सिनेमा को समाज का आईना माना जाता है, और इससे यह आशा की जाती है कि वह समाज की असल स्थिति दिखाते हुए उन वर्गों की आवाज को समाज के अन्य हिस्सों तक पहुंचाएं, जिन्हें दबाने की कोशिश की गई है, या जिन्हें कभी इस काबिल माना ही नहीं गया कि वे भी अन्य लोगों की तरह जीवन व्यतीत कर सकें। हमारे समाज में ट्रान्सजेंडर समुदाय को आज तक बुनियादी मानवाधिकार भी नहीं मिल पाएं है। इन्हें कभी कथित समाज का हिस्सा ही नहीं माना गया। हालांकि हिन्दी सिनेमा में भी यह समाज हाशिए पर ही रहा है। आज हिन्दी सिनेमा के 100 से भी ज्यादा साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन ट्रांसजेंडर लोगों का जीवन, उनकी समस्याओं, उनकी सामाजिक स्थिति, समाज का उनके प्रति नजरिया, उनके प्रति किए जा रहे अमानवीय व्यवहारों को कभी भी सही तरीके से व्यक्त करने की कोशिश नहीं की गई है। यह समुदाय कला और व्यावसायिक सिनेमा के दोनों ही रूपों से गायब रहा।
अगर ध्यान से देखें, तो समझ आता है कि फ़िल्में हमें सोचने का तरीका भी सिखाती हैं। वे यह तय करती हैं कि समाज में किसे सामान्य माना जाए और किसे अलग। फ़िल्मों में बार-बार दिखाए जाने वाले दृश्य, बातचीत और किरदार धीरे-धीरे हमारी दैनिक ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। हम वही बातें बोलने लगते हैं, वही मज़ाक करने लगते हैं और वही डर अपने मन में बैठा लेते हैं, जिन्हें सिनेमा आम बना देता है। इसलिए पर्दे पर किसी समुदाय को जैसे दिखाया जाता है। समाज भी उसे वैसे ही देखने लगता है। ऐसे में यह सवाल बेहद ज़रूरी हो जाता है कि जब बॉलीवुड ट्रांसजेंडर समुदाय के व्यक्तियों को दिखाता है, तो वह उन्हें किस रूप में पेश करता है। क्या वह उन्हें एक ऐसे इंसान की तरह दिखाता है, जिनकी ज़िंदगी में काम, रिश्ते, सपने और अधिकार हैं? या फिर उन्हें सिर्फ़ हंसी, डर और सनसनी तक सीमित कर देता है?
आज हिन्दी सिनेमा के 100 से भी ज्यादा साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन ट्रांसजेंडर लोगों का जीवन, उनकी समस्याओं, उनकी सामाजिक स्थिति, समाज का उनके प्रति नजरिया, उनके प्रति किए जा रहे अमानवीय व्यवहारों को कभी भी सही तरीके से व्यक्त करने की कोशिश नहीं की गई है।
पर्दे पर मौजूदगी, लेकिन इंसान के तौर पर गैरहाज़िरी
हिंदी सिनेमा के इतिहास में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के किरदारों की मौजूदगी बहुत सीमित और रूढ़िवादी रही है। ज़्यादातर मामलों में उन्हें या तो हंसी का पात्र बनाया गया, या फिर रहस्यमय और डरावनी छवि के रूप में पेश किया गया। उनकी चाल, आवाज़ और पहनावे का मज़ाक बनाया गया। लेकिन उनकी जिंदगी पर कभी गंभीर नज़र नहीं डाली गई। उदाहरण के लिए साल 1994 की फिल्म अंजाम में एक ट्रांस महिला का पुलिस स्टेशन वाला दृश्य देखा जा सकता है। जब चंपा- चमेली ( जॉनी लीवर ) को जेल में ले जाया गया होता है, तक एक पुलिस कांस्टेबल, इंस्पेक्टर से एक सवाल पूछता है कि सर इसे मर्दों वाली जेल में डाला जाए या महिलाओं वाली जेल में ? लेकिन चंपा पुरुष और महिला दोनों के साथ रहने के लिए मना करती है। यह दृश्य हमारे समाज की उस संरचना को साफ़ तौर पर दिखाता है, जिसमें हर एक जगह महिला और पुरुषों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।
