भारत के गाँवों में एक ऐसी शांत लेकिन गहरी क्रांति चल रही है, जो अक्सर सुर्खियों में नहीं आती। यह क्रांति महिला किसानों के हाथों की है जहा वे बीज संरक्षण की परंपरा को ज़िंदा रखकर न केवल हमारी खेती को बचा रही हैं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और जलवायु संकट से लड़ने की ताकत भी तैयार कर रही हैं। हालांकि उनके काम ज़्यादातर अदृश्य है और उन्हें ‘किसान’ के रूप में सही दर्जा नहीं मिलता। बीज संरक्षण का मतलब है एक फसल से दूसरी फसल के लिए बीज बचाना, उन्हें सुरक्षित रखना और समुदाय में साझा करना। यह सिर्फ़ बीज इकट्ठा करना नहीं है, बल्कि स्थानीय और देसी किस्मों की रक्षा करना है।
ये बीज स्थानीय जलवायु के अनुकूल होते हैं और पीढ़ियों के अनुभव से विकसित हुए हैं। इसके उलट, हाइब्रिड या जेनेटिक रूप से बदले गए बीज हर साल बाज़ार से खरीदने पड़ते हैं और उन पर कंपनियों का नियंत्रण होता है। पर्यावरणविद् वंदना शिवा कहती हैं कि बीज खाद्य श्रृंखला की पहली कड़ी है। आज जहां कभी भारत में चावल की लगभग एक लाख देसी किस्में पाई जाती थीं, वहां अब खेती कुछ गिनी-चुनी किस्मों तक सीमित हो गई है। इससे आनुवंशिक विविधता कम हो रही है और हमारी खाद्य प्रणाली कमज़ोर हो रही है। अगर एक बीमारी या कीट हमला करे, तो पूरी फसल नष्ट होने का खतरा बढ़ जाता है। भारत में कृषि कार्यबल का बड़ा हिस्सा महिलाएं हैं।
बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं कृषि कार्यबल का लगभग 64.4 फीसद हिस्सा हैं और देश के 60–80 फीसद भोजन के उत्पादन में योगदान देती हैं, लेकिन उनके पास केवल लगभग 12.8 फीसद भूमि का मालिकाना हक है।
महिला किसानों का अदृश्य मेहनत और अनदेखी विशेषज्ञता
बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं कृषि कार्यबल का लगभग 64.4 फीसद हिस्सा हैं और देश के 60–80 फीसद भोजन के उत्पादन में योगदान देती हैं, लेकिन उनके पास केवल लगभग 12.8 फीसद भूमि का मालिकाना हक है। ग्रामीण भारत में अधिकतर महिलाएं खेती पर निर्भर हैं, फिर भी वे पारिवारिक ज़मीन पर बिना वेतन काम करती हैं। परंपरागत रूप से महिलाएं ही बीजों का चयन, संरक्षण और आदान-प्रदान करती रही हैं। उन्हें पता होता है कि कौन-सी किस्म किस मिट्टी में बेहतर होगी, किस बीज में औषधीय गुण हैं, और कौन-सी फसल सूखा या बाढ़ सह सकती है। यह गहरा पारिस्थितिक और व्यावहारिक ज्ञान है।
फिर भी आधुनिक ‘वैज्ञानिक’ कृषि मॉडल के सामने इस ज्ञान को अक्सर कमतर माना जाता है। भूमि का मालिकाना हक ही बैंक कर्ज़, सरकारी योजनाओं, बीमा और प्रशिक्षण तक पहुंच की कुंजी है। जब ज़मीन महिलाओं के नाम नहीं होती, तो वे आधिकारिक रूप से ‘किसान’ भी नहीं मानी जातीं। इससे उनकी बीज संरक्षण की विशेषज्ञता को मान्यता नहीं मिलती और उनका श्रम पारिवारिक कर्तव्य समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। भारत की खाद्य सुरक्षा और जलवायु लचीलापन तभी मजबूत हो सकता है, जब महिला किसानों के ज्ञान, श्रम और अधिकारों को बराबरी से स्वीकार किया जाए। बीज बचाने की यह परंपरा सिर्फ़ खेती की तकनीक नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित रखने की लड़ाई है।
परंपरा से प्रतिरोध तक: एक संक्षिप्त इतिहास
