समाजकानून और नीति क्या फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट महिलाओं के खिलाफ़ अपराधों में न्याय की प्रक्रिया बदल पाए हैं?

क्या फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट महिलाओं के खिलाफ़ अपराधों में न्याय की प्रक्रिया बदल पाए हैं?

विधि एवं न्याय मंत्रालय के अनुसार, उच्च न्यायालयों के संबंध में, स्वीकृत संख्या 1114 न्यायाधीश है, जिनमें से 785 न्यायाधीश कार्यरत हैं और 329 न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं। न्यायाधीश पहले से ही लंबित मामलों के बोझ तले दबे हुए हैं, ऐसी स्थिति में वे फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में कार्यवाही कैसे करेंगे?

भारत में न्यायिक लंबित मामलों की अभूतपूर्व संख्या को कम करने और न्याय की समयबद्धता सुनिश्चित करने के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना की गई थी। इन न्यायालयों को स्थापित करने के पीछे का उद्देश्य यौन अपराधों और महिलाओं एवं बच्चों के विरुद्ध अपराधों सहित जघन्य अपराधों से निपटना था। हालांकि, संसाधनों की कमी, अक्षम जांच और न्यायपालिका में कर्मचारियों की अपर्याप्तता जैसे कई कारकों के कारण फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की प्रभावशीलता प्रभावित हुई है। वर्ष 2000 में शुरू की गई इन अदालतों का उद्देश्य लंबित मामलों की भारी संख्या को कम करना और महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए त्वरित न्याय सुनिश्चित करना था।

फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का प्राथमिक लक्ष्य अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित मामलों के भारी बोझ को कम करना और लंबे समय से लंबित मामलों में न्याय में होने वाली देरी की समस्या का समाधान करना था। फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) विशेष रूप से बलात्कार से जुड़े मामलों और बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम (पॉस्को) के अंतर्गत आने वाले मामलों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिससे सर्वाइवर्स को तत्काल राहत मिलती है। साथ ही इन न्यायालयों का उद्देश्य अनावश्यक स्थगन से बचना और गवाहों की शीघ्र जांच सुनिश्चित करना है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में न्याय दिलाने में फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (एफटीएससी) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इनकी निपटान दर 96.28 फीसद है। केवल 2024 में ही 88,902 नए मामले दर्ज किए गए और 85,595 मामलों का निपटारा इन्हीं कोर्ट के ज़रिए किया गया।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में न्याय दिलाने में फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (एफटीएससी) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी निपटान दर 96.28 फीसद है। केवल साल 2024 में ही 88,902 नए मामले दर्ज किए गए और 85,595 मामलों का निपटारा इन्हीं कोर्ट के ज़रिए किया गया, जो लंबित मामलों को निपटाने में एफटीएससी की प्रभावशीलता को दिखाता है। सरकार ने निर्भया कोष के तहत 1952.23 करोड़ रुपये के वित्तीय आवंटन के साथ इस योजना को साल 2026 तक बढ़ा दिया है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, इन न्यायालयों ने सामूहिक रूप से 3,06,604 से अधिक मामलों का निपटारा किया है। एफटीएससी न्याय, महिलाओं की सुरक्षा और यौन अपराधों से बचे लोगों के आघात को कम करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हैं। 

फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की आवश्यकता

मजबूत कानून और नीतिगत ढांचे के बावजूद, देश भर की विभिन्न अदालतों में बलात्कार और पॉस्को अधिनियम के तहत बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। कठोर दंड लागू करने का मुख्य उद्देश्य अपराध को रोकना है, लेकिन यह तभी संभव है जब मुकदमे समय सीमा के भीतर पूरे हों और पीड़ितों को शीघ्र न्याय मिले। आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और पीओसीएसओ अधिनियम में जांच और मुकदमे को पूरा करने के लिए सख्त समयसीमा निर्धारित है, फिर भी मामलों के लंबित होने और सीमित न्यायिक संसाधनों के कारण देरी होती रहती है।

भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सुओ मोटो लेते हुए एक रिट याचिका में पॉस्को अधिनियम के तहत अपराधों में समय पर जांच और मुकदमे के मुद्दे को उठाया और 25 जुलाई, 2019 को निर्देश जारी कर मामलों के शीघ्र निपटान को अनिवार्य किया। इन निर्देशों और आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 को लागू करने के लिए, सरकार ने 2 अक्टूबर, 2019 को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की योजना शुरू की, जिसके तहत बलात्कार और पॉस्को अधिनियम के मामलों के शीघ्र निपटान के लिए देश भर में विशेष अदालतों की स्थापना की गई।

14वें वित्त आयोग ने वर्ष 2015 से 2020 तक लंबित मामलों के निपटान के लिए 1,800 त्वरित न्यायालयों की स्थापना की सिफारिश की थी। 31 दिसंबर 2025 तक, उच्च न्यायालयों ने बताया कि 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 879 त्वरित न्यायालय कार्यरत हैं।

फायदे से अधिक नुकसान कर रहे हैं फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट

विशेषज्ञों के अनुसार फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। लगभग दो दशक पहले, केंद्र सरकार ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में प्रक्रिया को तेज करने और न्यायपालिका में लंबित लाखों मामलों को कम करने के लिए त्वरित न्यायालयों (एफटीसी) की अवधारणा पेश की थी। इस संदर्भ में, यह तथ्य स्वीकार करना वास्तव में हैरान करने वाला है कि उपलब्ध शोध के अनुसार, भारत में फास्ट ट्रैक अदालतों ने सामान्य अदालतों की तुलना में बदतर परिणाम दिए हैं। केंद्र सरकार द्वारा एफटीसी बनाने के लिए धनराशि जारी किए जाने के बावजूद, 14 से अधिक राज्यों और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों में अभी भी एक भी एफटीसी नहीं है।

विधि मंत्रालय के अनुमान के अनुसार, देश भर में बच्चों और महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए लगभग 1,023 एफटीसी की कमी है। राज्यसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए, विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने भारत में त्वरित न्यायालयों की वर्तमान स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि 14वें वित्त आयोग ने वर्ष 2015 से 2020 तक लंबित मामलों के निपटान के लिए 1,800 त्वरित न्यायालयों की स्थापना की सिफारिश की थी। 31 दिसंबर 2025 तक, उच्च न्यायालयों ने बताया कि 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 879 त्वरित न्यायालय कार्यरत हैं।

दिल्ली में एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में औसतन एक मामले का निपटारा 122 दिनों में होता है, जबकि सामान्य अदालत में यही प्रक्रिया लगभग 133 दिनों में पूरी होती है। इससे इन अदालतों की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं।

फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से जुड़ी समस्याएं और चुनौतियां

फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य लोगों को जल्दी न्याय देना और सामान्य अदालतों पर बढ़ते मामलों का बोझ कम करना था। इन अदालतों से उम्मीद की गई थी कि गंभीर मामलों का निपटारा तय समय में होगा। लेकिन व्यवहार में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट और सामान्य अदालतों के काम करने की गति में बहुत बड़ा अंतर नहीं दिखता। उदाहरण के लिए, दिल्ली में एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में औसतन एक मामले का निपटारा 122 दिनों में होता है, जबकि सामान्य अदालत में यही प्रक्रिया लगभग 133 दिनों में पूरी होती है। इससे इन अदालतों की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं। मामलों में देरी का एक मुख्य कारण गवाहों की अनुपस्थिति है। कई बार गवाह समय पर अदालत नहीं पहुंच पाते या आरोप पत्र में उनकी पूरी जानकारी नहीं होती।

पुलिस गवाह भी अन्य जिम्मेदारियों के कारण अनुपलब्ध रहते हैं। इसके अलावा, जांच प्रक्रिया और फोरेंसिक रिपोर्ट आने में देरी भी मामलों के निपटारे को धीमा कर देती है। फ़ास्ट ट्रैक अदालतों में किन मामलों की सुनवाई होगी, इसके स्पष्ट मानदंड भी नहीं हैं। बलात्कार, पॉक्सो, हत्या, दहेज उत्पीड़न, तलाक और संपत्ति विवाद जैसे मामलों में तेज सुनवाई जरूरी होती है, लेकिन स्पष्ट दिशा-निर्देशों की कमी से प्रक्रिया प्रभावित होती है। अवसंरचना और कर्मचारियों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। कई अदालतों में अलग भवन, पर्याप्त स्टाफ और आधुनिक तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इन कमियों को दूर किए बिना फ़ास्ट ट्रैक अदालतें अपने उद्देश्य के अनुसार लोगों को समय पर न्याय नहीं दे पाएंगी।

विधि एवं न्याय मंत्रालय के अनुसार, उच्च न्यायालयों के संबंध में, स्वीकृत संख्या 1114 न्यायाधीश है, जिनमें से 785 न्यायाधीश कार्यरत हैं और 329 न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं। न्यायाधीश पहले से ही लंबित मामलों के बोझ तले दबे हुए हैं, ऐसी स्थिति में वे फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में कार्यवाही कैसे करेंगे?

