इंटरसेक्शनलजेंडर क्यों ज़रूरी है महिलाओं के नज़रिये से पलायन को समझना

क्यों ज़रूरी है महिलाओं के नज़रिये से पलायन को समझना

लेकिन क्या महिलाएं स्वतंत्र रूप से भी पलायन करती हैं? क्या प्रवासी महिलाओं के परिवार में उनकी हैसियत में कोई बदलाव आता है? क्या पलायन महिलाओं को एक जगह की पितृसत्ता से निकाल कर दूसरी जगह की पितृसत्ता में धकेल देता है? इन सब सवालों के जवाब पाने के लिए पहले हमें पलायन को लैंगिक दृष्टिकोण से समझना ज़रूरी है।

दुनियाभर में, पहले से कहीं अधिक लोग पलायन कर रहे हैं। उनमें से कई अपने और अपने परिवार के लिए नये अवसरों और बेहतर जीवन की तलाश करते हैं। कई लोगों को आपदा या संघर्ष के कारण स्थानांतरित होने के लिए मजबूर होना पड़ता है। परंपरागत रूप से, बेहतर जीवन की संभावनाओं की तलाश में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाना एक पुरुषों का काम माना जाता रहा है। हालांकि पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी बड़ी संख्या में पलायन कर रही होती हैं। एक व्यक्ति की लैंगिक पहचान प्रवास के अनुभव के हर चरण को आकार देती है। कौन प्रवास करता है और कहां जाता है, लोग कैसे प्रवास करते हैं, इससे जुड़े जोख़िम, प्रवासी द्वारा उपयोग किए जाने वाले साधन, गंतव्यों पर उपलब्ध अवसर और संसाधन और मूल स्थान के साथ संबंध- सभी बिंदुओं पर व्यक्ति के लिंग, धर्म, जाति, वर्ग का प्रभाव होता है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, कुल प्रवासी कामगारों की संख्या 164 मिलियन होने का अनुमान है, जो साल 2017 में दुनिया के प्रवासियों का लगभग आधा हिस्सा है। लेकिन फिर भी अंतरराष्ट्रीय प्रवासन के सिद्धांतों में जेंडर को शामिल करने के लिए बहुत कम ठोस प्रयास किए गए हैं। माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टिट्यूट के अध्ययन के अनुसार 1960 और 1970 के दशक की शुरुआत में पलायन को समझने के लिए ‘प्रवासी और उनके परिवार’ जैसे वाक्यांश का प्रयोग होता था जिसका निहित अर्थ है, ‘पुरुष प्रवासियों और उनकी पत्नियां और बच्चे।’

पलायन और जेंडर की भूमिका

महिला आंदोलनों के ज़रिये प्रवासियों के रूप में महिलाओं की अदृश्यता, प्रवासन प्रक्रिया में उनकी अनुमानित निष्क्रियता और घर में उनकी जगह पर सवाल उठाया। 1970 और 1980 के दशक में शोध में महिलाओं को शामिल करना शुरू किया गया लेकिन इससे सोच में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया। यही सवाल अहम था कि क्या प्रवास की वजह से महिलाओं का आधुनिकीकरण होता है? फिर पुश-पुल जनसांख्यिकीय मॉडल में माइग्रेशन को व्यक्तिगत फैसलों के परिणाम के रूप में देखा गया। यह समझा गया कि पत्नी और माँ के रूप में महिलाओं की ज़िम्मेदारियां और कमानेवाले के रूप में पुरुषों की भूमिका, महिलाओं के फैसलों को प्रभावित करती हैं। इसीलिए प्रवास के फैसलों में और मेजबान देश की श्रम शक्ति में भाग लेने में महिलाओं की संभावना कम होती है।

महिलाओं के प्रवासन में शादी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। लेकिन समय के साथ रोज़गार, व्यवसाय और शिक्षा जैसे आर्थिक कारकों को महत्व मिला है। यह महिलाओं के प्रवासन के पीछे एकल कारक के रूप में विवाह पर कम निर्भरता दर्शाता है। 2001 और 2011 के बीच, काम के लिए पलायन करने वाली महिलाओं की संख्या में 101% की वृद्धि हुई है।

