समाजकैंपस महिला शिक्षिकाओं की बढ़ती संख्या के बावजूद उनके बुनियादी अधिकारों की अनदेखी

महिला शिक्षिकाओं की बढ़ती संख्या के बावजूद उनके बुनियादी अधिकारों की अनदेखी

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश के शैक्षणिक संस्थानों में 2024-25 में कुल शिक्षकों में से पुरुषों की संख्या 43,400 थी जबकि महिलाओं की संख्या 1,18,558 थी, जो कि कुल शिक्षकों का लगभग दो तिहाई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में महिला शिक्षकों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

भारत के स्कूलों में महिला शिक्षकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। साल 2024-25 के आंकड़ों से पता चलता है कि इस समय महिला शिक्षकों का आंकड़ा कुल मौजूदा शिक्षकों का 73 फीसद तक पहुंच चुका है जो कि अपने आप में एक बहुत बड़ी संख्या है। यह शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी और हिस्सेदारी को दिखाता है। लेकिन जब इस के तह तक देखा जाए तो पता चलता है कि संख्या में बहुमत में होने के बावजूद शिक्षण संस्थानों में अभी भी महिला शिक्षकों को समानता और सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है। 73 फीसद की संख्या देखने में तो अच्छी लगती है लेकिन इसके पीछे के लैंगिक भेदभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता। अभी भी शिक्षण संस्थानों में नीतिगत फ़ैसले लेने महिलाओं की हिस्सेदारी सीमित ही है।

महिला शिक्षिकाओं की बढ़ती संख्या

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश के शैक्षणिक संस्थानों में 2024-25 में कुल शिक्षकों में से पुरुषों की संख्या 43,400 थी जबकि महिलाओं की संख्या 1,18,558 थी, जो कि कुल शिक्षकों का लगभग दो तिहाई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में महिला शिक्षकों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। ख़ासतौर पर प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर महिला शिक्षकों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके बावजूद महिलाओं की स्थिति में कोई बहुत ज़्यादा सुधार नहीं देखा जा रहा क्योंकि महिला शिक्षकों की संख्या का बड़ा हिस्सा प्राइवेट स्कूलों और कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर की गई नियुक्तियों से आया है।

इनमें बेहद कम वेतन, अनियमित कॉन्ट्रैक्ट और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की कमी आम बात है। अर्थशास्त्र के नज़रिए से देखा जाए तो इसमें महिलाओं की भागीदारी नहीं बल्कि सस्ते और लचीले महिला श्रम को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह स्थिति उसी पित्तृसत्तात्मक ढांचे को उजागर करती है जहां महिलाओं को सेवा देने वाली भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाता है जबकि नीतियां बनाने का अधिकार पुरुषों के हाथ में रहता है।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश के शैक्षणिक संस्थानों में 2024-25 में कुल शिक्षकों में से पुरुषों की संख्या 43,400 थी जबकि महिलाओं की संख्या 1,18,558 थी, जो कि कुल शिक्षकों का लगभग दो तिहाई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में महिला शिक्षकों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

दिल्ली के एक जाने-माने प्राइवेट स्कूल में 8 सालों से शिक्षक का काम कर रहीं नज़मा (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “पिछले 8 सालों से इसी स्कूल में पढ़ा रही हूं इसके बावजूद हर साल कॉन्ट्रैक्ट रीन्यू होने की चिंता लगी रहती है। इंक्रीमेंट भी हर साल नियम से नहीं होता है। 16,000 की सैलरी में दिल्ली जैसे मेट्रो सिटी में मुश्किल से गुजारा हो पता है। कोविड महामारी के समय तो सैलरी कट भी हुआ था जबकि ऑनलाइन क्लासेस की वजह से काम तो तब भी करना ही होता था। इसके बावजूद स्कूल प्रशासन की शर्तें न मानने पर नौकरी जाने का रिस्क बना रहता है। कॉपी चेक करना, क्वेश्चन पेपर बनाना डेटा अपडेट करने जैसे बहुत सारे काम घर पर लाकर करने पड़ते हैं क्योंकि स्कूल में सिलेबस कंप्लीट करने की भी टेंशन बनी रहती है। इन सबसे वर्क लाइफ बैलेंस बहुत ज़्यादा डिस्टर्ब होता है।”