लेकिन हाशिए पर रह रहे, दूसरे व्यक्तियों के बारे में कभी सोचा ही नहीं जाता है। हालांकि फिल्म में ये एक कॉमेडी सीन है। लेकिन असल में यह ट्रांस समुदाय के व्यक्तियों के जीवन की सच्चाई है। रिसर्च गेट में साल 2018 में छपे एक लेख के मुताबिक, हिंदी फिल्मों में ट्रांस समुदाय के व्यक्तियों की भूमिका किसी बच्चे के जन्म लेने, शादी समारोह में बधाई देने, नाचने-गाने और भीख मांगने तक ही सीमित रही, जैसे साल 1974 की एक फिल्म कुंवारा बाप का मशहूर गाना ‘सज रही गली मेरी माँ सुनहरी गोटे में’ भी बधाई देने वाले ट्रांसजेंडर समुदाय को प्रदर्शित किया गया है। बाद में में यह गाना ट्रांस समुदाय का प्रतीक बन गया और कई फिल्मों में, इसे ट्रांस व्यक्तियों में को चिढ़ाने के लिए प्रयोग किया गया। हालांकि हालात अब भी वैसे ही हैं, जैसे कई साल पहले थे। अब भी ट्रांस समुदाय के व्यक्तियों को देखते ही उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया जता है ।
साल 1994 की फिल्म अंजाम में जब एक महिला चंपा- चमेली (जॉनी लीवर) को जेल में ले जाया गया होता है, तब एक पुलिस कांस्टेबल, इंस्पेक्टर से एक सवाल पूछता है कि सर इसे मर्दों वाली जेल में डाला जाए या महिलाओं वाली जेल में ? यह दृश्य हमारे समाज की उस संरचना को साफ़ तौर पर दिखाता है, जिसमें हर एक जगह महिला और पुरुषों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।
दिखावे की दृश्यता और बहिष्कार
साल 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 4.88 लाख ट्रांसजेंडर व्यक्ति थे,लेकिन अब यह संख्या इससे कहीं अधिक होने की उम्मीद है। स्वाभाविक रूप से कई लोग अपनी लैंगिक पहचान का खुलासा नहीं करना चाहते हैं, और अगर वे ऐसा करते भी हैं, तो उनके पास अक्सर ऐसे आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं होते जो उनकी वास्तविक पहचान को दर्शाते हों, जिससे इन व्यक्तियों को बहुत ही कम अवसर मिल पाते है। यूएनडीपी की एक रिपोर्ट बताती है कि लगभग 90 प्रतिशत ट्रांसजेंडर लोग अनौपचारिक और असुरक्षित रोज़गार में काम करने को मजबूर हैं ।
यह स्थिति किसी व्यक्तिगत असफलता का नतीजा नहीं, बल्कि शिक्षा और रोज़गार से व्यवस्थित बहिष्कार का परिणाम है, जिसे सिनेमा अक्सर अनदेखा करता है। सिनेमा इन सवालों को उठाने के बजाय अक्सर इन्हें नज़रअंदाज़ करता है। पर्दे पर ट्रांसजेंडर किरदार दिखते हैं, लेकिन उनके जीवन की असल संरचनात्मक समस्याएं, काम, घर, सुरक्षा कहानी से बाहर रह जाती हैं। किसी फ़िल्म में ट्रांसजेंडर किरदार का होना अपने आप में प्रगतिशील नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या उस किरदार को अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले लेने की आज़ादी दी गई है। क्या उसे कामगार और नागरिक के रूप में देखा गया है, या फिर वह एक बार फिर दया और त्याग की कहानी तक सीमित रह गया है।
यूएनडीपी की एक रिपोर्ट बताती है कि लगभग 90 प्रतिशत ट्रांसजेंडर लोग अनौपचारिक और असुरक्षित रोज़गार में काम करने को मजबूर हैं। यह स्थिति किसी व्यक्तिगत असफलता का नतीजा नहीं, बल्कि शिक्षा और रोज़गार से व्यवस्थित बहिष्कार का परिणाम है, जिसे सिनेमा अक्सर अनदेखा करता है।
