बीते दिनों उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के ठाकुरद्वारा कस्बे में अदालत परिसर के अंदर एक महिला वकील पर दो व्यक्तियों ने तेजाब से हमला कर दिया। हमलावरों में से एक ने पहले वकील के सिर पर पिस्तौल तान दी, जबकि दूसरे ने तेजाब डाल दिया, जिससे उनके चेहरे और सिर पर गंभीर चोटें आईं। घटना उस समय हुई जब महिला वकील अपने चैंबर की ओर जा रही थी। हमला करने वाले दोनों आरोपी उन मामलों में पक्षकार थे, जिनमें वकील मामले में पीड़ित पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। हमले के बाद साथी वकीलों ने महिला को अस्पताल पहुंचाया, जबकि दोनों आरोपी मौके से भाग निकले।
अदालत परिसर के अंदर हुई इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या महिलाएं अपने कार्यस्थल पर सुरक्षित हैं। खासकर वे महिलाएं, जो अधिक संवेदनशील कार्यस्थलों पर काम करती हैं, वे कितनी सुरक्षित हैं? अदालत परिसर, जहां कानून की रक्षा की जाती है, वहां एक महिला वकील पर हमला होना सभी अन्य कार्यस्थलों पर महिला सुरक्षा पर सवाल खड़ा करता है।
बीते दिनों उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के ठाकुरद्वारा कस्बे में अदालत परिसर के अंदर एक महिला वकील पर दो व्यक्तियों ने तेजाब से हमला कर दिया। हमलावरों में से एक ने पहले वकील के सिर पर पिस्तौल तान दी, जबकि दूसरे ने तेजाब डाल दिया, जिससे उनके चेहरे और सिर पर गंभीर चोटें आईं।
कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा की अहमियत

वैसे तो लगभग हर पेशे में महिलाओं की सुरक्षा एक चुनौती है, लेकिन कुछ पेशे अधिक संवेदनशील हैं, जहां उन्हें अधिक खतरों का सामना करना पड़ता है। चिकित्सा क्षेत्र, न्यायिक क्षेत्र, मीडिया, मिल या खेतों में काम करने वाली महिलाएं, घरेलू कामगार और कॉरपोरेट क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं अपने कार्यस्थल पर अधिक जोखिम का सामना करती हैं। इस विषय पर बिहार के अररिया जिले की शबनम अली (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “जब मैंने वकालत की पढ़ाई पूरी कर प्रैक्टिस शुरू की, तो मुझे अपने सीनियर्स के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। पितृसत्तात्मक सोच और महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे के नज़रिए के कारण, लगातार मेहनत के बावजूद मुझे अपने सीनियरों की आलोचना और दुर्व्यवहार झेलना पड़ा। कई बार मुझे “महिला हो, ज़्यादा मत उड़ो” और “महिला हो, एक बार में निपटा दी जाओगी” जैसे शर्मनाक और डराने वाले ताने सुनने पड़े। महिला होने के नाते जितना मुश्किल एक पुरुषवादी सोच से भरे कार्यस्थल पर रहना है, उतना ही कार्यालय से बाहर भी रहना कठिन है। एक केस के सिलसिले में मुझे बार-बार आरोपी पक्ष से धमकियां मिलती थीं। जब उन्होंने केस से पीछे हटने से इनकार किया, तो अज्ञात लोग मेरा पीछा करने लगे और मुझे धमकी भरे कॉल आने लगे।”

