इतिहास कैन्डिड तस्वीर की शुरुआत करने वाली जुड़वा बहनें: देबलीना रॉय और मनोबिना रॉय

कैन्डिड तस्वीर की शुरुआत करने वाली जुड़वा बहनें: देबलीना रॉय और मनोबिना रॉय

दोनों बहनों के नाम से पहली तस्वीरें 1937 की पत्रिका 'शोचित्रो भारत' में प्रकाशित हुईं। 1940 में, इलाहाबाद में प्रदर्शित 81 तस्वीरों में से, देबलीना और मानोबिना की तस्वीरें सबसे अधिक दिलचस्प थीं। उन्होंने तस्वीरों को प्रतियोगिताओं में भेजा और कई पुरस्कार जीते।

जब आप ‘फ़ोटोग्राफ़र’ शब्द सुनते हैं तो सबसे पहले आपके दिमाग में एक पुरुष की छवि स्थापित होती है। न्यूज या फिल्मों के प्रोडक्शन में जो लोग कैमरा पर होते हैं उन्हें आम तौर पर ‘कैमरा मैन” के नाम से ही संबोधित किया जाता है। इंजीनियर, पायलट, सैनिक और पुलिस जैसे कई पेशों की तरह पितृसत्ता ने फ़ोटोग्राफ़ी को भी लैंगिक आधार पर बाँट रखा है। लेकिन इस दुनिया में दो बहनों ने अपना खूब नाम कमाया। साल 1931 में बिनोद बिहारी सेन रॉय ने अपनी जुड़वा बेटियों के 12वें जन्मदिन पर उन्हें ऐग्फा ब्राउनी कैमरा बॉक्स भेंट किया। और यहीं बहनें देबलीना मजूमदार और मनोबिना रॉय आगे चल कर भारत की पहली दो महिला फ़ोटोग्राफ़र्स बनी। जिसे आज हम फ़ोटोग्राफ़ी की ‘कैन्डिड’ शैली कहते हैं उसकी शुरुआत भी इन्होंने ही की थी।

देबलीना और मनोबिना का जन्म नवंबर 1919 में हुआ। बनारस के पास रामनगर में रहने वाले मध्यम-वर्गीय बंगाली परिवार में जन्मी इन जुड़वा बहनों को इनके घरवाले प्यार से ‘लीना दी’ और ‘बीना दी’ कह कर पुकारते थे। इनके पिता बनारस के महाराज द्वारा नियुक्त हेडमास्टर थे और साथ में रॉयल फ़ोटोग्राफ़िक सोसाइटी ऑफ ब्रिटेन के सदस्य भी थे। वे एक प्रगतिशील व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलवाने का निश्चय किया। पिता अपनी बेटियों को दरबारों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए ले जाते थे।

मनोबिना लिखती हैं कि उनके पुरुष सहकर्मी फ़ोटोग्राफ़ी जगत में सम्मानित चेहरे बन गए, जबकि उनके जैसी महिलाओं को हमेशा केवल ‘शौकिया महिला फ़ोटोग्राफ़र’ माना जाता था और तुलना करते हुए मान्यता से वंचित रखा जाता था। अपनी उपलब्धियों के बावजूद, उन्हें अपने जीवनकाल में कभी वह पहचान नहीं मिली जिसके वे हकदार थीं।

फोटोग्राफी की शुरुआत

साल 1931 में वाल्टर बेंजामिन ने ‘लिटल हिस्ट्री ऑफ फोटोग्राफी’ प्रकाशित किया जो आज के समय में एक क्रोनिकल है। उसी साल देबलीना और मानोबिना ने अपना बारहवां जन्मदिन मनाया और उनके पिता ने उन्हें एक-एक एग्फ़ा ब्राउनी कैमरा उपहार में दिया। उन्होंने अपनी बेटियों को कैमरों का उपयोग कर, खूब सारी तस्वीरें खींचने के लिए कहा। उन्होंने इनके लिए एक अस्थायी डार्क रूम भी बनवाया। विभिन्न शैलियों में पारंगत हासिल करने और अपनी स्वयं की शैलियां विकसित करने; रोलीफ्लेक्स और रोलीकोर्ड जैसे ट्विन लेंस रिफ्लेक्स कैमरों में ट्रांजीशन के लिए अँधेरे कमरे में भी आराम से रहने; और अपने आस-पास बढ़ रही फोटोग्राफिक संस्कृति के माध्यम से अपने काम का प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित किया।

