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‘अर्धांगनी, बेटर हाफ़, पति- पत्नी गाड़ी के दो पहिए हैं’ ऐसे शब्दों और वाक्यों का इस्तेमाल हम आमतौर पर स्त्री पुरुष के वैवाहिक संबंधों के स्वरूप को बताने के लिए करते हैं। किसी भी वैवाहिक रिश्ते में स्त्री पुरुष दो पहियों के समान होते हैं, लेकिन गाड़ी मंजिल तक तभी पहुंच सकती है जब रिश्ते में बराबरी और समानता का भाव हो। विवाह संस्था का स्वरूप तो अपने-आप में असमान अधिकारों और कर्तव्यों के आधार पर खड़ा है, जहां स्त्री पुरुष सामाजिक, आर्थिक रूप से गैरबराबरी की स्थिति में होते हैं। ऐसे में क्या उसे एक सफल वैवाहिक जीवन कहा जा सकता है, जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों केवल सामाजिक दबाव के चलते अपनी-अपनी भूमिका को ढोने के लिए मजबूर हो? एक पितृसत्तात्मक समाज में जब कर्तव्य और अधिकारों का असमान बंटवारा हो वहां शादी जैसी सामाजिक संस्थाएं लैंगिक भेदभाव को ही कायम रखने में एक अहम भूमिका निभाती हैं। शुरू से ही निजी संपत्ति और एकनिष्ठ विवाह की धारणाओं ने स्त्री को दोयम दर्जे को बनाये रखने की धारणाओं को मजबूती दी है। परिवार और विवाह जैसी संस्थाएं स्त्री के शोषण और उत्पीड़न के मुख्य केंद्र हैं। बावजूद इसके विवाह और परिवार सामाजिक का केंद्र बने हुए हैं।

मानवीय संबंधों और सभ्यताओं के इतिहास को देखे तो हम पाएंगे कि समुदायों और कबीलों में विवाह एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता था। विवाह ही वह मुख्य ज़रिया होता था समाज और समुदाय का आपस में जुड़ने का। जिसमें लड़की संपत्ति की तरह किसी अन्य पुरुष या समाज को दे दी जाती थी। इस तरह से उनका आपस में मजबूत संबंध स्थापित होता था। आज भी विवाह का यह स्वरूप और उसकी भूमिका वैसी ही बनी हुई है। पितृसत्तात्मक समाज में परिवार और विवाह संस्थाओं को सामाजिक स्वीकृति मिली हुई है। आदर्श पति-पत्नी, आदर्श मां, अच्छा बेटा, आदर्श बेटी और न जाने कितने खांचे बनाए गए हैं। अपने आस-पास हम कई लोगों को यह कहते और सुनते पाएंगे कि “लड़की को जल्दी शादी कर लेनी चाहिए, उसे ज्यादा समय तक अविवाहित नहीं रहना चाहिए। लड़कों को कहा जाता है. “जल्दी नाैकरी कर अपना घर बसाओ।”

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परिवार और विवाह संस्था से ही पितृसत्तात्मक समाज के उस स्वरूप को खड़ा करना सहज हो जाता है जो स्त्री पुरुष की रूढ़िवादी भूमिकाओं को आकार देते हैं। वह उन्हें इन संस्थाओं में ढालने के लिए प्रेरित करते हैं। सामाजिक दबाव डालते हैं कि वे भी इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था का हिस्सा बन इस व्यवस्था को पोषित करें, इसे चलाने में अपना योगदान दें। इन संस्थाओं के अलावा बाकी अन्य विकल्प गलत या अनैतिक घोषित कर दिए जाते हैं। जो इन भूमिकाओं में नहीं ढलता, या इससे इतर विकल्पों की तरफ बढ़ता है जैसे कि शादी न करना, बिना शादी के बच्चे पैदा करना या लिव इन में रहना। उन्हें इस समाज में अच्छी लड़की या लड़के के पैमाने में फिट नहीं माना जाता। इस तरह इन संस्थाओं के सही और उसके बने रहने की सामाजिक स्वीकृति बनी रहती है।

