समाजख़बर शादी, हिंसा और समाज की रुढ़िवादी प्राथमिकताओं के बीच महिलाओं की एजेंसी की अनदेखी  

शादी, हिंसा और समाज की रुढ़िवादी प्राथमिकताओं के बीच महिलाओं की एजेंसी की अनदेखी  

बीते दिनों बिहार के बक्सर में एक 18 वर्षीय दुल्हन को उसके कथित प्रेमी ने शादी के दौरान गोली मार दी। परिवार के सदस्यों और स्थानीय लोगों ने घायल दुल्हन को बक्सर के सदर अस्पताल में भर्ती कराया। बाद में डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर बताई जाने के बाद उसे बेहतर इलाज के लिए वाराणसी रेफर कर दिया।

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में शादी एक ऐसी सामाजिक संस्था है, जिसे खासतौर पर ग्रामीण भारत में दो व्यक्तियों के प्रेम से अधिक दो परिवारों की जातिगत और सामाजिक प्रतिष्ठा आदि के आधार पर देखा जाता है, जिसमें लड़की की इच्छा से ज़्यादा परिवार की इज्ज़त, सामाजिक रुढ़िवादी मान्यताओं और परंपराओं का पालन ज्यादा ज़रूरी माना जाता है। ऐसे में लड़की का जीवन अक्सर कथित ज़िम्मेदारी की तरह देखा जाता है, जिसे सुरक्षित, नियंत्रित और सम्मानजनक तरीके से विदा करना ही परिवार के लिए ज़रूरी बन जाता है। यह मानसिकता केवल एक परिवार की नहीं है, बल्कि पूरे समाज में गहराई से बसी हुई है।

यहां अक्सर महिला की पहचान को केवल आदर्श पत्नी, बहू और माँ की भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाता है। उसकी पढ़ाई, उसके सपने और उसकी इच्छाएं केवल तब ही तक स्वीकार की जाती हैं, जब तक वे रुढ़िवादी नियमों के मुताबिक चलती रहे। ऐसे में जब किसी शादी समारोह के बीच हिंसा की घटनाएं होती हैं, तो वह केवल एक आपराधिक घटना नहीं रहती हैं, बल्कि वह हमारे सामाजिक रुढ़िवादी ढांचे की परतें खोल देती हैं। वह दिखाती हैं कि कैसे एक महिला का जीवन आज के दौर में भी सामूहिक मान-सम्मान और शादी के भविष्य की चिंता की कसौटी पर तौला जाता है, और कैसे एक महिला की एजेंसी और जीवन को हाशिए में धकेल दिया जाता है।

अक्सर महिला की पहचान को केवल आदर्श पत्नी, बहू और माँ की भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाता है। उसकी पढ़ाई, उसके सपने और उसकी इच्छाएं केवल तब ही तक स्वीकार की जाती हैं, जब तक वे रुढ़िवादी नियमों के मुताबिक चलती रहे।

क्या है पूरा मामला ?

 टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, बीते दिनों बिहार के बक्सर में एक 18 वर्षीय दुल्हन को उसके कथित प्रेमी ने शादी के दौरान गोली मार दी। परिवार के सदस्यों और स्थानीय लोगों ने घायल दुल्हन को बक्सर के सदर अस्पताल में भर्ती कराया। बाद में डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर बताई जाने के बाद उसे बेहतर इलाज के लिए वाराणसी रेफर कर दिया। खबर के मुताबिक, स्थानीय लोगों ने आरोपी की पहचान दुल्हन के पड़ोसी के रूप में की। एनडीटीवी में छपी खबर के मुताबिक, गौरतलब है कि इसके बाद दूल्हे यानी जिस लडके से उसकी शादी हो रही थी, उसके परिवार ने उस लड़की से शादी करने से इनकार कर दिया ।

 यह पहली बार नहीं था, जब आरोपी ने उसकी शादी में बाधा डालने की कोशिश की थी। एक साल पहले, जब उसकी शादी तय हुई थी, तब उसने दूल्हे के परिवार को धमकी दी थी, जिसके बाद उन्होंने सगाई तोड़ दी थी। उस घटना के बाद, ग्रामीणों ने पंचायत बुलाई और उसको गांव से निकाल दिया गया, लेकिन फिर भी वह लडकी का पीछा करता रहा। फिलहाल आरोपी अब पुलिस हिरासत में है। अतिरिक्त थाना अधिकारी चंदन कुमार के मुताबिक आरोपी शराब के एक पुराने मामले में भी जेल जा चुका है। पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि आरोपी को हथियार कहां से मिला और उसका मकसद क्या था यानी यह तथाकथित ‘हर्ष फायरिंग’ का मामला है, जो कई जगहों पर गैरकानूनी होने के बावजूद शादियों में दिखावे और शक्ति प्रदर्शन के रूप में की जाती है?  या फिर इसके पीछे कोई दूसरी वजह थी। 

 टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, बीते दिनों बिहार के बक्सर में एक 18 वर्षीय दुल्हन को उसके कथित प्रेमी ने शादी के दौरान गोली मार दी। परिवार के सदस्यों और स्थानीय लोगों ने घायल दुल्हन को बक्सर के सदर अस्पताल में भर्ती कराया। बाद में डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर बताई जाने के बाद उसे बेहतर इलाज के लिए वाराणसी रेफर कर दिया।

हिंसा के बाद भी शादी का दबाव

भारतीय समाज में एक लड़की की शादी को आज भी उसके जीवन की अंतिम मंज़िल की तरह देखा जाता है। इसकी ट्रेनिंग तब से ही शुरू हो जाती है, जब बचपन में ही एक लड़की को खेलने के लिए गुड़िया और किचन सेट दिया जाता है। यहीं से साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि यह रुढ़िवादी मानसिकता किस हद तक अपनी पैठ बनाए हुए है। लड़कियों को अक्सर यह सिखाया जाता है कि पढ़ाई, नौकरी, सपने सब कुछ सही है, लेकिन उससे भी ज़रूरी शादी है। ऐसे में जब कई बार लडकियों के साथ घरेलू हिंसा और यौन हिंसा होती है, तो उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति की चिंता करने से पहले यह चिंता होती है, कि लोग क्या कहेंगे ? या उसकी शादी पर क्या असर पड़ेगा। इसका एक उदाहरण हाल ही के मामले का देखा जा सकता जा सकता है, जिसमें दुल्हन को गोली लगने के बाद उसके पिता ने उसके भविष्य की चिंता व्यक्त करते हुआ कहा कि, अगर उनकी बेटी बच भी गई, तो उससे कौन शादी करेगा? यह चिंता स्वाभाविक भी है, क्योंकि पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचा ही इस तरह का है। शादी के निर्णय लेने में कई बार लडकियों की राय तक नहीं ली जाती है।

 फैक्टलीमें छपे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के साल 2019-21 के सर्वेक्षण के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर 20 से 24 साल की उम्र की 23.3 फीसदी महिलाओं ने 18 साल की उम्र से पहले शादी करने की बात स्वीकार की। यह बताता है कि आज भी बड़ी संख्या में लड़कियों के जीवन के फैसले उनकी इच्छा और तैयारी से पहले तय कर दिए जाते हैं। यह सोच सर्वाइवर की सहमति और सम्मान को नज़रअंदाज़ करती है और उसे फिर से उसी ढांचे में धकेल देती है, जिसने उसे असुरक्षित महसूस करवाया। यह पहली घटना नहीं है, आए दिन इस तरह की घटनाएं सुर्ख़ियों में रहती हैं। फेमिना पत्रिका में प्रकाशित एसिड अटैक सर्वाइवर रेशमा कुरैशी के एक इंटरव्यू के मुताबिक, जब वो 17 साल की थी, तब उन पर एसिड अटैक हुआ। इसके बाद उन्हें कई सवालों का सामना करना पड़ा जैसे ‘उसने तुम पर तेजाब क्यों फेंका? तुमने क्या किया?’ या ‘बेचारी, उससे कौन शादी करेगा?’ आदि। इसी तरह, कई सर्वाइवर्स को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है । यही वह सोच है जिसे बदलने की ज़रूरत है, जहां शादी नहीं, बल्कि महिला का जीवन, उसकी सुरक्षा और उसकी इच्छा सबसे ऊपर हो।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के साल 2019-21 के सर्वेक्षण के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर 20 से 24 साल की उम्र की 23.3 फीसदी महिलाओं ने 18 साल की उम्र से पहले शादी करने की बात स्वीकार की। यह बताता है कि आज भी बड़ी संख्या में लड़कियों के जीवन के फैसले उनकी इच्छा और तैयारी से पहले तय कर दिए जाते हैं।

