संस्कृतिपरंपरा भारतीय परिवार की राजनीति में संयुक्त, एकल और चुने हुए परिवारों की भूमिका

भारतीय परिवार की राजनीति में संयुक्त, एकल और चुने हुए परिवारों की भूमिका

भारत में संयुक्त परिवार पारंपरिक सामाजिक सुरक्षा, साझा संसाधन, और पीढ़ीगत उत्तरदायित्व का माध्यम रहा है, जबकि एकल परिवार में व्यक्तिगत आज़ादी और आर्थिक निर्णय ज्यादा साफ़ तौर पर दिखाई देते हैं।

भारतीय समाज में परिवार केवल निजी जीवन की इकाई नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था रहा है, जो मूल्य-निर्माण, सत्ता-संबंधों और सामाजिक समावेशन की दिशा तय करता है। संयुक्त और न्यूक्लियर परिवारों की संरचना को अक्सर परंपरा और आधुनिक जीवनशैली के टकराव के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह तुलना केवल जीवनशैली तक सीमित नहीं है। पारिवारिक ढांचा यह भी निर्धारित करता है कि निर्णय कैसे लिए जाते हैं, देखभाल और श्रम का बंटवारा कैसे होता है, और किसे स्वीकृति या अस्वीकृति मिलती है। अंतरजातीय और अंतरधार्मिक रिश्तों के संदर्भ में यह प्रश्न और जटिल या मुश्किल हो जाता है। ऐसे रिश्ते परिवार की आंतरिक सत्ता-प्रणालियों, सामाजिक अपेक्षाओं और समावेशन की सीमाओं, यहां तक कि रूढ़िवादी परंपराओं और सोच को स्पष्ट रूप से सामने लाते हैं और चुनौती भी देते हैं।

संयुक्त और एकल परिवार की सामाजिक संरचना 

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से परिवार वह गृहस्थ समूह है, जिसमें माता-पिता और बच्चे एक साथ रहते हैं। भारत में कई सालों से संयुक्त परिवारों का चलन रहा है, लेकिन वर्तमान में बदलती जीवनशैली, प्राथमिकताओं और व्यक्तिगत सीमाओं के कारण एकल परिवार परिवार भी प्रचलित हो रहे हैं। भारत में संयुक्त परिवार पारंपरिक सामाजिक सुरक्षा, साझा संसाधन, और पीढ़ीगत उत्तरदायित्व का माध्यम रहा है, जबकि एकल परिवार में व्यक्तिगत आज़ादी और आर्थिक निर्णय ज्यादा साफ़ तौर पर दिखाई देते हैं। भारतीय संदर्भ में संयुक्त और एकल परिवार दो प्रमुख संरचनात्मक रूप हैं, जिनकी आंतरिक अनुमति और सीमाएं सामाजिक समावेशन और बहिष्करण को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करती हैं। संयुक्त परिवार परंपरागत रूप से सामूहिकता, संसाधनों के साझा उपयोग और पीढ़ीगत सह-अस्तित्व और परंपराओं के पालन से जुड़ा रहा है। इसमें देखभाल का ढांचा विस्तृत होता है, जिसमें बुजुर्गों और बच्चों की जिम्मेदारी सामूहिक रूप से निभाई जाती है।

भारत में संयुक्त परिवार पारंपरिक सामाजिक सुरक्षा, साझा संसाधन, और पीढ़ीगत उत्तरदायित्व का माध्यम रहा है, जबकि एकल परिवार में व्यक्तिगत आज़ादी और आर्थिक निर्णय ज्यादा साफ़ तौर पर दिखाई देते हैं।

 हालांकि, यह सामूहिकता अक्सर उस अदृश्य श्रम पर आधारित होती है, जिसका बोझ हमेशा महिलाओं पर पड़ता है। घरेलू श्रम, भावनात्मक प्रबंधन और संबंधों को संतुलित रखने का कार्य संरचनात्मक रूप से महिलाओं से जोड़ दिया जाता है, जिससे सत्ता-संबंध असमान बने रहते हैं। इसके विपरीत, न्यूक्लियर परिवार को अक्सर व्यक्तिगत आज़ादी और निर्णय लेने की आज़ादी से जोड़ा जाता है। सीमित सदस्यों के कारण दैनिक निर्णयों में बाहरी हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम होता है, जिससे अंतरजातीय या अंतरधार्मिक रिश्तों के लिए यह संरचना अधिक सुरक्षित प्रतीत हो सकती है। लेकिन यह आज़ादी अक्सर दोहरी जिम्मेदारी के साथ आती है, जैसे देखभाल, आय और घरेलू श्रम का पूरा भार सीमित सदस्यों, खासकर  महिलाओं पर केंद्रित हो जाता है। द इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंडियन साइकोलॉजी (आईजेआईपी) में छपे  एक अध्ययन से पता चलता है कि पारिवारिक ढांचा बच्चों के सामाजिक व्यवहार और खुलकर बोलने की क्षमता को प्रभावित करता है। संयुक्त और न्यूक्लियर परिवारों में बच्चों के व्यक्तित्व विकास में स्पष्ट और महत्वपूर्ण अंतर देखे गए हैं।

