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तस्वीर साभारः kashmirobserve
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बेगम ज़फर अली कश्मीर की प्रसिद्ध शिक्षाविद्, महिला अधिकारों के लिए मुखरता से बोले वाली सामाजिक कार्यकर्ता थी। वह पहली कश्मीरी मैट्रिक पास महिला थीं जिन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी नवाजा गया। बेगम ज़फर अली का नाम उन बड़ी हस्तियों में शामिल हैं जिन्होंने भारतीय समाज में शिक्षा के महत्व के बारे में प्रचार किया। उस दौर में महिलाओं को खुलकर जीने का अधिकार नहीं था। ऐसे में महिलाओं के लिए शिक्षा बहुत दूर की बात थी। बेगम ज़फर अली पहली भारतीय महिला रही जिन्होंने महिलाओं को शिक्षा से अवगत कराया। उनको शिक्षित होने के लिए अधिक से अधिक जागरूक किया। उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने और अपने हक के लिए खड़ा होना सिखाया। बेगम ज़फर अली ने महिला सशक्तिकरण के लिए अनेक प्रयास किए।

बेगम ज़फर अली का जन्म साल 1901 में कश्मीर रियासत में हुआ था। इनके पिता का नाम खान बहादुर आगा सैय्यद हुसैन ठाकुर था। वह राजा हरि सिंह के यहां गृह और न्यायिक मंत्री के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने साल 1925 में गर्ल्स मिशन हाई स्कूल में एक शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। वह जम्मू-कश्मीर की हाईकोर्ट के पहले न्यायाधीश थे। उनकी माता का नाम सैय्यद सईदा सकीना सादात था। वह एक ईरान के सबज़ेवर सैय्यद परिवार से थीं। जो उस समय कश्मीर में एक संपन्न व्यापारी थे।

बेगम ज़फ़र अली का बचपन में नाम सैय्यदा फातिमा हुसैन रखा गया था। बेगम अली ज़फर को शुरुआत से ही उनके परिवार द्वारा हर मोड़ पर किसी भी प्रकार से रोका-टोका नहीं गया। हमेशा से ही उनके परिवार वाले उन्हें हर तरह से सहयोग करते थे। जिस दौर में लड़कियों, महिलाओं खास तौर से मुस्लिम समाज में उनके परिवार वाले पाबंदियां लगाते थे उस समय बेगम के परिवार ने उन्हें किसी भी कार्य के लिए उन पर बंदिश नहीं लगाई। उनके माता-पिता ने उन्हें शुरुआत से ही शिक्षा के लिए आगे बढ़ाया। उन्हें शिक्षित कर एक काबिल इंसान बनाया। उनके परिवार द्वारा उन्हें शिक्षित करने के लिए एक अध्यापिका भी रखी गई।

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विवाह के बाद भी शिक्षा जारी रखी

बेगम ज़फर अली का विवाह उनके चचेरे भाई आगा ज़फर अली से हुआ था। जिनसे उनकी 3 संताने थी। विवाह के बाद भी बेगम ने अपनी शिक्षा को प्रभावित नहीं होने दिया। उनकी शिक्षा के लिए उनके पति ने भी उन्हें बहुत सहयोग दिया था। उनका झुकाव उनकी आगे की पढ़ाई व सामाजिक कार्यों की ओर था।

इसी दौरान साल 1925 में बेगम अली ज़फ़र जी को उन्हीं के शहर के एक कन्या विद्यालय द्वारा एक शिक्षिका के पद के लिए आमंत्रण पत्र आया। यह स्कूल श्रीनगर के फतेह कदल इलाके में मिस मांलिसन और मिस बोस के द्वारा संचालित था। शुरुआती हिचक के बाद उन्होंने आमंत्रण स्वीकार कर लिया। अपने बच्चों के लिए गृह शिक्षक की व्यवस्था कर उन्होंने स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। इसी समय में उन्होंने सामाजिक भागीदारी शुरू की। अपनी क्षमता के अनुसार स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों को जागरूक किया। उन्होंने वहां की लड़कियों को शिक्षा के साथ शारीरिक स्वच्छता और आत्मनिर्भरता के लिए भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने लड़कियों में व्यक्तिगत शारीरिक स्वास्थ्य और व्यवहार में अच्छी आदतों को शामिल करना सिखाया। बेगम ज़फर अली का शिक्षा के प्रति प्रेम किसी से छिपा नहीं था। इसी दौरान उनके गृह शिक्षक ने उन्हें मैट्रिक परीक्षा देने का सुझाव दिया।

शुरुआत में वह परीक्षा देने में झिझक महसूस कर रही थी। उस समय घाटी में किसी भी महिला ने मैट्रिक पास नहीं किया था। बाद में उन्होंने अपनी हिचकिचाहट को खत्म करते हुए और शिक्षा के प्रति अपने स्नेह के लिए उन्होंने परीक्षा देना तय किया। साल 1930 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा दी। उस परीक्षा में वह द्धितीय श्रेणी के साथ उर्त्तीण हुई। बेगम ने परीक्षा में सफल परिणाम उस समय समाज में एक बहुत बड़ी बाधा को तोड़ने के समान था। कश्मीर में इस उपलब्धि को हासिल करने वाली वह पहली महिला थीं। इसके लिए उन्हें स्वर्ण पदक से नवाजा गया था।

लड़कियों व महिलाओं को शिक्षित व जागरूक करना बेगम के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गई थी। परंतु वे डटी रही, सभी समस्याओं का सामना करते हुए उन्होंने अपने मतों को खुलकर रखा। महिलाओ और लड़कियों को आत्मनिर्भर करने के लिए उनका साथ दिया। जिसके कारण उन्हें समाज द्वारा बहुत सी कठोर आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। वह उन कठोर वचनों से टूटी नहीं और आगे सामाजिक कार्यों के लिए बढ़ती रही।