न्यायाधीशों पर बोझ और इम्प्लिमेन्टेशन में असंगति

फास्ट ट्रैक मामलों की सुनवाई करते समय न्यायाधीशों की कानूनी जिम्मेदारी दोगुनी हो जाती है। उन्हें फास्ट ट्रैक न्यायालयों के साथ-साथ नियमित न्यायालयों का भी प्रबंधन करना पड़ता है; अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक रिक्तियों को भरा नहीं जाता; कम संख्या में न्यायाधीशों द्वारा बड़ी संख्या में मामलों का निपटान करने से न्यायाधीशों पर अत्यधिक बोझ पड़ता है और किसी न किसी रूप में यह निर्णयों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। विधि एवं न्याय मंत्रालय के अनुसार, उच्च न्यायालयों के संबंध में, स्वीकृत संख्या 1114 न्यायाधीश है, जिनमें से 785 न्यायाधीश कार्यरत हैं और 329 न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं। न्यायाधीश पहले से ही लंबित मामलों के बोझ तले दबे हुए हैं, ऐसी स्थिति में वे फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में कार्यवाही कैसे करेंगे? एक सरकारी आंकड़ें के अनुसार फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में लगभग 6000 न्यायाधीशों की कमी है। 

विभिन्न क्षेत्रों में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना और कार्यप्रणाली में अंतर कार्यान्वयन को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है। विभिन्न राज्यों के त्वरित न्यायालयों से संबंधित अपने-अपने कानून और दिशानिर्देश हो सकते हैं, जिससे मामलों के निपटान में असंगति उत्पन्न हो सकती है। कुछ क्षेत्राधिकार अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक संसाधन, जैसे कि धन, कर्मचारी और सुविधाएं आवंटित कर सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप मामले के प्रबंधन में असमानता और समाधान की गति में कठिनाई उत्पन्न होती है। त्वरित न्यायालयों के बारे में जन जागरूकता की कमी भी कार्यान्वयन को प्रभावित करती है।

कई न्यायालय सीमित बजट के साथ संचालित होते हैं, जिससे पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति, आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करने और बुनियादी ढांचे के रखरखाव की उनकी क्षमता प्रभावित होती है। इन न्यायालयों के संचालन से संबंधित व्यय, जैसे कि मामले के प्रबंधन के लिए प्रौद्योगिकी और सुविधाएं, रखरखाव, पर्याप्त रूप से कवर नहीं हो पाते हैं। बजट की कमी के कारण अक्सर न्यायाधीशों और सहायक कर्मचारियों की संख्या कम हो जाती है, जिससे कार्यभार बढ़ सकता है और मामलों के समाधान में देरी हो सकती है। त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए त्वरित न्यायालयों में अपार संभावनाएं हैं। लेकिन, इन न्यायालयों को अपने वादे को पूरा करने के लिए, राज्यों को इनके संचालन को प्राथमिकता देनी होगी।

उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि इनके पास कुशल संचालन के लिए आवश्यक संसाधन हों। राज्यों को अपनी उन्नत जांच प्रणाली में सुधार करना होगा और अत्याधुनिक फोरेंसिक सेवाएं प्रदान करनी होंगी। न्यायालयों में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए और संबंधित क्षेत्रों में कुशल एवं विशेषज्ञों की नियुक्ति की जानी चाहिए। त्वरित न्यायालयों के कामकाज की आवधिक निगरानी की जानी चाहिए। पारंपरिक न्यायालयों और त्वरित न्यायालयों के बीच समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए। सरकार को त्वरित न्यायालयों के लिए पर्याप्त और नियमित निधि सुनिश्चित करनी चाहिए।

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