भारत में बीज संरक्षण की परंपरा बहुत पुरानी है। आदिवासी और स्वदेशी समुदायों में बीज को पवित्र और सामुदायिक संपत्ति माना जाता था। इन्हें सुरक्षित रखना और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के साथ साझा करना परंपरा का हिस्सा था। खासकर आदिवासी महिलाएं पीढ़ियों से बीजों का चयन, सुखाना और सुरक्षित भंडारण करती रही हैं। लौकी या कद्दू जैसे सूखे खोल में बीज भरकर, राख का उपयोग कर उन्हें कीटों और नमी से बचाया जाता है। यह ज्ञान माँ से बेटी और दादी से पोती तक पहुंचता रहा है। आज जलवायु परिवर्तन के दौर में यही पारंपरिक ज्ञान सबसे अधिक उपयोगी साबित हो रहा है।
बीज संरक्षण के मामले में कुछ नाम बेहद जरूरी हैं। ओडिशा के कोरापुट ज़िले की पद्म श्री कमला पुजारी बिना औपचारिक शिक्षा के देसी धान की 100 से अधिक किस्मों के साथ हल्दी, बाजरा और काला जीरा जैसी कई फसलों के बीज सुरक्षित रखे। वे गाँव-गाँव जाकर किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करती थीं। उनके योगदान के लिए उन्हें साल 2002 में इक्वेटर इनिशिएटिव अवार्ड और साल 2019 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। वे कृषि क्षेत्र में यह सम्मान पाने वाली पहली आदिवासी महिला थीं।
‘किसान’ शब्द को अक्सर ज़मीन के मालिक पुरुष के रूप में परिभाषित किया जाता है। महिलाएं खेती का काम करती हैं, लेकिन उन्हें ‘किसान की पत्नी’ या ‘मज़दूर’ कहा जाता है। यही भाषाई भेदभाव आगे चलकर नीतियों में भी दिखता है। जब महिला को आधिकारिक रूप से किसान नहीं माना जाता, तो उसे कर्ज़, बीमा, सब्सिडी और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
पर्यावरण कार्यकर्ता वंदना शिवा ने साल 1991 में नवधान्य आंदोलन की शुरुआत की। यह संगठन आज 22 राज्यों में 150 से अधिक सामुदायिक बीज बैंक चलाता है। नवधान्य ने लाखों किसानों को टिकाऊ खेती के लिए प्रशिक्षित किया है और हजारों देसी किस्मों को संरक्षित किया है। जलवायु आपदाओं के समय उनका ‘सीड्स ऑफ होप’ कार्यक्रम किसानों को जलवायु-प्रतिरोधी बीज उपलब्ध कराता है। कोविड महामारी के दौरान गार्डेन्स ऑफ होप अभियान ने हजारों महिलाओं को अपने घरों में जैविक बगीचे बनाने में मदद की। ओडिशा की 13 वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता हर्षिता प्रियदर्शिनी मोहंती भी बीज संरक्षण की मिसाल हैं। वे 180 से अधिक धान और 60 से अधिक बाजरा किस्मों का देसी बीज बैंक चला रही हैं। उनकी ‘विनिमय के लिए ऋण’ पद्धति के तहत किसानों को 2 किलो बीज मुफ्त दिया जाता है, जिसे फसल के बाद 4 किलो के रूप में लौटाना होता है। इस पहल से कई महिला किसान सशक्त हुई हैं। वे कमला पुजारी की विरासत से प्रेरित हैं और दिखाती हैं कि बीज संरक्षण आज की पर्यावरणीय जरूरत भी है।
मुख्यधारा की चुप्पी क्यों है खतरनाक
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब महिलाएं देश के बड़े हिस्से का भोजन उगा रही हैं, सदियों से बीज संरक्षण कर रही हैं और जलवायु संकट से निपटने के व्यावहारिक समाधान उनके पास हैं, तो मुख्यधारा की चर्चा में उनकी आवाज़ क्यों नहीं सुनाई देती? ‘किसान’ शब्द को अक्सर ज़मीन के मालिक पुरुष के रूप में परिभाषित किया जाता है। महिलाएं खेती का काम करती हैं, लेकिन उन्हें ‘किसान की पत्नी’ या ‘मज़दूर’ कहा जाता है। यही भाषाई भेदभाव आगे चलकर नीतियों में भी दिखता है। जब महिला को आधिकारिक रूप से किसान नहीं माना जाता, तो उसे कर्ज़, बीमा, सब्सिडी और सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। यह चुप्पी संयोग नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक ढांचे का परिणाम है। भारतीय कृषि इस समय कई संकटों से गुजर रही है। मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है, भूजल स्तर गिर रहा है, जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ रहा है और रासायनिक इनपुट पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में महिला बीज संरक्षकों का अनुभव बेहद महत्वपूर्ण है।
