इतिहास सुसान ग्रिफिन: नारीवाद, प्रकृति और प्रतिरोध को जोड़ने वाली लेखिका

सुसान ग्रिफिन: नारीवाद, प्रकृति और प्रतिरोध को जोड़ने वाली लेखिका

ग्रिफिन की लिखित किताबें आज भी इस इकोफेमिनिज़्म आंदोलन का अहम हिस्सा है। ग्रिफिन अपने काम में प्रकृति के विनाश, महिलाओं के हाशिए पर जाने और नस्लवाद के बीच गहरे संबंध को बताने के साथ निजी और सार्वजनिक जीवन दोनों में युद्ध के कारणों और प्रभावों को बताया।

साल 1970 के दशक में अपने अनोखे नारीवादी लेखन काम से दुनिया भर में पहचान बनाने वाली सुसान ग्रिफिन एक प्रतिष्ठित लेखिका, कवयित्री और नारीवादी विचारक थीं। उन्होंने करीब बीस से ज्यादा पुस्तकें लिखीं, जिनमें नारीवाद, प्रकृति, युद्ध, लोकतंत्र और संस्कृति के बीच के जटिल रिश्तों की पड़ताल की गई है। अपनी वुमन एंड नेचर: द रोरिंग इनसाइड हर (1978) और पोर्नोग्राफी एंड साइलेंस (1981) जैसी महत्वपूर्ण किताबों के माध्यम से उन्होंने दुनिया भर में अपनी एक अलग पहचान कायम की थी।

उन्होंने अपने लेखन में सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और यौन हिंसा को एक ही सामाजिक ताने-बाने के हिस्से के रूप में दिखाया। इसके साथ उन्होंने पारिस्थितिकी नारीवादी विचारधारा को विकसित करने और उसे आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपनी लेखन कला जैसे निबंध, कविता, संस्मरण और राजनीतिक दर्शन जैसी विधाओं को मिश्रित करने के हुनर के चलते ग्रिफिन उन तमाम दुनिया भर के लेखकों के लिए एक आदर्श बन गई जिन्होंने कला और सक्रियता के बीच स्पष्ट सीमाओं को मानने से इनकार कर दिया था।

सुसान अमेरिका की एक प्रतिष्ठित लेखिका, कवियत्री, नारीवादी और इकोफेमिनिज़्म की पायोनियर आवाज़ थी। वह अपने लेखन से महिला उत्पीड़न, पर्यावरणीय विनाश, नस्लवाद और हिंसा के बीच गहरे सामाजिक संबंधों को उजागर करने के लिए जानी जाती थीं।

कौन है सुसान ग्रिफिन?

सुसान अमेरिका की एक प्रतिष्ठित लेखिका, कवियत्री, नारीवादी और इकोफेमिनिज़्म की पायोनियर आवाज़ थी। वह अपने लेखन से महिला उत्पीड़न, पर्यावरणीय विनाश, नस्लवाद और हिंसा के बीच गहरे सामाजिक संबंधों को उजागर करने के लिए जानी जाती थीं। उनका सबसे प्रसिद्ध काम वुमन एंड नेचर: द रोरिंग इनसाइड हर (1978) था, जिसमें उन्होंने इकोफेमिनिज़्म आंदोलन को वैश्विक पहचान दी और यह दिखाया कि कैसे पितृसत्तात्मक अवधारणा प्रकृति और महिलाओं दोनों का शोषण करती है। उनके लेखन में कविता, स्मृतियां, निबंध और सामाजिक इतिहास के तत्व एक साथ जुड़े रहते थे। इससे उन्होंने लेखन की एक अनूठी रचनात्मक शैली विकसित की थी। सुसान ग्रिफिन ने लोकतंत्र, लैंगिक न्याय और पर्यावरणीय चेतना जैसे मसलों पर भी गहराई से लिखा और उन्होंने साहित्य, सामाजिक विचार और समकालीन राजनीति के बीच जटिल कड़ियां जोड़कर महिलाओं के अनुभव को व्यापक विमर्श में स्थापित किया। 

शुरुआती जीवन और शिक्षा

सुसान ग्राफ़िन की पहचान एक ऐसी लेखिका के तौर पर जिन्होंने पारिस्थितिकी नारीवाद की अवधारणा विकसित की और युद्ध, स्मृति और सार्वजनिक घटनाओं में शामिल लोगों के निजी जीवन के बारे में एक नारीवादी नजरिए से लिखा। इस तरह अगर देखा जाए तो उनकी पहचान अमेरिका और यूरोप तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में वह एक रेडिकल नारीवादी कवयित्री, निबंधकार, नाटककार और लेखिका के रूप में पहचान रखती थी। उनका जन्म 26 जनवरी 1943 को लॉस एंजेलिस, कैलिफ़ोर्निया में हुआ था। उनकी मां का नाम सारा कोल्विन और पिता का नाम वाल्डेन ग्रिफिन, जो एक अग्निशामक थे। जब सुसान छह साल की थीं, तब उनके माता-पिता का तलाक हो गया।

