इतिहास नुपी लान आंदोलन: मणिपुर की महिलाओं का अनदेखा संघर्ष

नुपी लान आंदोलन: मणिपुर की महिलाओं का अनदेखा संघर्ष

नुपी लान आंदोलन, मणिपुरी भाषा में इसका अर्थ है ‘महिलाओं का संघर्ष’। यह एक ऐसा आंदोलन था, जिसे आम महिलाओं ने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी, घर-परिवार और आजीविका को बचाने के लिए किया था।

जब भी हम आज़ादी की बात करते हैं, तो ज़्यादातर उन्हीं आंदोलनों का ज़िक्र होता है, जो इतिहास के केंद्र में रहे हैं, जैसे महात्मा गांधी का सत्याग्रह आंदोलन हो, स्वदेशी आंदोलन हो या फिर साल 1857 का स्वतंत्रता संग्राम। लेकिन, ये बात हमें हमेशा याद रखनी चाहिए कि हमें मिली आज़ादी सिर्फ बड़े-बड़े आंदोलनों की ही देन नहीं है, बल्कि धरातल पर लड़े गए छोटे – छोटे संघर्षों और आंदोलनों का परिणाम है। इसके साथ ही इसमें महिलाओं की भी उतनी ही भूमिका रही है, जितनी कि पुरुषों की। इन्हीं आंदोलनों में से एक है ‘नुपी लान’ आंदोलन, मणिपुरी भाषा में इसका अर्थ है ‘महिलाओं का संघर्ष’।

 ये आंदोलन भारत के मणिपुर राज्य की महिलाओं का संघर्ष था, जो आज भी सेवन सिस्टर की पहचान में कहीं गुम है। इतिहास की किताबों में अक्सर ऐसे आंदोलनों को जगह नहीं मिल पाती। यह आंदोलन एक ऐसा संघर्ष था, जिसे आम महिलाओं ने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी, घर-परिवार और आजीविका को बचाने के लिए किया था। यह आंदोलन हर उस महिला के लिए प्रेरणा बन गए, जो हिंसा के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाना चाहती हैं। 

नुपी लान आंदोलन, मणिपुरी भाषा में इसका अर्थ है ‘महिलाओं का संघर्ष’। इतिहास की किताबों में अक्सर ऐसे आंदोलनों को जगह नहीं मिल पाती। यह आंदोलन एक ऐसा संघर्ष था, जिसे आम महिलाओं ने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी, घर-परिवार और आजीविका को बचाने के लिए किया था।

लल्लुप प्रणाली के विरोध में नुपी लान की पहली लड़ाई

जब भारत पर ब्रिटिश साम्राज्य का राज था, तो मणिपुर की महिलाएं अपने घर के भरण-पोषण की कमान संभाले हुई थीं, क्योंकि उस समय मणिपुर के ज़्यादातर पुरुषों को या तो सैनिक बना दिया जाता था। या फिर उन्हें ‘लल्लुप’के नाम से जाने जाने वाले जबरन श्रम में लगा दिया जाता था, इसलिए नुपी लान की पहली लड़ाई इस लल्लुप व्यवस्था के खिलाफ थी। बात साल 1904 की है, जब मणिपुर का शासन राजा चुराचंद सिंह के पास था। लेकिन ये शासन सिर्फ दिखावे का होता था, क्योंकि असली नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथ में ही होता था। साल 1904 में जब दो ब्रिटिश अधिकारियों के बंगले आग में नष्ट हो गए। इसके बाद, ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन एजेंट कर्नल मैक्सवेल ने लल्लुप प्रणाली को लागू करते हुए मणिपुर के पुरुषों को जबरन श्रम करने का आदेश दिया। 