ट्रांसजेंडर किरदारों को केंद्र में रखकर बनने वाली फिल्मों की संख्या बहुत कम है। यहां तक कि सड़क और मर्डर जैसी फिल्मों में तो इन्हें क्रूर खलनायक के रूप में पेश किया गया। फिल्म सड़क में जहां ट्रांस महिला की भूमिका में महारानी (सदाशिव अमरापुरकर) एक सेक्स वर्कर दलाल के रूप में दिखाया गया है। वहीं मर्डर-2 में सीरियल किलर के रूप में दिखाया गया है। हालांकि इस तरह के नकारात्मक छवि वाली फिल्मों का विरोध देशभर में कई ट्रांसजेंडर संगठनों, जेंडर और सेक्शुअलिटी से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले संगठनों ने कई बार किया है। उनका कहना था कि पहले से ही समाज में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के बारे में सच्चाई कम और अफवाह ज्यादा फैली हुई है। ऐसे में इस तरह की फिल्में उन अफवाहों को सच्चा साबित करने में और भी ज़्यादा कारगार सिद्ध होंगी।
हालिया बदलाव में संवेदनशीलता है, लेकिन सीमाएं भी
पिछले कुछ सालों में फ़िल्मों और वेब सीरीज़ में ट्रांसजेंडर किरदारों को थोड़ी संवेदनशीलता के साथ दिखाने की कोशिश ज़रूर हुई है। पहचान के संघर्ष, परिवार से टकराव और आत्म स्वीकृति जैसे मुद्दों को जगह मिली है। यह एक ज़रूरी और सकारात्मक बदलाव है। लेकिन यह बदलाव अभी भी अपवाद बनकर रह गया है। ज़्यादातर कहानियों में ट्रांसजेंडर पात्रों को समाज से अलग दिखाया जाता है, जैसे वे आम नागरिक नहीं हैं। जबकि हकीकत यह है कि उनकी सबसे बड़ी लड़ाई सम्मानजनक रोज़गार और सुरक्षित जीवन को लेकर है। स्क्रोल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, केरल डेवलपमेंट सोसाइटी के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को साल 2017 में प्रस्तुत किए गए।
केरल डेवलपमेंट सोसाइटी के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को साल 2017 में प्रस्तुत किए गए। एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 92 फीसदी ट्रांसजेंडर महिलाओं को किसी भी प्रकार की आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने के अधिकार से वंचित किया गया था।
एक अध्ययन में पाया गया कि लगभग 92 फीसदी ट्रांसजेंडर महिलाओं को किसी भी प्रकार की आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने के अधिकार से वंचित किया गया था। इसके बावजूद सिनेमा बहुत कम मामलों में इस संरचनात्मक समस्या को कहानी के केंद्र में रखता है। फ़िल्में और टीवी कंटेंट सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करते, वे समाज को सिखाते भी हैं कि किस पर हंसना है और किसे गंभीरता से लेना है। बच्चे वही भाषा सीखते हैं जो वे पर्दे पर सुनते हैं। युवा वही मज़ाक दोहराते हैं जिसे सिनेमा सामान्य बना देता है। इसीलिए ट्रांसजेंडर लोगों पर होने वाला मज़ाक, तिरस्कार और हिंसा अक्सर नॉर्मल मान ली जाती है। गलत चित्रण भेदभाव को वैधता देता है और यह भ्रम पैदा करता है कि समस्या व्यक्ति में है, व्यवस्था में नहीं।
किसी फ़िल्म में ट्रांसजेंडर व्यक्ति के किरदार का होना ही काफ़ी नहीं है। ज़रूरी यह है कि उसे एक इंसान की तरह दिखाया जाए, जिसे अपने फैसले लेने का हक़ हो और जिसे एक आम नागरिक की तरह देखा जाए। फ़िल्में केवल मनोरंजन ही नहीं करतीं, वे हमारी सोच भी बनाती हैं। इसलिए जब ट्रांसजेंडर लोगों को गलत या अधूरा दिखाया जाता है, तो समाज में उनके साथ होने वाला भेदभाव भी सामान्य मान लिया जाता है। यहां तक कि आज के कथित आधुनिक दौर में यह समुदाय और भी ज्यादा हाशिए पर पहुंचता जा रहा है चाहे फिर वो शिक्षा का क्षेत्र हो, रोज़गार का क्षेत्र हो या फिर सिनेमा। अगर सिनेमा सच में समाज को बदलना चाहता है, तो उसे ट्रांसजेंडर लोगों को दया या मज़ाक की नज़र से नहीं, बल्कि सम्मान और बराबरी के नज़रिए से दिखाना होगा। तभी पर्दे पर दिखाई देने वाली पहचान असल ज़िंदगी में सम्मान में बदल पाएगी और हर एक इंसान आजादी से अपनी जिंदगी जी पाएगा।

