भारत में दहेज प्रथा का इतिहास कई सदियों पुराना है, जो हमारे समाज की पितृसत्तात्मक रुढ़िवादी मानसिकता को सामने लाता है। सामाजिक सुरक्षा का माध्यम मानी जाने वाली इस व्यवस्था में, महिलाओं को बराबरी का इंसान नहीं बल्कि सौदे और लेन-देन की वस्तु के रूप में देखा गया, जिस कारण बहुत सी महिलाओं को हिंसा का सामना करना पड़ा, और आज भी कहीं न कहीं बहुत सी महिलाएं इसका सामना कर रही हैं। क्योंकि यह हिंसा का ऐसा रूप है, जिसे घरेलू मामला कहकर अक्सर टाल दिया जाता है, जिस कारण बहुत सी महिलाएं इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठा पाती हैं।
लेकिन भारतीय इतिहास में कुछ ऐसी महिलाएं रही हैं, जिन्होंने इसके विरोध के लिए आवाज़ उठाई। उन्हीं में से एक शख्सियत थीं सत्य रानी चड्ढा, जिन्होंने समाज की उस चुप्पी को चुनौती दी, जो दहेज-हत्या को सहनशीलता और समझौते की आड़ में सामान्य बना देती है। उनका संघर्ष इस मायने में ऐतिहासिक है, क्योंकि उन्होंने दहेज-हिंसा को एक व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्या के रूप में सबके सामने लाने की कोशिश की। इसके अलावा बहुत सी महिलाओं को भी इसका विरोध करने के लिए प्रेरित किया।
17 मार्च 1979 को सत्य रानी की बेटी शशि बाला ( कंचनबाला ) अपने ससुराल में जली हुई, हालत में बेहोश पाई गई।बाद में जब उसे अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईएमएस) ले जाया गया, तो उसे 100 फीसदी जलने के कारण मृत घोषित कर दिया गया। उनकी 20 वर्षीय बेटी छह महीने की गर्भवती थी।
शुरूआती जीवन, दहेज-हत्या और एक मां का संघर्ष
सत्य रानी चड्ढा का जन्म साल 1933 में हुआ था। वे एक मध्यमवर्गीय परिवार में पली-बढ़ीं। वह एक महिला अधिकार कार्यकर्ता थीं। उन्हें पढ़ने -लिखने के ज्यादा अवसर नहीं मिल पाए। इसलिए शादी के बाद उनका जीवन मुख्य रूप से एक गृहिणी के रूप में बीता और वे घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित रहीं। हालांकि उनके बचपन, शिक्षा और शादी से जुड़ी हुई जानकारी बहुत कम मिलती है। शादी के कुछ सालों के बाद उनके पति की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उन्होंने अकेले ही अपने पांच बच्चों का पालन पोषण किया। उनकी एक बेटी की दहेज के लिए हत्या कर दी गई थी। बार एंड बेंच में छपी साल 2021 की खबर के मुताबिक, 17 मार्च 1979 को सत्य रानी की बेटी शशि बाला ( कंचनबाला ) अपने ससुराल में जली हुई, हालत में बेहोश पाई गई।
बाद में जब उसे अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईएमएस) ले जाया गया, तो उसे 100 फीसदी जलने के कारण मृत घोषित कर दिया गया। उनकी 20 वर्षीय बेटी छह महीने की गर्भवती थी। यह घटना दहेज-हिंसा और दहेज-हत्या के मामलों में एक अहम संदर्भ बन गई और इसी से उनके लंबे संघर्ष की शुरुआत हुई। सत्यरानी की शिकायत पर पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज कराई। गौरतलब है कि शुरुआत में अधिकारियों ने एफआईआर को गंभीरता से नहीं लिया और उसके पति पर हत्या का नहीं, बल्कि दहेज निषेध अधिनियम के तहत अपराध का मुकद्दमा दर्ज किया। उन्होंने बताया कि जब वह गर्भवती थी, तब भी उसके पति ने उस पर और उसके परिवार पर अतिरिक्त दहेज के लिए दबाव डालना जारी रखा और मांगें पूरी न होने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। अदालत की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि मृतका अपनी मां को पत्र भेजा करती थी।
सत्यरानी के अदालती संघर्ष के दौरान, एक और मां, शाहजहां आपा, ने दहेज हत्या में अपनी बेटी को खो दिया था। इन दोनों ने सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों ने दहेज की मांग और हिंसा का सामना करने वाली, महिलाओं की सहायता के लिए शक्ति शालिनी नामक एक छोटा गैर-सरकारी संगठन शुरू किया और कई महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा पर आवाज़ उठाई