जिसके तहत पुरुषों को हर 30 दिनों के बाद, 10 दिनों तक मुफ्त श्रम करना अनिवार्य था, ताकि अंग्रेज़ों के दोनों बंगलों की मरम्मत की जा सके। इसके तहत पुरुषों को मज़दूरी करनी थी, वो भी बिना वेतन के, तो घर और बाज़ार संभालने का सारा ज़िम्मा महिलाओं पर आ गया। इस संकट को सबसे पहले महिलाओं ने महसूस किया और उन्होंने संगठित होकर इस निर्णय का पुरज़ोर विरोध किया। ख्वैरामबंद बाज़ार जिसे इमा कैथल या माँ का बाज़ार भी कहा जाता है। यह 500 साल पुराना बाज़ार है, जो कि दुनिया का एकमात्र ऐसा बाजार है, जिसे पूरी तरह से महिलाएं संचालित करती हैं।  

जब भारत पर ब्रिटिश साम्राज्य का राज था, तो मणिपुर की महिलाएं अपने घर के भरण-पोषण की कमान संभाले हुई थीं, क्योंकि उस समय मणिपुर के ज़्यादातर पुरुषों को या तो सैनिक बना दिया जाता था। या फिर उन्हें ‘लल्लुप’के नाम से जाने जाने वाले जबरन श्रम में लगा दिया जाता था।

वहां की महिलाओं ने सितंबर 1904 में संगठित होकर मैक्सवेल के आधिकारिक आवास पर हल्ला बोल दिया और ये ऐलान कर दिया, कि वे इस जबरन लागू की गई व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेंगी। इसमें लगभग 5000 से अधिक महिलाएं इमा कैथल बाज़ार में इकट्ठी हुई और उन्होंने ये साफ तौर पर कहा  कि जब तक लल्लुप का आदेश वापिस नहीं लिया जाएगा, तब तक वो पीछे नहीं हटेंगी। उनके दृढ़ निश्चय के आगे ब्रिटिश शासन को आखिरकार घुटने टेकने ही पड़े और लल्लुप आदेश रद्द कर दिया गया। इस संग्राम की सबसे खास बात ये थी कि इसमें कोई अकेला नेता नहीं था, बल्कि सभी महिलाओं ने संगठित होकर ब्रिटिश साम्राज्य के आर्थिक शोषण के खिलाफ सीधा प्रतिरोध किया था।

दूसरा नुपी लान आंदोलन, चावल संकट और जनप्रतिरोध

पहले नुपी लान आंदोलन ने ही, साल 1939 में हुए दूसरे नूपी लान आंदोलन की नींव मज़बूती से तैयार कर दी थी। एक तरफ़ दूसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडरा रहा था, तो वहीं दूसरी ओर मणिपुर में भी नए बदलाव हो रहे थे। वहीं दूसरे नूपी लान संघर्ष की जड़ थी, चावल का निर्यात। मणिपुर की घाटी जो खेती पर निर्भर थी, उससे लगातार चावल का निर्यात किया जा रहा था। यहां तक कि स्थानीय और बाहरी व्यापारियों ने सरकारी प्रशासन के साथ मिलकर चावल को जबरन निर्यात करना शुरू कर दिया। इसके साथ ही, चावल की कीमत और बढ़ गई और मणिपुर की जनता के लिए इसे खरीदना दिन-ब-दिन महंगा होता रहा था।  

12 दिसंबर 1939 को दूसरा नूपी लान एक बड़े आंदोलन के रूप में सामने आया। कई महिलाओं ने संगठित होकर सरकारी दफ्तरों पर धावा बोल दिया और उन्हें चावलों के निर्यात पर रोक लगाकर कीमतें कम करने और राज्य की व्यापार नीतियों को सुधारने की मांग की। 

हालात इतने खराब हो गए कि घरों में राशन की भारी कमी हो गई, क्योंकि मणिपुर के लोगों के लिए चावल सबसे प्रमुख अनाज था। इमा बाज़ार की महिलाएं, जो बड़ी मेहनत से खेती करके अपना घर चला रही थी, उन्होंने इसका विरोध करते हुए। एक बार फिर दूसरे नुपी लान की ओर रुख़ किया। हालांकि छोटे-छोटे स्थानीय संघर्षों के बाद, 12 दिसंबर 1939 को दूसरा नूपी लान एक बड़े आंदोलन के रूप में सामने आया। कई महिलाओं ने संगठित होकर सरकारी दफ्तरों पर धावा बोल दिया और उन्हें चावलों के निर्यात पर रोक लगाकर कीमतें कम करने और राज्य की व्यापार नीतियों को सुधारने की मांग की। 

