स्वास्थ्यशारीरिक स्वास्थ्य ल्यूपस: शरीर, समाज और स्त्री अस्मिता के बीच अनदेखा संघर्ष

ल्यूपस: शरीर, समाज और स्त्री अस्मिता के बीच अनदेखा संघर्ष

ल्यूपस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, इस बीमारी में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से स्वस्थ कोशिकाओं और टिश्यूज़ पर हमला करने लगती है। इसे मुख्य रूप से सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एस एल ई )भी कहते हैं।

ल्यूपस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, इस बीमारी में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) गलती से स्वस्थ कोशिकाओं और टिश्यूज़ पर हमला करने लगती है। इसे मुख्य रूप से सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एस एल ई )भी कहते हैं। यह बीमारी शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित कर सकती है, जैसे त्वचा से संबंधित चेहरे पर तितली के आकार का लाल चकत्ता (बटरफ्लाई रैश), सूरज की रोशनी से रैश बढ़ना, जोड़ों और मांसपेशियों से संबंधित दर्द, सूजन और कठोरता (आर्थराइटिस जैसे लक्षण),साथ ही अत्यधिक थकान, बुखार, मुंह या नाक में अल्सर, सिरदर्द, एनीमिया, किडनी की समस्या (ल्यूपस नेफ्राइटिस), सांस लेने में तकलीफ ये सभी इसके लक्षण हैं। लक्षण समय-समय पर बढ़ते-घटते रहते हैं, जिन्हें ‘फ्लेयर’ कहा जाता है।  इसके लक्षण और संकेत अक्सर अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते हैं। ल्यूपस का सबसे विशिष्ट लक्षण – चेहरे पर एक दाने का होना जो तितली के पंखों जैसा दिखता है और दोनों गालों पर फैला होता है। यह महिलाओं में ज्यादा आम है, ये नवजात शिशुओं, बच्चों और वृद्ध व्यक्तियों  को भी हो सकता है और इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है।

ल्यूपस के प्रकार 

यह कई प्रकार का हो सकता है, जिसमें सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस सबसे आम और गंभीर किस्म है। यह शरीर के अलग-अलग अंगों और कोशिकाओं को प्रभावित करता है, जैसे कि जोड़ों, त्वचा, गुर्दे, हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क, और रक्त कोशिकाएं। इसके लक्षणों में थकान, बुखार, जोड़ों में दर्द और सूजन, त्वचा पर रैश, और अंगों की सूजन आदि शामिल हैं। इसके अलावा क्यूटेनियस ल्यूपस भी इसका एक प्रकार है जो मुख्य रूप से त्वचा को प्रभावित करता है। यह एसएलई सिस्टेमिक ल्यूपस से अलग है, क्योंकि यह आमतौर पर शरीर के अंदरूनी अंगों (किडनी, हृदय आदि) को नहीं छूता है। यह केवल त्वचा को ही प्रभावित करता है। इसके मुख्य तीन प्रकार हैं, पहला एक्यूट क्यूटेनियस ल्यूपस ( एसीएलई ) इसमें चेहरे पर तितली आकार का लाल रैश हो जाता है। दूसरा सबएक्यूट क्यूटेनियस ल्यूपस (एससीएलई ) इसमें रैश अचानक नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे शुरू होता है। आमतौर पर चेहरे को कम प्रभावित करता है। कंधे, पीठ का ऊपरी हिस्सा, छाती का वी-आकार वाला हिस्सा (नैक-लाइन), बाजुओं का बाहर वाला हिस्सा इन जगहों को ज़्यादा प्रभावित करता है । 

ल्यूपस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, इस बीमारी में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) गलती से स्वस्थ कोशिकाओं और टिश्यूज़ पर हमला करने लगती है। इसे मुख्य रूप से सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एस एल ई )भी कहते हैं। यह बीमारी शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित कर सकती है।

तीसरा प्रकार डिस्कॉइड ल्यूपस (डीएलई ) है, इसमें गोल लाल गुलाबी चकत्ते हो जाते हैं। साथ ही ये चकत्ते स्थाई निशान भी छोड़ जाते हैं। ड्रग-इंड्यूस्ड ल्यूपस एरिथेमेटोसस  (डीआईएलई) यह ल्यूपस का अस्थायी प्रकार है, जो कुछ दवाओं के सेवन के कारण होता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें कुछ दवाइयां लेने से शरीर में ल्यूपस जैसी बीमारी के लक्षण पैदा हो जाते हैं। इस प्रकार के ल्यूपस का कारण बनने वाली दवाओं में कुछ हाई ब्लड प्रेशर, एंटी-सीजर, और एंटी-टीबी दवाएं शामिल हो सकती हैं। इसके अलावा नियोनेटल ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एनएलई ) यह नवजात शिशुओं में होता है। यह बच्चे का अपना ल्यूपस नहीं होता, बल्कि माँ के खून से आई हुई एंटीबॉडीज़ बच्चे को प्रभावित करती हैं। जिन माताओं को ल्यूपस या अन्य ऑटोइम्यून समस्या होती हैं। नवजात शिशुओं में त्वचा रैश जैसी समस्या  हो जाती हैं। यह स्थिति आमतौर पर अस्थायी होती है, और बच्चा कुछ महीनों के बाद ठीक हो जाता है। लेकिन किसी भी प्रकार के लक्षण महसूस होने पर डॉक्टर से कंसल्ट करना ज़रूरी है। 