सुरक्षा और वर्कप्लेस की चुनौतियां

आज ज़्यादातर स्कूलों में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक है। इसके बावजूद वहां महिलाओं की विशेष ज़रूरतों और समस्याओं को ध्यान में रखकर नियम नहीं बनाए जाते हैं। ज्यादातर सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल गांव के दूरदराज वाले इलाकों में होते हैं। इस वजह से महिला शिक्षकों को आवागमन और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। स्कूलों में बिजली, पानी और वर्किंग टॉयलेट जैसी बेसिक ज़रूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। इसके अलावा किसी भी तरह की समस्या या मेडिकल इमरजेंसी होने पर मदद मिलने में अक्सर देरी होती है।

अम्बाला के केन्द्रीय विद्यालय में काम कर रही शिक्षिका मनीषा कुमारी (बदला हुआ नाम) ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताती हैं, “स्कूल में हमें सबसे पहले तो जेंडर डिस्क्रिमिनेशन का सामना करना पड़ता है। अगर कभी टीम लीडर बना दिया जाता है तो टीम के पुरुष शिक्षक सहयोग नहीं करते और इन्हें इंस्ट्रक्शन फॉलो करने में प्रॉब्लम होती है। महिलाओं को घर में भी अपने मेल पार्टनर से ज़्यादा काम करना पड़ता है और स्कूलों में भी ऐसी सिचुएशन बना दी जाती है। साथ ही डेटा मेंटेन करना, पेपर वर्क, डेडलाइन जैसे नॉन टीचिंग कामों के प्रेशर से टीचिंग पर असर पड़ता है। इसके अलावा आए दिन एक्टिविटीज करवाने ख़ासकर उनके फोटोज और वीडियो को स्ट्रिक्ट डेडलाइन के भीतर सबमिट करने का जो प्रेशर होता है उससे भी टीचिंग बहुत ज़्यादा प्रभावित होती है। इन सब का सबसे ज़्यादा असर हाशिए पर मौजूद बच्चों यानी फर्स्ट जेनरेशन लर्नर्स पर पड़ता है जिन पर हम पूरा ध्यान नहीं दे पाते हैं।”

पिछले 8 सालों से इसी स्कूल में पढ़ा रही हूं इसके बावजूद हर साल कॉन्ट्रैक्ट रीन्यू होने की चिंता लगी रहती है। इंक्रीमेंट भी हर साल नियम से नहीं होता है। 16,000 की सैलरी में दिल्ली जैसे मेट्रो सिटी में मुश्किल से गुजारा हो पता है। कोविड महामारी के समय तो सैलरी कट भी हुआ था जबकि ऑनलाइन क्लासेस की वजह से काम तो तब भी करना ही होता था।

आंदोलनों में महिला शिक्षकों की मुखरता और उसके मायने 

हाल के वर्षों में महिला शिक्षक अपने हक़ के लिए होने वाले आंदोलनों में सक्रिय रूप से भागीदारी करती हुई नज़र आ रही हैं। तमिलनाडु का हाल ही में हुआ सेकेंडरी ग्रेड टीचर्स का आंदोलन जो कि ‘समान काम समान वेतन’ की मांग पर था, इसमें भी महिला शिक्षकों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। पिछले ही साल यानी 2025 में छत्तीसगढ़ के प्राइमरी टीचिंग के लिए बीएड धारकों को अयोग्य ठहराने वाले हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ भी हुए शिक्षक आंदोलन में महिला शिक्षकों ने सक्रिय भागीदारी निभाई थी। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, राजस्थान और दूसरे राज्यों में भी भर्ती, समान वेतन, नौकरी के स्थायित्व जैसे मामलों में हुए विरोध प्रदर्शन में महिलाओं का एक बड़ा तबका शामिल था।

