हम एक ऐसे समाज का हिस्सा हैं जहां महिला की आवाज़ को या तो दबा दिया जाता है या उसे कम ज़रूरी समझा जाता है। मेरे लिए पढ़ना और लिखना एक ज़रिया बना अपनी अंदर की आवाज़ को पहचानने और उसे दुनिया के सामने रखने का। मेरी पहचान सिर्फ डिग्रियों तक सीमित नहीं है। लिखना और पढ़ना मेरे जीवन में सिर्फ शौक नहीं बल्कि सोचने और खुद को समझने का माध्यम रहा है। किताबों से मेरा रिश्ता सिर्फ भावनात्मक ही नहीं वैचारिक भी रहा है। जब मैं कुछ पढ़ती हूं तो बस पढ़कर आगे नहीं बढ़ जाती, मैं उस पर सोचती हूं, कभी सवाल करती हूं, कभी उससे सहमत होती हूं और कभी नहीं भी। कई बार कोई लेखक वही कह जाता है जो मैं अंदर ही अंदर महसूस कर रही होती हूं । धीरे – धीरे मुझे लगा कि जो कुछ मैं सोचती हूं या महसूस करती हूं उसे अपने तक ही न रखूं । बस, वहीं से मैंने एक छोटे से डिजिटल मंच की शुरुआत की, एक जगह जहां मैं अपने मन की बातें, पढ़े हुए अंश और रोज़मर्रा के अनुभव सहज और सरल तरीके से साझा कर सकूं । ये शुरुआत आज मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुकी है।
बचपन की कहानियों से डिजिटल नारीवाद तक का सफर

जनवरी 2025 में जब मैंने अपने इंस्टाग्राम पेज की शुरुआत की, तब वह मेरे लिए बस एक अनुभवों को समेटने की जगह थी। एक छोटा सा प्रयास जहां मैं अपने मन की बातें कह सकूं, पढ़ी हुई चीज़ों को साझा कर सकूं और उन भावनाओं को ज़ाहिर कर सकूं जो मैंने अपने भीतर महसूस की थीं। मुझे यह अंदाज़ा नहीं था कि यह छोटी सी शुरुआत धीरे धीरे इतने लोगों के दिलों में घर बना लेगी। आज ये पेज एक लाख से ज़्यादा लोगों तक संवाद कर रहा है, तो मुझे यह समझ आता है कि यह केवल एक डिजिटल पहल नहीं है, बल्कि मेरे लिए एक जीवंत यात्रा रही है। जब मैं नौवीं कक्षा में पढ़ती थी, तब मेरे दादाजी ने मुझे प्रेमचंद की कहानियों की किताब दी। उन्होंने कुछ नहीं कहा बस वो किताब मेरे हाथ में थमा दी, लेकिन उस किताब ने मुझे नए तरिके से सोचने की दिशा दी।
जनवरी 2025 में जब मैंने अपने इंस्टाग्राम पेज की शुरुआत की, तब वह मेरे लिए बस एक अनुभवों को समेटने की जगह थी। एक छोटा सा प्रयास जहां मैं अपने मन की बातें कह सकूं, पढ़ी हुई चीज़ों को साझा कर सकूं और उन भावनाओं को ज़ाहिर कर सकूं जो मैंने अपने भीतर महसूस की थीं।
फिर मैने प्रेमचंद को और पढ़ा, उनकी लिखी हुई कहानी ‘कफ़न’ की विडंबना, ‘निर्मला’ के दुख और उस समय की सामाजिक सच्चाईयां मेरे भीतर गहरी उतरती चली गईं। वे हर कहानी के बाद मुझसे कहते, “अब यह मत सोचो कि कहानी में क्या हुआ, यह सोचो कि तुम्हारे साथ क्या हुआ इसे पढ़कर।” यही वह पल थे जहां मैंने सीखा कि पढ़ना केवल जानकारी लेना नहीं होता वह खुद को बदलने की प्रक्रिया भी होती है। कुछ समय बाद मेरे स्कूल की प्रिंसिपल मैम ने मुझे द काइट रनर नाम की किताब दी। पहली बार मैंने किसी कहानी में अपराधबोध, प्यार और माफी जैसे भावों को इतने गहरे तरीके से महसूस किया। इस किताब ने मेरे अंदर नई भावनाएं जगाईं और मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि इंसान के मन, सोच और समाज के पीछे क्या चल रहा होता है। मेरी नारीवादी सोच की शुरुआत तभी हुई जब किताबों ने मुझे अंदर से इतना मज़बूत बना दिया कि मैं अपनी बातें, अपनी पहचान और एक लड़की होने के एहसास को शब्दों में कहने लगी।