जब वह सिर्फ 16 साल की थीं, तब एक सड़क दुर्घटना में उनके पिता गुजर गए थे, जिसके बाद उन्हें अपना जीवन सैन फर्नांडो घाटी में अपने रिश्तेदारों के यहां रह कर बिताना पड़ा। वह अपने लेखन में बताती हैं कि कैलिफोर्निया में पली बढ़ी होने साथ उन्होंने अपना अधिकांश समय बाहर बिताया और हर साल वह ग्रीष्मकालीन शिविर में जाती, तंबू लगाती और तारों के नीचे सोती थीं। उन्होंने यूसी बर्कले और फिर सैन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी से अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। यही से उन्होंने साल 1965 में रचनात्मक लेखन विषय में बी. ए. और साल 1973 में मास्टर की डिग्रियां हासिल की। इसके साथ उन्होंने साल 1966 में जॉन लेवी से शादी की। इस शादी से उनको एक बेटी क्लोई भी हुई। शादी से तलाक के बाद, साल 1970 में, ग्रिफिन ने सार्वजनिक रूप से अपने होमोसेक्शुअल होने की बात जाहिर कर दी थी। 

इकोफेमिनिज़्म और सुसान ग्रिफिन के विचार 

सुसान ग्रिफिन एक छात्रा के रूप में मार्क्सवादी थीं। हालांकि बाद में उन्होंने इस सिद्धांत की आलोचना करते हुए कहा कि यह पदार्थ को प्रकृति से अलग करता है। उनका मानना था कि उनका असली धर्म प्रकृति है। उनकी लेखनी ने नारीवादी दर्शन, प्रकृति-मानव संबंध, युद्ध, सामाजिक दमन, और व्यक्तिगत अनुभवों को जोड़कर एक अलग दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखा। उनका काम महिलाओं की वास्तविक दुनिया और सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच गहरे संबंधों को समझने में मदद करता है। सुसान इकोफेमिनिज़्म आंदोलन में अहम जगह रखती हैं। उन्होंने अपने लेखन कार्यों में प्रकृति के विनाश, लैंगिक भेदभाव और नस्लवाद के बीच के परस्पर गहरे संबंधों का विश्लेषण किया। अमेरिका में उन्हें इकोफेमिनिज़्म यानि पारिस्थितिक नारीवाद की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है।

ग्रिफिन की लिखित किताबें आज भी इस इकोफेमिनिज़्म आंदोलन का अहम हिस्सा है। ग्रिफिन अपने काम में प्रकृति के विनाश, महिलाओं के हाशिए पर जाने और नस्लवाद के बीच गहरे संबंध को बताने के साथ निजी और सार्वजनिक जीवन दोनों में युद्ध के कारणों और प्रभावों को बताया। इसके अलावा वह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में 1960 के दशक के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आंदोलन का भी एक अहम चेहरा रही, जिसमें उन्होंने यह सिद्धांत दिया कि सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और यौन हिंसा सभी एक ही सामाजिक ताने बाने से उत्पन्न होती हैं। उनका यह सिद्धांत आगे जाकर अमेरिकी नारीवादी आंदोलन में अहम बन गया। 

सुसान ग्रिफिन एक छात्रा के रूप में मार्क्सवादी थीं। हालांकि बाद में उन्होंने इस सिद्धांत की आलोचना करते हुए कहा कि यह पदार्थ को प्रकृति से अलग करता है। उनका मानना था कि उनका असली धर्म प्रकृति है। उनकी लेखनी ने नारीवादी दर्शन, प्रकृति-मानव संबंध, युद्ध, सामाजिक दमन, और व्यक्तिगत अनुभवों को जोड़कर एक अलग दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखा।