महिला शिक्षकों के मौजूदा हालात पर बात करते हुए उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका रागिनी शर्मा (बदला हुआ नाम) बताई हैं, “मेरा एक छोटा बच्चा है। डिलीवरी के बाद से ही घर-बच्चे और स्कूल को मैनेज करने में बहुत समस्या हो रही है। अपने लिए टाइम निकालना भी मुश्किल हो रहा है। चाइल्ड केयर लीव कागजों में तो है पर मिलना बहुत मुश्किल होता है। घर और स्कूल दोनों जगह जमकर काम करने के बावजूद सबको यही लगता है कि यह तो काम ही नहीं करना चाहती। ऊपर से समय समय पर नॉन टीचिंग कामों की ज़िम्मेदारी और डेडलाइन बहुत ही तनाव भरा होता है। हम बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं पर उसके लिए न तो समय मिल पाता है और न ही सुविधाएं। टीचर बनने का सपना जब देखा था तो यह सोचा था की शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ले आऊंगी लेकिन ऐसी स्थितियां बन गई हैं कि रेगुलर टीचिंग और सिलेबस कंप्लीट करना ही मुश्किल हो रहा है।”

स्कूल में हमें सबसे पहले तो जेंडर डिस्क्रिमिनेशन का सामना करना पड़ता है। अगर कभी टीम लीडर बना दिया जाता है तो टीम के पुरुष शिक्षक सहयोग नहीं करते और इन्हें इंस्ट्रक्शन फॉलो करने में प्रॉब्लम होती है।

आंदोलन में मुखरता के बावजूद नेतृत्व और निर्णय लेने की प्रक्रिया में इनकी भागीदारी अभी भी सीमित है। समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे की वजह से अभी भी घर और बाहर दोनों जगह इन्हें लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। किसी भी तरह की मांग या आंदोलन में शामिल होने से पहले इन्हें तमाम तरीके की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जिसमें सबसे पहला सवाल होता है सुरक्षा का। इसके अलावा किसी भी पेशे में हों घर परिवार की ज़िम्मेदारी आज भी ज़्यादातर महिलाओं पर डाल दी जाती है। इस वजह से अगर सक्रिय रूप से भागीदारी नहीं कर पाती हैं या ज़्यादा समय नहीं दे पाती हैं तो इन्हें नाकारा साबित करने की भरपूर कोशिश की जाती है। इसके अलावा जब सिस्टम ही कमज़ोर होता है, शिकायत तंत्र भरोसेमंद और जवाबदेह नहीं होता तो अक्सर महिलाएं चुप रहने को मजबूर हो जाती हैं। 

क्या हो सकता है आगे का रास्ता

महिला शिक्षकों की समस्याएं कोई निजी संघर्ष नहीं बल्कि यह हमारे सिस्टम की असफलता है। एक सभ्य समाज और लोकतांत्रिक देश होने के नाते हमारी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि देश के सभी नागरिकों ख़ासकर वंचित समुदाय जैसे कि महिलाओं के लिए बराबरी और न्याय सुनिश्चित किया जाए। महिला शिक्षकों की कॉन्ट्रैक्ट भर्तियों को नियमित, जवाबदेह बनाया जाए और इसे सामाजिक सुरक्षा से जोड़ा जाए। सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों में महिलाओं की ख़ास ज़रूरतों जैसे कि पीरियड्स, मैटरनिटी और चाइल्ड केयर को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाई जाएं और उन्हें कड़ाई से लागू किया जाए। नेतृत्व पदों पर महिलाओं के लिए भागीदारी की पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए। इसके अलावा महिलाओं के लिए काउंसलिंग और शिकायत निस्तारण व्यवस्था सुनिश्चित किया जाए। भारत के स्कूलों में महिला शिक्षकों की बढ़ती संख्या एक ज़रूरी बदलाव है लेकिन यह बदलाव तब तक अधूरा रहेगा जब तक महिलाओं की सत्ता में हिस्सेदारी सुनिश्चित न की जाए।

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