समाजकानून और नीति तलाक के बाद महिलाओं की आर्थिक स्थिति, चुनौतियां और कानूनी प्रावधान

तलाक के बाद महिलाओं की आर्थिक स्थिति, चुनौतियां और कानूनी प्रावधान

घर का काम, बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की सेवा ये सब काम अक्सर महिलाएं करती हैं। लेकिन इन कामों को कानूनी और आर्थिक रूप से महत्व नहीं दिया जाता। तलाक के समय, घर में किए गए इस “अदृश्य श्रम” को आर्थिक योगदान नहीं माना जाता। इससे महिला की कमाई की क्षमता कम हो जाती है और पति द्वारा कमाई गई संपत्ति में उसे हिस्सा नहीं मिल पाता।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय समाज मुख्य रूप से पितृसत्तात्मक है। चल और अचल संपत्ति के मामलों में पुरुषों को जो विशेष अधिकार मिलते हैं, वे इसी पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था का परिणाम हैं। महिलाओं को चाहे वे बेटी हों, पत्नी हों या माँ अक्सर संपत्ति के अधिकारों से दूर रखा जाता है। घर में संपत्ति से जुड़े अधिकतर फैसले पुरुष ही लेते हैं। महिलाओं को संपत्ति विरासत में पाने, उसका स्वामित्व रखने, उपयोग करने और उसे बेचने या बांटने का अधिकार मिलना तूलनामूलक रूप से हाल की बात है। हिंदू महिलाओं के संपत्ति अधिकारों की वर्तमान स्थिति, प्रचलित परंपराओं और औपचारिक कानूनों के लंबे इतिहास पर आधारित है।

वैदिक काल में महिलाओं को आर्थिक रूप से पुरुषों के बराबर माना जाता था। पत्नियों को अपने पति की संपत्ति पर समान अधिकार प्राप्त थे। लेकिन बाद में स्थिति बदल गई। मनुस्मृति में मनु ने कहा था कि पत्नी, दास या नाबालिग पुत्र को संपत्ति नहीं दी जानी चाहिए। मनु के अनुसार, कानून बताता है कि पत्नी, पुत्र और दास इन तीनों को सामान्य रूप से अपनी कोई संपत्ति रखने का अधिकार नहीं है। वे जो भी कमाते हैं, वह उस व्यक्ति का माना जाता है जिसके वे अधीन हैं। यह उस समय के उस विचार को दिखाता है जिसमें महिलाओं को पुरुषों के अधीन और उनकी संपत्ति के समान समझा जाता था। इसके बाद महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार देने की परंपरा धीरे-धीरे कम होती गई।

मनुस्मृति में मनु ने कहा था कि पत्नी, दास या नाबालिग पुत्र को संपत्ति नहीं दी जानी चाहिए। मनु के अनुसार, कानून बताता है कि पत्नी, पुत्र और दास इन तीनों को सामान्य रूप से अपनी कोई संपत्ति रखने का अधिकार नहीं है।

तलाक और महिलाओं के लिए कानूनी और आर्थिक मोड़

तलाक महिलाओं के जीवन में एक बड़ी कानूनी और आर्थिक विभाजन रेखा साबित होता है। इससे अक्सर उनके जीवन स्तर में भारी और लंबे समय तक गिरावट आती है और गरीबी का खतरा बढ़ जाता है। तलाक दोनों पति-पत्नी के लिए दुखद होता है, लेकिन इसके असर महिलाओं और पुरुषों पर अलग-अलग पड़ते हैं। कई अध्ययनों के अनुसार, तलाक के तुरंत बाद महिलाओं की घरेलू आय में लगभग 40–50 फीसद तक कमी आ जाती है। वहीं पुरुषों की आय में इतनी बड़ी गिरावट नहीं होती। कई मामलों में तो तलाक के कुछ वर्षों बाद पुरुषों के जीवन स्तर में सुधार भी देखा गया है। अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि तलाकशुदा महिलाओं के गरीबी में जाने की संभावना ज्यादा होती है। लगभग तीन में से एक तलाकशुदा महिला तलाक के बाद गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिताती है। कुछ मामलों में महिलाओं के लिए गरीबी का खतरा 20 फीसद से भी अधिक बढ़ जाता है।

