इंटरसेक्शनलजेंडर डिजिटल आज़ादी के दौर में महिलाओं की सुरक्षा पर गहराता संकट

डिजिटल आज़ादी के दौर में महिलाओं की सुरक्षा पर गहराता संकट

डिजिटल-युग में महिलाओं के प्रति ऑनलाइन हिंसा चाहे वह सोशल मीडिया पर अपशब्द हों, निजी तस्वीरों का गैर-अनुमति प्रसार, ट्रोलिंग  या स्टॉकिंग आज चिंता का एक बेहद गंभीर विषय बन चुका है।

डिजिटल युग में, इंटरनेट ने न केवल महिलाओं को आवाज़ दी है, बल्कि उन्हें नए मंच पर भागीदारी करने के अवसर भी प्रदान किए हैं। चाहे वह सोशल मीडिया अकाउंट हो, पेशेवर नेटवर्किंग, ब्लॉगिंग, या व्यक्तिगत बातचीत से जुड़े प्लेटफॉर्म हों। हालांकि सोशल मीडिया आज संवाद, सूचना और आत्म-अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम बन चुका है। लेकिन डिजिटल-युग में महिलाओं के प्रति ऑनलाइन हिंसा चाहे वह सोशल मीडिया पर अपशब्द हों, निजी तस्वीरों का गैर-अनुमति प्रसार, ट्रोलिंग  या स्टॉकिंग आज चिंता का एक बेहद गंभीर विषय बन चुका है। यह समस्या सिर्फ व्यक्तिगत आघात पैदा नहीं करती, बल्कि यह लैंगिक असमानता, सामाजिक अलगाव और मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन को भी बताती है। 

 इंटरनेट ने महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से सक्रिय होने के नए अवसर दिए हैं। वहीं यह प्लेटफ़ॉर्म अब उनके लिए जोखिम का स्थान भी बन गया है। डिजिटल हिंसा केवल शब्दों की आक्रामकता नहीं है, यह तकनीक के माध्यम से किसी व्यक्ति को डराने, अपमानित करने, बदनाम करने या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक शांति को क्षति पहुंचाने का व्यवस्थित प्रयास है। यह समस्या सिर्फ व्यक्तिगत नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संवाद, मीडिया स्वतंत्रता और सामाजिक समावेशन के लिए भी गंभीर चुनौती है। यह समस्या वैश्विक स्तर पर विस्तार ले रही है। यू एन वुमन की साल 2025 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि डिजिटल हिंसा का दायरा दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है और डिजिटल दुनिया एक ऐसा नया मोर्चा बन गया है, जहां लैंगिक शक्ति असंतुलन अधिक हानिकारक तरीकों से व्यक्त हो रहा है। 

सोशल मीडिया आज संवाद, सूचना और आत्म-अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम बन चुका है। लेकिन डिजिटल-युग में महिलाओं के प्रति ऑनलाइन हिंसा चाहे वह सोशल मीडिया पर अपशब्द हों, निजी तस्वीरों का गैर-अनुमति प्रसार, ट्रोलिंग  या स्टॉकिंग आज चिंता का एक बेहद गंभीर विषय बन चुका है।

ऑनलाइन दुनिया में असुरक्षित होती महिलाएं

भारत के विषय में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि डिजिटल हिंसा का खतरा कितनी तेजी से और गंभीरता से बढ़ रहा है। बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपी साल 2023 की राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों की एक भयानक तस्वीर उभरकर सामने आई है। उस साल देशभर में 4,48,211 अपराध महिलाओं के खिलाफ दर्ज किए गए, जो साल 2022 में दर्ज 4,45,256 मामलों से कई ज्यादा हैं। वहीं राष्ट्रीय अपराध दर (महिला-प्रति-लाख आबादी) 66.2 दर्ज की गई। साइबर क्राइम में तेजी से बढ़ोतरी होना बहुत चिंता विषय बन गया है। टेलीग्राफ इंडिया में छपी साल 2023 की एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक, उस साल 86,420 साइबर अपराध हुए, जो पिछले साल की तुलना में 31.2 फीसदी की बढ़ोतरी को दिखता है। इनमें 69 मामले ऐसे थे, जिनमें धोखाधड़ी की घटनाएं प्रमुख थी, लेकिन अन्य हिस्से में सेक्सुअल एक्सप्लोइटेशन, ब्लैकमेल, पहचान-परहेज आदि शामिल हैं। राज्यों की बात करें तो तेलंगाना डिजिटल हिंसा के मामले में एक अलार्मिंग ट्रेंड दिखा रहा है। आउटलुक में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में  आईटी-कानून के तहत 120 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से 78 सेक्सुअल रूप से स्पष्ट सामग्री से जुड़े थे, और अन्य में ब्लैकमेल, फेक प्रोफाइल जैसे अपराध शामिल थे। 

