इतिहास जहांआरा बेग़म: दिल्ली के मशहूर चांदनी चौक की रूपरेखा तैयार करने में निभाई थी अहम भूमिका

जहांआरा बेग़म: दिल्ली के मशहूर चांदनी चौक की रूपरेखा तैयार करने में निभाई थी अहम भूमिका

जहांआरा का जन्म साल 1614 में हुआ। अजमेर में जन्मी जहांआरा शाहजहां और मुमताज़ महल की बड़ी बेटी और औरंगजेब की बड़ी बहन थीं। वह अपने भाई औरंगजेब और पिता के काफी करीब थी। उन्हें राजकाज में काफी रुचि थी। शाहजहां और औरंगजेब की विश्वासपात्र होने की वजह से राजकार्यों में उनसे सलाह भी ली जाती थी।

मुग़ल काल के दौरान गुलबदन बेग़म, नूरजहां, मुमताज़ महल, रोशन आरा और ज़ेबुन्निसा जैसी कई बेग़मों का नाम लिया जाता है। इन्हीं मुगलकालीन बेगमों में से एक थीं जहांआरा बेग़म। नूरजहां और मुमताज़ महल मुगलकाल में मल्लिका रहीं लेकिन इस समय की कोई और शहज़ादी जहांआरा की शख़्सियत तक नहीं पहुंचती। मुमताज़ महल की मौत के बाद मुग़ल साम्राज्य के हरम का सारा भार जहांआरा बेग़म पर आ गया। यह ज़िम्मेदारी लेते वक्त उनकी उम्र सिर्फ 17 साल की थी। 

जहांआरा का जन्म साल 1614 में हुआ। अजमेर में जन्मी जहांआरा शाहजहां और मुमताज़ महल की बड़ी बेटी और औरंगजेब की बड़ी बहन थीं। वह अपने भाई औरंगजेब और पिता के काफी करीब थीं। उन्हें राजकाज में काफी रुचि थी। शाहजहां और औरंगजेब की विश्वासपात्र होने की वजह से राजकार्यों में उनसे सलाह भी ली जाती थी। फारसी भाषा का अच्छा ज्ञान होने के चलते उन्होंने फारसी में दो ग्रंथों की रचना की। इतिहासकार इन्हें मुग़ल काल की सबसे अमीर बेगमों से एक मानते हैं। 
जहांआरा अपने आप में ही एक मुकम्मल शख्सियत थीं। 17 साल की उम्र दौरान उस ज़माने में ‘पादशाह बेग़म’ बनना किसी औरत के लिए बड़े ओहदे से कम न था।

साल 1648 में बने शाहजहानाबाद की 19 में से 5 इमारतें जहांआरा की देखरेख में बनी थीं। चांदनी चौक आज संकरी गलियों सहित भीड़भाड़ वाला बाजार है, जो कि कभी एक शानदार शाही बाजार हुआ करता था। शाहजहानाबाद व्यापार का केंद्र था जो कि 1650 में जहांआरा द्वारा बनवाया गया था

औरंगजेब और जहांआरा के विचारों में बहुत अंतर था। शाहजहां के बेटों शिकोह, औरंगजेब, मुराद बख़्श में सत्ता को लेकर हमेशा तकरार रही। तब जहांआरा ने औरंगजेब के सामने सभी भाइयों में सत्ता बराबर बांटने का प्रस्ताव रखा लेकिन वह नहीं माना। सत्ता की चाहत के चलते औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को साल 1658 में बंदी बना लिया। मां मुमताज़ से किए गए वादे के अनुसार शाहजहां के बंदी होने के बावजूद जहांआरा उनकी देखभाल करती रहीं। इसलिए उनके पिता का स्नेह उन पर हमेशा बना रहा। 

 बिजनेस वुमेन ‘जहांआरा’ 

जहांआरा मुगल काल की एक ‘बिजनेस वुमन’ थीं। अपने पिता और भाई औरंगजेब की चहेती होने के चलते उनका वेतन लगातार बढ़ता गया। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की शोध पत्रिका ‘इतिहास’ के मुताबिक शुरू में जहांआरा को वेतन के तौर में सात लाख रुपए सालाना मिलते थे। उनकी मां मुमताज़ की मौत के बाद, हरम की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपने के साथ ही उनके वेतन में बढ़ोतरी हुई।  

