माया कामथः भारत की मशहूर महिला राजनीतिक कार्टूनिस्ट
तस्वीर साभारः Wikimedia Commons
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माया कामथ एक प्रशिक्षित चित्रकार और प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट रही हैं। उनके बनाए कार्टून केवल हास्यबोध तक ही सीमित नहीं थे बल्कि वे गंभीर और लैंगिक रूप से संवेदनशील भी थे। भारत में कार्टूनिस्ट के तौर पर बहुत कम महिलाएं काम करती हैं। माया कामथ वह नाम है जिन्होंने इस क्षेत्र में अपने हुनर की वजह से बहुत नाम कमाया है। असाधारण प्रतिभा की धनी माया समाज की स्थिति को पहचान कर उन्हें कार्टून में दर्ज किया करती थीं।

माया कामथ के राजतीनिक मुद्दों पर कार्टून बहुत आलोचनात्मक होते थें। समाज की बुराइयों और राजनीति पर वह तीखे ब्रश चलाया करती थीं। उनके बनाए कार्टून भारतीय पत्रकारिता के स्तर को और ऊंचा करने में साहयक रहे हैं। उनके कार्टून सत्ता से सवाल करने और लोकतंत्र में आम आवाम के पक्ष की बात रखते थे। 

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शुरुआती जीवन

माया कामथ का जन्म 12 मार्च 1951 में मुंबई में हुआ था। माया ने अपने जीवन के शुरुआती साल दिल्ली में गुज़ारे थे। उनके पति का नाम अमरनाथ कामथ है। उनके बेटे का नाम नंदन और बेटी का नाम दीपा है। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एमए की डिग्री प्राप्त की थी। उन्हें बचपन से ही ड्रांइग का बहुत शौक था। बाद में शौक को ही उन्होंने अपना करियर बनाया। मैकमिलन प्रकाशन के साथ उन्होंने इलस्ट्रेटर और सोफिया स्कूल में कला के शिक्षा के तौर पर काम करना शुरू किया। 

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उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने लिन जॉनसन की स्केच बुक ‘फॉर बैटर और फॉर वर्स’ देखी। इस किताब ने उन्हें कार्टून बनाने की प्रेरणा दी। उसके बाद वह कार्टून बनाने में जुट गई। माया कामथ ने कार्टूनिस्ट के तौर पर करियर की राह चुनकर आगे बढ़ना ठान लिया था। 

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माया कामथ के राजतीनिक मुद्दों पर कार्टून्स बहुत आलोचनात्मक होते थें। वह उस समय में भारत की एकमात्र महिला राजनीतिक कार्टूनिस्ट थीं। समाज की बुराईयों और राजनीति पर वह तीखे ब्रश चलाया करती थीं। उनके बनाए कार्टून भारतीय पत्रकारिता के स्तर को और ऊंचा करने में सहायक रहे हैं।

कार्टूनिस्ट के तौर पर करियर

माया कामथ ने कार्टूनिस्ट के तौर पर अपने करियर की शुरुआत 1985 में की थी। उनका पहला कार्टून गीता के टाइटल से डेक्नन हेराल्ड ग्रुप के ईवनिंग हेराल्ड में प्रकाशित हुआ था। यह कार्टून एक  फैमिली बेस्ड कार्टून स्ट्रिप था। उन्होंने अपने कार्टून के ज़रिये से रोजमर्रा के मुद्दों को आवाज़ दी।

एक कार्टूनिस्ट के तौर पर अपनी पैनी नज़र से उनका काम समय के साथ और निखरता चला गया। उनके बनाए कार्टून लोगों को पसंद आने लगे। उसके बाद माया को स्थानीय इंडियन एक्सप्रेस में एक स्लॉट मिला। जहां उनका काम प्रकाशित होता था। माया के करेंट अफेयर्स से जुड़े मुद्दे पर बने कार्टून सिटी टैब, द पायनियर, द इंडिपेडेंट, फ्री प्रेस जर्नल, न्यूजडे, मिड डे, इकोनॉमिक टाइम्स, द एशियन ऐज और द टाइम्स ऑफ इंडिया जैसी जगह प्रकाशित हुआ करते थे।