इस विषय पर अंकिता तिवारी जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हैं वे बताती हैं, “मेरा इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल खुला है और मैं एक ट्रैवल एजेंसी से जुड़ी हुई हूं । उस ट्रैवल एजेंसी ने मनाली ट्रिप आयोजित किया था और उस ग्रुप के एक मेंबर ने थोड़ी सी गलतफहमी की वजह से मेरे प्रोफाइल पर जाकर गाली देना शुरू कर दिया और यह काफ़ी लंबे समय तक जारी रहा।” इस विषय पर अनुष्का राज बताती हैं, “ मेरा इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल गोपनीय है, लेकिन मेरे किसी फॉलोअर ने मेरी तस्वीरों का इस्तेमाल करते हुए एक फेक प्रोफाइल बनाया, जिसका यूजर नेम अभद्र भाषा था। इस घटना के बाद से मैंने इंस्टाग्राम पर तस्वीरें पोस्ट करना छोड़ दिया।” इस तरह कई यूजर्स ने बात चित के दौरान इस बात की पुष्टि की।

मेरा इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल खुला है और मैं एक ट्रैवल एजेंसी से जुड़ी हुई हूं । उस ट्रैवल एजेंसी ने मनाली ट्रिप आयोजित किया था और उस ग्रुप के एक मेंबर ने थोड़ी सी गलतफहमी की वजह से मेरे प्रोफाइल पर जाकर गाली देना शुरू कर दिया और यह काफ़ी लंबे समय तक जारी रहा।

महिलाओं के बीच ये समस्या आम हो चुकी हैं। एआई-उपयोग और इंटरनेट सिर्फ कीबोर्ड वार और गाली-गलौज का ही नहीं, बल्कि एआई का भी मैदान बन चुका है। हाल ही में द गार्डियन ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें बताया गया है कि भारत में न्यूडीफाई ऐप्स और डीपफेक टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ गया है। महिलाएं इस डर में रहती हैं कि उनकी तस्वीरों का यौन या अपमानजनक रूप में मैनिपुलेशन किया जाएगा, और यही डर कई महिलाओं को ऑनलाइन सक्रियता से रोक रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लगभग 10 फीसदी हेल्पलाइन मामलों में ए आई उत्पादित छवि दुरुपयोग (जैसे मैनिपुलेटेड नग्न तस्वीरें) शामिल था। जब तकनीक इतनी शक्तिशाली हो जाए, तो डिजिटल शक्ति महिलाओं के आत्मसम्मान और अधिकारों पर भारी प्रभाव डाल सकती है।

तकनीक, डर और सिस्टम की चुप्पी

डिजिटल हिंसा सिर्फ स्क्रीन पर रहने वाली घटनाएं नहीं हैं। यह महिलाओं की मानसिकता, उनकी सार्वजनिक भागीदारी और उनकी आज़ादी को जकड़ देता है। मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित गाली-गलौज, धमकी, ब्लैकमेल और पहचान का दुरूपयोग महिलाओं में बहुत सारी भावनात्मक चोटें छोड़ता है, जैसे चिंता, आत्म-संदेह, शर्म और सामाजिक अलगाव अक्सर आम होते हैं। इससे महिलाओं की भागीदारी में गिरावट आती है, जो आगे जाकर निराशा और डर बन जाता है, और महिलाएं सार्वजनिक ऑनलाइन मंचों पर बोलने, तस्वीरें साझा करने या सामाजिक मुद्दों पर राय व्यक्त करने से पीछे हटती नज़र आती हैं। सुरक्षा और न्याय की कमी भी इस समस्या को और प्रबल करता हैं। कई बार महिलाएं शिकायत तो करती हैं, लेकिन प्रक्रिया लंबी, पेचीदा या अक्षम लगती है। इससे वह न्याय न पा सकने या फिर हिंसा का डर महसूस करती हैं।यह घटना स्वयं मेरे एक दोस्त साथ घटित हुई थी जब वह पहली बार सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाया था। उसके प्रोफाइल का फेक प्रोफाइल बनाया गया था, जिसका यूजरनेम एक अभद्र भाषा में था, और उसकी  यूजर आईडी पर फेक यूजरआईडी से अश्लील मैसेज किया गया था,जिसकी शिकायत उसने अपने नजदीकी पुलिस थाने में करानी चाही। लेकिन वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया, और उसे इंस्टाग्राम चलाने के साथ अन्य सोशल मीडिया से अलग रहने की सलाह दी। 

