जब जीवन में हर रास्ता बंद नजर आने लगता है, जब हालात अंधेरे जैसे हो जाते हैं और भविष्य सिर्फ अंत की तरह दिखता है, तब असल में एक नई शुरुआत होती है। मेरी कहानी भी एक ऐसी कहानी है, जब मुझे खुद भी नहीं पता था कि मेरे भीतर कितनी ताकत छिपी है। हर इंसान के अंदर कुछ कर दिखाने की एक जज़्बा होता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि यह इच्छा कब और कैसे जाहिर होता है या समझ आता है, इसका कोई निश्चित समय तय नहीं होता। मेरी कहानी भी एक आम लड़की की तरह ही शुरू हुई थी। मेरे फैसले, मेरी राह और मेरा जीवन—सब कुछ दूसरों के नियंत्रण में था। मेरे पास अपना कहने को बहुत कम था।
लेकिन मेरी कहानी की सबसे अलग बात यह थी कि मेरे जीवन पर नियंत्रण समाज या पितृसत्ता का नहीं, बल्कि मेरे अपने शरीर का था। मुझे जन्म से ही अस्थमा की बीमारी थी। इसकी वजह से मैं शारीरिक रूप से कमजोर थी। बचपन से ही बीमारी ने मेरी रोजमर्रा की जिंदगी को सीमित कर दिया था। खेलना, दौड़ना या सामान्य गतिविधियां भी मेरे लिए चुनौती बन जाती थीं। इस बीमारी ने न सिर्फ मेरी सेहत को प्रभावित किया, बल्कि आत्मविश्वास पर भी असर डाला।
अक्सर यह महसूस होता था कि मैं दूसरों से पीछे हूं। यही कमजोरी धीरे-धीरे मेरे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती बन गई। मुझे वह समय आज भी याद है, जब मेरे माता-पिता को पहली बार डॉक्टर से यह पता चला कि मुझे अस्थमा है। तब मैं सिर्फ छह महीने की थी और ठीक से सांस नहीं ले पा रही थी। यह बात साल 1988 की है। उस दौर में, अगर पहला बच्चा बेटी हुई, तो परिवार और समाज की ओर से जल्दी दूसरा बच्चा करने का दबाव बनाया जाता था। लेकिन मेरे माता-पिता ने इन सामाजिक दबावों को नजरअंदाज किया। उनका पूरा ध्यान सिर्फ मेरे इलाज पर था। उन्हें मेरी तकलीफ दिखाई देती थी और वे हर संभव जगह मेरा इलाज कराने की कोशिश करते रहे। नए-नए शहरों में डॉक्टरों के पास ले जाना, अस्पतालों के चक्कर लगाना—यह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया था। मुझसे उन्हें कोई बड़ी उम्मीद नहीं थी। उनकी बस यही चाहत थी कि उनकी बेटी स्वस्थ रहे और उसके चेहरे पर मुस्कान बनी रहे।
पढ़ाई के दौरान शारीरिक समस्या
पढ़ाई के दौरान भी मेरी स्थिति सामान्य नहीं थी। बीमारी की वजह से मैं नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पाती थी। पापा जब स्कूल में मेरा रिजल्ट लेने जाते थे, तो मेरे अंक सिर्फ पास होने लायक होते थे। जहां मेरी सहेलियां 80 या 85 प्रतिशत अंक लाती थीं, वहीं मैं सिर्फ पास होती थी। कई बार शिक्षक पिताजी से कहते थे कि बेटी स्कूल नहीं आती, उसे नियमित भेजिए। लेकिन इन बातों का मेरे पिता पर कोई असर नहीं पड़ता था। वे हर बार मेरा रिजल्ट सबसे ज्यादा खुशी के साथ लेकर आते थे और साथ में कुछ मीठा भी जरूर लाते थे। उनके लिए यह बड़ी बात थी कि उनकी बेटी, जो साल का आधे से ज्यादा समय अस्पताल में बिताती है, वह परीक्षा पास कर रही है। मेरे सपने उस समय भी बड़े थे। इतने कि अगर कोई सुन ले तो शायद हंस पड़े। यह सोचना स्वाभाविक भी था कि जो लड़की ज्यादातर समय बिस्तर पर रहती हो या अस्पताल में ऑक्सीजन के सहारे जीती हो, वह कैसे कोई बड़ी पहचान बना सकती है। लेकिन समय अक्सर उम्मीद से अलग साबित होता है।
