इंटरसेक्शनलजेंडर पीरियड्स स्वास्थ्य भी एक मौलिक अधिकार है सर्वोच्च न्यायालय

पीरियड्स स्वास्थ्य भी एक मौलिक अधिकार है सर्वोच्च न्यायालय

बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है, जिसमें पीरियड्स संबंधी स्वास्थ्य और स्वच्छता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकारों में शामिल किया है।

भारत में पीरियड्स आज भी चुप्पी, शर्म और भेदभाव से जुड़ा हुआ विषय है। बहुत-सी लड़कियों के लिए पीरियड्स के दिन स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि वहां साफ शौचालय, पानी या सैनिटरी पैड की सही व्यवस्था नहीं होती। ऐसे में पीरियड्स केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि शिक्षा, सम्मान और बराबरी का भी सवाल बन जाता है। इसी विषय में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया फैसला बहुत महत्वपूर्ण है, जिसमें पीरियड्स से जुड़े स्वास्थ्य और स्वच्छता के अधिकार को जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार के रूप में माना गया है। इस फैसले में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि बिना जरूरी सुविधाओं के कोई भी लड़की अपने अधिकारों का पूरा इस्तेमाल नहीं कर सकती। यह निर्णय पीरियड्स को निजी समस्या नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी मानता है और लड़कियों के सम्मानजनक जीवन की दिशा में एक बड़ा कदम है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला? 

 बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है, जिसमें पीरियड्स संबंधी स्वास्थ्य और स्वच्छता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकारों में शामिल किया है। द हिन्दू में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने यह फैसला दिया है, इसमें यह कहा गया है कि ‘आज़ादी का सार्थक ढंग से तभी इस्तेमाल किया जा सकता है, जब लडकियों को चालू शौचालयों, पर्याप्त पीरियड उत्पादों, पानी की उपलब्धता, और इस्तेमाल उत्पादों के निपटारे के लिए स्वच्छ (हाइजिनिक) प्रणालियों तक पहुंच हासिल हो।’ राज्य को जिम्मेदार ठहराते हुए न्यायाधीशों ने कहा कि सरकार को सभी लड़कियों के लिए पीरियड्स से जुड़ी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए और रुढ़िवादी धारणाओं को खत्म करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि हर स्कूल में चालू हाल में, जेंडर के आधार पर अलग-अलग शौचालय हों, और अनुपालन न होने पर दंडात्मक कार्रवाई के लिए कहा। अगर सरकारी स्कूल नियमों का पालन नहीं करते हैं तो राज्य को जवाबदेह ठहराया जाएगा और निजी स्कूलों की मान्यता रद्द की जा सकती है। 

बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है, जिसमें पीरियड्स संबंधी स्वास्थ्य और स्वच्छता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकारों में शामिल किया है।

 यह फैसला, एक सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. जया ठाकुर की याचिका पर आधारित था, जिसमें स्कूलों में अपर्याप्त पीरियड स्वच्छता प्रबंधन को उजागर किया गया था। याचिकाकर्ता के अनुसार स्वच्छता प्रबंधन में स्वच्छता से कहीं अधिक व्यापक पहलू शामिल हैं, जिनमें शारीरिक स्वायत्तता और निर्णय लेने की आज़ादी भी शामिल है। पीरियड्स के दौरान स्वास्थ्य देखभाल उत्पादों, यहां तक ​​कि स्वच्छ पानी और शौचालयों तक पहुंच की कमी, लैंगिक असमानता की  समस्या का परिणाम है। इस विषय पर द हिन्दू में छपे, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-5 के आंकड़ों के अनुसार, 15 से 24 साल की उम्र की महिलाओं के पीरियडस के दौरान स्वच्छता विधियों का उपयोग करने का प्रतिशत एनएफएचएस-4 के 57.6 फीसदी से बढ़कर एनएफएचएस-5 में 77.3 फीसदी हो गया है, लेकिन फिर भी देश में पात्र आयु वर्ग की लगभग एक चौथाई महिलाएं सहायता से वंचित रह जाती हैं। हालांकि पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता पैदा करने के लिए पीरियड स्वच्छता प्रबंधन पर दिशानिर्देश विकसित किए हैं, लेकिन इनका कार्यान्वयन हमेशा अनियमित रहा है और ये प्रयास परियोजना आधारित हैं, सतत नहीं। 

क्या है पीरियड पॉवर्टी ?