मीडिया की सुर्खियां, परिवार का दर्द और समाज का बदलता रवैया 

जब कोई घटना शादी समारोह के बीच घटती है, तो वह तुरंत खबर बन जाती है। भारत में हर्ष फायरिंग जो कि गैर क़ानूनी है। इसका चलन बहुत सी शादियों में प्रचलित है, और बहुत से लोग इसमें घायल भी हो जाते हैं। लेकिन जब कोई लड़की इसका सामना करती है, तो उसे उसके चरित्र के साथ जोड़ दिया जाता है। मीडिया का काम सूचना देना है, लेकिन कई बार घटना को समझने के बजाय उसे सनसनीखेज बना दिया जाता है। अक्सर इस तरह की घटनाओं को एक ‘असामान्य हादसा’ या ‘ड्रामा’ की तरह पेश किया जाता है। जैसे कि इस केस के कुछ हेडलाइन भी देखे जा सकते हैं, बिहार में शादी के दौरान ठुकराए गए प्रेमी ने दुल्हन पर गोली चलाई, अगर वह बच गई, तो उससे कौन शादी करेगा? मंच पर दुल्हन के पिता पर गोली चलाई गई, बिहार के बक्सर में एकतरफा प्यार के चलते पड़ोसी ने दुल्हन पर स्टेज पर ही गोली चला दी; आरोपी फरार, बक्सर शादी हत्याकांड: जयमाला के बीच दुल्हन को गोली, प्रेम प्रसंग की आशंका आदि। इस तरह की भाषा अपराधी को रोमांटिक बना देती है और लड़की पर नैतिक संदेह डालती हैं।

ऐसे में परिवार और सर्वाइवर की मानसिक स्थिति को समझने की संवेदनशीलता कम दिखाई देती है। मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि सार्वजनिक हिंसा और मीडिया ट्रायल या कवरेज का सामना करने वाले परिवारों में पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। सर्वाइवर के परिवार के लिए यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि गहरा आघात होता है। कई बार परिवार की प्रतिक्रिया, जैसे कि शादी के भविष्य को लेकर चिंता, इसी सामाजिक दबाव की उपज होती है। यह चिंता केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस माहौल का परिणाम है, जहां लड़कियों के जीवन को शादी की कसौटी में तौला जाता है। परिवार का दर्द वास्तविक है, लेकिन समाज की प्रतिक्रिया यह तय करती है कि दर्द को समझा जाएगा या फिर यह दबाव महसूस करवाया जाएगा।

दुल्हन को गोली लगने के बाद उसके पिता ने उसके भविष्य की चिंता व्यक्त करते हुआ कहा कि, अगर उनकी बेटी बच भी गई, तो उससे कौन शादी करेगा? यह चिंता स्वाभाविक भी है, क्योंकि पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचा ही इस तरह का है।

बदलाव की ज़रूरत 

समाज में हर एक इंसान को यह समझने और स्वीकार करने की ज़रूरत है कि किसी भी महिला की जिंदगी उसकी शादी से कहीं ज्यादा अहमियत रखती है। इसके साथ ही उन पुरुषो को भी अपनी मानसिकता बदलने की ज़रूरत है जो महिलाओं को एक वस्तु की तरह समझते हैं और उन पर अपना अधिकार जताने की कोशिश करते हैं। इसके साथ ही मीडिया को भी किसी खबर को प्रकाशित करने से पहले उसके हर एक पहलू को जानने और संवेदनशील तरीके से लोगों तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए। इसके अलावा समाज में इसके प्रति जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए । 

ताकि लोग सर्वाइवर को दोषी ठहराने के बजाय उसकी सपोर्ट में खड़े हो सकें। इसके अलावा स्कूल-कॉलेज में जेंडर सेंसिटाइजेशन की शिक्षा भी मुहैया कराई जानी चाहिए।यह घटना केवल अपराध नहीं, बल्कि उस सामाजिक सोच का नतीजा है, जहां लड़की की पहचान उसकी शादी से जोड़ दी जाती है।जब किसी लड़की को गोली लगने के बाद पहला सवाल उसकी जान नहीं, बल्कि उसकी शादी को लेकर उठे, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक विफलता है। बदलाव की शुरुआत वहीं से होगी, जब हम शादी को महिला की नियति नहीं, बल्कि एक विकल्प मानना सीखेंगे। इससे ही समाज में समावेशिता की नींव रखी जा सकती है।

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