किताबों से मेरी दोस्ती और जीवन के कठिन पल
बीमारी के उन लंबे दिनों में किताबें मेरी सबसे करीबी साथी बन गईं। मैंने सबसे पहले प्रेमचंद का उपन्यास गोदान पढ़ा। इसके बाद हरिवंश राय बच्चन की कविता अग्निपथ ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। इन किताबों ने मेरे सोचने का नजरिया बदल दिया। करीब नौ या दस साल की उम्र में मैंने अपनी पहली कविता लिखी। कविता का शीर्षक था—‘मेरा आकाश’। उसमें मैंने लिखा था कि एक दिन मेरा अपना आकाश होगा, जिसमें रंग भी मेरे होंगे और सपने भी। किताबें पढ़ते-पढ़ते समय आगे बढ़ता रहा, लेकिन जीवन कई बार बेहद नाजुक मोड़ पर आकर खड़ा हो गया।
ग्यारहवीं कक्षा के दौरान मेरी तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। मेरी हालात इतनी नाजुक हो गई कि घर में अफरा-तफरी मच गई। परिवार के लोग घबरा गए और सभी को लगा कि शायद अब कुछ नहीं किया जा सकता। ऐसे हालात में मेरे पिता ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बिना समय गंवाए मुझे सीपीआर देना शुरू किया। पूरी कोशिश के बाद मेरी सांस चलने लगी और मुझे अस्पताल ले जाया गया। होश में आने पर मैंने अपने पिता और चाचा के चेहरे की राहत और खुशी साफ देखी। उस दिन को मैं अपने जीवन का दूसरा जन्म मानती हूं।
कुछ समय बाद, बारहवीं कक्षा की परीक्षाएं शुरू होने वाली थीं। स्वास्थ्य को देखते हुए मैंने ओपन स्कूल से परीक्षा देने का फैसला किया और किसी तरह पढ़ाई शुरू की। तैयारी के लिए सिर्फ दो महीने का समय था। पढ़ाई में मेरे साथ मेरे माता-पिता पूरी तरह जुड़े रहे। बारहवीं का परिणाम आया। इस बार भी मैं सिर्फ पास हुई थी। लेकिन पिता की खुशी पहले से कहीं ज्यादा थी। मैं हमेशा सोचती कि इतना भरोसा और समर्थन शायद बहुत कम लोगों को मिलता है। बारहवीं के बाद मैंने पहली बार अपने पिता से एक बड़ी जिद की। मैंने बाहर जाकर पढ़ाई करने की इच्छा जताई। बीमारी और उससे जुड़े हालातों से मैं थक चुकी थी। मेरी कई सहेलियां पढ़ाई के लिए बाहर जा रही थीं। हालांकि मेरे पिता ने मुझे समझाने की कोशिश की। लेकिन इस बार मेरी जिद भारी पड़ी।
कॉलेज में दाखिला और जीवन का अहम अनुभव
मैंने जानकारी जुटाई और इंदौर के कुछ कॉलेजों के बारे में पता किया, जहां कम अंकों पर भी प्रवेश मिल सकता था। आखिरकार मैं अपने सपनों और कुछ किताबों के साथ घर से निकल गई। मां के चेहरे पर उदासी थी, लेकिन उन्होंने मुझे गले लगाकर विदा किया। कॉलेज की पढ़ाई मेरे लिए आसान नहीं थी। पढ़ाई में मैं पहले से ही कमजोर थी। किसी तरह मैंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इस दौरान मेरा मन अक्सर उदास ही रहा। कॉलेज के दिनों में मैं सबसे ज्यादा खुश उस दिन थी, जब सांस्कृतिक कार्यक्रम में मैंने अपनी कविता सुनाई और पहला पुरस्कार मिला। ग्रेजुएशन के बाद मैंने कई विकल्प आजमाए, लेकिन लंबे समय तक मुझे संतोष और दिशा नहीं मिल पाई। साल 2008 मेरे जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुआ। इसी साल मैंने पत्रकारिता में दाखिला लिया। इस फैसले पर आस-पास के लोगों की प्रतिक्रिया नकारात्मक थी। कई लोग कहते थे कि यह लड़की अपने पिता के पैसे बर्बाद कर रही है—कभी इलाज के नाम पर, कभी बाहर पढ़ने के नाम पर और कभी नए-नए कोर्स करके।
