उत्तराखंड एक हिमालयी पहाड़ी राज्य है, जो अपनी भौगोलिक स्थिति के लिए संवेदनशील है, यहां अधिकांश लोग ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। गौरतलब है कि यहां रोजगार के अवसर न होने के कारण पुरुष अन्य जगहों में पलायन कर रहे हैं। गाँवों में ज्यादातर महिलाएं ही रहती हैं,और जो पुरुष रह गए हैं, उनके सामने भी रोजगार का संकट बना रहता है। पहाड़ की महिलाओं का जीवन संघर्षों से भरा है, वह दिन भर घर का काम करती हैं। इसके अलावा पहाड़ में अक्टूबर का महीना या असोज सबसे ज्यादा काम का शारीरिक और मानसिक दबाव लेकर आता है, जिसका ज्यादातर दबाव महिलाओं के ऊपर होता है। यह वह समय है, जब खेती हो रही होती है,उसे समेटना,जानवरों के लिए घास काटना,उसके बाद हरी घास को काटकर सुखाना, जो कि बहुत ही कठिन काम है। इसके साथ ही दिमाग में भी एक तरह का दबाव बना रहता है। लेकिन फिर भी महिलाओं के काम को हमेशा अनदेखा कर दिया जाता है, उनकी थकावट और शारीरिक स्वास्थ्य को अनदेखा कर दिया जता है।
पहाड़ी क्षेत्रों की महिलाओं का संघर्ष
उत्तराखंड की महिलाएं राज्य की पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक संरचना में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। अक्सर पुरुषों के रोजगार की तलाश में होने वाले पलायन के कारण महिलाएं घर में अकेले रह जाती हैं। इसका सीधा असर महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में पड़ता है। घरेलू काम की सारी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ जाती है। टाइम यूज़ सर्वे पर आधारित शोध में कहा गया है कि भारतीय महिलाएं हर दिन 7.2 घंटे अवैतनिक घरेलू काम में बिताती हैं। लेकिन यह ग्रामीण महिलाओं के काम के घंटों का ठीक निर्धारण नहीं कर पाता है। क्योंकि अकेले ही घर ,परिवार,बच्चों सहित खेतों का काम भी उन्हें खुद ही करना पड़ता है। वह दिन भर काम में लगे रहने के बावजूद आर्थिक रूप से घर के पुरुष पर निर्भर रहती हैं। उनकी स्थिति आज भी हाशिए पर बनी हुई है।
पहाड़ में अक्टूबर का महीना या असोज सबसे ज्यादा काम का शारीरिक और मानसिक दबाव लेकर आता है, जिसका ज्यादातर दबाव महिलाओं के ऊपर होता है। यह वह समय है, जब खेती हो रही होती है,उसे समेटना,जानवरों के लिए घास काटना,उसके बाद हरी घास को काटकर सुखाना, जो कि बहुत ही कठिन काम है।
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में महिलाओं के बिना जीवन की संभावनाएं नजर नहीं आती हैं। वह सदियों से काम में लगी हुई हैं। जहां वह काम न उन्हें कोई सम्मान दिला पाया है,न कोई आत्मनिर्भरता। पहाड़ों में महिलाओं की जंगली जानवरों के हमले से मौत, तो कभी पेड़ से घास काटते हुए पहाड़ी से गिरने और मौत की खबरें आज भी कहीं दर्ज नहीं हैं। आज आधुनिक समय में तो हालात और भी ज्यादा खराब हो रहे हैं। पहले जहां खेती करके साल भर का अनाज हो जाता था। आजकल वह या तो जंगली जानवर खा जाते हैं या जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं।
इस विषय पर पिथौरागढ़ के गांव भट्टयूडा की रहने वाली 75 वर्षीय भागीरथी देवी कहती हैं, “आजकल तो पहले की तुलना में सब आसान हो गया है। पहले के दिनों में महिलाओं की हालत बहुत खराब होती थी, समाज में पुरुषों का दबदबा रहता था। काम के साथ घरेलू हिंसा भी बहुत थी। हम रात को ही उठ जाते थे, जानवर भी बहुत होते थे, हमें सारा काम खुद ही करना होता था। आजकल तो गैस है, लेकिन पहले हम जंगलों में ही रहते थे, घास ,लकड़ियों का भी अभाव होता था। महिलाओं को सिर्फ काम और घर चलाने वाले के रूप में देखा जाता था। एक इंसान के रूप में हमें कोई नहीं पूछता था। बहुत सी बंदिशे थी,खाना बहुत कम मिलता था।हमारे लिए अच्छा खाना जरूरी नहीं समझा जाता था। उन दिनों किसी को कुछ हो जाता तो कोई अस्पताल नहीं जाता था। घरेलू इलाज होता और बहुत बार घर में ही मौत हो जाने की घटना आम थी।”
