इतिहास पुरुषों की दुनिया में जगह बनाने वाली भारतीय फिल्म संपादक रेणु सालुजा| #IndianWomenInHistory

पुरुषों की दुनिया में जगह बनाने वाली भारतीय फिल्म संपादक रेणु सालुजा| #IndianWomenInHistory

रेणु मानती थीं कि एडिटिंग “पटकथा लेखन का तीसरा चरण” होती है। वह सिर्फ कट्स नहीं करती थीं, बल्कि निर्देशक की सोच को नया रूप देती थीं। अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कहा था, “वह सिर्फ एक एडिटर नहीं थीं, वह एक फिल्म निर्माता थीं।”

सिनेमा में किसी फिल्म की रफ्तार और कहानी को आकार देने वाला सबसे अहम कलाकार एडिटर होता है, लेकिन उसे अक्सर भुला दिया जाता है। लंबे समय तक एडिटिंग जैसे तकनीकी कामों को पुरुषों का क्षेत्र माना गया और महिलाओं को इससे दूर रखा गया। 1970–80 के दशक में भारतीय सिनेमा का एडिटिंग रूम लगभग पूरी तरह पुरुषों के कब्ज़े में था। ऐसे माहौल में रेणु सालुजा का आगे आना एक बड़ा बदलाव था। उन्होंने न सिर्फ एक बेहतरीन फिल्म एडिटर के रूप में पहचान बनाई, बल्कि यह भी साबित किया कि तकनीक और कला में महिलाओं की भूमिका उतनी ही ज़रूरी है।

उनका जन्म और सिनेमा की दुनिया में आने का सफर

रेणु का जन्म 5 जुलाई 1952 को दिल्ली के एक पंजाबी परिवार में हुआ था। सिनेमा में आने का फैसला उनके लिए पहले से तय नहीं था। उनकी बड़ी बहन राधा सालुजा एक जानी-मानी फिल्म अभिनेत्री थीं। रेणु को सिनेमा की दुनिया से परिचय और प्रेरणा वहीं से मिली। साल 1974 में रेणु ने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में निर्देशन कोर्स के लिए आवेदन किया। लेकिन, उनका चयन नहीं हुआ। इसके बजाय उन्हें एडिटिंग कोर्स में दाखिला मिला। यही मोड़ उनके करियर की दिशा तय करने वाला साबित हुआ। साल 1976 में रेणु ने एडिटिंग का कोर्स पूरा किया और फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। उस समय फिल्म एडिटिंग पूरी तरह पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। एडिटिंग रूम में किसी महिला की मौजूदगी न केवल दुर्लभ थी, बल्कि कई लोगों को असहज भी करती थी। तकनीकी काम को पुरुषों से जोड़ा जाता था, जबकि महिलाओं के लिए सिनेमा में जगह सिर्फ कैमरे के सामने मानी जाती थी। रेणु ने इन धारणाओं को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपने काम से साबित किया कि एडिटिंग एक तकनीकी ही नहीं, बल्कि संवेदनशील कला भी है, और इसमें महिलाओं की भूमिका बेहद जरूरी है।

तकनीकी काम को पुरुषों से जोड़ा जाता था, जबकि महिलाओं के लिए सिनेमा में जगह सिर्फ कैमरे के सामने मानी जाती थी। रेणु ने इन धारणाओं को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपने काम से साबित किया कि एडिटिंग एक तकनीकी ही नहीं, बल्कि संवेदनशील कला भी है, और इसमें महिलाओं की भूमिका बेहद जरूरी है।

एफटीआईआई में रहते हुए रेणु ने अपने सहपाठी विधु विनोद चोपड़ा की डिप्लोमा फिल्म ‘मर्डर एट मंकी हिल’ (1976) की एडिटिंग की। इस फिल्म के लिए उन्हें सहायक निर्देशक का श्रेय भी मिला। यह फिल्म साल 1977-78 में सर्वश्रेष्ठ प्रयोगात्मक फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने में सफल रही। एफटीआईआई के बाद रेणु का पेशेवर सफर शुरू हुआ। उन्होंने सईद अख्तर मिर्जा की ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ (1980), विधु विनोद चोपड़ा की ‘सजाये मौत’ (1981) और कुंदन शाह की ‘जाने भी दो यारों’ (1983) जैसी फिल्मों में काम किया। ‘जाने भी दो यारों’ रेणु के योगदान को समझने के लिए खास फिल्म है। यह फिल्म कई वजहों से अधूरी सी थी। बजट की कमी थी, समय की कमी थी और तकनीकी समस्याएं भी थीं। रेणु ने एडिटिंग टेबल पर उपलब्ध सामग्री को संभाला और उससे एक यादगार फिल्म तैयार की। कुंदन शाह ने खुद माना है कि फिल्म की सफलता में रेणु की भूमिका बहुत अहम थी। यह काम सिर्फ एक एडिटर का नहीं, बल्कि एक फिल्म निर्माता का था।