इस तरह फोटोग्राफी के प्रति एक उत्साह भरे सफ़र की शुरुआत हुई, जिससे दोनों बहनें जीवन भर जुड़ी रहीं। उन्होंने प्रकृति, परिदृश्य, परिवार, दोस्त और एक-दूसरे की भी खूब तस्वीरें खींचीं। आगे चल कर, वे संयुक्त प्रांत पोस्टल पोर्टफोलियो सर्कल की सदस्य बन गईं, जो फ़ोटोग्राफ़िक सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा बनाया गया एक समूह था। इस सर्कल के सदस्य पोस्ट के माध्यम से फ़ोटोग्राफ़िक प्रिंट का आदान-प्रदान करते थे, जिसे दूसरे शहर के सैलून में प्रदर्शित किया जाता था।

इनके जीवन में फोटोग्राफी पेशे के रूप में कभी नहीं रहा। लेकिन हमेशा उनके लिए एक गंभीर चर्चा का विषय रहा। देबलीना के पोते राजसदय याद करते हैं कि कैसे वे दोनों अपने काम के बारे में बात करते समय लगभग गीतात्मक हो जाती थीं। उन्हें यह करना और इसके बारे में बात करना पसंद था।

वैवाहिक जीवन

1936 में 17 साल की मनोबिना की शादी 27 वर्षीय फोटोग्राफर बिमल रॉय से हो गई और ये दोनों मुंबई में बस गए। देबलीना ने कोलकाता से परास्नातक किया और 7 साल बाद, उनकी भी उद्योगपति नीतीश चंद्र मजूमदार से शादी हो गई। कलकत्ता और बंबई में अलग-अलग रहने के बाद भी ये दोनों बहनें हमेशा फोटोग्राफी के प्रति समर्पित रहीं और फ़ोटोग्राफ़ी जारी रखा। मानोबिना की सबसे बड़ी बेटी रिंकी लिखती हैं कि 1959-1960 में इन दोनों को लंदन में छह महीने के लिए साथ रहने का मौका मिला। इस यात्रा से वे पेरिस और जिनेवा होते हुए लौटीं। वे हर समय पार्कों, सड़कों, थिएटरों और दुकानों में अपनी साड़ियों पर कैमरे लटकाए चलती थीं।

पेशा न होते हुए भी फोटोग्राफी का पैशन

इनके जीवन में फोटोग्राफी पेशे के रूप में कभी नहीं रहा। लेकिन हमेशा उनके लिए एक गंभीर चर्चा का विषय रहा। देबलीना के पोते राजसदय याद करते हैं कि कैसे वे दोनों अपने काम के बारे में बात करते समय लगभग गीतात्मक हो जाती थीं। उन्हें यह करना और इसके बारे में बात करना पसंद था। शादी के बाद दोनों बहनों ने बंबई और कलकत्ता में अपना-अपना घर संभाला, बच्चों की परवरिश की, लेकिन इन सब के साथ तस्वीरें खींचना भी जारी रखा। लेकिन ज्यादातर परिवार के भीतर- बच्चों के बचपन, यात्राओं, घटनाओं और परिवार के सदस्यों का दस्तावेजीकरण किया। मनोबिना एक ‘भाग्यशाली’ फ़ोटोग्राफ़र के रूप में जानी जाने लगीं। उनके द्वारा खींची गई एक लड़की की वैवाहिक तस्वीर को कथित तौर पर तुरंत शादी के प्रस्ताव मिलने लगते थे। मनोबिना की बेटी रिंकी लिखती हैं कि उन्हें किसी भी अन्य चीज़ से ज़्यादा लोगों की तस्वीरें खींचना पसंद था। व्यक्तिगत रूप से महसूस करती हूं कि मेरे पिता ने मेरी मां की कला को पर्याप्त रूप से प्रोत्साहित नहीं किया। लेकिन उनकी गंभीर रुचि को स्वीकार करते हुए, कभी-कभार दोनों बहनों को कैमरा, लेंस और फिल्म रोल पर पढ़ने के लिए जानकारी और सामग्री प्रदान करते थे।

तस्वीर साभार: Homegrown

फोटोग्राफी जगत में इनका सफ़र

दोनों बहनों के नाम से पहली तस्वीरें 1937 की पत्रिका ‘शोचित्रो भारत’ में प्रकाशित हुईं। 1940 में, इलाहाबाद में प्रदर्शित 81 तस्वीरों में से, देबलीना और मानोबिना की तस्वीरें सबसे अधिक दिलचस्प थीं। उन्होंने तस्वीरों को प्रतियोगिताओं में भेजा और कई पुरस्कार जीते। जब वे साथ में फोटोग्राफी करती थीं, उन्हें पता था कि दो अलग-अलग दृष्टिकोणों के साथ एक ही विषय की फ़ोटोग्राफ़ी करने पर भी अलग-अलग परिणाम होंगे। वे न केवल कैमरा उठाने वाली पहली कुछ भारतीय महिलाओं में से थीं, बल्कि ‘कैन्डिड फ़ोटोग्राफ़ी’ की शुरुआत भी इन्होंने ने ही की। उनका संग्रह 20वीं सदी की शुरुआत और मध्य के दौरान महिलाओं के जीवन की एक अंतरंग झलक है। यह दस्तावेज़ीकरण और सौंदर्यशास्त्र उनके कैमरों के बहुमुखी उपयोग का प्रमाण है।