परिवार के भीतर सत्ता, स्वीकृति और निगरानी की संरचना

अंतरजातीय और अंतरधार्मिक रिश्ते परिवार के भीतर बनी सत्ता और फैसले लेने की पुरानी व्यवस्था को सीधे सवालों के घेरे में लाते हैं। ऐसे रिश्तों में घरेलू सत्ता-संतुलन केवल पति-पत्नी या साझेदारों के बीच सीमित नहीं रहता, बल्कि पुरे परिवार, समुदाय और सामाजिक मान्यताओं तक फैल जाता है। जिस कारण, निजी निर्णय अक्सर सार्वजनिक निगरानी के अधीन आ जाते हैं। संयुक्त परिवारों में सत्ता मुख्य रूप से पीढ़ीगत होती है, जहां बुजुर्गों और पारिवारिक मुखियाओं की स्वीकृति को वैधता का आधार माना जाता है। वहीं एकल परिवारों में निर्णय लेना अपेक्षाकृत निजी और द्विपक्षीय होता है, जहां साझेदारों की सहमति अधिक केंद्रीय भूमिका निभाती है

द इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंडियन साइकोलॉजी (आईजेआईपी) में छपे  एक अध्ययन से पता चलता है कि पारिवारिक ढांचा बच्चों के सामाजिक व्यवहार और खुलकर बोलने की क्षमता को प्रभावित करता है। संयुक्त और न्यूक्लियर परिवारों में बच्चों के व्यक्तित्व विकास में स्पष्ट और महत्वपूर्ण अंतर देखे गए हैं।

संयुक्त परिवार की अवधारणा अक्सर सामूहिकता, आपसी सहयोग और साझा जिम्मेदारियों से जोड़ी जाती है। ज़ेनोडो में छपे साल 2022 के संयुक्त और एकल परिवार के संदर्भ में महिलाओं के विचार के अध्ययन में, नई और पुरानी पीढ़ी की महिलाओं के विचारों में काफी अंतर पाया गया है। इसमें देखा गया कि 21 से 45 साल की उम्र की 75 प्रतिशत युवा महिलाएं आज़ादी और रोजगार की वजह से एकल परिवार पसंद करती हैं, जबकि 45 से 55 साल की 80 प्रतिशत महिलाएं आपसी समझ और सम्मान के कारण संयुक्त परिवार के पक्ष में हैं। हालांकि, एकल परिवार की चाहत रखने वाली युवा महिलाओं में भी 60 प्रतिशत ने माना कि बच्चों के पालन-पोषण और सुरक्षा के लिए संयुक्त परिवार ही बेहतर विकल्प है।इस प्रक्रिया में सहयोग और नियंत्रण के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। जो देखभाल कभी सहारा प्रतीत होती है, वही स्वतंत्रता पर अंकुश और भावनात्मक शोषण का माध्यम बन सकती है। बच्चों की बहिर्मुखता या एक्सट्रोवर्ट व्यवहार को अक्सर अधिक सामाजिक संपर्क से जोड़ा जाता है, न कि आज़ादी से। आईएसआई के अनुसार ग्रामीण संयुक्त परिवारों में पहले जन्मे लड़के सबसे अधिक एक्सट्रोवर्ट पाए गए, जिसका कारण सामाजिक समर्थन और पारिवारिक ध्यान है, सामाजिकता हमेशा एजेंसी का संकेत नहीं होती, यह अनुकूलन और अपेक्षाओं में ढलने का परिणाम भी हो सकती है।