मुख्यधारा सिनेमा और उनका योगदान

रेणु उस दौर में काम कर रही थीं जब समानांतर सिनेमा और मुख्यधारा सिनेमा के बीच की सीमाएं बदल रही थीं। शुरुआत में उन्होंने अपने एफटीआईआई साथियों के साथ काम किया, जो नए विषयों और नई भाषा की तलाश में थे। लेकिन गोविंद निहलानी की ‘अर्ध सत्य’ (1983) से उन्हें मुख्यधारा सिनेमा में पहचान मिली और उनका करियर नई ऊंचाइयों पर पहुंचा। रेणु की एडिटिंग की खासियत यह थी कि वह दिखावटी नहीं होती थी। उनका ध्यान हमेशा कहानी पर रहता था। वह दर्शकों को कहानी से जोड़ती थीं, न कि अपने काम की ओर खींचती थीं। विधु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ (1989) उन शुरुआती मुख्यधारा फिल्मों में से थी, जिन्हें रेणु ने एडिट किया।

इस फिल्म में उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया। ‘परिंदा’ तीन साल में पूरी हुई थी। इस फिल्म के लिए रेणु को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। यह सम्मान इस बात की पहचान था कि तकनीकी उत्कृष्टता का कोई जेंडर नहीं होता। साल 1990 के दशक में रेणु ने मुख्यधारा सिनेमा और स्वतंत्र फिल्मों के बीच संतुलन बनाए रखा। उन्होंने 35 से अधिक फिल्मों, डॉक्यूमेंट्री, शॉर्ट फिल्मों और टीवी सीरीज़ में काम किया। उनके काम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वे फिल्में थीं, जो महिलाओं की कहानियां कहती थीं और जेंडर और जाति आधारित उत्पीड़न को सामने लाती थीं।

एफटीआईआई में रहते हुए रेणु ने अपने सहपाठी विधु विनोद चोपड़ा की डिप्लोमा फिल्म ‘मर्डर एट मंकी हिल’ (1976) की एडिटिंग की। इस फिल्म के लिए उन्हें सहायक निर्देशक का श्रेय भी मिला। यह फिल्म साल 1977-78 में सर्वश्रेष्ठ प्रयोगात्मक फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने में सफल रही।

बैंडिट क्वीन – जब महिला की नजर से कहानी को देखा गया

शेखर कपूर की विवादास्पद फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) जातिगत और लैंगिक हिंसा की एक क्रूर कहानी है। फूलन देवी की यात्रा-बलात्कार, अपमान, और फिर प्रतिशोध को पर्दे पर लाना आसान नहीं था। विधु विनोद चोपड़ा ने एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्होंने ‘बैंडिट क्वीन’ को एडिट होने से पहले देखा। पांच घंटे की फिल्म थी जिसमें कोई खास प्रभाव नहीं था। लेकिन रेणु ने उस फिल्म को वहां पहुंचाया जहां वह होनी चाहिए थी। यह सिर्फ तकनीकी कौशल का सवाल नहीं था। यह एक महिला एडिटर की संवेदनशीलता का सवाल था- जो फूलन पर बनी फिल्म के दृश्यों को इस तरह एडिट कर सकती थी कि दर्शक उसकी पीड़ा और क्रोध दोनों को महसूस कर सकें। बलात्कार के दृश्य को कैसे दिखाया जाए एक नाजुक सवाल है। बहुत बार पुरुष निर्देशक और एडिटर इसे या तो सनसनीखेज बना देते हैं या फिर इतना कम दिखाते हैं कि उसकी भयावहता ही गायब हो जाती है।

रेणु ने इस दृश्य को इस तरह एडिट किया कि दर्शक फूलन की पीड़ा को महसूस कर सकें। लेकिन साथ ही उसकी गरिमा भी बनी रहे। यह एक महिला की नजर थी जो दूसरी महिला की कहानी को सम्मान के साथ बता रही थी। फूलन सिर्फ सर्वाइवर नहीं थी। वह एक लड़ाकू महिला थी जिसने व्यवस्था के खिलाफ बगावत की। रेणु की एडिटिंग ने इस बगावत को, इस प्रतिरोध को, पूरी ताकत के साथ पर्दे पर उतारा। यह वही फर्क है जो एक महिला की उपस्थिति लाती है। महिला के अनुभव को महिला की नजर से देखना और दिखाना, यह एक अलग संवेदनशीलता मांगता है, जो उनके पास थी। विनय शुक्ला की साल 1999 की ‘गॉडमदर’ के लिए उन्हें उनकी मौत के बाद राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह फिल्म एक साधारण महिला की अपराध की दुनिया में यात्रा को दिखाती थी। यह सत्ता, प्रतिशोध और परिस्थितियों की कहानी थी जो एक महिला को मजबूर बनाती हैं।

बहुत बार पुरुष निर्देशक और एडिटर इसे या तो सनसनीखेज बना देते हैं या फिर इतना कम दिखाते हैं कि उसकी भयावहता ही गायब हो जाती है। रेणु ने इस दृश्य को इस तरह एडिट किया कि दर्शक फूलन की पीड़ा को महसूस कर सकें। लेकिन साथ ही उसकी गरिमा भी बनी रहे।