पहले के दिनों में महिलाओं की हालत बहुत खराब होती थी, घर में पुरुषों का दबदबा रहता था। काम के साथ घरेलू हिंसा भी बहुत थी। हम रात को ही उठ जाते थे, जानवर भी बहुत होते थे, जिनका सारा काम हमें सारा काम खुद ही करना होता था। आजकल तो गैस है, लेकिन पहले हम जंगलों में ही रहते थे, घास और लकड़ियों का भी अभाव होता था।
ग्रामीण जीवन में काम और आर्थिक गतिविधियां
ग्रामीण समाज में पितृसत्ता और रूढ़िवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं। यहां आज भी महिलाओं की भूमिका सामाजिक स्थानों में बहुत कम है, सारे जरूरी निर्णय पुरुष ही लेते हैं। समय से पहले बूढ़ी हो रही महिलाओं के चेहरे में उनके ऊपर काम का बोझ साफ दिखाई देता है। वह इतना भारी लकड़ियों का गट्ठर लाती हैं, जिसका वजन 60 किलो से ऊपर भी होता है, जिसके लिए वह कठिन रास्ता और लंबी दूरी तय करती हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाएं अपने स्वास्थ्य का कोई ध्यान नहीं रखती हैं, किसी तरह के दर्द उठने पर अक्सर नजरअंदाज करती हैं। उनके खुद के भीतर पितृसत्ता की इतनी गहरी पकड़ बन चुकी है कि वह इस संरचना और काम के असमान वितरण को अपना नैतिक फर्ज समझती हैं। किसी काम से विद्रोह नहीं करती और न ही इस भेदभाव पूर्ण संरचना के खिलाफ सवाल उठाती हैं।
इस भेदभाव पूर्ण संरचना के खिलाफ, यहां महिलाओं के पास कोई आर्थिक गतिविधियां नहीं है, और अगर हैं भी तो बहुत सीमित। घर में दुधारू जानवर पालकर दूध बेचती हैं, तो उसे दूर पहुंचाना होता है। वह ज्यादातर गाय का घी बेचती हैं। लेकिन, यह आर्थिक गतिविधि इतनी पर्याप्त नहीं है कि जिससे उनका घर चल सके। मेहनत बहुत ज्यादा लगती है और मुनाफ़ा बहुत कम होता है। ज्यादा जानवर पालकर उनके देख-रेख का बोझ भी उनके ही ऊपर आता है, जिसके लिए वह कोशिश करती हैं कि एक या दो ही पशु हों, वह भी अच्छी नस्ल के जो आजीविका में कुछ मदद कर सकें।
पिछले दस सालों में 5,00,000 से अधिक लोग उत्तराखंड से पलायन करने के लिए मजबूर हुए हैं। नतीजन, लोगों ने 3946 गांवों को स्थायी रूप से छोड़ दिया है। आरटीआई से पता चलता है कि इन लोगों में से, लगभग 1,18,961 लोग वापस लौटने के इरादे के बिना, स्थायी रूप से राज्य से बाहर चले गए।
काम का दबाव और परिवार की मदद
सवाल यह उठता है कि कोई भी काम महिलाओं के जिम्मे ही क्यों आता है। वह पुरुषों के हिस्से क्यों नहीं आता। महिलाओं को समझा जाता है कि उसकी तो आदत है,वह कर लेगी। यह मानसिक रूप से भी महिलाओं को बहुत परेशान करता है। वह काम वाले दिनों ऐसे काम में लगी हुई मिलती हैं, मानो उसके अलावा जीवन में कुछ हो ही नहीं। असोज में पहाड़ी महिलाओं को इतना काम होता है, जिसमें फुर्सत जैसा कोई शब्द नहीं होता। महिलाएं एक दिन भी खेत में आना नहीं छोड़ती, ताकि वह पीछे न रह जाएं। यहां घास कटाई बड़े पैमाने में होती है, जिसके लिए आज मशीन आ गई है, जिसने महिलाओं के काम को कुछ कम किया है। यह मशीन महिला खुद चलाती हैं,या फिर पुरुष।
