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तस्वीर साभार : www.bbc.com
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मैं एक संस्था के साथ काम करती हूं, जो गाँव स्तर पर महिला नेतृत्व विकास और उनकी क्षमतावर्धन के लिए काम करती है। इस संस्था में काम करते हुए हर दिन मैंने खुद में आत्मविश्वास को बढ़ते देखा है। पहले मैं कभी भी अकेले अपनी बस्ती से बाहर जाने के लिए डरती थी। लेकिन आज मैं अकेले साइकिल से अलग-अलग गाँव जाती हूं और वहां की महिलाओं और किशोरियों के साथ काम करती हूं। वैसे तो मेरे गाँव की सड़कें कामकाजी महिलाओं को देखने की अभ्यस्त नहीं है, इसलिए अक्सर जब काम पर जाती हूं तो सड़क और चाय की दुकान पर बैठे लोगों के बीच चर्चा होती है। ये सब कई बार मुझे असहज बनाता है, लेकिन कभी डर नहीं लगता।

सालभर में होली एकमात्र ऐसा त्योहार है जब मुझे काम पर जाने में डर लगता है। होली का त्योहार आने से कुछ दिन पहले से ही मुझे घर पर बैठना पड़ता है। होली ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को हमेशा सुरक्षा के मोटे कवच में रहने की मांग करता है, क्योंकि इस त्योहार के पास आते ही पुरुष रंग लगाने और त्योहार के बहाने से महिलाओं के साथ बद्तमीज़ी और उत्पीड़न करने की कोशिश करते हैं। ‘होली के त्योहार के समय महिलाएं खुद को कितना सुरक्षित महसूस करती हैं’, इस सवाल को लेकर जब मैने गाँव की कुछ युवा महिलाओं के साथ बात की तो उनके कई अनुभव सामने आए।

खरगूपुर गाँव की रहने वाली बाईस वर्षीय ममता बताती हैं, “मुझे होली का त्योहार बिल्कुल पसंद नहीं है। जब छोटी थी तो ये त्योहार हमें बहुत पसंद था। लेकिन जैसे-जैसे बड़ी हुई, तो यह त्योहार हिंसा करने का एक मौक़ा के रूप में दिखाई देने लगा। मैं तब बारहवीं में थी जब स्कूल से घर वापस आते समय गाँव के कुछ लड़कों ने रंग घोलकर मुझ पर डाल दिया और फिर गंदे-गंदे कमेंट करने लगे। इसका पता जब मेरे घरवालों को लगा तो उन लोगों ने मेरा स्कूल जाना बंद कर दिया और फिर मैंने आगे की पढ़ाई प्राइवेट से की। अब मुझे यही लगता है कि अगर ये त्योहार नहीं होता तो मुझे कभी ही ये परेशानी नहीं हुई होती।”

कहने को तो होली रंग का त्योहार होता है, पर महिलाओं के लिए ये त्योहार बेरंग हो जाता है। क्योंकि उन्हें इस त्योहार को मनाते हुए खुद को सुरक्षित करने का डर हर पल होता है।

अदमा-बसुहन गाँव की रहने वाली पैंतीस वर्षीय फूलपत्ती देवी कहती हैं कि होली के दिन गाँव के लड़के अक्सर दारू पीकर घरों में आकर महिलाओं के साथ रंग लगाने के बहाने परेशान करने की कोशिश करते हैं। हमको तो ऐसा लगता है कि होली के त्योहार के समय तो महिलाएं अपने घर तक में सुरक्षित नहीं होती हैं। इस त्योहार की एक कमजोरी यह भी है कि अगर किसी को बुरा-भला कहो भी तो उसे लोग गंभीरता से नहीं लेते और कई बार ये बड़ा विवाद का भी विषय बन जाता है।