गॉडमदर’ से कैमरा पर बदलाव की कहानी

रेणु ने इस फिल्म में एक महिला के बदलाव को निर्दोष से गॉडमदर बनने के सफर को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया। उन्होंने दिखाया कि कैसे एक महिला को व्यवस्था मजबूर बनाती है, कैसे वह अपने लिए जगह बनाने के लिए उसी व्यवस्था के नियमों को अपनाने को विवश होती है। यह सिर्फ तकनीकी कौशल नहीं था – यह महिला अनुभव की गहरी समझ थी। रेणु को सुधीर मिश्रा की ‘धारावी’ (1991) और केतन मेहता की ‘सरदार’ (1993) के लिए भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। ‘सरदार’ में रेणु ने ऐतिहासिक घटनाओं के बीच सहज संक्रमण के माध्यम से कहानी को और प्रभावशाली बनाया। ये फिल्में सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित थीं और रेणु ने अपनी एडिटिंग से इन कहानियों को और मजबूती दी।

रेणु मानती थीं कि एडिटिंग “पटकथा लेखन का तीसरा चरण” होती है। वह सिर्फ कट्स नहीं करती थीं, बल्कि निर्देशक की सोच को नया रूप देती थीं। अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कहा था, “वह सिर्फ एक एडिटर नहीं थीं, वह एक फिल्म निर्माता थीं।” यह कथन उनके काम की गहराई को दिखाता है। रेणु का काम उस अदृश्य श्रम का उदाहरण है, जो महिलाएं घर, दफ्तर और रचनात्मक क्षेत्रों में करती हैं। उनका योगदान ज़रूरी होता है, लेकिन अक्सर उसे पहचान नहीं मिलती। रेणु शूटिंग के दौरान सेट पर मौजूद रहती थीं ताकि कहानी और निर्देशन को बेहतर समझ सकें।

रेणु मानती थीं कि एडिटिंग “पटकथा लेखन का तीसरा चरण” होती है। वह सिर्फ कट्स नहीं करती थीं, बल्कि निर्देशक की सोच को नया रूप देती थीं। अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कहा था, “वह सिर्फ एक एडिटर नहीं थीं, वह एक फिल्म निर्माता थीं।”

फिल्म की गति, भावनाओं और दर्शकों की प्रतिक्रिया को संतुलित करना उनके काम का अहम हिस्सा था। अनुशासन और पेशेवरता उनकी पहचान थी। फिर भी, उनके काम को वह श्रेय नहीं मिला जिसकी वह हकदार थीं। उन पर लिखी गई किताब ‘इनविज़िबल – द आर्ट ऑफ रेणु सालुजा’ का शीर्षक ही बहुत कुछ कहता है। 80 के दशक के गंभीर सिनेमा की चर्चा में रेणु हमेशा मौजूद रहीं, लेकिन हाशिए पर।

यह स्थिति केवल रेणु सालुजा की नहीं, बल्कि सिनेमा में महिलाओं के अदृश्य श्रम की आम कहानी है। निर्देशक और अभिनेता पहचाने जाते हैं, लेकिन एडिटिंग जैसी तकनीकी भूमिकाओं में काम करने वाली महिलाएं अक्सर पीछे रह जाती हैं। रेणु ने निजी रिश्तों से अलग अपनी पहचान एक एडिटर के रूप में बनाई और अलगाव के बाद भी पेशेवर प्रतिबद्धता निभाई। चार राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर उन्होंने साबित किया कि तकनीकी क्षेत्रों में भी महिलाएं उत्कृष्ट हो सकती हैं। आज उनका नाम पुरस्कारों, किताबों और अगली पीढ़ी की महिला एडिटर्स के काम में जीवित है। उनकी कहानी याद दिलाती है कि परदे के पीछे भी महिलाएं सिनेमा और समाज को आकार देती हैं।

About the author(s)

मैं एक फ्रीलांस मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट हूँ। मेरा जन्म राजगीर में हुआ, पटना और दिल्ली से पढ़ाई पूरी की और फिलहाल कोची, केरल में रहती हूँ। मेरा मानना है कि तस्वीरें कई शब्दों से ज्यादा सच बयान करती हैं, इसलिए फोटोग्राफी मेरा पैशन भी है और करियर भी। मेरा कैमरा खासतौर पर महिलाओं की कहानियाँ कैद करता है—उनकी छोटी-छोटी बातें और जीवन की समस्याएँ जो आम तौर पर पुरुषों को सामान्य लगती हैं, उन पर गहराई से बात और विचार करना मैं ज़रूरी समझती हूँ।मैं आराम से, फोकस के साथ काम करना पसंद करती हूँ—मल्टीटास्किंग मुझे पसंद नहीं है। नई चीज़ें सीखने के लिए हमेशा तैयार रहती हूँ और अपनी गलतियों को तुरंत स्वीकार करने में यकीन रखती हूँ। खाली वक्त में नए-नए व्यंजन बनाना और लोगों को खिलाना मुझे बेहद पसंद है। 

 

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