पीरियड्स संबंधी गरीबी, जिसे पीरियड पॉवर्टी कहा जाता है। कई महिलाएं और लड़कियां पीरियड्स के दौरान जरूरी चीज़ें जैसे सैनिटरी पैड, साफ पानी, शौचालय और सफाई की सुविधाएं नहीं जुटा पातीं। इसकी वजह आर्थिक तंगी होती है। यह समस्या सिर्फ पैड न मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि साफ-सफाई, कपड़े बदलने की जगह और सुरक्षित निपटान जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से भी जुड़ी है।वर्ल्ड बैंक में प्रकाशित विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के साल 2012 के संयुक्त निगरानी कार्यक्रम के अनुसार, पीरियड्स प्रबंधन (एमएचएम) को इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि, महिलाएं और किशोरियां पीरियड्स के दौरान रक्त को सोखने के लिए स्वच्छ सामग्री का उपयोग करें।

वर्ल्ड बैंक में प्रकाशित विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के साल 2012 के संयुक्त निगरानी कार्यक्रम के अनुसार, पीरियड्स प्रबंधन (एमएचएम) को इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि, महिलाएं और किशोरियां पीरियड्स के दौरान रक्त को सोखने के लिए स्वच्छ सामग्री का उपयोग करें।

 उसे आवश्यकतानुसार गोपनीयता से बदलें, शरीर को साबुन-पानी से धोएं और डिस्पोजल की सुविधा प्राप्त करें और प्रयुक्त पीरियड प्रबंधन सामग्री के निपटान के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक सुविधाओं तक उनकी पहुंच हो। वे पीरियड्स चक्र से जुड़े बुनियादी तथ्यों को समझती हों और बिना किसी भय के गरिमा के साथ इसका प्रबंधन करना जानती हों। इसके अलावा अनुच्छेद 21ए और आरटीई अधिनियम के अंतर्गत शिक्षा का मौलिक अधिकार मुफ्त, अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करता है।इसमें  मुफ्त शिक्षा में सभी प्रकार के शुल्क या खर्च शामिल हैं, जो किसी बच्चे को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने और उसे पूरा करने से रोकते हैं।

मुफ्त सैनिटरी पैड और बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य

सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले के कई परिणाम निकलते हैं। जोकि निम्न हैं, अनिवार्य निशुल्क पैड: सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में स्थित प्रत्येक विद्यालय, चाहे वह सरकारी हो या निजी, एएसटीएम डी-6954 मानकों के अनुरूप निर्मित ऑक्सोबायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ्त उपलब्ध कराए। ये सैनिटरी नैपकिन विद्यार्थियों के लिए सुलभ होने चाहिए, शौचालय परिसर में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों के माध्यम से, या जहां ऐसी व्यवस्था तत्काल संभव न हो, वहां विद्यालय के भीतर किसी स्थान पर या किसी अधिकारी के पास उपलब्ध कराए जाएं।

सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में स्थित प्रत्येक विद्यालय, चाहे वह सरकारी हो या निजी, एएसटीएम डी-6954 मानकों के अनुरूप निर्मितऑक्सोबायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन मुफ्त उपलब्ध कराए।