लेकिन क्या महिलाएं स्वतंत्र रूप से भी पलायन करती हैं? क्या प्रवासी महिलाओं के परिवार में उनकी हैसियत में कोई बदलाव आता है? कुछ महिलाओं के लिए प्रवासन का मतलब सामाजिक गतिशीलता, आर्थिक स्वतंत्रता और सापेक्ष स्वायत्तता में वृद्धि हो सकता है। कुछ के लिए, श्रमबल की भागीदारी बोझ को बढ़ा सकती है क्योंकि उन्हें तब भी घर के काम और बच्चों की देखभाल करनी होती है। क्या पलायन महिलाओं को एक जगह की पितृसत्ता से निकाल कर दूसरी जगह की पितृसत्ता में धकेल देता है? इन सब सवालों के जवाब पाने के लिए पहले हमें पलायन को लैंगिक दृष्टिकोण से समझना ज़रूरी है।

महिलाओं के पलायन का पैटर्न 

साल 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल 31.4 करोड़ आंतरिक प्रवासी हैं जिनमें से 30.96 करोड़ महिलाएं हैं अर्थात करीब 68 प्रतिशत। माइग्रेशन इन इंडिया 2020-21 रिपोर्ट के मुताबिक 71% से अधिक प्रवासियों के प्रवास के पीछे शादी एक बड़ी वजह थी। 86.8% महिलाएं और केवल 6.2% पुरुष शादी के लिए पलायन करते हैं। 9.2% प्रवासियों ने परिवार के कमाने वाले सदस्य के साथ जाने या माता-पिता के प्रवास को कारण बताया जिसमें 17.5% पुरुष और 7.3% महिलाएं थीं।

कुछ महिलाओं के लिए प्रवासन का मतलब सामाजिक गतिशीलता, आर्थिक स्वतंत्रता और सापेक्ष स्वायत्तता में वृद्धि हो सकता है। कुछ के लिए, श्रमबल की भागीदारी बोझ को बढ़ा सकती है क्योंकि उन्हें तब भी घर के काम और बच्चों की देखभाल करनी होती है।

अधिकतर लोग अपने राज्य के अंदर ही पलायन करते हैं जिनमें से 92.6% महिलाएं हैं और 65.6% पुरुष। 7.2% महिलाओं और 31.4% पुरुषों ने दूसरे राज्य में पलायन किया। 2.9% पुरुष और 0.2% महिलाएं दूसरे देश में चले गए। 63% से अधिक महिला आंतरिक प्रवासी ग्रामीण इलाकों से दूसरे ग्रामीण इलाकों में गई, और पुरुष केवल 18%। दूसरी ओर, 33.5% पुरुषों और 15.6% महिलाओं ने ग्रामीण से शहरी इलाकों की ओर पलायन किया। यह दिखाता है कि अधिकतर महिलाएं अपने मूल निवास के आस पास ही प्रवास करती हैं और पुरुषों का बहुतायत में ग्रामीण इलाकों से शहरी क्षेत्रों में जाना गाँव-शहर के बीच की आर्थिक असमानता की ओर इशारा करता है।

काम या रोज़गार के लिए पलायन करती महिलाएं 

एक शोधपत्र के मुताबिक महिलाओं के प्रवासन में शादी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। लेकिन समय के साथ रोज़गार, व्यवसाय और शिक्षा जैसे आर्थिक कारकों को महत्व मिला है। यह महिलाओं के प्रवासन के पीछे एकल कारक के रूप में विवाह पर कम निर्भरता दर्शाता है। 2001 और 2011 के बीच, काम के लिए पलायन करने वाली महिलाओं की संख्या में 101% की वृद्धि हुई है।  यह पुरुषों के लिए विकास दर (48.7%) से दोगुनी है। साथ ही, व्यवसाय को प्रवास का कारण बताने वाली महिलाओं की संख्या में 153% की वृद्धि हुई, जो पुरुषों (35%) की दर से चार गुना अधिक है। शिक्षा के लिए भी अधिक महिलाओं ने प्रवास किया है।