ल्यूपस के कारण

ज़्यादातर स्टडीज में ये पाया गया है, कि जब इम्यून सिस्टम गलती से स्वस्थ कोशिकाओं और टिशू पर हमला कर देती हैं, तब ल्यूपस होता है। लेकिन ल्यूपस के होने का ये अकेला कारण नहीं है। यह कई कारकों के संजोग से होता है, जैसे कि यह जेनेटिक भी हो सकता है। अगर परिवार में किसी को ल्यूपस है, तो संभावना है कि अन्य सदस्यों में भी इसका संक्रमण हो सकता है। पर्यावरण सूर्य की किरणें यानी (यूवी) किरणों से ल्यूपस के लक्षण देखने को मिल सकते हैं। त्वचा पर रैश ज़्यादा बढ़ जाता है।यूवी किरणें ल्यूपस के लक्षणों को बढ़ा सकती हैं। कुछ मामलों में दवाओं के कारण भी ल्यूपस के लक्षण देखने को मिलते हैं, जैसे हाई ब्लड प्रेशर और एंटी- सीजर दवाएं ड्रग-इंड्यूस्ड ल्यूपस का कारण बनती है। 

यह जेनेटिक भी हो सकता है। अगर परिवार में किसी को ल्यूपस है, तो संभावना है कि अन्य सदस्यों में भी इसका संक्रमण हो सकता है। पर्यावरण सूर्य की किरणें यानी (यूवी) किरणों से ल्यूपस के लक्षण देखने को मिल सकते हैं। त्वचा पर रैश ज़्यादा बढ़ जाता है।

कैसे महिलाओं को अलग तरीके से करता है प्रभावित 

ल्यूपस पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक पाया जाता है, खासकर 15 से 45 साल की उम्र के बीच शुरू होता है। हार्मोनल, जैविक और सामाजिक कारणों से यह महिलाओं को अलग तरह से प्रभावित करता है। महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन नामक हार्मोन प्रमुख रूप से पाया जाता है। यह हार्मोन शरीर में इम्यून सिस्टम को एक्टिव रखता है। लेकिन जब यह अत्याधिक एक्टिव हो जाता है, तो शरीर अपनी ही कोशिकाओं और टिशू पर हमला करने लगता है, जिस कारण महिलाओं में ल्यूपस की संभावना बढ़ जाती है। प्रोजेस्टेरोन हार्मोन एस्ट्रोजेन के प्रभाव को संतुलित करता है। प्रोजेस्टेरोन का स्तर कम होने पर ल्यूपस के लक्षण बढ़ सकते हैं। गर्भावस्था और पीरियड्स के दौरान प्रोजेस्टेरोन में उतार चढ़ाव ल्यूपस की स्थिति को प्रभावित कर सकता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर के कंसल्ट की जरूरत है। महिलाओं में एस्ट्रोजन और अन्य हार्मोनों के स्तर में उतार चढ़ाव से यह बीमारी अधिक एक्टिव हो जाती है। इसलिए ल्यूपस महिलाओं को अधिक प्रभावित करता है। लुपस केवल एक शारीरिक बीमारी नहीं, बल्कि महिलाओं के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करने वाला रोग है। हार्मोनल, मानसिक और सामाजिक कारक मिलकर इसे और जटिल बना देते हैं। लेकिन सही जानकारी, समय पर इलाज और परिवार के समर्थन से महिलाएं, इस रोग के साथ भी संतुलित और सक्रिय जीवन जी सकती हैं।