मेरा इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल गोपनीय है, लेकिन मेरे किसी फॉलोअर ने मेरी तस्वीरों का इस्तेमाल करते हुए एक फेक प्रोफाइल बनाया, जिसका यूजर नेम अभद्र भाषा था। इस घटना के बाद से मैंने इंस्टाग्राम पर तस्वीरें पोस्ट करना छोड़ दिया।

वहां की महिला कांस्टेबल ने इस घटना पर कहा कि यही सब तुम लड़कियों के रेप की वजह बनता है। पारिवारिक मर्यादा सामाजिक दबाव और डर की वजह से महिलाएं अपनी ऑनलाइन गतिविधियों को सीमित कर देती हैं। यहां तक कि बहुत सी महिलाएं डिजिटल हिंसा की घटनाओं को रिपोर्ट नहीं करतीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कार्रवाई नहीं होगी, या उन्हें शर्मिंदा किया जाएगा, या यह कम महत्व की समस्या मानी जाएगी।शोध बताते हैं कि रिपोर्टिंग में यह अंतराल पूरी समस्या को और बड़ा बनाता है। उदाहरण के लिए, डी एस जर्नल ऑफ साइबर सिक्योरिटी में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि कई महिलाएं शिकायत करने के बजाय खुद को सीमित कर लेती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि शिकायत करने से सामाजिक या कानूनी बोझ बढ़ेगा। इसके अलावा, भाषा और सांस्कृतिक संदर्भ भी बाधा बनते हैं। भारत में ऑनलाइन जेंडर-आधारित हिंसा की पहचान करने वाले कुछ एल्गोरिदम और मॉडरेशन टूल अंग्रेज़ी-केन्द्रित हैं, जिससे हिंदी, तमिल या अन्य भारतीय भाषाओं में हो रहे हिंसा को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। हाल ही में प्रकाशित यू ली डाटासेट ने इसी समस्या पर प्रकाश डाला है, उन्होंने हिंदी, तमिल और भारतीय अंग्रेजी में ट्वीट्स का विश्लेषण किया, ताकि भाषा-विशिष्ट गालियों और यौन हिंसा को बेहतर समझा जा सके। 

महिलाओं की डिजिटल सुरक्षा के लिए ठोस कदम

डिजिटल हिंसा के खिलाफ केवल व्यक्तिगत प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। हमें बहुस्तरीय, एआई के दौर में महिलाओं की सुरक्षा और हक़ से जुडी हुई नीतियां बनानी होंगी। सोशल मीडिया कंपनियों को अपने रिपोर्टिंग मैकेनिज्म में पारदर्शिता लानी चाहिए, शिकायतें कैसे आती हैं, उनका निपटारा कैसे हो रहा है, और अगर अपील है तो वह कैसे काम करती है। एआई और मानव मॉडरेशन की शक्ति मिलाकर ऐसे सिस्टम तैयार किए जाने चाहिए, जो भाषा-विशिष्ट हिंसा (जैसे हिंदी ट्रोलिंग) को पहचान सकें। प्लेटफ़ॉर्म को सुरक्षा-उपकरण (ब्लॉक, म्यूट, रिपोर्ट) अधिक सशक्त बनाने चाहिए, ताकि उपयोगकर्ता तुरंत प्रतिक्रिया दे सकें। इसके अलावा मौजूदा कानूनों (जैसे आई टी एक्ट, आईपीसी ) को डिजिटल युग की चुनौतियों के अनुरूप बदलाब करना चाहिए। पुलिस और साइबर-सेल को विशेष प्रशिक्षण देना चाहिए, ताकि वे डिजिटल हिंसा की नाज़ुकता को समझें और त्वरित कार्रवाई कर सकें। राष्ट्रीय साइबर-क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल का प्रचार-प्रसार बढ़ाना चाहिए, और रिपोर्टिंग प्रक्रिया को आसान और संवेदनशील बनाना चाहिए।