लंदन के विदेशी विकास संस्थान की प्रिया देशिंगकर और शाहीन अख्तर ने अप्रैल 2009 के यूएनडीपी पेपर में तर्क दिया था कि महिलाएं प्रवास के बाद भी काम करती हैं, भले ही उनके इस कदम का पहला कारण विवाह था। महिलाओं के प्रवासन को पर्याप्त रूप से कैप्चर नहीं किया गया है क्योंकि सर्वेक्षणों में प्रवासन का केवल एक ही मुख्य कारण पूछा जाता है। इसे आमतौर पर शादी बताया जाता है और दूसरा कारण, जो गंतव्य पर काम ढूंढना है, का उल्लेख नहीं किया जाता।

एक व्यक्ति की लैंगिक पहचान प्रवास के अनुभव के हर चरण को आकार देती है। कौन प्रवास करता है और कहां जाता है, लोग कैसे प्रवास करते हैं, इससे जुड़े जोख़िम, प्रवासी द्वारा उपयोग किए जाने वाले साधन, गंतव्यों पर उपलब्ध अवसर और संसाधन और मूल स्थान के साथ संबंध- सभी बिंदुओं पर व्यक्ति के लिंग, धर्म, जाति, वर्ग का प्रभाव होता है।

काम के लिए प्रवास आमतौर पर गरीबी से राहत का परिणाम होता है, भले ही इसका मतलब भारत के महानगरों में एक कठिन जीवन हो। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त मराठवाड़ा क्षेत्र से एक प्रवासी, मुंबई जाने के बाद अस्थायी रूप से अपनी आय को तीन गुना कर लेती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि संकट, भूमि उपयोग के बदलते पैटर्न, बढ़ते मशीनीकरण, और बदतर होते पर्यावरण जैसे कारकों ने महिलाओं के लिए गरीबी और बेरोजगारी के स्तर में वृद्धि की है, जिससे उन्हें काम के लिए शहरी क्षेत्रों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

शहरी क्षेत्रों में, उदारीकरण के बाद जेंडर-पृथक श्रम बाज़ारों के उद्भव की वजह से कई कम कुशल, अशिक्षित महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्र में अवसर पा रही हैं। उच्च महिला साक्षरता के साथ-साथ शिक्षा की प्राप्ति भी कई महिलाओं को पलायन के लिए प्रेरित कर रही है। हालाँकि मोटे तौर पर देश की 80% प्रवासी महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्र में – कृषि, निर्माण, परिवहन, घरेलू कार्य और खनन जैसी गतिविधियों में अनुबंध के आधार पर काम करती हैं। शहरी क्षेत्रों में महिला कार्यबल के लिए विनिर्माण श्रमिक सबसे बड़ा व्यवसाय है (इस क्षेत्र में 45 लाख महिलाएं हैं), इसके बाद शिक्षण (27.5 लाख) और घरेलू कार्य (20 लाख) हैं।

प्रवासी महिलाओं की समस्याएं

सबसे बड़ी समस्या है- अदृश्यता हम जब ‘प्रवासी’ कहते हैं, हमारे दिमाग में केवल पुरुषों की छवि आती है और आज भी 1950 की तरह हम महिलाओं और बच्चों को पुरुष पर निर्भर होने से आगे नहीं देख पाते। इसके अलावा, प्रवास के बाद उपलब्ध योजनाओं के बारे में जागरूकता की भी भारी कमी है। इस वजह से महिलाएं आंगनवाड़ी सेवाओं और पीडीएस का लाभ नहीं उठा पाती। साथ ही, महिलाएं वित्तीय साक्षरता, फ़ोन व टेक्नोलॉजी के उपयोग से भी बहुत दूर हैं। शहरों में उन्हें बेहद बीमार परिस्थितियों में रहना पड़ता है, लगभग काम की जगह अस्थायी आश्रयघरों में। 

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण वार्षिक रिपोर्ट, 2020-2021 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार महिलाएं गैर कृषि अनौपचारिक क्षेत्र के आधे से अधिक (56.7%) का गठन करती हैं। उनमें से ज्यादातर हाशिए पर रहने वाले समुदायों, अत्यंत संसाधन-गरीब पृष्ठभूमि से आती हैं और अपने परिवारों के लिए एकमात्र आय का स्रोत हैं। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम में अनौपचारिक कार्यकर्ता शामिल हैं परन्तु वे अकसर कानून से अनभिज्ञ होती हैं, जिससे उनके लिए उत्पीड़न के खिलाफ बोलना बेहद मुश्किल हो जाता है। उन्हें आजीविका के नुकसान और इस मुद्दे से जुड़े कलंक का भी डर रहता है, जो उन्हें इस तरह की हिंसा की रिपोर्ट करने से रोकता है।