भावनात्मक श्रम और देखभाल की राजनीति

एकल परिवार या सीमित सदस्यों वाली यह संरचना बाहरी हस्तक्षेप को कम करती है और साझेदारों को जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय अपने स्तर पर लेने की अधिक गुंजाइश देती है। इसके साथ ही यह व्यक्तिगत सीमाओं को भी महत्व देती है। शहरी एकल परिवारों में जन्मी लड़कियां अपेक्षाकृत अधिक एक्स्ट्रोवर्ट पाई गईं, जो संकेत करता है कि सीमित पारिवारिक निगरानी कभी-कभी अभिव्यक्ति को बढ़ाती है। हालांकि, यह आज़ादी अपने साथ जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण भी लेकर आती है। संयुक्त परिवार में साझा किए जाने वाले देखभाल और घरेलू श्रम का बोझ एकल परिवार में सीमित व्यक्तियों पर केंद्रित हो जाता है। खासतौर पर महिलाओं के लिए यह स्थिति दोहरी जिम्मेदारी का रूप ले सकती है। इसके अतिरिक्त, एकल परिवार सामाजिक समर्थन के अभाव का सामना भी कर सकता है। पारिवारिक संरचनाएं जेंडर के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। परिवार केवल आर्थिक इकाई नहीं है। यह संवेदनशीलता, अपेक्षाएं और भावनात्मक श्रम का जाल भी है। शोध बताते हैं कि एकल परिवार में महिलाओं पर दूसरी पारी जैसा दबाव बनता है, जहां वे बाहर काम करने के बाद भी अदृश्य घरेलू और भावनात्मक श्रम संभालती हैं। 

ज़ेनोडो में छपे साल 2022 के संयुक्त और एकल परिवार के संदर्भ में महिलाओं के विचार के अध्ययन में, नई और पुरानी पीढ़ी की महिलाओं के विचारों में काफी अंतर पाया गया है। इसमें देखा गया कि 21 से 45 साल की उम्र की 75 प्रतिशत युवा महिलाएं आज़ादी और रोजगार की वजह से एकल परिवार पसंद करती हैं।

संयुक्त परिवारों में सामूहिकता का लाभ यह होता है कि व्यापक नेटवर्क समर्थन उपलब्ध होता है। आईजेआईपी में छपे साल 2025 के हालिया शोध के अनुसार, 35-60 साल के व्यक्तियों  में संयुक्त परिवारों में रहने वाले लोगों का जीवन स्तर (क्वालिटी ऑफ लाइफ) एकल परिवारों की तुलना में काफी बेहतर पाया गया। आंकड़ों के मुताबिक, संयुक्त परिवार का औसत स्कोर 526.89 था, जबकि एकल परिवार का स्कोर 487.80 दर्ज किया गया। सबसे चिंताजनक स्थिति एकल परिवारों में रहने वाली महिलाओं की पाई गई, जिनका स्कोर सबसे कम था। यह डेटा साफ़ तौर पर संकेत देता है कि मध्य-आयु में संयुक्त परिवार का सहयोग मानसिक खुशहाली में बड़ी भूमिका निभाता है। न्यूक्लियर परिवार में निर्णय-स्वायत्तता के कारण व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिक होती है और रोमांटिक अनुभवों को अपेक्षाकृत कम बाहरी दबाव मिलता है। फिर भी, यहां अकेलेपन और सामाजिक समर्थन के अभाव जैसी समस्याएं सामने आती हैं। वहीं, संयुक्त परिवारों में पीढ़ीगत पदानुक्रम के कारण महिलाओं और कभी-कभी पुरुषों के भावनात्मक अनुभव दबे रह जाते हैं। 

 क्वीयर रिश्ते और चुने हुए परिवार

भारत में परिवार की पारंपरिक संरचना मुख्य रूप से रक्त संबंधों और शादी पर आधारित रही है, लेकिन क्वीयर समुदाय के व्यक्तियों के अनुभव इस परिभाषा को विस्तार देते हैं। शोध और न्यायिक टिप्पणियां बताती हैं कि कई बार पारंपरिक घर क्वीयर व्यक्तियों के लिए सुरक्षा के बजाय हिंसा और बहिष्कार का केंद्र बन जाते हैं। मद्रास उच्च न्यायालय और जेजीयू के अध्ययन यह बताते हैं कि जाति, धर्म और जेंडर के कठोर मानदंड पारिवारिक अस्वीकृति का कारण बनते हैं, जहां लगभग 37 प्रतिशत एलजीबीटीक्यू समुदाय के युवा अपने घर को अनुकूल नहीं पाते। इस भावनात्मक और सामाजिक शून्यता को भरने के लिए चोज़न फैमिली यानी चुने हुए परिवार की अवधारणा उभरी है। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जहां अपनापन जैविक संबंधों से नहीं, बल्कि आपसी देखभाल, स्वीकार्यता और साझे संघर्षों से तय होता है। आईजेआरएआर के विश्लेषण के अनुसार, यह वैकल्पिक ढांचा पितृसत्तात्मक नियंत्रण से मुक्त होकर सदस्यों को वह भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है जो उन्हें अपने जन्मजात परिवारों में नहीं मिली।