उनकी आय का माध्यम केवल शाहजहां और औरंगजेब द्वारा दिया गया वेतन ही नहीं था। उनकी आय के कई और भी साधन थे। वह पश्चिमी देशों के साथ व्यापार करती थीं। सूरत बंदरगाह से मिलनेवाली पूरी आय उनके हिस्से में आती थी। उनके खुद के कई जहाज थे जो डच और अंग्रेजों से व्यापार करने समुंदर पार जाते। बीबीसी से बातचीत के दौरान इतिहासकार इरा मुखौटी बताती हैं कि जब पश्चिमी यात्री भारत आते थे तो उन्हें यह देखकर बेहद हैरानी होती थी कि मुग़ल बेगमें कितनी ताकतवर होती हैं। इसके ठीक उलट उस ज़माने की पश्चिमी औरतों के पास उस तरह के अधिकार नहीं थे।

जहांआरा का जन्म साल 1614 में हुआ। अजमेर में जन्मी जहांआरा शाहजहां और मुमताज़ महल की बड़ी बेटी और औरंगजेब की बड़ी बहन थीं। वह अपने भाई औरंगजेब और पिता के काफी करीब थी। उन्हें राजकाज में काफी रुचि थी। शाहजहां और औरंगजेब की विश्वासपात्र होने की वजह से राजकार्यों में उनसे सलाह भी ली जाती थी।

फ्रेंच इतिहासकार फ्रांस्वा बर्नियर की किताब, ‘ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर’ के मुताबिक जहांआरा बेहद खूबसूरत थीं। शाहजहां उन्हें बेहद चाहते थे। जहांआरा अपने पिता का इतना ध्यान रखती थीं कि शाही दस्तरख्वान पर ऐसा कोई खाना नहीं परोसा जाता था जो जहांआरा की देखरेख में न बना हो।

हालांकि, इतिहासकार राना सफवी का मानना है कि सिर्फ़ बर्नियर ने ही शाहजहां और जहांआरा के नाजायज़ संबंधों की बात लिखी है। उनके कहना है कि बर्नियर औरंगजेब के साथ थे और उन्हें दारा शिकोह से बहुत रंजिश थी। बर्नियर उत्तराधिकार की लड़ाई में औरंगजेब का साथ दे रहे थे, तो वहीं जहांआरा दारा शिकोह के साथ थीं। इस वजह से बर्नियर द्वारा इस तरह की अफवाहें फैलाई गई।  

चांदनी चौक की रूपरेखा तैयार करनेवाली जहांआरा 

साल 1648 में बने शाहजहानाबाद की 19 में से 5 इमारतें जहांआरा की देखरेख में बनी थीं। चांदनी चौक आज संकरी गलियों सहित भीड़भाड़ वाला बाजार है, जो कि कभी एक शानदार शाही बाजार हुआ करता था। शाहजहानाबाद व्यापार का केंद्र था जो कि 1650 में जहांआरा द्वारा बनवाया गया था। मशहूर इतिहासकार इरा मुखौटी ने भी मुगल काल की महिलाओं पर शोध करने के दौरान पाया कि शाहजहांनाबाद का नक्शा जहांआरा बेग़म ने अपनी देखरेख में बनवाया था। दिल्ली की चकाचौंध और मशहूर जगह चांदनी चौक भी उन्हीं की देन है। उन्होंने ने ही इस जगह की रूपरेखा तैयार की थी।

मुग़लकाल में जहांआरा महिलाओं के लिए एक सार्वजनिक स्थान बनानेवाली पहली मुग़ल शहज़ादी थी। उन्होंने दिल्ली से सटे यमुना पार साहिबाबाद में बेगम का बाग़ बनावाया था, ताकि महिलाएं आज़ादी के साथ बाग़ की सैर कर सकें और वहां की ख़ूबसूरती का आनंद ले सकें।