अनिवार्य बुनियादी ढांचा: सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में स्थित प्रत्येक विद्यालय, चाहे वह सरकारी हो या निजी, उसमें पीरियड्स स्वच्छता प्रबंधन (एमएचएम) कॉर्नर स्थापित किए जाएं। इन एमएचएम कॉर्नरों में अतिरिक्त अंडरवियर, अतिरिक्त यूनिफॉर्म, डिस्पोजेबल बैग और पीरियड्स संबंधी आपात स्थितियों से निपटने के लिए अन्य ज़रूरी सामग्रियां उपलब्ध कराई जाएंगी। स्कूलों में सुचारू रूप से चलने वाले, जेंडर विभाजित और विकलांग अनुकूल शौचालयों की व्यवस्था करनी होगी, जिनमें पानी की निरंतर आपूर्ति और साबुन उपलब्ध हो। साथ ही स्कूलों में पीरियड्स स्वच्छता प्रबंधन केंद्र स्थापित किए जाएं, जिनमें अतिरिक्त यूनिफॉर्म, इनरवियर और आपात स्थिति के लिए डिस्पोजेबल बैग उपलब्ध हों।

सुरक्षित अपशिष्ट निपटान, शिक्षा और जागरूकता की अनिवार्यता

सैनिटरी अपशिष्ट निपटान: सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह सुनिश्चित करेंगे कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में स्थित प्रत्येक विद्यालय, चाहे वह सरकारी हो या निजी, में सैनिटरी नैपकिन के निपटान के लिए नवीनतम ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुसार एक सुरक्षित, स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल व्यवस्था हो। प्रत्येक शौचालय इकाई में सैनिटरी सामग्री के संग्रहण के लिए एक ढका हुआ कूड़ेदान होना चाहिए, और ऐसे कूड़ेदानों की स्वच्छता और नियमित रखरखाव हर समय सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पीरियड्स स्वास्थ्य और यौवनारंभ के बारे में जागरूकता और प्रशिक्षण: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ( एनसीईआरटी ) और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ( एससीईआरटी ) जेंडर संवेदनशील पाठ्यक्रम को शामिल करें, ख़ास तौर से पीरियड्स, यौवनारंभ और अन्य संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं (पीसीओएस, पीसीओडी, आदि) पर, ताकि पीरियड्स स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े कलंक और वर्जना को तोड़ा जा सके।

सभी शिक्षकों, चाहे वे पुरुष हों या महिला, सभी को पीरियड्स स्वच्छता के बारे में पर्याप्त प्रशिक्षण और जागरूकता प्रदान की जाएगी, जिसमें इसका सामना कर रही छात्राओं को उचित सहायता और सहयोग प्रदान करने के तरीके शामिल हैं। इसके अलावा जन औषधि सुविधा ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता के बारे में जानकारी सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, रेडियो, टीवी, सिनेमा और बाहरी प्रचार माध्यमों जैसे बस स्टॉप, बसों पर ब्रांडिंग, कार रैपिंग और दीवार पेंटिंग के माध्यम से व्यापक रूप से प्रसारित की जाएगी। साथ ही जिला शिक्षा अधिकारियों (डीईओ ) को वार्षिक निरीक्षण करना होगा और विद्यार्थियों से गुमनाम प्रतिक्रिया एकत्र करनी होगी, नियमों का पालन न करने वाले निजी स्कूलों की मान्यता रद्द की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला पीरियड्स को निजी समस्या नहीं, बल्कि जीवन, गरिमा और शिक्षा के मौलिक अधिकार से जोड़ता है। यह राज्य की जिम्मेदारी तय करता है कि हर लड़की को सुरक्षित सुविधाएं और सम्मान मिले। अब जरूरत है कि इस फैसले को ज़मीन पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, ताकि पीरियड्स किसी भी लड़की की पढ़ाई और आत्मसम्मान में बाधा न बनें। ताकि हर एक वो विद्यार्थी अपनी शिक्षा पूरी कर सकें, जिन्हें सुविधाओं के बगैर पढाई छोड़नी पड़ती है। 

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