आज के दौर में जो महिलाएं घर से बाहर काम कर रही हैं। पितृसत्ता को चुनौती देते हुए घर की चारदीवारी को लांघकर रोज़गार के हर क्षेत्र में अहम भूमिका निभा रही हैं। जो महिलाएं घर से बाहर काम करती हैं, उनको तो दोहरा बोझ उठाना पड़ता है। ऐसे में ल्यूपस से सर्वाइवर महिलाएं सार्वजनिक स्थान पर जाती हैं, तो कहीं न कहीं उनके मानसिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास पर असर पड़ता है। जो महिलाएं घर पर ही रहती हैं और घर संभालती हैं, धूप में कई काम करती हैं। ऐसे में उनको ल्यूपस होता है तो उसे कोई गंभीर रूप से नहीं लेता उसे सामान्य सी खुजली या दाद कहकर दवाई दे दी जाती है। जो आगे चलकर गंभीर हो जाता है, क्योंकि ल्यूपस के लक्षण पता न होने के कारण इससे बचने के लिए कोई परहेज़ नहीं किया जाता। इसके कारण जोड़ो में दर्द और थकान सामान्य लक्षण हैं , घर में काम करने वाली महिलाओं को इसके बारे में पता नहीं होता, उनको लगता है कि ये घरेलू काम के कारण होता है। लेकिन लक्षण बढ़ जाने के बाद काफी समस्याएं आती हैं। इन शारीरिक लक्षणों से परिवार की जिम्मेदारी न निभा पाने के कारण तनाव, चिंता और डिप्रेशन की संभावना बढ़ जाती है। 

ल्यूपस पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक पाया जाता है, खासकर 15 से 45 साल की उम्र के बीच शुरू होता है। महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन नामक हार्मोन प्रमुख रूप से पाया जाता है। लेकिन जब यह अत्याधिक एक्टिव हो जाता है, तो शरीर अपनी ही कोशिकाओं और टिशू पर हमला करने लगता है, जिस कारण महिलाओं में ल्यूपस की संभावना बढ़ जाती है।

बचाव के लिए कदम 

ल्यूपस का कोई इलाज नहीं है, लेकिन दैनिक जीवन में कुछ बदलाव करके इसे नियंत्रित किया जा सकता है। अगर किसी को इसके लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए। ताकि पता चल सके कि इसका कारण क्या है। डॉक्टर की सलाह पर ही दवाइयां ले ताकि लक्षणों को नियंत्रित करने और ज्यादा एक्टिव इम्यून सिस्टम को नियंत्रित करने में मदद मिले। इसके अलावा दैनिक जीवन में भी कुछ चीजों को अपनाकर इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। जैसे धूप में निकलने से बचाना क्योंकि त्वचा पर यूवी किरणें पड़ने से ये बढ़ सकता है। अगर धूप में निकलना ही पड़े तो लंबी आस्तीन के कपड़े पहने और पूरे शरीर को ढक कर निकले ताकि सूर्य की किरणों से बचा जा सके। ल्यूपस के कारण जोड़ों में दर्द रहता है, इसे कम करने के लिए पैदल चलना, साइकिल चलाना और योग करना  चाहिए, ताकि शरीर एक्टिव रहे और थकान महसूस ना हो। इसके अलावा अपने डॉक्टर से सलाह लें  कि आपको किस तरह की एक्सरसाइज करनी चाहिए।  साथ ही संतुलित पौष्टिक आहार लें और तनाव मुक्त होकर पर्याप्त नींद ले ताकि शरीर को आराम मिले। ल्यूपस के साथ जीना मुश्किल है, लेकिन इसको कम या संतुलित किया जा सकता है।

हर साल 10 मई को विश्व ल्यूपस फेडरेशन (डब्ल्यूएलएफ ) के सहयोग से विश्व ल्यूपस दिवस मनाया जाता है। विश्व ल्यूपस फेडरेशन दुनिया भर के ल्यूपस समूहों का एक गठबंधन है, जो इसका  सामना करने वाले लोगों और उनके परिवार के सदस्यों और देखभाल करने वालों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए मिलकर काम करते हैं। भारत में ल्यूपस अभी भी कम समझी जाने वाली बीमारी है। यहां विश्व ल्यूपस फेडरेशन के सहयोगी संगठन जैसे ल्यूपस ट्रस्ट इंडिया, और कई रूमेटोलॉजिस्ट्स हर साल 10 मई को जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करते हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई जैसे शहरों में वॉकाथॉन, सेमिनार और फ्री कैंप होते हैं। ल्यूपस केवल एक शारीरिक बीमारी नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि महिलाओं का स्वास्थ्य आज भी अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता। थकान, दर्द और रैश जैसे लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिससे देर से पहचान और उपचार की समस्या बढ़ती है। जरूरत है जागरूकता, समय पर चिकित्सा परामर्श और सामाजिक संवेदनशीलता की, ताकि महिलाएं इस बीमारी के साथ भी सम्मानजनक और संतुलित जीवन जी सकें।

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