कोरोना महामारी के कारण आर्थिक अनिश्चितता और रिवर्स माइग्रेशन ने उनके दुख को और बढ़ा दिया है। यूएनडीपी द्वारा 12 भारतीय राज्यों की प्रवासी महिला श्रमिकों के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि महामारी के पूर्व के स्तरों की तुलना में महामारी के दौरान उनकी आय आधे से अधिक गिर गई। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि महामारी से न केवल आजीविका का नुकसान हुआ, बल्कि लॉक-डाउन के कुछ महीनों के बाद, पुरुषों की तुलना में बहुत कम महिलाएं काम कर रही थीं। इससे प्रवासी महिलाओं के पोषण और सेहत पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा। इसके अलावा, रोज़गार की तलाश में जो पुरुष पलायन करते हैं और महिलाएं पीछे अकेले खेती, घर व बच्चों को संभालने का कार्य करती हैं, वह एक भिन्न समस्या है। ग्रामीण क्षेत्रों में 4.5% से अधिक और शहरी क्षेत्रों में 1.5% से अधिक महिलाओं के पति कहीं और रहते हैं।

सबसे पहले तो सटीक डेटा एकत्र करना ज़रूरी है। फिर सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि महिला श्रमिकों को गुणवत्तापूर्ण और सस्ती बाल देखभाल, वेतन समानता, व्यावसायिक सुरक्षा, किफायती स्वास्थ्य, विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन और सुरक्षित शहर उपलब्ध करवाए जा सकें। चूंकि प्रवासी महिलाओं को तकनीकी प्रगति के कारण नौकरी के नुकसान के लिए सबसे अधिक असुरक्षित माना जाता है, इसलिए यह आवश्यक है कि उन्हें भविष्य के काम को आकार देने में प्रौद्योगिकी की भूमिका को ध्यान में रखते हुए कौशल प्रशिक्षण दिया जाए।

केरल ने प्रवासी श्रमिकों के लिए एक मुफ्त स्वास्थ्य देखभाल व बीमा योजना ‘आवाज़‘ शुरू की है। इससे प्रेरणा ली जा सकती है।  नीति आयोग द्वारा प्रवासी श्रम नीति के मसौदे में प्रवासी श्रमिकों के लिए उपयुक्त नीति बनाने के लिए प्रस्ताव है लेकिन यह काफी हद तक प्रवासी महिलाओं की विशिष्ट जरूरतों और चिंताओं की अनदेखी करता है। 

ऐसे समय में जब महिलाओं को दशकों से पुरुषों से पिछड़ने के बाद सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ना चाहिए, ऐसा लगता है कि आगे बढ़ना ही उनके अवसरों के लिए एक बड़ी बाधा है। अधिकतर पलायन पितृसत्ता के कारण होता है। शेष, अकसर पितृसत्ता की एक जगह से पितृसत्ता और अनदेखी की दूसरी जगह में स्थानांतरण है। समस्त प्रणाली में सरंचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है और बेहतर नीति की जो न केवल महिला प्रवासियों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील हो, बल्कि उनके लिए एक एकीकृत सामाजिक सुरक्षा प्रणाली बनाने पर भी ध्यान दे। शायद फिर समाज में महिलाओं की गतिशीलता को नए सिरे से देख पाए। 


About the author(s)

Kanika
मैं राजस्थान के झुंझुनूं जिले से हूं। दिल्ली से पढ़ाई पूरी करने के बाद से अपने गृह जिले को ही समझने, संवाद करने और यहाँ की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए सीखने की कोशिश कर रही हूं। नारीवाद, समता, आज़ादी, बंधुत्व और समावेशिता के बिना क्या ही जीवन है? इसीलिए इन्हीं विचारों को सीखने और जीवन में उतारने की कोशिश करती रहती हूं।

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