कार्यस्थल पर सुरक्षा की कमी से न सिर्फ महिलाओं का कार्यस्थल पर कामकाज में रुकावट आती है बल्कि उन्हें काम करने से भी मना किया जाता है। खराब कार्यस्थलीय परिस्थितियां, अपर्याप्त सुरक्षा उपाय और नियोक्ताओं की लापरवाही दुर्घटनाओं को जन्म देती हैं। इससे न केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है, बल्कि उत्पादन क्षमता और कार्यस्थल की समग्र दक्षता भी प्रभावित होती है। महिलाओं के लिए यह समस्या और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि उन्हें शारीरिक सुरक्षा के साथ-साथ यौन उत्पीड़न और भेदभाव जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। इस विषय पर गाइनोकॉलजिस्ट डॉ. अंजू प्रिया बताती हैं, “मेरा पेशा समाज में सम्मानित माना जाता है। लेकिन मेरे लिए डॉक्टर होना किसी कठिन सफ़र से कम नहीं है। हम डॉक्टर दिन-रात मरीजों की सेवा करते हैं, लेकिन हमारी एक गलती भी हमें जान का दुश्मन बना सकती है।”
जब मैंने वकालत की पढ़ाई पूरी कर प्रैक्टिस शुरू की, तो मुझे अपने सीनियर्स के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। पितृसत्तात्मक सोच और महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे के नज़रिए के कारण, लगातार मेहनत के बावजूद मुझे अपने सीनियरों की आलोचना और दुर्व्यवहार झेलना पड़ा।
डॉ. अंजू एक घटना का जिक्र करते हुए बताती हैं, “कुछ समय पहले मेरे क्लीनिक में एक महिला आई, जो बेहद कमज़ोर और कम उम्र की थी। उसकी हालत गंभीर थी। मैंने उसका इलाज किया, लेकिन कुछ समय के लिए उसकी स्थिति बिगड़ गई, जिससे उसके घरवालों ने मेरे पर हमला कर दिया और जान से मारने तक की धमकी दी।” नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2021 में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के 450 से अधिक मामले दर्ज किए गए, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल क्यों जरूरी है, इस पर एक प्राइवेट संस्थान में काम करने वाली महिला सोनी (बदला हुआ नाम), बताती हैं, “मेरे बॉस अक्सर अनचाहे व्यवहार करते थे। वे इच्छा के विरुद्ध मुझे छूते थे और हंसी-मज़ाक के बहाने अश्लील हरकतें करते थे। जब मैंने नौकरी छोड़ दी, तो बॉस मुझे धमकी भरे कॉल करने लगे और मेरी शक्ल बिगाड़ने की धमकी देने लगे।” सोनी बताती हैं कि वो इस डर से शहर छोड़कर अपने गांव लौट गई। वे कहती हैं कि उनके लिए वह समय मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से बेहद तोड़ देने वाला था।
कानूनी पहलू और नीतियां

इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन ने साल 2017 में 6,000 से अधिक कर्मचारियों पर एक सर्वेक्षण किया, जो भारत में अब तक का सबसे बड़ा सर्वेक्षण था। इसमें पाया गया कि यौन उत्पीड़न सभी कामकाजी क्षेत्रों में प्रचलित है और इसमें यौन टिप्पणी करने से लेकर सेक्शुअल फ़ेवर माँगना तक शामिल है। सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि अधिकांश महिलाएं सामाजिक कलंक, प्रतिशोध के डर, कानूनों की जानकारी की कमी और तंत्र में विश्वास न होने के कारण उत्पीड़न की शिकायत दर्ज नहीं कराना चाहतीं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, 2018 में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के 402 मामले दर्ज हुए थे, जो 2022 में बढ़कर 422 हो गए। यह दर्शाता है कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा चिंता का विषय है।
विशाखा गाइडलाइन्स और पॉश एक्ट
साल 1997 में विशाखा बनाम राजस्थान राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया और कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशाखा गाइडलाइन्स जारी की। इन गाइडलाइन्स के तहत:
- हर कंपनी या संगठन को अपनी आचार संहिता (Code of Conduct) में यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए नियम जोड़ने होंगे।
- हर संस्थान में एक शिकायत समिति बनानी होगी, जिसकी अध्यक्ष एक महिला होगी।
- यौन उत्पीड़न के मामलों में दोषियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी होगी और पीड़ित महिला के हितों की रक्षा करनी होगी।
- महिला कर्मचारियों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
मेरा पेशा समाज में सम्मानित माना जाता है। लेकिन मेरे लिए डॉक्टर होना किसी कठिन सफ़र से कम नहीं है। हम डॉक्टर दिन-रात मरीजों की सेवा करते हैं, लेकिन हमारी एक गलती भी हमें जान का दुश्मन बना सकती है।
2013 में ‘महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम’ (पॉश ऐक्ट) पारित किया गया, जिससे कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा को कानूनी मान्यता मिली। हालांकि नीतिगत सुधार और कानूनी प्रावधान लागू किए गए हैं, लेकिन कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अब भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं। यौन उत्पीड़न और हिंसा के मामलों में लापरवाही अपराधियों को बढ़ावा देती है और महिलाओं की सुरक्षा को खतरे में डालती है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए कार्यस्थलों पर विशाखा गाइडलाइन्स और पॉश एक्ट का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। संगठनों को स्पष्ट संदेश देना होगा कि यौन उत्पीड़न और हिंसा के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई जाएगी। महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करना अनिवार्य होना चाहिए। जब तक कार्यस्थलों पर सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक महिलाओं के करियर में समान अवसर और विकास की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।