डेक्कन हेराल्ड के साथ सिटी लाइफ से जुड़ा उनका कार्टून पेज नंबर तीन पर नियमित रूप से प्रकाशित हुआ करता था जबतक उन्होंने द एशियन ऐज के साथ काम शुरू नहीं किया यह प्रक्रिया चलती रही। पर्यावरण पर बनाए उनके कार्टून ‘थर्ड वर्ल्ड’ टाइटल जर्मन एंथोलॉजी में प्रकाशित हुए।

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माया कामथ राजनीतिक, लैंगिक संवेदनशील और पर्यावरण के मुद्दों पर विशेष तौर पर काम किया करती थीं। उन्होंने वंचितों और शोषित वर्ग की लड़ाई और संघर्षों को हमेशा अपने काम में शामिल किया है। विशेषतौर पर वह महिलाओं से जुड़े विषयों पर बहुत मुखर थीं। जब भी वह काम के बीच किसी पुरुष को आराम करते देखती थीं तो उनका कहना था कि क्यों महिलाएं रसोई में बच्चों के साथ गुलाम के तौर पर लगातार काम कर रही हैं। अपने कार्टूनों में समाज की इस असमानता पर वह खुलकर बात किया करती थीं। 

तस्वीर साभारः Pratha

माया एक पशु प्रेमी भी थीं। वह कम्पैशन अनलिमिटेड प्लस एक्शन (सीयूपीए), बैंगलुरू में एक पशुओं के संरक्षण के लिए काम करनेवाली संस्था के साथ काम किया करती थीं। उन्होंने आवारा कुत्तों के अडॉप्शन के लिए भी काम किया है। पशुओं के कल्याण के लिए वह चैरिटी भी किया करती थीं। अपने कार्टून चित्रों की प्रदर्शनी से मिलनेवाले पैसे को वह बच्चों और पशुओं के कल्याण कार्य के लिए दान कर दिया करती थी।

माया अपने काम के लिए बहुत समर्पित थीं। वह हर स्थिति में काम करके खुश रहती थीं। बीमार होने के बाद भी उनमें काम करने का जज्बा कभी खत्म नहीं हुआ। उन्होंने कैंसर की सर्जरी के महज चार दिन बाद अपने काम पर लौटकर ब्रश और पेन थाम लिया था। 26 अक्टूबर 2001 केवल पचास साल की उम्र में कैंसर से उनकी मौत हो गई थी। अपनी मौत के समय माया कामथ भारत में एकलौती महिला कार्टूनिस्ट थीं जो राजनीति के मुद्दों पर कार्टून बनाया करती थीं।

उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने लिन जॉनसन की स्केच बुक ‘फॉर बैटर और फॉर वर्स’ देखी। इस किताब ने उन्हें कार्टून बनाने की प्रेरणा दी। उसके बाद वह कार्टून बनाने में जुट गई।

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माया कामथ मेमोरियल पुरस्कार

कार्टूनिस्ट के तौर पर माया कामथ के काम के सम्मान में उनके पति अमरनाथ कामथ ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कार्टूनिस्ट्स में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ‘माया कामथ मेमोरियल पुरस्कार’ प्रतियोगिता 2008 में स्थापित की। हर साल आईआईसी, कार्टूनिंग में उत्कृष्टता के लिए वार्षिक प्रतियोगिता का आयोजन करवाती है। प्रतियोगिता में जीत हासिल करनेवालों कार्टूनिस्टों के कार्टूनों की इंडियन कार्टून गैलरी में प्रदर्शनी में शामिल किया जाता है।

इंडियन कार्टून गैलरी में ‘माया जाल’ के नाम से उनके काम की प्रदर्शनी लगाई गई। सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर बने उनके स्टिप्र और पॉकेट कार्टून को मुख्य रूप से दर्शाया गया। भारतीय पत्रकारिता के क्षेत्र में महिला कार्टूनिस्ट के तौर पर उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है।  

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तस्वीर साभारः Wikimedia Commons

स्रोतः

Wikipedia

Mulled Ink

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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