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स्त्रियों के लिए तो विवाह संस्था का हिस्सा बनना एक नियति बन चुका है। उनके पास विवाह को स्वीकार करने या अपनी मर्जी से विवाह की स्वतंत्रता का कोई विकल्प दिया ही नहीं जाता है। करियर से ज्यादा आज भी औरतों की शादी से जुड़े खर्च और योजनाएं बनाने में सारी शक्ति लगाई जाती है। शादी उनके लिए एक केंद्र बिंदु बना दिया गया है। उन्हें बचपन से पराया धन कहकर हीनता का बोध पैदा किया जाता है। ‘पराया’ और ‘अपना’ घर कहकर उनके अंदर विवाह संस्थाओं के प्रति एक आकर्षण पैदा किया जाता है क्योंकि आज भी समाज का एक बड़ा तबका पितृसत्तात्मक मूल्यों से प्रेरित है जिससे पुरुष भी ग्रस्त हैं। गांव, कस्बों में ही नहीं शहर में भी यह विचार रचा-बसा है कि पति के अलावा अगर उसकी पत्नी को भी काम करने की जरूरत पड़ रही है तो यह बात पुरुष को ग्लानि और ठेस से भर देती है। यह उसके लिए एक नकारात्मक छवि पैदा करता है। पत्नी का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने से वह अपराधबोध महसूस करने लगते हैं कि उनके होते हुए भी उनकी पत्नी को बाहर काम करना पड़ेगा। इस तरह से विवाह की संस्था पुरुषों को दोहरी जिम्मेदारी का सामना करना उन पर पितृसत्तात्मक दबाव बनाता है जिसके मुताबिक घर चलाना पुरुषों की ही ज़िम्मेदारी है।

स्त्रियों के लिए तो विवाह संस्था का हिस्सा बनना एक नियति बन चुका है। उनके पास विवाह को अस्वीकार करने या अपनी मर्जी से विवाह की स्वतंत्रता का अन्य कोई विकल्प दिया ही नहीं जाता है।

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विवाह संस्था की जड़ता ने व्यक्ति के स्वभाव और व्यवहार को नियंत्रित ही ज्यादा किया है। परिवार, विवाह आदि संस्थाएं स्त्री को सुरक्षा देने के नाम पर उनके अधिकारों को सीमित कर उन्हें दोयम दर्जे का प्राणी होने पर मजबूर करती है। लेकिन इन सामाजिक संस्थाओं के भीतर होने वाले शोषण और उत्पीड़न को नजरअंदाज़ किया जाता है। कई बार घरवालों की तरफ से शादी के लिये राज़ी करना उनका मानसिक शोषण का ज़रिया बन जाता है। शादी उनके लिए एक जबरदस्ती का सौदा बन जाता है। ज्यादातर मामलों में देखने में यह आता है कि लड़की को पता ही नहीं होता कि उसकी शादी की बात की जा रही है अगर रिश्ता मिल गया तो पढ़ाई के बीच में या नौकरी छुड़वाकर शादी करने का दबाव बनाया जाता है। इस तथ्य को सिरे से भुला दिया जाता है कि शादी पूरा जीवन नहीं है। विवाह किसी की मर्ज़ी हो सकती है लेकिन अनिवार्य नहीं। इस तथ्य पर विश्वास बढ़ाए जाने की ज़रूरत है कि विवाह न करने का फैसला भी एक सही फैसला हो सकता है। विवाह संस्था की जड़ता, उससे जुड़े आडंबरों को अपनाए बगैर भी स्त्री पुरुष साथ रहने का एक बेहतर विकल्प चुन सकते हैं।

अनिश्चित भविष्य, लैंगिक असमानता और अवसर की कमी के कारण लड़कियां आज भी विवाह संस्था के प्रति आशावादी बनी हुई हैं यह उन्हें उनके सफल जीवन का विकल्प लगने लगता है। यह जानकर भी की इसके भीतर उन्हें पहले के मुकाबले ज्यादा असमानता से भरपूर अनुशासित और सीमित जीवन बिताना होगा, क्योंकि इसके भीतर एक निर्धारित भूमिका और आचरण पहले से तय है। जहां आज भी पति यानी मालिक है और इस तरह स्त्री की स्थिति किसी गुलाम से कम नहीं। परंपरा के बोझ और आर्थिक निर्भरता के कारण स्त्री आश्रित जीवन जीने को विवश है। एक समय बाद वह शारीरिक ही नही मानसिक गुलामों का जीवन जीने लगती है। वह किसी की बेटी है, पत्नी है, मां है लेकिन अपनी खुद की पहचान उसे हासिल नहीं होती है। यही खालीपन वैवाहिक जीवन और परिवार में मिलने वाली भौतिक सुविधाओं से भी नहीं भर सकता।

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विवाह एक ऐसा अनुबंध है जिसका फैसला परिवार के पुरुष सदस्य या मुखिया करते हैं। जिसमें ज्यादातर स्त्री की स्वीकृति होना भी महत्वपूर्ण नहीं समझा जाता। कई बार यह स्वीकृति जबरदस्ती लाद दी जाती है। आज भी करोड़ों लड़कियों की उम्र, स्वास्थ्य और मानसिक शारीरिक परिपक्वता को शादी के फैसले से पहले नजरअंदाज कर दिया जाता है। विवाह से जुड़ी कई अवधारणाओं को अनजाने में अपना लिया जाता है जिससे भेदभाव स्वभाविक हो जाता है, जिन्हें बदलने की पहल करनी चाहिए। यह तमाम परंपराएं पितृसत्तात्मक मूल्यों से प्रेरित हैं। मसलन मंगलसूत्र, सिंदूर जैसे प्रतीकों से लेकर कन्यादान और दहेज की प्रथा। दहेज एक अपराध न नज़र आए इसलिए अब इसे ‘स्त्रीधन’ भी कहा जाने लगा है। आज भी विवाह में एक ज़रूरी रस्म है कन्यादान। स्त्री मानो आदान-प्रदान की कोई चीज़ हो, उसके अस्तित्व और आत्मसम्मान को कहीं कोई प्राथमिकता ही नहीं दी जाती। क्या सचमुच आज इन्हीं मूल्यों से चिपके रहने की जरूरत है  जिसमें स्त्री पुरुष बराबर नहीं बल्कि एक दूसरे के मालिक और दास बने रहने की भूमिका में बदल जाते हो।