अदालत ने कहा, मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति से ताल्लुक रखने वाली मृतका अपने शादीशुदा जीवन के इन दस महीनों में अपनी मां को भी अपना दर्द नहीं बताना चाहती थी, मां और मंदिर वाली माताजी को लिखे उसके पत्र मानो खुद को दिलासा देने जैसे थे, जिनमें वह खुद को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रही थी कि उसके जीवन में सब ठीक हो जाएगा ।उसे अपने पति पर भरोसा करना सीखना चाहिए। साथ ही अपनी मां को यह भी बता रही थी कि उसके पति की बहनें हैं और उसे किसी को परेशान नहीं करना चाहिए। यह अप्रत्यक्ष रूप से अपनी मां को यह बताने का तरीका था कि उसका पति उसे खुद परेशान कर रहा है।
सत्य रानी का दहेज विरोधी संघर्ष
सत्यरानी के अदालती संघर्ष के दौरान, एक और मां, शाहजहां आपा, ने दहेज हत्या में अपनी बेटी को खो दिया था। इन दोनों ने सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों ने दहेज की मांग और हिंसा का सामना करने वाली, महिलाओं की सहायता के लिए शक्ति शालिनी नामक एक छोटा गैर-सरकारी संगठन शुरू किया और कई महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा पर आवाज़ उठाई। इसके साथ – साथ उनकी बेटी के केस का मुकदमा भी चलता रहा। उन्होंने भारतीय कानून के उस प्रावधान का सहारा लिया, जिसके तहत कोई व्यक्ति हत्या का मुकदमा दायर कर सकता है। लेकिन उन्हें किसी न्यायाधीश से सुनवाई करवाने में 20 साल लग गए। साल 2000 में आरोपी को आत्महत्या से मौत के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराया गया।
साल 2013 में वह दोषी साबित हुआ और उसे सात साल की सजा सुनाई गई। गौरतलब है कि आरोपी गिरफ्तारी से बचकर फरार हो गया पुलिस उसे कभी गिरफ्तार ही नहीं कर सकी। यह मामला अकेला ऐसा मामला नहीं था, जहां न्याय में देरी हुई ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां परिवार न्याय पाने के लिए कई सालों से संघर्ष कर रहे हैं।
अपील पर साल 2013 में वह दोषी साबित हुआ और उसे सात साल की सजा सुनाई गई। गौरतलब है कि आरोपी गिरफ्तारी से बचकर फरार हो गया पुलिस उसे कभी गिरफ्तार ही नहीं कर सकी। यह मामला अकेला ऐसा मामला नहीं था, जहां न्याय में देरी हुई ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां परिवार न्याय पाने के लिए कई सालों से संघर्ष कर रहे हैं। बार एंड बेंच की साल 2021 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सत्य रानी ने कहा था कि, उन्होंने 35 साल पहले अपनी बेटी को खो दिया, लेकिन इस प्रक्रिया में उन्होंने हजारों-हजारों लोगों की जान बचाई। लेकिन अंत में उन्हें क्या मिला? वह जिंदा है, शादीशुदा है और फरार है, वह जेल में नहीं है। लेकिन उनकी बेटी मर चुकी है।
कानून से उनका यह मोहभंग हमेशा उनके साथ रहेगा। इस तरह वह जीवन भर न्याय के लिए संघर्ष करती रही और दहेज़ विरोधी आंदोलनों का हिसा बनी रहीं । न्याय की इंतज़ार में 84 साल की उम्र में साल 2014 में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन उनका संघर्ष और योगदान हमेशा के लिए लोगों के दिलों में अपनी एक अलग जगह बना गया और इससे भी सीख मिली कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना कितना ज़रूरी है।सत्य रानी चड्ढा का संघर्ष दहेज-प्रथा और उससे जुड़ी हिंसा के खिलाफ एक साहसिक प्रतिरोध का उदाहरण है। उन्होंने निजी दुख को सामाजिक लड़ाई में बदलते हुए दहेज-हिंसा को सार्वजनिक मुद्दा बनाया और कई महिलाओं को आवाज़ दी। भले ही उन्हें पूरा न्याय न मिल सका, लेकिन उनका संघर्ष यह सिखाता है कि अन्याय के खिलाफ चुप रहने से बेहतर है आवाज़ उठाना, क्योंकि यही बदलाव की शुरुआत है।