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बड़ौरा गाँव की रहने वाली आरती दसवी क्लास में पढ़ती है। आरती होली के त्योहार को लेकर कहती हैं, “मुझे रंग खेलना बहुत अच्छा लगता है, लेकिन मैंने अपने घर में होली के दौरान हमेशा अपनी मम्मी और चाची को छिपते देखा है, ऐसा क्यों होता है ये मुझे तब समझ में नहीं आता था। एक बार जब मैं रंग खेलने अपने दोस्तों के साथ घर से बाहर निकली तो दूर के एक चाचा (जिनकी उम्र बीस साल रही होगी) ने रंग लगाने के बहाने मुझे ग़लत तरीक़े से छूना शुरू किया,तब मैं बहुत डर गई और रोते हुए घर वापस आ गई। तब से मैंने रंग खेलना बंद कर दिया। अब मुझे पता चला कि क्यों चाची और मम्मी होली के त्योहार के समय काम ख़त्म होने के बाद अपने कमरे में छुप ज़ाया करती थी।” 

रंगों का त्योहार होली हर साल की तरह इस साल भी आ चुका है। होली सुनते ही हमारे मन में हमेशा ज़हन में रंग, पकवान, दोस्त और परिवार की तस्वीरें सामने आती हैं। लेकिन महिलाओं के अनुभव इस मामले में थोड़े अलग होते हैं, क्योंकि होली सुनते ही अक्सर महिलाओं के ज़हन में बात आती खुद की सुरक्षा की। ऐसा क्यों, इस बात का ज़वाब हम ऊपर बताए गए महिलाओं के अनुभवों से मिल सकता है। हर त्योहार की तरह, होली का त्योहार भी महिलाओं पर काम का बोझ लेकर आता है। पकवान बनाने से लेकर होली खेलने की पूरी तैयारी का ज़िम्मा महिलाओं के ऊपर होता है और इन सबके के साथ महिलाओं पर ज़िम्मेदारी होती है खुद कि सुरक्षा की।

होली के त्योहार के समय न केवल हमारे घर महिलाओं के असुरक्षा लाते है बल्कि सड़कों पर अश्लील गानों पर थिरकते और नशे में चूर पुरुष किसी भी महिला पर भद्दे कमेंट या फिर रंग फेंकने से पीछे नहीं हटते। ये सारी बातें होली के त्योहार को महिलाओं के लिए असुरक्षित बनाती है। कहने को तो होली रंग का त्योहार होता है, पर महिलाओं के लिए ये त्योहार बेरंग हो जाता है। क्योंकि उन्हें इस त्योहार को मनाते हुए खुद को सुरक्षित करने का डर हर पल होता है। यहां हमलोगों को यह सोचना होगा कि अगर किसी त्योहार में महिला सुरक्षा बड़ा सवाल हो तो क्या वाक़ई वह त्योहार सभी के लिए है या फिर सिर्फ़ पुरुषों का त्योहार है। रिश्ते, ओहदे और त्योहार के नाम पर महिलाओं के साथ होनी वाली हिंसा को दूर किए बिना हम भाईचारे और सौहार्द के नामपर मनाए जाने वाले इस त्योहार को महिला-हिंसा मुक्त बनाना ज़रूरी है।

इसके लिए हम सभी लोगों को ये समझना और दूसरों को समझाना ज़रूरी है कि किसी को भी रंग लगाने से पहले उसकी सहमति को जानना ज़रूरी है और सहमति का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि वो जो चाहे उनके साथ कर सकते हैं। होली के त्योहार में सहमति की बात को हमें दूसरों को समझाना होगा और अपनी ना को मज़बूती कहना सीखना होगा। वरना हमेशा की ही तरह होली का त्योहार महिलाओं की सुरक्षा पर एक बड़ा सवाल ही बना रहेगा।

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तस्वीर साभार : www.bbc.com

नोट: निजी अनुभवों को ध्यान में रखते हुए कई नामों को सुरक्षा के लिहाज से बदल दिया गया है।

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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