टेलीग्राफ इंडिया में छपी साल 2023 की एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक, उस साल 86,420 साइबर अपराध हुए, जो पिछले साल की तुलना में 31.2 फीसदी की बढ़ोतरी को दिखता है। इनमें 69 मामले ऐसे थे, जिनमें धोखाधड़ी की घटनाएं प्रमुख थी, लेकिन अन्य हिस्से में सेक्सुअल एक्सप्लोइटेशन, ब्लैकमेल, पहचान-परहेज आदि शामिल हैं।

स्कूल और कॉलेज में डिजिटल सुरक्षा पाठ्यक्रम को अनिवार्य करना चाहिए, जिसमें पासवर्ड सुरक्षा, प्राइवेसी सेटिंग्स, ऑनलाइन ट्रोलिंग से निपटने के तरीकों की पढ़ाई हो। सामाजिक अभियानों में महिलाओं को यह बताया जाना चाहिए कि उनके अधिकार हैं और उन्हें कैसे सुरक्षित रहना चाहिए।डिजिटल शक्ति केंद्र जैसी संस्थाएं स्थापित की जानी चाहिए, जहां महिलाएं  कानूनी, तकनीकी और सशक्तिकरण सहायता पा सकें। सरकार, एनजीओ और शोधकर्ता मिलकर लैंग्वेज-स्पेसिफिक डेटा संग्रह करें, ताकि जेंडर-आधारित ऑनलाइन हिंसा का पैमाना, स्वरूप और प्रवृत्ति गहराई से समझी जा सके। प्लेटफ़ॉर्म और नीति-निर्माता जवाबदेही मीट्रिक्स (जैसे रिपोर्ट की संख्या, समाधान दर, औसत चक्र समय) बनाएं, ताकि यह देखा जा सके कि नीतियां काम कर रही हैं या नहीं।

इंटरनेट को डर का मैदान नहीं बनने देना चाहिए। इंटरनेट को, जो शुरू में अभिव्यक्ति, कनेक्शन और सशक्तिकरण का मंच माना गया था। अगर वह महिलाओं के लिए डर, शांति-भाव और आत्म-संकोच का स्थान बन जाए, तो यह हमारी सामाजिक प्रगति के लिए एक विफलता होगी। डिजिटल हिंसा को अनदेखा करना या इसे मिर्च-मसाला ऑनलाइन बहस कहना आसान है। लेकिन यह सिर्फ बहस नहीं है, यह शक्ति, असमानता और पहचान की लड़ाई है। हमें इस लड़ाई में कंपनियों, सरकारों, नागरिक समाज और खुद उपयोगकर्ताओं के रूप में मिलकर खड़ा होना होगा। इसमें देरी अगले जनरेशन की महिलाएं इंटरनेट पर अपनी वास्तविक आवाज़ खो देंगी और उनके अनुभव इतना गहरा होगा कि उनकी चुप्पी ही उनकी कहानी बन जाएगी। इसलिए यह प्रयास करना ज़रूरी है, ताकि डिजिटल दुनिया महिलाओं के लिए सिर्फ एक मंच ही न बने, बल्कि एक सुरक्षित, सम्मानयुक्त और सशक्त मंच बने।

About the author(s)

दिल्ली विश्वविद्यालय की पत्रकारिता की छात्रा हूं। बिहार के सत्याग्रह की भूमि से आती हूं। देश की राजनीतिक गतिविधियों में दिमाग खपाने का निजी शौक है। लेकिन "Politics is a dirty game" सर्वविदित कथन कहने में परहेज़ नहीं करती हूं! किताबें पढ़ती हूं पर इसमें भी राजनीतिक और उपन्यास को महत्व देती हूं। लेखनी से पहले शोध आवश्यक समझती हूं। महिला होने के नाते उनके हक की बात करती हूं पर मामला ज्यादा गड़बड़ तब हो जाता है, जहां कोई पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित इंसान महिला होने का बोध कराने पर अड़ जाता है। मेरे शब्द मेरा नजरिया है।

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