पिथौरागढ़ जिले की 40 वर्षीय गीता देवी बताती है, “काम का बहुत दबाव होता है। बहुत बार मैं झुंझला जाती हूं। इतना काम करने के बाद भी सुनने को मिलता है कि तुझसे ज्यादा काम हम खुद करते हैं। मैं अंधेरे में ही उठ जाती हूं। बच्चों के लिए खाना बनाना ,स्कूल भेजना। उसके बाद घर के कामों में लग जाना अपने आप में थका देता है। जल्दी घर का और जानवरों का काम निपटाकर अकेले खेत जाती हूं। दिन के लिए वहीं कुछ खाने को रख लेती हूं,नहीं तो चाय पी लेती हूं। मुझे नहीं पता पौष्टिक खाना क्या होता है। जो घर में बनता है वह खा लेती हूं। घर में क्या बनेगा यह पुरुष की इच्छा पर निर्भर करता है कि उसे क्या अच्छा लगता है। घर के सदस्य काम करते हैं, जो बहुत टुकड़ों में हैं । लेकिन मेरे हिस्से का काम सारा मुझे ही करना होता है। कभी बहुत बुरा भी लगता है। जब घर वाले इतना काम करने के बाद भी ताने सुनाते है।”
इतना काम करने के बाद भी सुनने को मिलता है कि तुझसे ज्यादा काम हम खुद करते हैं। मैं अंधेरे में ही उठ जाती हूं। बच्चों के लिए खाना बनाना ,स्कूल भेजना। उसके बाद घर के कामों में लग जाना अपने आप में थका देता है। जल्दी घर का और जानवरों का काम निपटाकर अकेले खेत जाती हूं। दिन के लिए वहीं कुछ खाने को रख लेती हूं,नहीं तो चाय पी लेती हूं।
ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन और जलवायु परिवर्तन
उत्तराखंड में पलायन एक गंभीर मुद्दा है। यहां रोजगार के अवसर न होने के कारण पुरुषों ने बड़ी संख्या में पलायन किया है। बहुत से गांवों से लोगों ने मूलभूत सुविधाओं के अभाव में पूरा परिवार ही पलायन कर गया है। यहां की भौगोलिक संरचना जटिल रही है। दुर्गम रास्तों,और पहाड़ी ढलान जैसे जगहों से लोगों ने पूरी तरह पलायन कर दिया है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में साल 2021 में छपी आरटीआई रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दस सालों में 5,00,000 से अधिक लोग उत्तराखंड से पलायन करने के लिए मजबूर हुए हैं। नतीजन, लोगों ने 3946 गांवों को स्थायी रूप से छोड़ दिया है। आरटीआई से पता चलता है कि इन लोगों में से, लगभग 1,18,961 लोग वापस लौटने के इरादे के बिना, स्थायी रूप से राज्य से बाहर चले गए।
जो लोग रह गए है उनमें भी ज्यादातर महिलाएं ही हैं, जो विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए भी गांव में बनी हुई हैं।इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का ऐसा असर हुआ है कि फसल भी नहीं होती है। अनियमित वर्षा, सूखा, ओले प्राकृतिक प्रकोप बढ़ गए हैं। बारिश के दिनों अत्यधिक बारिश होना, गर्मी के दिनों बारिश का न होना कुछ ऐसे कारण है, जिन्होंने यहां के कृषि क्षेत्र को पूरी तरह प्रभावित किया है। अब तो जो बीज खेतों में डाला जाता था, वह भी पूरा नहीं हो पा रहा है। स्थिति यहां तक खराब है कि अकाल की स्थिति पैदा हो चुकी है।
क्या हो सकता है आगे का रास्ता
पहाड़ की महिलाओं की स्थिति में तब ही सुधार आ सकता है ,जब सरकार बुनियादी ज़रूरतों के लिए जमीनी स्तर पर काम करे। ऐसी योजनाओं की शुरुआत करे जो महिलाओं में आत्मविश्वास भर सकें।इसके साथ ही महिलाओं की सामाजिक भूमिका सुनिश्चित करनी होगी। ताकि सामाजिक स्थानों से उनकी मौजूदगी गायब न हो। उनके पारंपरिक कार्य को भी उचित बाजार उपलब्ध कराना चाहिए। ताकि आत्मनिर्भरता आ सके और उनकी पहचान बन सके। सच्चाई यह है कि सरकार हो या किसी तरह के स्वयं सहायता समूह जिनका कार्यक्षेत्र सीमित है। वह उत्तराखंड की महिलाओं को उदासीनता से नहीं बचा पा रहे हैं ।पुरुषों के पलायन, सीमित आजीविका के साधन और जलवायु परिवर्तन ने महिलाओं के काम और मानसिक दबाव को और बढ़ा दिया है। खेती, पशुपालन और घरेलू काम का अधिकांश बोझ उनके कंधों पर है, फिर भी उनका श्रम न तो गिना जाता है और न ही सम्मान पाता है। जब तक नीतियों और विकास योजनाओं में पहाड़ी महिलाओं की वास्तविक जरूरतों, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक पहाड़ों का सामाजिक और आर्थिक भविष्य असंतुलित बना रहेगा।

