ग्राउंड ज़ीरो से ज़मीन के मालिकाना हक़ से दूर अथाह श्रम करती महिला किसान

ज़मीन के मालिकाना हक़ से दूर अथाह श्रम करती महिला किसान

अगर इतिहास को ही खंगाला जाए तो पता चलता है कि खेती-किसानी की शुरुआत तो औरतों ने ही की है। सभ्यता की शुरुआत में तो पुरुष आखेट करने निकल जाता और स्त्रियां उनके पीछे बच्चों की देखभाल करती और कृषि आदि का काम भी करती थीं। लेकिन जैसा कि सत्ताओं की प्रवृत्ति होती है हड़पने की तो महिला किसानों के साथ वही हुआ। बाद में पितृसत्तात्मक समाज ने उनसे ये अधिकार छीन लिए। स्त्रियां श्रम करती रहीं और ज़मीन का मालिकाना हक़ पुरुषों के हाथ रहा।

गांवों में इस समय गेहूं की कटाई -मड़ाई का सीज़न चल रहा है। खेत-खलिहान मेड़-चकरोड जहां से आप गुजरेंगे तो सिर पर बोझा धरे लोग मिलेंगे लेकिन सबसे ज्यादा स्त्रियां और लड़कियां दिखेंगी। वैसे भी पलायन में ज्यादातर पुरुष परदेश चले गए हैं। यहां देखा जा सकता है खेत में काम करनेवाले मज़दूर किसानों में सबसे ज्यादा स्त्रियां दिख रही हैं। यहां खेती का लगभग एक तिहाई काम हमेशा से स्त्रियां ही करती आ रही हैं लेकिन खेत का मालिकाना हक शुरू से ही पुरुषों के पास है। आमतौर पर जब हम किसान का नाम लेते है तो हमारा मतलब पुरुष से होता है। महिलाएं जीवन भर जिस खेत में काम करती है उनका उस खेत पर मालिकाना अधिकार नही होता है क्योंकि वह औरत है। उस महिला किसान को कृषि से संबंधित सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिलता है क्योंकि राज्य उन्हें किसान नहीं मानता।

महिला किसान आज से नहीं सदियों से खेतों में बेहिसाब श्रम करती आई हैं। लेकिन खेत पर उसका कोई अधिकार नहीं होता। भारतीय पितृसत्तात्मक संस्कृति में पति ही औरत का स्वामी है तो उसे भला किसी स्वामित्व की क्या ज़रूरत। हमारे यहां कानून भी उसी संस्कृति की छाया में बने हैं जहां औरत के अधिकार में खूब कटौती है। खेत की बुवाई से लेकर कटाई, निराई, गुड़ाई, सिंचाई खेती के सभी कामों में हमेशा से औरतें लगीं रहती हैं। यहां मैं देखती हूं रात को अगर बिजली आ जाती है तो स्त्रियां रात-रात भर खेत की सिंचाई करती हैं। खेत की कटनी के समय में अगर चाँदनी रात है तो खेत की कटाई भी करती हैं। कहने का अर्थ है कि यह कोई आज की बात नहीं है। हमेशा से यहां औरतों ने खेतों में पुरुषों से ज्यादा श्रम किया लेकिन उन्हें खेत के स्वामित्व अधिकार नहीं मिला।

श्रम के बदले प्रताड़ना

ग्रामीण क्षेत्रों में घर के कामकाज से लेकर खेतों के भी ज्यादातर कामों की ज़िम्मेदारी महिलाओं के ही कंधों पर होती है। इसके बाद भी उन्हें किसान का दर्जा नहीं मिलता। वे बस किसान की पत्नी के रूप में जानी जाती हैं। मैं जिस गाँव में रहती हूं उसी गाँव की हैं शांता देवी। उन्होंने आजीवन खेती में श्रम करके अपना और अपने बच्चों के जीवन को पाला है। शांता देवी के पति मुंबई में गार्ड की नौकरी करते थे। अब नौकरी से रिटायर्ड होकर गाँव लौट आए हैं। अपनी पत्नी के प्रति वह हमेशा लापरवाह और हिंसक व्यवहार रखते थे। उनकी मर्दवादी सोच के लिहाज से स्त्रियां जन्मजात पुरुषों से कमतर होती हैं। वह आए दिन अपनी पत्नी को गाली देते हुए धमकाते हैं कि खेत की ज़मीन के मालिक वह हैं और वह जब चाहें अपने खेत बेच सकते हैं। अपने इसी अधिकार के कारण वह खेत में कोई श्रम भी नहीं करते और पत्नी को भी प्रताड़ित करते हैं। उनकी पत्नी शांता देवी इस जमीन बेचने वाली बात से पति से और डरी रहती हैं।