हमारा समाज पितृसत्तात्मक है जिसमें विवाह स्त्री पुरुष के लिए अलग-अलग अर्थ पैदा करता है। विवाह पुरुष के लिए जहां सामाजिक उन्नति और जीवन की प्रगति का सूचक है। वहीं आज भी स्त्री के लिए विवाह एक सुरक्षित भविष्य की गारंटी के तौर पर देखी जाती है। यानी विवाह स्त्रियों के लिए शारीरिक, मानसिक जरूरत से ज्यादा मात्र सुरक्षा का आश्वासन भर है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में यह संस्थाएं स्त्री-पुरुष के बीच असमान भेदभाव को बढ़ाने का जरिया बन जाते हैं, उनके स्वरूप को लोकतांत्रिक बनाने की चुनौती नहीं दी जाती। 

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औरत को जितनी सुरक्षा दी जाती है बदले में उसकी स्वाधीनता को उतना ही अधिक सीमित कर उसका उत्पीड़न किया जाता है। यह सुरक्षा भी कुछ स्त्रियों को ही मिल पाती है। स्त्री जिसे विवाह के बाद किसी और घर में जाना है उन्हें सामाजिक संबंधों को नए सिरे से बनाना पड़ता है। कई बार यह प्रक्रिया बहुत लंबी हो जाती है। अपने आप को अनजान जगह स्थापित करने की चुनौती रहती है। जैसे एक पौधे को उखाड़ कर दूसरे जगह रोपना। इस पूरी प्रक्रिया में स्त्री के अधिकार और स्वंत्रता ही सीमित किए जाते हैं। वह अनजान जगह, अनजान लोगों के बीच आजीवन मानवीय संबंधों को बरकरार रखने की त्रासदी में जीने लगती है। यह सब ऊपर से देखने में भले खूबसूरत और राहत देता है लेकिन इसके भीतर की जटिलताएं जीवन का हिस्सा बन जाते है। लोग भावनात्मक, शारीरिक जरूरतों की जगह हर रोज शोषण और हिंसा का सामना करते हैं।

घर-परिवार में स्त्रियों को सीमित अधिकार ही दिए जाते हैं। वह संपत्ति की हिस्सेदार नहीं होती। स्त्री जो पहले ही दोयम दर्जे की नागरिक है। स्त्री खुद एक निजी संपत्ति बन गई है। विवाह के साथ ही उसका शरीर और श्रम दोनों पर उसका अधिकार नहीं रह जाता। धीरे-धीरे आश्रित और अपनी संकुचित होती जिंदगी के बीच वह विवाह की त्रासदियों में अपना जीवन स्वाहा होने की स्थिति तक पहुंच जाती है क्योंकि पितृसत्ता के चलते विवाह संस्था के भीतर भी पुरुष ही वर्चस्वशाली स्थिति में होता है जिससे औरतों का दमन करना आसान और स्वाभाविक हो जाता है।  ऐसे अलोकतांत्रिक ढांचे के भीतर बने रहना करोड़ो स्त्री, पुरुषों की नियति है। ज़रूरत है इन भूमिकाओं को बदलने की, आदर्श खांचे की जरूरत ही क्यों है, क्यों कोई पैमाना गढ़ा जाए? जड़ हो चुकी मान्यताओं और परंपराओं को ढोने की विवशता क्यों किसी पर डाली जाए? एक महत्वाकांक्षी और स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाने पर जोर क्यों न दिया जाए? परिवार और विवाह संस्थाओं को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाया जाए जिसमें समान अधिकार और सहयोग की भावना हो। इससे समाज भी लोकतांत्रिक बन जाएगा। 

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तस्वीर : सुश्रीता भट्टाचार्जी

मेरा नाम प्रीति है। मैं दिल्ली से हूँ। मैंने जे.एन.यू. से हिंदी विषय में मास्टर किया है। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय से 'हिन्दी के नारीवादी उपन्यासों में स्त्री-मुक्ति की अवधारणा: मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों के संदर्भ में'' विषय पर शोध कर रही हूं। मैं एक लेखक बनना चाहती हूं। मुझे नारीवादी बहसों और अवधारणाओं के विषयो पर पढ़ना-लिखना पसन्द है।

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