जहांआरा को उनके भाई दारा शिकोह द्वारा सूफीवाद से ‌परिचित कराया गया था। सूफी संतो के‌ प्रति वह हमेशा से ही समर्पित रही थी। इस विषय पर शुरुआती दौर से जहांआरा अपने भाई दारा शिकोह और पिता शाहजहां से शास्त्रार्थ किया करती थीं। सूफीवाद से प्रभावित होकर जहांआरा ने श्रीनगर में सूफी संत मुल्ला शाह बदाक्षी के लिए कई उद्यान, खानकाह और मस्जिद परिसरों की स्थापना करवाई। आगरा के शाहजहांनी मस्जिद की पट्टिका पर फारसी शिला लेखों में उनका गुणगान भी किया गया है। जहांआरा औपचारिक रूप से मुरीद यानी शिष्य बनने और अपने पीर यानी गुरु के अनुसार जीवन जीने वाली पहली मुग़ल महिला थी। जिन्हें इस बात पर गर्व भी था। उन्होंने कई मस्जिदें बनवाईं और अजमेर में हज़रत मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर एक बारादरी का निर्माण भी करवाया। उन्होंने कई मस्जिदें भी बनवाईं थी, जिनमें से एक थी आगरा की जामा मस्जि़द। इस मस्जिद में एक विशेष कमरा बनवाया गया था जिसमें महिलाएं इबादत कर सकें।

जहांआरा स्वयं में शाहजहांनी दरबार में एक शक्तिशाली व्यक्ति थी और उन्होंने अपनी राजनीतिक सत्ता सहित अपने व्यक्तिगत सम्मान दोनों को लेखन और वास्तुशिल्प की एक श्रृंखला के जरिए व्यक्त किया था। जहांआरा ने 1660 मे ‘मुनीस-अल-अरवाह’ सूफी सन्तों का एक संकलन और ‘रिसाला- ए- साहिबियाह’ एक आत्म कथात्मक सूफी ग्रंथ लिखा था। ये दोनों किताबें उन्होंने फारसी भाषा में लिखी थीं। अपने लेखन और वास्तुशिल्प दोनों में जहाँआरा एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की धनी थीं।मुग़लकाल में जहांआरा महिलाओं के लिए एक सार्वजनिक स्थान बनानेवाली पहली मुग़ल शहज़ादी थी। उन्होंने दिल्ली से सटे यमुना पार साहिबाबाद में बेगम का बाग़ बनावाया था, ताकि महिलाएं आज़ादी के साथ बाग़ की सैर कर सकें और वहां की ख़ूबसूरती का आनंद ले सकें।

साल 1681 में 67 की आयु में ही इस प्रतिभावान शहजादी की मृत्यु हो गई। जहांआरा को उनकी इच्छा के मुताबिक दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की मज़ार के बगल में दफ़नाया गया। बीबीसी की एक रिपोर्ट में राना सफवी के कहती हैं जहांआरा ने वसीयत की थी कि उनकी क़ब्र सादगीपूर्ण और खुली होनी चाहिए। उसे पक्का नहीं किया जाना चाहिए। कहा जाता है कि  मुगल इतिहास में सिर्फ औरंगजेब और जहांआरा की क़ब्रें ही बहुत साधारण हैं और उन्हें पक्का नहीं बनवाया गया है।  


स्रोत:

1- Wikipedia
2- BBC

About the author(s)

Priyanka Yadav

मेरा नाम प्रियंका है। मै दिल्ली में रहती हूं। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय "कॉलेज ऑफ़ वोकेशनल स्टडीज" से स्नातक किया है। मुझे कविताएं पढ़ने और लिखने में रूचि है। खाली समय में कभी कभी  गुनगुनाना भी पसंद करती हूँ। सीखने सीखाने के लिए अग्रसर रहती हूं। मैं थोड़ी गंभीर स्वभाव की हूं। नई -नई चीजों को जानना मुझे काफी पसंद है। मुझे समाजिक मुद्दों पर लिखना पसंद है। समाज में उठने वाले ऐसे मुद्दे जिन्हे अक्सर लोग नजर अंदाज करते हैं।

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