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कुछ महीने पहले कोरोना की दूसरी लहर के दौरान एक महिला की वायरल फोटो बड़ी चर्चा में रही। फोटो में साफ देखा जा सकता है कि एक महिला मुंह पर ऑक्सीजन मास्क लगाए, ऑक्सीजन सिलिंडर बगल में रखकर अपनी रसोई में काम कर रही है। फ़ोटो के सूत्र का ठीक-ठीक पता तो नहीं चल पाया पर उससे मिलने वाले संदेश पर कई सवाल उठे। फ़ोटो का कैप्शन था, “बिना शर्तों वाला प्यार। माँ कभी भी ऑफ-ड्यूटी नहीं होती।” अक्सर ही भारत में माँओं को ‘त्याग की मूर्ति’ जैसी उपाधियां देकर उनकी शारीरिक क्षमता की सीमाओं को नकारा जाता रहा गया है। आमतौर पर हम जब घरेलू कामों की कल्पना करते हैं तो अक्सर एक औरत का चेहरा ज़हन में आता है। वह दिन में सबसे पहले उठती है, अपने पति और बच्चों की देखभाल करती है और रात में सबसे आखिर में सोती है। पूरे दिन यही चक्र चलता रहता है। इससे औरतों को न सिर्फ शारीरिक तकलीफ़ होती है बल्कि मानसिक पीड़ाएं भी सहनी पड़ती हैं।

अक्सर हम माँ की तारीफ़ में कहते हैं कि माँ कभी बीमार नहीं पड़ती। ऊपर दिए गए उदाहरण से भी यही जान पड़ता है, पर क्या ऐसा वाकई सच है? क्या वाकई माँ बीमार नहीं पड़ती या पितृसत्ता उन्हें बीमार पड़ने का समय नहीं देती है? अगर वह बीमार पड़ती भी हैं तो हम अनदेखा ही तो कर देते हैं। “आखिर माँ है, वह हमारी देखभाल करेंगी, हम कैसे उनकी देखभाल कर सकते हैं?” यह दुर्भाग्य सिर्फ माँओं का नहीं बल्कि घर की हर महिला का है जिन्होंने त्याग को ही अपना सबसे बड़ा धर्म मान लिया है या यूं कहें कि ऐसा मानने के लिए पितृसत्तात्मक समाज ने उन्हें मजबूर किया है। समाज में बनाई गई आदर्श छवि को बनाए रखने के लिए महिलाओं को अपने स्वास्थ्य को पीछे छोड़ देना पड़ता है। यह कोई नई बात नहीं है।

बचपन से ही महिलाओं को त्याग और सेवा के सांचे में ढाल दिया जाता है। पापा ऑफिस से आए तो उनको पानी दो, भाई कोचिंग से आए तो उसके लिए चाय बनाओ, रात के खाने के लिए टेबल लगा दो। ये सारी सीख लड़कियों को बचपन में मिल जाती है। यह त्याग इतना हावी हो जाता है कि अगर महिलाएं अपने आराम या मनोरंजन के लिए थोड़ा समय निकालें तो वह भी उन्हें गलत लगता है! कल्पना करिए कि आपके पिता और माँ अपने अपने फोन में यूट्यूब चला रहे हैं। अब सोचिए कि आपके पिता क्या देख रहे होंगे और माँ क्या देख रही होंगी। बहुत संभव है कि आपके पिता मनोरंजन से जुड़े वीडिओज़ देख रहे होंगे और आपकी माँ खाना बनाने से संबंधित! आराम के वक़्त भी महिलाओं के ज़हन में घरेलू काम ही चलता है।

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इंडियास्पेंड पर छपे एक लेख के मुताबिक भारत में महिलाएं हर दिन 352 मिनट घरेलू काम करती हैं। इस हिसाब से वे आदमियों से 577 फ़ीसद ज़्यादा काम करती हैं। वहीं, पुरुष दिन में सिर्फ 52 मिनिट घरेलू काम करते हैं। साउथ अफ्रीका और चीन की तुलना में भारतीय महिलाएं 40 फ़ीसद ज़्यादा घरेलू काम करती हैं। यह समस्या गरीब और पिछड़े वर्गों में और गंभीर पाई जाती है, जहां महिलाएं आर्थिक तंगी के कारण किसी सहायक को काम पर रखने में असमर्थ होती हैं। ऐसे में कुछ महिलाएं 17-19 घंटे भी घरेलू काम करने में बिता देती हैं। इसका यह भी मतलब निकलता है कि इतना वक़्त घरेलू काम में लगाने के बाद, महिलाओं के पास अपने निजी विकास के लिए समय नहीं मिलता। न ही वे कुछ नया सीख सकती हैं, न ही अपने शरीर को आराम दे पाती हैं। लेख के ही मुताबिक जब पालघर, महाराष्ट्र की 45 वर्ष की सुनन्धन भोईर से पूछा गया कि यदि खाली समय मिला, तो वह क्या करना पसंद करेंगी। इस सवाल पर वह कहती हैं, “सोऊंगी, और क्या?”