संयुक्त राष्ट्र महिला की साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लगभग 1.3 करोड़ परिवार अकेले माताओं द्वारा चलाए जा रहे हैं। शोध बताते हैं कि जहां शहरी एकल माताओं को अक्सर सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक सहयोग के कारण बच्चों की खुशहाली बेहतर रहती है।

मद्रास उच्च न्यायालय ने भी इस बदलाव को स्वीकारते हुए माना है कि शादी ही परिवार का एकमात्र आधार नहीं है, बल्कि क्वीयर जोड़े और समूह भी एक वैध और सम्मानजनक पारिवारिक इकाई का निर्माण करते हैं। क्वीयर परिवारों में बच्चों का आगमन अक्सर एक सोच-समझ कर लिया गया निर्णय होता है, जो उन्हें पारंपरिक परिवारों से अलग करता है। विलियम्स इंस्टीट्यूट के हालिया शोध के अनुसार क्वीयर जोड़ों में बच्चा गोद लेने की दर हेट्रोसेक्सुअल जोड़ों की तुलना में सात गुना अधिक यानी लगभग 21 प्रतिशत है। यह परिवार अक्सर चोज़न फैमिली यानी चुने हुए परिवार के मॉडल पर काम करते हैं, जहां बच्चों की परवरिश में केवल दो अभिभावक नहीं, बल्कि विस्तारित समुदाय और वयस्क मित्र भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। यह समावेशी ढांचा बच्चों को विविधता और स्वीकार्यता का पाठ पढ़ाता है, जो भावनात्मक विकास के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है।

एकल अभिभावक परिवार: सामाजिक कलंक बनाम मानसिक दृढ़ता

भारत में परिवार की बदलती संरचना का एक ज़रूरी पहलू एकल अभिभावक परिवारों का विस्तार है। संयुक्त राष्ट्र महिला की साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लगभग 1.3 करोड़ परिवार अकेले माताओं द्वारा चलाए जा रहे हैं। शोध बताते हैं कि जहां शहरी एकल माताओं को अक्सर सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक सहयोग के कारण बच्चों की खुशहाली बेहतर रहती है। एकल अभिभावक परिवारों में पिताओं की भूमिका अक्सर अदृश्य रह जाती है। चेन्नई के साल 2024 के अध्ययन में उनकी हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत पाई गई है। शोध बताते हैं कि एकल पिता आर्थिक दबाव से ज्यादा सोशल आइसोलेशन और रोल कॉन्फ्लिक्ट से जूझते हैं, क्योंकि समाज पुरुषों को स्वाभाविक देखभालकर्ता के रूप में सहजता से स्वीकार नहीं करता।

भारत में क्वीयर शादी को कानूनी मान्यता न मिलने के कारण कई क्वीयर व्यक्ति एकल अभिभावक के रूप में परिवार का निर्माण कर रहे हैं। किशोर न्याय अधिनियम के तहत अविवाहित व्यक्तियों को गोद लेने का अधिकार प्राप्त है, जिसका उपयोग यह समुदाय कर रहा है। द एस्टेब्लिश्ड की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय संदर्भ में यह कदम केवल परिवार बसाना नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी बदलाव है जो साबित करता है कि पालन-पोषण की क्षमता लैंगिक पहचान पर निर्भर नहीं करती। भारतीय समाज में परिवार की परिभाषा अब केवल संयुक्त या एकल के पारंपरिक द्वंद्व तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह क्वीयर और एकल अभिभावक परिवारों जैसे नए स्वरूपों को भी अपने भीतर समेट रही है। समावेशन की असली कसौटी मकान की छत या सदस्यों की संख्या नहीं, बल्कि घर के भीतर उपलब्ध भावनात्मक सुरक्षा, संवाद और व्यक्तिगत गरिमा है। चाहे वह रक्त संबंधों पर आधारित पारंपरिक ढांचा हो या आपसी प्रेम से चुना हुआ परिवार, एक आदर्श इकाई वही है जो सत्ता और नियंत्रण के बजाय सहयोग और स्वीकार्यता पर टिकी हो। भविष्य उन परिवारों का है जो बदलते दौर में अपने सदस्यों को जड़ें और पंख, दोनों देने का साहस रखते हैं, ताकि परंपरा और आधुनिकता के बीच एक संतुलित और मानवीय समाज का निर्माण हो सके।

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