तलाक के बाद महिलाओं को भरण-पोषण

समय के साथ हिंदू कानून के तहत महिलाओं के संपत्ति अधिकार और भरण-पोषण के अधिकारों में बदलाव आए हैं। पहले तलाक के बाद महिलाओं को संपत्ति या भरण-पोषण का बहुत सीमित अधिकार मिलता था। बाद में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 जैसे कानून बनाए गए, जिनसे महिलाओं को आर्थिक सहायता पाने का कानूनी अधिकार मिला। समय के साथ अदालतों ने भी इन कानूनों की ऐसी व्याख्या की, जिससे तलाक के बाद महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा को महत्व दिया गया। फिर भी, आज भी महिलाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सामाजिक भेदभाव, कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता और कानूनों का सही तरीके से पालन न होना, ये सभी कारण हैं जिनसे भरण-पोषण का अधिकार अक्सर आर्थिक न्याय के स्तर तक नहीं पहुंच पाता।

कई अध्ययनों के अनुसार, तलाक के तुरंत बाद महिलाओं की घरेलू आय में लगभग 40–50 फीसद तक कमी आ जाती है। वहीं पुरुषों की आय में इतनी बड़ी गिरावट नहीं होती। कई मामलों में तो तलाक के कुछ वर्षों बाद पुरुषों के जीवन स्तर में सुधार भी देखा गया है।

विधायिका ने हिंदू कानून के तहत महिलाओं के संपत्ति और भरण-पोषण के अधिकारों की रक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं, खासकर तलाक के बाद। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 तलाक के बाद महिलाओं को आर्थिक सहायता और अधिकार देते हैं। घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 ने भी महिलाओं के संपत्ति और भरण-पोषण के अधिकारों को मजबूत किया। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में 2005 के संशोधन से बेटियों को समान संपत्ति अधिकार मिले। सरकार की “वन स्टॉप सेंटर” जैसी योजनाएं और कानूनी सहायता सेवाएं महिलाओं को अपने अधिकार समझने और पाने में मदद करती हैं। फिर भी, तलाक के बाद भरण-पोषण में अक्सर आर्थिक न्याय की कमी रह जाती है। इसे बराबरी की साझेदारी के बजाय केवल गुज़ारे की मदद माना जाता है। कानून होने के बावजूद सामाजिक असमानता, कानून का सही पालन न होना और महिलाओं के घरेलू (बिना वेतन) काम को महत्व न मिलना बड़ी समस्याएं हैं।

अक्सर लोग मानते हैं कि शादी के बाद अर्जित संपत्ति पर पति-पत्नी का बराबर अधिकार होता है। लेकिन भारत में आम तौर पर संपत्ति उसी की मानी जाती है, जिसके नाम पर वह दर्ज हो। हिंदू कानून के अनुसार, तलाक के बाद महिला को पति की पैतृक या अलग संपत्ति में भविष्य का अधिकार नहीं रहता। वह अपने स्त्रीधन की पूरी मालिक होती है, संयुक्त संपत्ति में हिस्सा मांग सकती है (अगर उसका योगदान हो) और गुजारा भत्ता/भरण-पोषण की हकदार होती है। संपत्ति का बंटवारा कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे, विवाह की अवधि, पति-पत्नी का आर्थिक और घरेलू योगदान, और बच्चों का हित। विवाद होने पर अदालत हस्तक्षेप करती है और पत्नी की जरूरतों, दोनों की आर्थिक स्थिति और बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखकर निर्णय देती है।

लगभग तीन में से एक तलाकशुदा महिला तलाक के बाद गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिताती है। कुछ मामलों में महिलाओं के लिए गरीबी का खतरा 20 फीसद से भी अधिक बढ़ जाता है।

न्यायिक विवेक और महिलाओं की असमान स्थिति

भारत में तलाक के बाद भरण-पोषण तय करने में अदालत का विवेक (डिस्क्रेशन) बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसी कारण कई बार फैसले एक जैसे नहीं होते और परिणाम कानून की भावना से अलग दिखाई देते हैं। कानून का उद्देश्य महिलाओं को गरीबी से बचाना है, लेकिन हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 के तहत अदालतें फैसला करते समय कई बातों पर विचार करती हैं। अदालतें अक्सर ‘पति-पत्नी के आचरण’ को भी देखती हैं। इससे नैतिक आकलन आर्थिक फैसलों को प्रभावित कर सकता है। कई बार भरण-पोषण को महिला का पक्का अधिकार नहीं, बल्कि शर्तों पर दिया जाने वाला लाभ माना जाता है। कुछ मामलों में, यदि पत्नी पढ़ी-लिखी है या नौकरी करने में सक्षम है, तो अदालत भरण-पोषण कम कर देती है या देने से मना कर देती है। कभी-कभी उसे ‘जानबूझकर काम न करने वाली’ भी मान लिया जाता है।

