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इंटरसेक्शनलजेंडर घर और दफ्तर के दोहरे बोझ के बीच महिलाओं की अधूरी ‘नींद’

घर और दफ्तर के दोहरे बोझ के बीच महिलाओं की अधूरी ‘नींद’

नेशनल स्लीप फ़ाउंडेशन के 2007 के सर्वेक्षण में, 30 फीसद गर्भवती महिलाओं और 42 फीसद प्रसवोत्तर महिलाओं ने बताया कि उन्हें शायद ही कभी रात में अच्छी नींद आती है, जबकि सभी महिलाओं में यह 15 फीसद था।

भारतीय समाज में महिलाएं आज हर क्षेत्र में भागीदारी निभा रही हैं। वर्तमान समय में महिलाओं की स्थिति में बदलाव आया है। वे अब सशक्त हो रही हैं और घर की देहरी पार कर बाहरी दुनिया में अपनी पहचान बना रही हैं। लेकिन क्या घर का काम उनसे छूट गया है? महिलाओं के जीवन में बदलाव आने के बावजूद उन्हें कई संघर्षों का सामना करना पड़ रहा है। आज जब वे संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं, तो उन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। लेकिन, इस इस दोहरी भूमिका का प्रभाव उनके जीवन पर पड़ रहा है। हाल ही में एक रिसर्च में यह पाया गया कि भारतीय समाज की महिलाएं नींद की कमी से जूझ रही हैं। इस विषय पर फेमिनिज़म इन इंडिया ने कुछ महिलाओं से उनकी दिनचर्या और सोने के समय को लेकर जानकारी प्राप्त की।

बिहार की रहने वाली 35 वर्षीय रेणु दिल्ली में रहकर काम करती हैं। वह कहती हैं, “मेरे परिवार में दस लोग रहते हैं, जिनमें से केवल दो ही कामकाजी हैं। मैं और मेरे पति। सुबह आठ बजे ऑफिस के लिए निकलना होता है, लेकिन मुझे सुबह पांच बजे उठना पड़ता है क्योंकि घर का सारा काम निपटाकर ही निकलती हूं। ऑफिस में शिफ्ट पूरी करने के बाद जब शाम सात बजे निकलने के बाद भी रात नौ बजे घर पहुंचती हूं। लेकिन, घर आते ही ढेर सारे काम मेरा इंतज़ार कर रहे होते हैं। मेरे आस-पास के लोग और सहेलियां अक्सर कहती हैं कि मेरे परिवार वाले कितने अच्छे हैं, जिन्होंने मुझे नौकरी करने की अनुमति दी। वे कहते हैं कि मेरा परिवार बहुत लिबरल है और समान व्यवहार करता है। लेकिन क्या इसे वास्तव में लैंगिक समानता की ओर झुकाव कहा जा सकता है?”

ऑफिस में शिफ्ट पूरी करने के बाद जब शाम सात बजे निकलने के बाद भी रात नौ बजे घर पहुंचती हूं। लेकिन, घर आते ही ढेर सारे काम मेरा इंतज़ार कर रहे होते हैं। मेरे आस-पास के लोग और सहेलियां अक्सर कहती हैं कि मेरे परिवार वाले कितने अच्छे हैं, जिन्होंने मुझे नौकरी करने की अनुमति दी। वे कहते हैं कि मेरा परिवार बहुत लिबरल है और समान व्यवहार करता है। लेकिन क्या इसे वास्तव में लैंगिक समानता की ओर झुकाव कहा जा सकता है?

घरेलू काम के बीच कामकाजी महिलाओं की नींद

हर किसी को अच्छी नींद की ज़रूरत होती है। हर रात 7-8 घंटे की नींद। लेकिन, अक्सर कहा जाता है कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज़्यादा और बेहतर नींद की ज़रूरत होती है। शोध से पता चला है कि महिलाओं को नींद की समस्याएँ ज़्यादा होती हैं और पुरुषों की तुलना में उनमें अनिद्रा का निदान होने का जोखिम ज़्यादा होता है। नेशनल स्लीप फ़ाउंडेशन के 2007 के सर्वेक्षण में, 30 फीसद गर्भवती महिलाओं और 42 फीसद प्रसवोत्तर महिलाओं ने बताया कि उन्हें शायद ही कभी रात में अच्छी नींद आती है, जबकि सभी महिलाओं में यह 15 फीसद था। इसके अलावा, 25 फीसद प्रीमेनोपॉज़ल महिलाओं और 30 फीसद पोस्टमेनोपॉज़ल महिलाओं ने बताया कि उन्हें महीने में केवल कुछ रातें या उससे भी कम अच्छी नींद आती है।

फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए रितिका बैनर्जी

अच्छे या आरामदायक स्थिति में नींद का एक कारक घरों में अवैतनिक काम भी है। इस विषय पर रेणु आगे बताती हैं, “जब मैं ऑफिस से लौटती हूं, तो मेरे पति भी साथ आते हैं। मगर वे आराम से टीवी देखने लगते हैं, जबकि मैं रसोई में लग जाती हूं। सबके लिए खाना बनाना, परोसना और सबके सोने के बाद घर का बाकी काम निपटाना ताकि सुबह की जल्दी में परेशानी न हो। ये सब करते-करते रात के बारह बज जाते हैं। फिर जल्दी उठकर फिर से वही दिनचर्या शुरू हो जाती है। ऑफिस में काम का अलग तनाव होता है। इस सबके बीच मेरी नींद पूरी नहीं हो पाती, जिससे थकावट और मानसिक तनाव बना रहता है।”

नेशनल स्लीप फ़ाउंडेशन के 2007 के सर्वेक्षण में, 30 फीसद गर्भवती महिलाओं और 42 फीसद प्रसवोत्तर महिलाओं ने बताया कि उन्हें शायद ही कभी रात में अच्छी नींद आती है, जबकि सभी महिलाओं में यह 15 फीसद था। इसके अलावा, 25 फीसद प्रीमेनोपॉज़ल महिलाओं और 30 फीसद पोस्टमेनोपॉज़ल महिलाओं ने बताया कि उन्हें महीने में केवल कुछ रातें या उससे भी कम अच्छी नींद आती है।

क्या गृहणियां पाती हैं पूरी नींद

अक्सर देखा गया है कि अधिकांश महिलाएं घरेलू काम और दफ्तर के काम के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती रहती हैं। जब काम का बोझ व्यक्ति की क्षमता से अधिक हो जाता है, तो वह तनाव का कारण बनता है। कई शोधों में यह स्पष्ट किया गया है कि जिन महिलाओं पर काम का दबाव अधिक होता है, वे अत्यधिक मानसिक तनाव महसूस करती हैं, जिसका सीधा असर उनकी नींद और स्वास्थ्य पर पड़ता है। उतर प्रदेश की रहने वाली 30 वर्षीय रेशमा दिल्ली में रह रही गृहणी हैं। वह कहती हैं, “मेरे परिवार में कभी भी बाहर जाकर काम करने की अनुमति नहीं मिली, हालांकि मैंने कई बार कोशिश की। अब जैसे-तैसे गृहिणी बनकर ही रह गई हूं। घरेलू काम को कभी भी ‘काम’ की श्रेणी में नहीं रखा गया, लेकिन इसका प्रभाव जीवन के हर मोड़ पर पड़ता है। मैं अपने जीवन में क्या करना चाहती हूं, यह सोचना भी अब मुझे गलत लगने लगा है। मुझे पेंटिंग का बहुत शौक है। समय मिलने पर पेंटिंग बनाती भी हूं। लेकिन उन्हें बेचने की अनुमति नहीं है। अब तो मेरी दिनचर्या बस सुबह चार बजे उठने से शुरू होती है और पूरा दिन परिवार की सेवा में बीत जाता है। यही मेरी जिम्मेदारी बन गई है।”

फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए श्रेया टिंगल

रेशमा आगे कहती हैं, “पूरा दिन चूल्हा-चौका, बर्तन और घर की सफाई में निकल जाता है। मेरे परिवार में सभी को ताज़ा और गर्म खाना पसंद है। तीन बच्चे हैं, जिन्हें स्कूल छोड़ना और लाना, उनकी देखभाल करना यह सब मेरी जिम्मेदारी है। दिन कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। सुबह चार बजे उठती हूं और रात करीब एक बजे सोती हूं। इस लंबे समय में दिन में शायद ही कभी कुछ मिनट मिलते हैं जब मैं थोड़ी देर के लिए आँखें बंद कर सकूँ। इन सबका मेरे जीवन पर गहरा असर पड़ता है। शारीरिक और मानसिक रूप से भी, सबसे बड़ी बात यह है कि इस मेहनत भरे काम के लिए न कोई तनख्वाह मिलती है, न ही इसे ‘काम’ का दर्जा दिया जाता है। समाज और परिवार दोनों ही इसे एक महिला का कर्तव्य मानते हैं।” 

सुबह चार बजे उठती हूं और रात करीब एक बजे सोती हूं। इस लंबे समय में दिन में शायद ही कभी कुछ मिनट मिलते हैं जब मैं थोड़ी देर के लिए आँखें बंद कर सकूँ। इन सबका मेरे जीवन पर गहरा असर पड़ता है। शारीरिक और मानसिक रूप से भी, सबसे बड़ी बात यह है कि इस मेहनत भरे काम के लिए न कोई तनख्वाह मिलती है, न ही इसे ‘काम’ का दर्जा दिया जाता है। समाज और परिवार दोनों ही इसे एक महिला का कर्तव्य मानते हैं।