महिलाओं का मार्च सरकारी दफ्तरों पर ही नहीं रुका, बल्कि उन्होंने चावल की मिलों, पुलिस थानों और व्यापारियों के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन किया। इसके साथ ही, धीरे-धीरे ये संघर्ष इतना बड़ा हो गया कि फौज तैनात हो गई। लेकिन स्थानीय जनता के समर्थन और इमा बाज़ार की महिलाओं के चट्टान जैसे दृढ़ निश्चय को कोई हिला नहीं पाया और फिर वही हुआ जो मणिुपर की महिलाएं चाहती थीं। चावल के निर्यात पर रोक लग गई और व्यापारियों को अपनी दुकानें बंद कर पड़ीं। दूसरे नुपी लान में बहुत सी महिलाएं गिरफ्तार हुई, तो कई गंभीर रूप से घायल भी हो गयीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इसलिए इसे ‘विमेन्स वॉर’ का नाम भी दिया गया था । 

महिलाओं का मार्च सरकारी दफ्तरों पर ही नहीं रुका, बल्कि उन्होंने चावल की मिलों, पुलिस थानों और व्यापारियों के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन किया। फिर वही हुआ जो मणिुपर की महिलाएं चाहती थीं। चावल के निर्यात पर रोक लग गई और व्यापारियों को अपनी दुकानें बंद कर पड़ीं।

नुपी लान का असर और विरासत

नुपी लान संघर्ष इसलिए खास थे, क्योंकि ये भारत के सबसे शुरुआती महिला-नेतृत्व वाले जन आंदोलन थे, इससे साफ़ तौर पर देखा जा सकता है, कि मणिपुर की महिलाएं केवल सामाजिक इकाई का हिस्सा ही नहीं थीं, बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप करने वाली सक्रिय शक्ति थीं। महिलाओं ने दिखा दिया कि जब-जब उनके घर-परिवार और आजीविका पर आघात होगा। वो बिना हथियार उठाए भी केवल अपनी ताकतवर गूंज और आवाज़ से शासन व्यवस्था को मजबूर कर सकती हैं। इन आंदोलनों ने गरीब और मध्यम वर्ग की राजनीतिक चेतना को जगाया, जिसके बाद कई स्थानीय महिला संगठनों का निर्माण भी हुआ।मणिपुर में आज भी हर साल 12 दिसंबर को नुपी लान का दिन मनाया जाता है, जिसके तहत बहुत से सांस्कृतिक और पारंपरिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। मणिपुर की राजधानी इम्फाल में स्थित नुपी लाल मेमोरियल कॉम्प्लेक्स में हर साल उन महिलाओं को याद किया जाता है, जिनकी बदौलत मणिपुर ने नूपी लान का गौरवशाली इतिहास रचा था।

इस मेमोरियल में इस आंदोलन की प्रतिमाएं और ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज हैं। ये इमारत महज़ पत्थरों की बिल्डिंग नहीं है, बल्कि मणिपुर की महिलाओं के लिए शक्ति का प्रतीक है। आज जब देश में महिलाएं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। यह संघर्ष या आंदोलन हमें याद दिलाता है कि यह लड़ाई नई नहीं है, जिसे सिर्फ़ तारीख़ों तक सीमित कर दिया जाए। यह एक ऐसा आंदोलन था, जिसमें आम महिलाएं इतिहास के केंद्र में खड़ी थीं। उन्होंने बिना हथियार, बिना सत्ता और बिना किसी बड़े नेतृत्व के यह दिखा दिया कि, जब महिलाओं पर अन्याय होता है, तो वे उसके ख़िलाफ़ मजबूती से खड़ी हो सकती हैं। इससे यह सीख मिलती है कि बदलाव हमेशा बड़े आंदोलनों से नहीं आता, बल्कि ज़मीन पर लड़ी गई छोटी-छोटी लड़ाइयों से भी बदलाव लाया जा सकता है।

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