अवैतनिक घरेलू काम की अनदेखी

घर का काम, बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की सेवा ये सब काम अक्सर महिलाएं करती हैं। लेकिन इन कामों को कानूनी और आर्थिक रूप से महत्व नहीं दिया जाता। तलाक के समय, घर में किए गए इस ‘अदृश्य श्रम’ को आर्थिक योगदान नहीं माना जाता। इससे महिला की कमाई की क्षमता कम हो जाती है और पति द्वारा कमाई गई संपत्ति में उसे हिस्सा नहीं मिल पाता। इसलिए तलाक के बाद उसके पास अक्सर बहुत कम संपत्ति बचती है। महिलाओं के लिए तलाक के बाद कुछ मुख्य प्रभाव और अधिकार हैं।

घर का काम, बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की सेवा ये सब काम अक्सर महिलाएं करती हैं। लेकिन इन कामों को कानूनी और आर्थिक रूप से महत्व नहीं दिया जाता। तलाक के समय, घर में किए गए इस “अदृश्य श्रम” को आर्थिक योगदान नहीं माना जाता। इससे महिला की कमाई की क्षमता कम हो जाती है और पति द्वारा कमाई गई संपत्ति में उसे हिस्सा नहीं मिल पाता।

  • संपत्ति पर स्वतः 50 फीसद अधिकार नहीं: तलाक के बाद वैवाहिक संपत्ति अपने-आप बराबर नहीं बंटती। पति की खुद की कमाई हुई संपत्ति पर महिला का सीधा अधिकार नहीं होता।
  • स्त्रीधन का अधिकार: महिला को अपने स्त्रीधन (शादी से पहले, दौरान या बाद में मिले उपहार) पर पूरा अधिकार होता है और वह इसे वापस मांग सकती है।
  • संयुक्त संपत्ति में हिस्सा: अगर पत्नी ने किसी संपत्ति की खरीद में पैसा लगाया है, तो वह अपने हिस्से की हकदार है।
  • भरण-पोषण और गुजारा भत्ता: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 के तहत अदालत पति को एकमुश्त या मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दे सकती है।
  • निवास का अधिकार: घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत महिला को साझा घर में रहने का अधिकार मिल सकता है, भले ही घर उसके नाम पर न हो।
  • पुनर्विवाह का प्रभाव: यदि महिला दोबारा शादी कर लेती है, तो वह पहले पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार खो सकती है।

इस तरह, कानून में अधिकार तो दिए गए हैं, लेकिन व्यवहार में महिलाओं को उन्हें पाने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। भारतीय समाज में महिलाओं के संपत्ति और भरण-पोषण संबंधी अधिकारों में समय के साथ कानूनी सुधार जरूर हुए हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति अब भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। कानून महिलाओं को सुरक्षा और आर्थिक सहारा देने का प्रयास करते हैं, लेकिन सामाजिक सोच, न्यायिक विवेक, और अवैतनिक घरेलू कार्य की अनदेखी के कारण उन्हें बराबरी का न्याय नहीं मिल पाता। तलाक के बाद महिला की आर्थिक स्थिति अक्सर कमजोर हो जाती है, क्योंकि संपत्ति पर खुद-ब-खुद अधिकार नहीं होता और भरण-पोषण को भी कई बार पूर्ण अधिकार के रूप में नहीं माना जाता। इसलिए जरूरी है कि कानूनों का प्रभावी पालन हो, न्यायिक प्रक्रिया अधिक संवेदनशील बने और घरेलू कार्य को भी आर्थिक योगदान के रूप में मान्यता दी जाए। सच्चे मायनों में समानता तभी संभव है, जब महिला को शादी के दौरान और उसके बाद भी आर्थिक साझेदार के रूप में सम्मान और अधिकार दोनों मिलें।

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