पुरुषों और महिलाओं में अवैतनिक काम के समय में अंतर

टाइम यूज़ सर्वे 2024 के अनुसार, महिलाएं प्रतिदिन औसतन 4 घंटे 49 मिनट घरेलू कामों में व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष केवल 88 मिनट यानी लगभग डेढ़ घंटे घरेलू कार्यों में समय देते हैं। महिलाओं द्वारा किए जाने वाले घरेलू कामों को लेकर समाज में बहुत कम चर्चा होती है। इस विषय पर संवाद की कमी और पारंपरिक सामाजिक ढांचे के कारण यह मुद्दा कभी गंभीर बहस का विषय नहीं बन पाया है। इसी कारण यह देखा गया है कि महिलाएं बिना किसी आर्थिक मान्यता के घरेलू कामों में अपना अधिक समय और श्रम लगा रही हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के टाइम यूज़ सर्वे 2019 रिपोर्ट के अनुसार भी भारत में महिलाएं पुरुषों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक समय घरेलू कार्यों में लगाती हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए श्रेया टिंगल

इस विषय पर दिल्ली की रहने वाली एक गैर सरकारी संस्था में काम कर रही 38 वर्षीय अनिता कहती हैं, “आज के समय में अगर आप महिला हैं और आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं, तो आपको दोहरा संघर्ष करना पड़ता है। कार्यस्थल पर लगातार खुद को साबित करना होता है। लैंगिक भेदभाव के कारण एक अलग तरह का तनाव महसूस होता है। चाहे आप कितना भी अच्छा काम करें, फिर भी ऊंचे और अहम पदों पर पुरुषों का वर्चस्व बना रहता है। इसके अलावा, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अक्सर कम वेतन मिलता है, जो असमानता को दिखाता है।” टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पुरुषों और महिलाओं के बीच औसत प्रति घंटा वेतन में 25.4 प्रतिशत का अंतर है, यानी महिलाएं पुरुषों की तुलना में प्रति घंटे 25.4 प्रतिशत कम कमाती हैं। वैतनिक भेदभाव भी महिलाओं के मानसिक तनाव, आत्मसम्मान और करियर के विकास को प्रभावित करता है।

ऑफिस से आने के बाद इतनी ऊर्जा नहीं बचती कि घर का काम कर सकूं, लेकिन उस काम को मना भी नहीं कर सकती। अगर मना करूंगी तो अगली ही सुबह से मुझे काम पर जाने से रोक दिया जाएगा। इन सब कारणों से झल्लाहट होने लगती है और यही उलझन मेरी नींद को प्रभावित करती है।

देखभाल के काम में महिलाओं की भूमिका और नींद की कमी  

घर के कामकाज के बंटवारे को लेकर अक्सर बातचीत नहीं होती और ये महिलाओं को कम आराम मिलने का एक अहम कारण है। इस विषय पर अनिता कहती हैं, कार्यस्थल पर भेदभाव का सामना करने के बाद जब मैं घर लौटती हूं तो यहां भी वही स्थिति मिलती है। ऑफिस से आने के बाद इतनी ऊर्जा नहीं बचती कि घर का काम कर सकूं, लेकिन उस काम को मना भी नहीं कर सकती। अगर मना करूंगी तो अगली ही सुबह से मुझे काम पर जाने से रोक दिया जाएगा। इन सब कारणों से झल्लाहट होने लगती है और यही उलझन मेरी नींद को प्रभावित करती है। अगर परिवार में कोई बुजुर्ग बीमार हो जाए, तो काम का दबाव और बढ़ जाता है। हालांकि मेरे पति पारिवारिक देखभाल में सहयोग करते हैं, फिर भी कहीं न कहीं आज भी महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा ज़्यादा काम करना पड़ता है।”

टाइम यूज़ सर्वे 2024 के अनुसार, भारतीय समाज में आज भी घर की देखभाल, बीमार परिवारजनों की सेवा, बच्चों की परवरिश और घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ मूल रूप से महिलाओं के कंधों पर होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं रोज़ाना औसतन 137 मिनट परिवार के सदस्यों की देखभाल में बिताती हैं, जबकि पुरुष मात्र 75 मिनट ही देते हैं। यह अंतर सामाजिक असमानता की ओर इशारा करता है। समय के साथ महिलाएं शिक्षा, रोजगार और अन्य बाहरी क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं और आर्थिक रूप से भी सशक्त हो रही हैं। परिवार के खर्चों में बराबरी से योगदान दे रही हैं। इसके बावजूद घरेलू कामों की जिम्मेदारी अब भी अधिकतर उन्हीं के हिस्से आती है। घरेलू कामों के लिए वेतन मिले या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि आज भी महिलाओं से ये उम्मीद की जाती है कि वे बिना पारिश्रमिक ये काम करेंगी। समाज को यह समझना होगा कि घरेलू काम केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है। जब महिलाएं बाहर के काम में बराबरी से भागीदारी निभा रही हैं, तो पुरुषों का भी कर्तव्य है कि वे घरेलू जिम्मेदारियों में समान रूप से हिस्सा लें। तभी महिलाओं पर काम का दोहरा दबाव कम होगा और एक संतुलित व समान समाज की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकेगा।

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