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महिला शिक्षा व सामाजिक सक्रियता 

साल 1938 में उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा भी जारी कर दी थी। बेगम ज़फर अली ने अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद बहुत से स्कूलों में शिक्षिका के रूप में कार्य किया। अपनी योग्यता के अनुसार उन्होंने घाटी के कई अलग-अलग स्कूलों में हेड मिस्ट्रेस के पद पर काम किया। महिलाओं की शिक्षा के बारे में जागरूकता लाने के लिए उन्होंने शिक्षा के प्रचार के लिए अनेक काम किए। महिलाओं के अधिकारों में दृढ़ विश्वास रखने वाली बेगम ज़फर अली ने घाटी के घर-घर जाकर लोगों को लड़कियों को शिक्षा दिलाने के लिए जाग्रत किया। कुछ ही समय बाद उन्हें कश्मीर में स्कूलों के निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। यह एक शिक्षाविद् के रूप में उनके जुनून के लिए एक अहम पुरस्कार था।

बेगम ज़फर अली एक बहुत अच्छी वक्ता थी। वह जागरूकता के लिए सार्वजनिक स्थान पर भाषण दिया करती थी। वह कश्मीर घाटी में महिलाओं शिक्षा जागरूकता के बहुत से सार्वजनिक कार्यक्रमों और स्कूलों में भाषण देने जाती थी। बेगम ज़फर अली हमेशा से हर काम में अव्वल रही। इसी तरह विद्यालय में टीचर्स क्लब बनाया गया जिसमें उन्होंने भी भाग लिया। सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रियता और सजगता के बाद में टीचर्स क्लब को और मजबूत किया। वह कश्मीर की महारानी तारा देवी के साथ इसकी प्रमुख सदस्य थी। टीचर्स क्लब द्वारा बहुत सी सार्वजनिक सभाएं व कार्यक्रम आयोजित होते थे और बेगम उनमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इस क्लब का मुख्य उद्देश्य महिला मुद्दों पर बात करना और उनके अधिकारों के प्रति समाज को जागरूक करना था। बेगम ज़फर अली भारत में महिला आंदोलन में बहुत सक्रिय रही थी। वह लेडीज क्लब की जनरल सेक्रटरी थी। आजादी से पूर्व बेगम अली ‘ऑल इंडिया वुमेन कॉन्फ्रेंस’ के भी सेक्रटरी के पद पर रही थी।

बाद में उनकी मुलाकात मुहम्मद जिन्ना और उनकी बहन फातिमा जिन्ना से हुई। जिसके बाद उन्होंने कॉन्फ्रेंस को छोड़ दिया था। उन्होंने, उन्हें महिलाओं की मुक्ति के लिए काम करने के लिए निर्देशित किया। वह शिक्षा विगाभ में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रही थी। उन्होंने शिक्षा अधिकारी, मुख्य शिक्षा अधिकारी और कश्मीर के स्कूलों के मुख्य निरीक्षक के पदों पर अपनी सेवा दी। बतौर मुख्य निरीक्षक के रूप में, उन्होंने स्कूल में मध्याह्न भोजन योजना भी लागू की थी। सेवानिवृत्ति से पूर्व वह कश्मीर में शिक्षा विभाग की उप निदेशक के पद पर भी नियुक्त की गयी थी। इसके अलावा वह जम्मू और कश्मीर के समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड की सदस्य भी रही थी।

बेगम ज़फर अली के सामाजिक कार्य

अपने जीवनकाल में बेगम ज़फर अली लगातार सामाजिक उत्थान के लिए कार्य करती रही। वह एक के बाद एक भूमिका निभाकर शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभा रही थी। बेगम ज़फर अली ने घाटी में महिलाओं के लिए तकनीकी प्रशिक्षिण केंद्र खोला। साल 1977-82 के बीच वह विधानसभा की सदस्य भी बनीं। बेगम ज़फर अली ने अन्य सामाजिक मुद्दों के साथ-साथ शिक्षा और महिला स्वतंत्रता के लिए अनेक सुधारों को लाने का प्रयास किया। बेगम ज़फ़र अली ने महिला शिक्षा क्षेत्र में महिलाओं को और अधिक शिक्षित करने के लिए अपने गांव में बहुत से कार्यक्रमो का आयोजन भी करवाया जिससे कि महिलाएं और अधिक शिक्षित हो सके और अपना अधिक से अधिक विकास कर सके।

बेगम ज़फर अली के लागतार प्रयास और मेहनत के बाद साल 1987 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हालांकि बाद में उन्होंने सरकार की कठोर नीतियों के विरोध में यह सम्मान वापस कर दिया था। उन्होंने हमेशा से ही सामाजिक कार्यों में अहम भूमिका निभाई हैं।

इस कठोर व संघर्ष से भरे सफर के बाद बेगम ज़फर अली ने साल 1999 में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। अपने अंतिम समय में बेगम ज़फर अली अपने बेटे आगा शौकत अली के निवास यूनाइटेड स्टेट्स में थी। उनके पोते आगा शाहिद अली, एक प्रसिद्ध कश्मीरी-अमेरिकी कवि थे। उन्होंने अपनी दादी की याद में एक कविता लिखी। जिसे द वील्ड सूटः द कलेक्टेड कवित संग्रह में शामिल किया गया।

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तस्वीर साभारः kashmirobserve

मेरा नाम नाज़ परवीन है। मैं बीए ऑनर्स की द्वितीय वर्ष की छात्रा हूं। मुझे लिखना पढ़ना और नयी-नयी चीजें सीखना बहुत पसंद है। मुझे रिपोर्टिंग करना भी बेहद पसंद है।

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