साहित्यक, समाजिक काम और उपलब्धियां 

निबंध, कविता, संस्मरण और राजनीतिक दर्शन जैसी कई विधाओं में बीस से ज्यादा किताबों की लेखिका सुसान ग्रिफिन ने बहुत से साहित्यक और समाजिक काम किए। उन्होंने लेखन काम के साथ-साथ कई विश्वविद्यालयों में जैसे यूसी बर्कले में एक प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाया। यहां पर वह एक सहायक प्रोफेसर थीं। इसके साथ ही उन्होंने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रल स्टडीज और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में भी पढ़ाया। अगर सुसान के बहुचर्चित और मुख्य लेखन काम पर नजर डाले तो उनका लेख “रेप: द ऑल-अमेरिकन क्राइम” (1971), इसमें उन्होंने नारीवादी दृष्टिकोण से महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा पर बात की, और इस लेख में उन्होंने महिला मुक्ति आंदोलन में सक्रिय कई नारीवादियों को उनके काम से भी परिचित कराया। उन्होंने इस पर “रेप: द पावर ऑफ कॉन्शियसनेस” (1979) नामक पुस्तक भी लिखी। उनका अगला लेख ‘पोर्नोग्राफी एंड साइलेंस, कल्चर्स रिवेंज अगेंस्ट नेचर’ (1981), जिसमें वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे अहम मुद्दों पर विचार रखती हैं।

आलोचकों ने उनकी इस पुस्तक पर दार्शनिक होने के बजाय बहुत अधिक नराजगी प्रकाट होने का आरोप लगाया। इस पर सुसान का तर्क था कि पोर्नोग्राफर और पोर्न देखने वाले लोग इसके बनने और अस्तित्व का बचाव करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे तर्कों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन पोर्न, क्योंकि यह महिलाओं के बुरे चरित्र को दिखाने पर आधारित है, महिलाओं की आवाज़ को दबाने का कारण है। उन्होंने लिखा कि अश्लीलता की जड़ें प्रकृति के व्यापक भय में निहित हैं, जिसमें ऐसी छवियां शामिल हैं जो आमतौर पर एक महिला के शरीर को वस्तु के रूप में प्रस्तुत करती हैं और उसे नीचा दिखाती हैं। वास्तविक यौन मुक्ति प्रकृति के साथ जुड़ाव और सामंजस्य पर निर्भर करती है। सुसान ग्रिफिन की बाद की किताबों में युद्ध, स्मृति और सार्वजनिक घटनाओं के निजी जीवन पर प्रभाव पर मुख्य रूप से बात करती हैं। 

सुसान ग्रिफिन को अपनी किताब ए कोरस ऑफ स्टोन्स: द प्राइवेट लाइफ ऑफ वॉर (1992) के लिए पुलित्जर सहित कई अन्य प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए चुना गया था। इसके अलावा उन्हें अपनी पांच महिलाओं के जीवन पर कविता आधारित नाटक ‘वॉइसेस’ के टेलीविजन प्रसारण के लिए स्थानीय एमी पुरस्कार मिला था।

सुसान ग्रिफिन को अपनी किताब ए कोरस ऑफ स्टोन्स: द प्राइवेट लाइफ ऑफ वॉर (1992) के लिए पुलित्जर सहित कई अन्य प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए चुना गया था। इसके अलावा उन्हें अपनी पांच महिलाओं के जीवन पर कविता आधारित नाटक ‘वॉइसेस’ के टेलीविजन प्रसारण के लिए स्थानीय एमी पुरस्कार मिला था। उनकी कविताओं पर भी कई पुस्तकें प्रकाशित कीं, जिनमें ‘बेंडिंग होम: सिलेक्टेड एंड न्यू पोएम्स’ और ‘अनरिमेम्बर्ड कंट्री’ (1987) जैसी किताबें शामिल हैं। इन सभी काम के साथ उन्होंने एमएस मैगजीन, न्यूयॉर्क टाइम्स बुक रिव्यू और कई अन्य प्रकाशनों में भी अपना योगदान दिया।

उनकी अन्य मुख्य लेखन कार्य  ‘द बुक ऑफ द कोर्टेसन्स: ए कैटलॉग ऑफ देयर वर्चुस’ (2001) और ‘रेसलिंग विद द एंजेल ऑफ डेमोक्रेसी: ऑन बीइंग एन अमेरिकन सिटिजन’ (2008) भी अहम हैं। बीते साल ग्रिफिन ने मताधिकार समर्थक फोबे ए हर्स्ट के जीवन पर अपना अंतिम कार्य पूरा किया, जो साल 2027 में प्रकाशित होगा। अपने इस अंतिम कार्य के साथ इस मजबूत नारीवादी लेखिका ने अपने परिवार में अपनी पत्नी क्लो और पोते पोती सोफी और जैस्पर के साथ इस दुनिया को 30 सितंबर 2025 को अंतिम अलविदा कह दिया। 

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content