इंस्टाग्राम पेज जहां विचारों को पंख मिले और चुप्पियों को आवाज़
जब मैंने अपना पेज बनाना शुरू किया, तब मेरे दिल में बस एक ही इच्छा थी। एक ऐसा मंच तैयार करना जहां मैं अपनी सोच और पढ़े हुए विचारों को अपने तरीके से, ईमानदारी और आत्मीयता के साथ साझा कर सकूं, चाहे वो नारीवाद से जुड़ी बातें हों या फिर साहित्य से जुड़ी । धीरे-धीरे यह पेज साहित्य, नारीवाद, कविता, मनोविज्ञान और दर्शन के अनगिनत धागों को आपस में जोड़ता गया और एक सुंदर सी कढ़ाई की तरह आकार लेने लगा। मैंने सावित्रीबाई फुले और मन्नू भंडारी की बात एक साथ रखी, इस्मत चुगताई की बेबाक सोच को सामने रखा, और रूसी लेखक दोस्तोयेव्स्की के गहरे विचारों पर भी बात की। मैंने कोशिश की कि साहित्य में उस नजरिए पर भी बात हो, जो अक्सर महिलाओं को सिर्फ पुरुषों की नजर से दिखाता है। मेरी हर पोस्ट मानो मेरी आत्मा की एक झलक थी जिसे मैं साझा कर रही थी और इस बांटने में जो प्रतिक्रिया मिली वही मेरे लिए फेमिनिस्ट जॉय बन गई। जब कोई अनजान लड़की मुझे मैसेज करके ये कहती है कि, “आपने तो मेरे मन की बात कह दी”, तो मुझे महसूस होता था कि नारीवाद सिर्फ सवाल उठाने का नहीं बल्कि खुद को फिर से समझने का सफर भी है।
मेरी हर पोस्ट मानो मेरी आत्मा की एक झलक थी जिसे मैं साझा कर रही थी और इस बांटने में जो प्रतिक्रिया मिली वही मेरे लिए फेमिनिस्ट जॉय बन गई। जब कोई अनजान लड़की मुझे मैसेज करके ये कहती है कि, आपने तो मेरे मन की बात कह दी।
कई बार मुझे महिलाओं के लंबे संदेश मिलते हैं, तो कभी किसी युवती का जिसने पहली बार अपनी माँ से बिना डर के बात की, कभी किसी गृहिणी का जिसे लगता है कि उसके जीवन का संघर्ष किसी ने पहली बार समझा। हर एक वाक्य मेरे लिए खास इसलिए था, क्योंकि उससे महसूस होता था कि हम जुड़ रहे हैं, सुन रहे हैं और सबसे अहम एक-दूसरे को समझने की कोशिश कर रहे हैं। लोग अक्सर सोचते हैं कि नारीवाद पुरुषों के खिलाफ है। ये गलतफहमी इतनी आम है कि मैंने भी कभी नहीं सोचा था कि इस पेज पर पुरुष भी इस पर खुलकर बात करेंगे। लेकिन इस भ्रम को सबसे पहले तोड़ा उन युवा लड़कों ने जो मुझसे जुड़कर यह कहने लगे कि अब हम समझते हैं कि टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी क्या होती है, या “मैं अब बहनों की बात सुनता हूं, समझता हूं, उन्हें टोकता नहीं हूं ।” यह सुनना मेरे लिए केवल संतोष का पल नहीं था, यह वह पल था जहां नारीवादी खुशी की एक नई परत खुली जहां पुरुष जो अकसर इस विमर्श से कटा हुआ महसूस करते हैं, अब उसमें भागीदार बन रहे थे।