महिलाओं द्वारा बचाए गए देसी बीजों को कम रासायनिक खाद और कीटनाशक की जरूरत होती है। इससे खेती की लागत घटती है और पर्यावरण सुरक्षित रहता है। इन बीजों में आनुवंशिक विविधता अधिक होती है, जिससे वे सूखा, बाढ़, अधिक गर्मी या लवणीय मिट्टी जैसी स्थितियों को बेहतर सहन कर पाते हैं। देसी बीज फसल चक्र और मिश्रित खेती को बढ़ावा देते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत सुधरती है। सबसे अहम बात यह है कि इन्हें हर साल खरीदा नहीं जाता, बल्कि किसान स्वयं बचाकर और साझा कर सकते हैं। हालांकि कई सरकारी योजनाओं में महिला किसानों की भागीदारी बढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। स्वयं सहायता समूहों को कृषि और बीज उत्पादन से जोड़ा जा रहा है। नीति स्तर पर यह मांग उठ रही है कि महिलाओं को भूमि स्वामित्व के बिना भी “किसान” के रूप में कानूनी मान्यता दी जाए।
महिलाओं द्वारा बचाए गए देसी बीजों को कम रासायनिक खाद और कीटनाशक की जरूरत होती है। इससे खेती की लागत घटती है और पर्यावरण सुरक्षित रहता है। इन बीजों में आनुवंशिक विविधता अधिक होती है, जिससे वे सूखा, बाढ़, अधिक गर्मी या लवणीय मिट्टी जैसी स्थितियों को बेहतर सहन कर पाते हैं।
क्या हो सकता है आगे का रास्ता
बीज कानूनों में भी सुधार पर चर्चा हो रही है। उदाहरण के लिए, सीड्स बिल 2004 (और उसके प्रस्तावित संशोधन) जैसे कानूनों पर बहस के दौरान यह ज़रूरी है कि पारंपरिक बीज संरक्षण और सामुदायिक बीज बैंकों के अधिकार सुरक्षित रहें। गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यक है, लेकिन कानून ऐसा होना चाहिए जो छोटे किसानों और खासकर महिलाओं के सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा दे, न कि उन्हें हतोत्साहित करे। कृषि अनुसंधान संस्थान अब धीरे-धीरे महिलाओं के पारंपरिक ज्ञान को महत्व देने लगे हैं। कुछ विश्वविद्यालय महिला किसानों के अनुभव को दस्तावेज़ कर रहे हैं और उन्हें शोध का हिस्सा बना रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है। सांस्कृतिक स्तर पर भी परिवर्तन हो रहा है। नई पीढ़ी भी बीज संरक्षण को जिम्मेदारी के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। शहरों में देसी अनाज, मोटे अनाज (मिलेट्स) और जैविक खेती के प्रति बढ़ती रुचि भी एक अवसर है। महिला किसानों के बचाए गए बीज केवल फसल के बीज नहीं, बल्कि भविष्य के बदलाव के बीज हैं। हर संरक्षित देसी बीज खाद्य सुरक्षा और जलवायु लचीलापन को मजबूत करता है।
बीज संरक्षण में लगी हर महिला ज्ञान और अनुभव का महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसे सम्मान मिलना चाहिए। आज जब जलवायु परिवर्तन और खाद्य संकट बढ़ रहे हैं, तब देसी बीज और पारंपरिक ज्ञान की अहमियत और बढ़ जाती है। नवधान्य जैसे संगठन यह दिखा चुके हैं कि सामुदायिक प्रयास टिकाऊ खेती की मजबूत नींव बन सकते हैं। जरूरत है कि मीडिया, नीति निर्माता और समाज महिला किसानों—जैसे कमला पुजारी और हर्षिता प्रियदर्शिनी मोहंती—के योगदान को पहचानें। क्योंकि आज बचाए गए बीज ही कल की खाद्य सुरक्षा की मिलेंगे।जरूरत इस बात की है कि महिला किसानों की आवाज़ को नीति, मीडिया और सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में लाया जाए क्योंकि बीज बचाना केवल खेती का काम नहीं है—यह हमारे भविष्य को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है।

