंग ऑफ फेमिनिस्ट, इंडियन जर्नल ऑफ जेंडर स्टडीज 2 (1995), वीमेंस एंड द भक्ति मूवमेंट‘ हैं। महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता और शिक्षा के लिए नीरा बेन देसाई जीवनभर काम करती रहीं। नीरा देसाई का नाम दुनिया की उन महिलाओं में लिया जाता है, जिन्होंने 1970 से पहले महिलाओं की समस्याओं पर लिखा और उस दिशा में काम किया। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में वह मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए लड़ती रहीं। ‘नर्मदा बचाओ‘ और ‘काश्तकारी संगठन‘ में भी जुड़ी थीं। 25 जून 2009 को इस नीरा देसाई ने मुंबई में आखिरी सांस ली और हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह दिया।

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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1 COMMENT

  1. Dear बहुत खूब लिखा है आपने हमारे समाज की सच्चाई को उजागर करते हुए….

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