अक्सर यह दलील दी जाती है कि पुरुष का काम घर के बाहर जाकर कमाने का है, वहीं महिला का काम घर के अंदर रहकर परिवार संभालना है। अगर पति-पत्नी दोनों कामकाजी हों, तब भी घरेलू काम करने का ज़िम्मा भी महिलाओं के सर ही आता है। 85 फ़ीसद भारतीय महिलाओं को लगता है कि उनकी दो नौकरियां हैं, एक घर के बाहर और एक घर के अंदर।

महिलाओं को मौलिक सुविधाओं से हमेशा वंचित रखा गया है। इस बात से सीख लेने के बजाय हम महिलाओं के 24×7 काम करने की क्षमता का बखान करते हैं। ‘माँ विकट स्थितियों में कभी हार नहीं मानती’, ‘माँ कभी बीमार नहीं पड़ती’, ‘महिलाओं को कभी छुट्टी नहीं होती’, ऐसे वाक्य बड़े गर्व से इस्तेमाल किए जाते हैं।

स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव

महिलाओं को मौलिक सुविधाओं से हमेशा वंचित रखा गया है। इस बात से सीख लेने के बजाय हम महिलाओं के 24×7 काम करने की क्षमता का बखान करते हैं। ‘माँ विकट स्थितियों में कभी हार नहीं मानती’, ‘माँ कभी बीमार नहीं पड़ती’, ‘महिलाओं को कभी छुट्टी नहीं होती’, ऐसे वाक्य बड़े गर्व से इस्तेमाल किए जाते हैं। महिलाओं के बिगड़ते स्वास्थ्य का मुख्य कारण है अत्यधिक घरेलू काम करना। ऐसे में शरीर पर बेहिसाब दर्द तो सहन करना ही पड़ता है, साथ में पर्याप्त आराम करने का समय भी नहीं मिलता। इसके साथ-साथ महिलाओं की स्वतंत्रता बाधित होती है, शारीरिक और मानसिक तनाव बढ़ता है। साथ ही साथ उन्हें लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है और कुपोषण का शिकार भी होना पड़ता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में माँ बनने योग्य महिलाओं में से एक-चौथाई कुपोषित हैं। ऐसे में इन महिलाओं के बच्चे भी कमज़ोर पैदा होते हैं।

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कोरोना से और बिगड़े हालात

स्वास्थ्य सेवाओं पर कोरोना महामारी का काफी गंभीर असर पड़ा। महिलाओं के मौलिक अधिकरों को नज़रअंदाज़ किया गया। ‘ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021’ के मुताबिक पुरुष और महिलाओं के बीच समानता में हम 39 साल और पिछड़ चुके हैं। कोरोना लॉकडाउन के कारण महिलाओं से संबंधित स्वास्थ्य सेवाएं और भी कम होती चली गईं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार इस महामारी में महिलाओं के प्रति हिंसा के मामलों में 25 फ़ीसद बढ़त देखी गई। कोरोना के चलते महिलाओं को कानूनी और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं न मिल सकीं। ऐसे में उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा।

घरेलू कामकाज मुख्यतः महिलाओं की ज़िम्मेदारी मानी जाती है। यहीं से सारी दिक्कतें पैदा होती हैं। उदाहरण के तौर पर निलसन इंडिया द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक 76 फ़ीसद भारतीय पुरुषों को मानना है की कपड़े धोना महिलाओं का ही काम है। धीरे-धीरे मीडिया, ऐड्स और अन्य माध्यमों के ज़रिये इस मुद्दे पर जागरूकता तो फैलाई जा रही है लेकिन अपने घरेलू कामों में समान रूप से पुरुषों की भागीदारी एक कल्पना ही है।

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तस्वीर साभार : BBC

सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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