आम धारणा यही थी कि इससे कुछ हासिल नहीं होगा। इन सब बातों के बावजूद मैंने कोर्स पूरा किया। इस दौरान मेरे पिता लगातार मेरे साथ खड़े रहे। पढ़ाई के साथ ही मैंने इंटर्नशिप के लिए आवेदन किया। इसी समय मैंने आकाशवाणी में कैजुअल अनाउंसर का टेस्ट भी पास कर लिया। कॉलेज खत्म होने के बाद मुझे नौकरी मिल गई। पहली सैलरी से मैंने अपनी मां के लिए साड़ी और पिता के लिए शर्ट खरीदी। यह मेरे लिए एक बड़ा व्यक्तिगत क्षण था। यह महसूस हुआ कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो पाई हूं। हालांकि, यहां पहुंचने के बाद भी आगे बढ़ने की इच्छा बनी रही। मेरा उद्देश्य हमेशा यही रहा कि मैं अपने पिता की जिम्मेदारियों को कम कर सकूं। इसके लिए मैंने समय-समय पर नौकरियां बदलीं। अपनी लेखनी के माध्यम से मैंने कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया और पेशेवर रूप से आगे बढ़ने की कोशिश जारी रखी।
जीवन में बदलाव और आगे का रास्ता
आज मेरी जिंदगी पहले से काफी अलग है। कई बार लोग मेरे फैसलों और काम को लेकर सवाल उठाते हैं, क्योंकि उन्हें मेरी परिस्थितियों और सीमाओं की पूरी जानकारी नहीं होती। मेरी जिंदगी में कमियां भी हैं, नाकामियां भी, और उन्हीं के बीच मेरा सफर आगे बढ़ता रहा है। जहां मेरी उम्र की कई महिलाएं या तो घरेलू जिम्मेदारियों पर केंद्रित हैं या स्थिर नौकरियों में हैं, वहीं मैं आज भी नए लक्ष्य लेकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हूं। सीखने की इच्छा अब भी बनी हुई है। अस्थमा की समस्या उम्र के साथ कुछ हद तक कम हुई है, इसलिए अब अपनी इच्छाओं और संभावनाओं को आगे बढ़ाना स्वाभाविक लगता है। जिस तरह पहले मेरे पिता मेरे साथ खड़े थे, आज उसी तरह मेरा जीवनसाथी मेरा साथ देते हैं।
संघर्ष से मिला ज्ञान और बनी अपनी पहचान
मेरी कहानी संघर्ष से भरी रही है। अक्सर लोग मुझे देखकर यह मान लेते हैं कि मैं दूसरों से पीछे हूं, लेकिन मेरी नजर में यही मेरी ताकत है। मैंने हर दिन जीवन के लिए संघर्ष किया है। जहां एक सामान्य बच्चा स्कूल जाने की चिंता करता है, वहीं मेरे लिए बचपन में यह सवाल ज्यादा अहम था कि अगला दिन देख पाऊंगी या नहीं। ऐसे अनुभवों के बाद खुद को पीछे मानना मेरे लिए संभव नहीं है। मुझे इस बात की संतुष्टि है कि मैंने कभी हार नहीं मानी। फैसले देर से ही सही, लेकिन मैंने अपने लिए खुद लिए। मेरे लिए यही सबसे बड़ी उपलब्धि है। आगे भी कई सपने हैं।
घूमना, नई जगहों को देखना, अपने बेटे के साथ वह बचपन जीना जो मैं नहीं जी पाई, अपने माता-पिता और जीवनसाथी की इच्छाओं को पूरा करना और एक स्थापित लेखिका बनना। मुझे भरोसा है कि यह संभव है क्योंकि मैंने कोशिश करना कभी छोड़ा नहीं है। मेरी कहानी उन सभी महिलाओं से जुड़ती है जो खुद को कमतर आंकती हैं। मेरा उनसे यही कहना है कि आपका ज्ञान और अनुभव आपका अपना है। वह न कम होता है, न ज्यादा। जरूरी यह है कि सीखने की इच्छा बनी रहे और तुलना दूसरों से नहीं, खुद से की जाए। देर से ही सही, लेकिन अपनी जिंदगी की दिशा तय करने का हक हमें खुद लेना चाहिए। यही मेरा असली फेमिनिस्ट जॉय है, खुद से प्यार करना।

