जानें, महिला कैदियों के पास कौन-कौन से कानूनी अधिकार होते हैं
तस्वीर साभार: Reuters/ Jayanta Shaw
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नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था, “ऐसा कहा जाता है कि कोई भी किसी राष्ट्र को वास्तव में तब तक नहीं जानता जब तक कि वह उस देश की जेलों के अंदर नहीं रहा हो। किसी राष्ट्र का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि वह अपने सर्वोच्च नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि वह राष्ट्र अपने देश के सबसे नीचे तबके के नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, इस आधार पर उस राष्ट्र का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।” 

जेल व्यक्तियों की कैद के लिए एक संस्था है, जिन्हें किसी राज्य के सर्वोच्च प्राधिकरण द्वारा न्यायिक हिरासत में रखा गया है या जिन्हें किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए जाने के बाद वहां उन्हें कैद कर रखा जाता है। वे व्यक्ति जो किसी अपराध के दोषी पाए गए हैं उन्हें सजा के तौर पर जेल में कैद कर रखा जाता है। साथ ही वे आरोपी जिनके मुकदमे अभी न्यायालय में लंबित हैं, समकालीन जेलों में बंदी बनाए जाते हैं। कुछ देशों में ऐसे आरोपी व्यक्ति वहां की जेल की कुल आबादी का बहुमत बनाते हैं। भारत में दो-तिहाई से अधिक जेल की आबादी हिरासत में पूर्व परीक्षण बंदियों की हैं यानि भारत की जेल में लगभग दो तिहाई क़ैदी वे हैं जिनके आरोप साबित होना अभी बाक़ी हैं। 

महिलाएं हमेशा भारत में सामान्य जेल की आबादी का एक बहुत ही मामूली हिस्सा रही हैं। हालांकि, हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि हाल के कुछ सालों में उनकी आबादी में बढ़त हुई है। नैशनल क्राइम रिकॉड्स ब्यूरो की साल 2020 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की जेलों में कुल महिला बंदियों में 4,713 दोषीसिद्ध अपराधी, 15,167 विचाराधीन क़ैदी, 62 नजरबंद क़ैदी शामिल हैं। महिला कैदियों की वृद्धि के साथ महिला कैदियों के लिए बने जेलों को विनियमित करने और स्थापित करना, समय की ज़रूरत बन गई है।

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क्या हैं महिला कैदियों के अधिकार

आज की स्थिति को ध्यान में रखते हुए, महिला कैदियों के लिए मौजूद कानूनी अधिकारों को समझना बेहद ज़रूरी है। जेल में बंद अधिकतर महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ रहती हैं, जहां बच्चे के स्वास्थ्य और देखभाल के लिए सही व्यवस्था का होना बेहद ज़रूरी है। महिलाओं के साथ पुरुष कैदियों से अलग व्यवहार करने की भी ज़रूरत होती है क्योंकि उनकी व्यक्तिगत स्वास्थ्य और सफाई की अलग जरूरतें हैं। इसलिए जेल में कैद गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य भी एक बड़ी चिंता का विषय है।

महिला कैदियों को भारत में अलग अधिकार दिए गए हैं, जिनमें भारतीय संविधान, जेल अधिनियम 1894, कैदी अधिनियम 1990, कैदियों का स्थानांतरण अधिनियम 1950, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रदान किए गए अधिकार शामिल हैं। मानवीय, संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के संबंध में महिला अधिकार, जो उन्हें जेलों में उपलब्ध होने चाहिए वे निम्नलिखित हैं:

  • भारतीय संविधान महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा देता है। संविधान का अनुच्छेद 14 भारत में महिलाओं को समान सुरक्षा प्रदान करता है और अनुच्छेद 15 लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। लेकिन जहां महिला को पुरुष से अलग मापने की ज़रूरत है वहां महिला संबंधित अलग नियम और कानून बनाए जाएंगे और उनका पालन करना ज़रूरी होगा।
  • महिला बंदियों की तलाशी और जांच चिकित्सा अधिकारी के सामान्य या विशिष्ट आदेश के तहत मैट्रन द्वारा की जाएगी। 
  • महिला कैदियों को पुरुष कैदियों से अलग रहने का अधिकार है। कारागार अधिनियम 1894 की धारा 27(1) के तहत महिला के साथ-साथ पुरुष कैदियों के लिए बने जेल में, महिला कैदियों को अलग-अलग इमारतों, या एक ही इमारत के अलग-अलग हिस्सों में इस तरह से कैद किया जाएगा, जिससे उन्हें देखने, या बातचीत करने या पुरुष कैदियों के साथ संभोग करने से रोका जा सके। इसी धारा में यह भी प्रावधान है कि दोषसिद्ध अपराधी बंदियों को विचाराधीन कैदियों से अलग रखा जाएगा तथा दीवानी बंदियों को आपराधिक बंदियों से अलग रखा जाएगा।
  • सभी कैदियों को बुनियादी मानवाधिकार जैसे स्वस्थ भोजन, आश्रय, चिकित्सा देखभाल और पढ़ने-लिखने की सुविधा दी जानी चाहिए। सभी के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए और किसी भी क़ैदी को एक निजी सेल में हिरासत में नहीं लिया जा सकता है, सिवाय चिकित्सा शर्तों के या अगर वह दूसरे कैदियों के लिए खतरा साबित हुआ है। 
  • महिलाओं को प्रसव के समय पूरी चिकित्सा और व्यक्तिगत देखभाल प्रदान की जानी चाहिए और उन्हें डिलीवरी के लिए ज़मानत पर रिहा करना चाहिए।
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने सलाह दी है कि जेल में गर्भवती, बीमार या जिन पर बच्चें निर्भर हैं, उन महिलाओं की पर्सनल बांड्स पर जल्द रिहाई के लिए विचार किया जाना चाहिए।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39ए महिला कैदियों को समान अवसर के आधार पर न्याय को बढ़ावा देने के लिए एक कानूनी प्रणाली प्रदान करके मुफ्त कानूनी सहायता प्राप्त करने के लिए शक्ति देता है। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि किसी को भी उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर मौजूदा कानूनी लाभों से वंचित नहीं किया जाता है।
  • महिला कैदियों को उनके केस में त्वरित सुनवाई का अधिकार है। जैसा कि हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य में कहा गया है कि त्वरित परीक्षण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है।
  • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 54 में एक पंजीकृत चिकित्सक द्वारा गिरफ्तार व्यक्ति के शरीर की उचित जांच शामिल है। उसके साथ जेलों में प्रताड़ना और दुर्व्यवहार के मामले में गिरफ्तार महिला के अनुरोध पर उसका मेडिकल परीक्षण किया जाएगा। लेकिन आमतौर पर महिला कैदी इस अधिकार से अनजान होती हैं।

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जेल में गर्भवती महिलाओं के अधिकार

गर्भावस्था के दौरान जेल के नजदीकी अस्पताल में गर्भवती महिला को प्रसव के समय रिहा करने की अस्थायी व्यवस्था करने के लिए राष्ट्रीय आदर्श कारागार नियमावली के प्रावधानों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। न्यायालय को महिलाओं के गर्भ के बारे में पहले से सूचित किया जाना चाहिए ताकि अदालत ज़रूरी समय पर ज़मानत दे सके। गर्भवती महिला कैदियों की उचित स्वास्थ्य जांच की जानी चाहिए। एक महिला कैदी से पैदा हुए बच्चे के जन्म स्थान का उल्लेख बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र पर जन्म की जगह पर ‘जेल’ के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय कारागार नियमावली के अनुसार, एक गर्भवती महिला क़ैदी को ज़रूरत के अनुसार सही खान-पान, जैसा कि एक सामान्य गर्भवती महिला को चाहिए होता है जेल द्वारा उसे प्रदान किया जाना चाहिए। बच्चे के जन्म के बाद, कम से कम एक महीने तक, महिला और बच्चे को अलग आवास और अन्य स्वच्छ देखभाल प्रदान की जानी चाहिए ताकि बच्चे को अलग-अलग तरह के संक्रमणों से बचाया जा सके। महिला बंदियों को अपने बच्चों को स्तनपान कराने से हतोत्साहित नहीं करना चाहिए। सभी महिला कैदियों और नवजात शिशुओं के लिए आधार कार्ड बनाए जाने चाहिए ताकि वे विभिन्न सरकारी कल्याण योजनाओं के तहत उन्हें मिलनेवाले लाभों का आनंद उठा सकें।

महिला क़ैदियों के कल्याण और उचित व्यवहार के लिए कई प्रगतिशील नियम निर्धारित किए गए हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि ये हमेशा व्यवहार में नहीं आते हैं। महिला क़ैदियों को जेल में महिला कर्मचारियों की कमी, अपर्याप्त और तंग आवास, साफ-सफ़ाई की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई महिलाएं जो अपने बच्चों के साथ रहती हैं, उन्हें अच्छी तरह से पालने के लिए उचित शैक्षिक, स्वास्थ्य और मनोरंजक सेवाएं नहीं मिलती हैं। इन मुद्दों में जेल में कानूनी सहायता की कमी, बाहरी दुनिया के साथ सीमित संपर्क और कैदियों और अधिकारियों द्वारा हिंसा की उच्च घटनाएं शामिल हैं।

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तस्वीर साभार: Reuters/ Jayanta Shaw

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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