गाँव के लगभग सभी मर्द अपनी ज़मीन और अपने स्वामित्व के अधिकार से इतराते हैं कि जमीन का मालिक तो राज्य उन्हें मानता है क्योंकि वे पुरुष हैं। उनके पास पुरुष होने का विशेषाधिकार है। उनकी मानें तो यह राज्य की बनाई वैचारिकी है। राज्य के बनाए कानून के कारण औरतों को जमीन का अधिकार नहीं मिला। साथ ही उन्हें राज्य किसान नहीं मानता। जबकि ध्यान से देखा जाए तो सदियों से औरत ने खेतों में अपना पसीना पुरुषों से ज्यादा बहाया है। 

रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

हरिपुर गाँव की शिखा कॉलेज में पढ़ती हैं। साथ ही माँ के साथ खेतों में भी काम करती हैं। वह कहती हैं, “हमारा ये पुरुष प्रधान समाज उन्ही औरतों को उनके जमीन के हक से वंचित रखता है जो दिन-रात उसी खेत में खटती हैं। इस समाज को लगता है कि हमारी जो परिवार नाम की संस्था है वह औरतों के अधिकार मिलने से एक ही झटके में टूट जाएगी। औरतों के रूप में उनको मुफ्त का श्रम मिल रहा है। दूसरी बात हमारे यहां विवाह की ऐसी व्यवस्था जिसमे औरतों को उनका खुद का घर छोड़ देना पड़ता है। ऐसे में वह औरत न यहां की किसान रह जाती है न वहां ससुराल की जबकि दोनों जगह वह खेतों में आजीवन श्रम करती है।”

अगर इतिहास को ही खंगाला जाए तो पता चलता है कि खेती-किसानी की शुरुआत तो औरतों ने ही की है। सभ्यता की शुरुआत में तो पुरुष आखेट करने निकल जाता और स्त्रियां उनके पीछे बच्चों की देखभाल करती और कृषि आदि का काम भी करती थीं। लेकिन जैसा कि सत्ताओं की प्रवृत्ति होती है हड़पने की तो महिला किसानों के साथ वही हुआ। बाद में पितृसत्तात्मक समाज ने उनसे ये अधिकार छीन लिए। स्त्रियां श्रम करती रहीं और ज़मीन का मालिकाना हक़ पुरुषों के हाथ रहा।

गाँव के लगभग सभी मर्द अपनी ज़मीन और अपने स्वामित्व के अधिकार से इतराते हैं कि जमीन का मालिक तो राज्य उन्हें मानता है क्योंकि वे पुरुष हैं। उनके पास पुरुष होने का विशेषाधिकार है। उनकी मानें तो यह राज्य की बनाई वैचारिकी है।

हमारे ही गाँव की नूरजहां जोगियान बस्ती में रहती हैं। उन्होंने बताया कि खेत की कटाई के लिए उन्होंने रोज़ा नहीं रखा। इन दिनों वो सुबह से शाम तक खेत में श्रम करती हैं उन्होंने कई सारे खेत बटाई पर लिया था और मौसम देखकर डरी रहतीं हैं कि बारिश हो जाएगी तो फसल नष्ट हो जाएगी। वहीं उनका पति कोई बहाना बनाकर बाज़ार की तरफ चला जाता है और सांझ को लौटता है। इस बात को लेकर दोनों से कहासुनी होती रहती है। यहां ज्यादातर ऐसे ही औरत पुरुष दिखते हैं जिनमें औरत ही ज्यादा श्रम करती हैं। खेती के साथ-साथ स्त्रियां जानवरों की देखभाल भी करती हैं और चूल्हा-चौका करना तो जैसे जन्म लेने का अधिकार बनाया है समाज ने।