दोनों बहनों के नाम से पहली तस्वीरें 1937 की पत्रिका ‘शोचित्रो भारत’ में प्रकाशित हुईं। 1940 में, इलाहाबाद में प्रदर्शित 81 तस्वीरों में से, देबलीना और मानोबिना की तस्वीरें सबसे अधिक दिलचस्प थीं। उन्होंने तस्वीरों को प्रतियोगिताओं में भेजा और कई पुरस्कार जीते।

उनका काम

1951 में, द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया की एक श्रृंखला ‘ट्वेंटी-फाइव पोर्ट्रेट्स ऑफ रवीन्द्रनाथ टैगोर’ में उनकी एक चित्र शामिल था, जिसे मनोबिना द्वारा जगन्नाथ पुरी में खींचा गया था। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, विजय लक्ष्मी पंडित और वी.के. कृष्ण मेनन सहित अन्य लोगों की तस्वीरें भी खींचीं। उन्होंने लंदन में मताधिकार के लिए संघर्ष कर रही महिलाओं की तस्वीरें भी खींचीं। देबलीना तीन वर्षों तक फ़ोटोग्राफ़ी एसोसिएशन ऑफ़ बंगाल की अध्यक्ष के रूप में सेवा करती रहीं। वह संयुक्त प्रांत एमेच्योर फ़ोटोग्राफ़िक एसोसिएशन की मानद सचिव और फेडरेशन ऑफ इंडियन फ़ोटोग्राफ़ी के महिला फोरम की सदस्य भी थीं, जिसने व्यूफाइंडर नामक एक पत्रिका प्रकाशित की थी।

1959 में, मनोबिना को इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के साथ अपना काम फिर से प्रकाशित करने का अवसर मिला। वे अपने पति बिमल रॉय, जो वहाँ ज्यूरी थे, उनके साथ मॉस्को फिल्म फेस्टिवल गईं थीं और उनसे वहाँ की तस्वीरें लेने और अपनी यात्रा के बारे में लिखने के लिए कहा गया। उसके बाद उन्होंने फेमिना के लिए एक कॉलम लिखना शुरू किया जिसमें अपनी यात्राओं के बारे में बात की और फ़ोटोग्राफ़ी के क्षेत्र में नस्लवाद और लैंगिक भेदभाव की ओर इशारा किया। मनोबिना लिखती हैं कि उनके पुरुष सहकर्मी फ़ोटोग्राफ़ी जगत में सम्मानित चेहरे बन गए, जबकि उनके जैसी महिलाओं को हमेशा केवल ‘शौकिया महिला फ़ोटोग्राफ़र’ माना जाता था और तुलना करते हुए मान्यता से वंचित रखा जाता था। अपनी उपलब्धियों के बावजूद, उन्हें अपने जीवनकाल में कभी वह पहचान नहीं मिली जिसके वे हकदार थीं।

मनोबिना ने करीब 80 वर्षों तक तस्वीरें खींचना जारी रखा, जब तक कि उनका स्वास्थ्य खराब नहीं होने लगा और 2001 में 82 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। दस साल बाद 2012 में 92 वर्ष की आयु में देबलीना का भी निधन हो गया। उन्होंने भी अपनी विरासत में अपने काम का एक अद्भुत समूह जो अब सामाजिक विज्ञान अध्ययन केंद्र, कोलकाता के पास एक संपत्ति के रूप में छोड़ा है। मनोबिना ने फ़ोटोग्राफ़िक कार्यों के साथ-साथ लिखित साहित्य के अविश्वसनीय संग्रह के रूप में एक विरासत छोड़ी है। मनोबिना के आखिरी समय में कुछ सप्ताह दोनों बहनों ने साथ बिताए। एक तरह से कहा जा सकता है कि गर्भ से मृत्यु शैय्या तक दोनों बहनें साथ रहीं-जीवन में भी और रचनात्मक अभिव्यक्ति में भी। 

About the author(s)

Vartika Shrivastava

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले से आती हूँ। दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की, उस दौरान किताबों से थोड़ी अधिक मुलाक़ात हुई तो लगा पढ़ना-लिखना अच्छा लगता है। लेखन में करिअर खोजते हुए पत्रकारिता चुन ली। सबकी तरह मैं भी अपना बयान दर्ज करवाने की कोशिश में  लगी हूँ। कहानियाँ पढ़ना, देखना और सुनना अच्छा लगता है।

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