फेमिनिस्ट जॉय किताबों, कलम और कविताओं के साथ

कविताएं मेरे लिए हमेशा दिल की बात कहने का सबसे सीधा और खूबसूरत तरीका रही हैं। जब मैंने इस पेज पर प्रसिद्ध हिंदी कवियों की कविताएं पढ़ना शुरू किया, तो वो सिर्फ एक साहित्य से जुड़ा काम नहीं था, बल्कि मेरे अंदर की उस चाह को पूरा करना था जो बहुत समय से छुपी हुई थी। जब लोगों ने लिखा, “आपकी आवाज़ में कविताएं पहली बार समझ आईं ” तो उस पल जो खुशी मिली वह मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं थी। इसी सफर में मैंने खुद भी लिखना शुरू किया, ऐसी कविताएं जो मेरे अपने अनुभवों से जन्मीं, मेरे सवालों से बनीं और मेरी नारीवादी दृष्टि से गूंथी गईं । ये कबिताएं मेरे लिए खुद को पहचानने का रास्ता बनीं।
लोग अक्सर सोचते हैं कि नारीवाद पुरुषों के खिलाफ है। ये गलतफहमी इतनी आम है कि मैंने भी कभी नहीं सोचा था कि इस पेज पर पुरुष भी इस पर खुलकर बात करेंगे। लेकिन इस भ्रम को सबसे पहले तोड़ा उन युवा लड़कों ने जो मुझसे जुड़कर यह कहने लगे कि अब हम समझते हैं कि टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी क्या होती है।
साहित्य को जीने और साझा करने का यही सिलसिला मेरे लिए आज भी सबसे बड़ी नारीवादी खुशी है। मेरे लिए फेमिनिस्ट जॉय कोई अचानक मिलने वाली उपलब्धि नहीं रही, वह धीरे-धीरे आई जैसे कोई आदत बनती है। वह मेरी परवरिश में था, जहां मैंने किताबों को ज़रूरत की तरह अपने हाथों में थामे रखा। वह मेरे संघर्षों में भी था, समाज के बनाए नियमों के बीच जूझते हुए मैंने अपनी आवाज़ ढूंढी। वह मेरी असफलताओं में भी था, जब महिला होने के अनुभव ने मुझे भीतर तक तोड़ा और फिर, वैसा ही कोई अनुभव साझा करने वाली किसी और महिला ने मुझे थामा भी। मेरे पेज ने मेरी यात्रा को एक दिशा तो दी लेकिन यह तलाश तो बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। आज जब कोई अनजान महिला मुझे कहती है कि मैंने उसके मन की बात कह दी तो मैं समझती हूं कि फेमिनिस्ट जॉय सिर्फ नारेबाज़ी या आक्रोश नहीं बल्कि वह गहराई भी है जो हमें ख़ुद को अपनी ही कहानियों में ढूंढने को प्रेरित करती है।
यह खुशी अकेली नहीं होती। यह बांटने से बढ़ती है और शायद इसीलिए मुझे लगता है कि मेरे लिए नारीवाद प्रेम करने की एक नई भाषा है वह प्रेम जो पूछता है, सुनता है, और डर को भी एक जगह देता है। मेरे लिए यह रास्ता न किसी क्रांति की घोषणा है, न किसी विचारधारा का प्रचार। यह मेरे लिए बस जीवन जीने का एक तरीका है जिसमें हर किताब, हर संवाद, हर चुप्पी, हर असहमति शामिल है और सबसे बढ़कर, इसमें साहित्य भी शामिल है जो हमारी चुप्पियों को आवाज़ देता है। हर दिन जब कोई न कोई लड़की, लड़का, महिला, छात्रा या बुज़ुर्ग कुछ कहता है तो मैं हर बार थोड़ी और भर जाती हूं। खुशी से, उम्मीद से और इस यकीन से कि यह दुनिया बदली जा सकती है।


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