गाँव की तारा देवी एक सवर्ण महिला हैं। उनके कई खेत हैं। महिला मजदूरों के साथ वह दिनभर खेत में काम करती रहती हैं। वहीं, उनके पति और बेटे खेतों की तरफ नहीं जाते। पति और बेटों के इस व्यवहार से दुखी होकर वह कहती हैं, “मेरे पास ज़मीन का मालिकाना अधिकार होता तो मैं कुछ जमीन बेचकर आधुनिक तरीक़े से खेती-किसानी करती।” 

महिला किसान आज से नहीं सदियों से खेतों में बेहिसाब श्रम करती आई हैं। लेकिन खेत पर उसका कोई अधिकार नहीं होता। भारतीय पितृसत्तात्मक संस्कृति में पति ही औरत का स्वामी है तो उसे भला किसी स्वामित्व की क्या ज़रूरत। हमारे यहां कानून भी उसी संस्कृति की छाया में बने हैं जहां औरत के अधिकार में खूब कटौती है

रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

वहीं, गाँव के स्कूल में पढ़ाती रचना कहती हैं कि एक औरत जो खेतों में घरों में दिन-रात खटती रहती है। फिर भी उसका कुछ नही होता क्योंकि हमारे समाज के पुरुषों को डर है कि कहीं उनकी बनाई थाती गुम न हो जाए। इसे हम पूरे पितृसत्तात्मक समाज का एक नज़रिया या कह सकते हैं जिसके तहत पुरुषों को लगता है कि जो कुछ उनके पास है उस पर सिर्फ उनका ही अधिकार हो। औरतें तो महज श्रम करती हुई ही अच्छी लगतीं हैं। जब वह अपने हक और अधिकार की बात करने लगती हैं तो तब उन्हें यह कहा जाता है कि ज्यादा कानून पढ़ ली है।

रचना आगे कहती हैं, “रही बात अगर खेतों में श्रम की तो मैंने यह देखा की निम्न वर्ग/ हाशिये के समाज में औरत-पुरुष साथ काम करते हैं अपने खेतों में। लेकिन सामान्य वर्ग में मैंने ऐसा कहीं नहीं देखा। मसलन कुछ औरतें अगर कर भी रहीं हैं काम तो उनके ही बीच के लोग उन्हें अजीब तरह के उलाहने और ताने देते हुए कहतें है कि हमारी जाति की मर्यादा बिगाड़ रही हैं। औरत को अधिकार न देने का कानून इस तथाकथित उच्च जाति के लोगों की मंशा से बना है।”

ये सारी स्त्रियां और लड़कियां गाँव में रहती हैं। ये अलग-अलग जातिगत पहचान और वर्ग से आती हैं। इनका पूरा जीवन ग्रामीण व्यवस्था पर निर्भर है। लेकिन ये सब सोचनेवाली स्त्रियां हैं, इन्हें समाज का लैंगिक भेदभाव लगातार खटकता है। लेकिन राज्य और समाज ने इनके अधिकार से इस तरह वंचित रखा है कि ये चाहकर भी इससे निकल नहीं पा रही हैं। श्रम विभाजन में समाज ने औरत से ज्यादा श्रम करवाया और अधिकार में उसे हमेशा पीछे रखा।

किसी राज्य में कानून बनता है तो उसे ज्यादा से ज्यादा समावेशी होना चाहिए जिससे समाज की खाइयां पाटी जा सकें। लेकिन इस सारी व्यवस्था की जड़ में देखेगें तो मिलेगा कि बहुसंख्यक समुदाय चाहे जेंडर का हो या जाति का। राज्य में कानून उनकी सहूलियत औऱ सुविधा से बन जाते हैं जिसका खामियाजा हमेशा अल्पसंख्यक समुदाय भुगतते हैं। किसानों को लेकर जो आंकड़े बनते हैं हमारे देश में उसमें कहीं भी महिला किसान को नहीं रखा जाता। किसान आंदोलनों में उनकी भागीदारी से लेकर उनकी आत्महत्या से मौत या उनके नुकसान को किसानों का नुकसान नहीं माना जाता।


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