संस्कृतिसिनेमा ‘अस्सी’: यौन हिंसा के बाद की जद्दोजहद और समाज की संवेदनहीनता की कहानी

‘अस्सी’: यौन हिंसा के बाद की जद्दोजहद और समाज की संवेदनहीनता की कहानी

ये फिल्म एक कोर्टरूम ड्रामा है, जो कि केवल यौन हिंसा तक ही केंद्रित नहीं रहती, बल्कि यह वकीलों के बीच होने वाले समझौतों, पुलिस के भ्रष्टाचार आदि पर भी सवाल उठाती है।

भारत में यौन हिंसा केवल एक अपराध की खबर नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की गहरी और असहज सच्चाइयों को भी सामने लाती है। इसी कठोर वास्तविकता को सामने लाने की कोशिश करती है, निर्देशक अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘अस्सी’। फ़िल्म बीतने के हर 20 मिनट बाद अचानक से स्क्रीन पर एक लाल बैकग्राउंड सामने आता है, जो दर्शकों को यह बताता है कि, अब तक भारत के किसी कोने में एक महिला के साथ बलात्कार हो चुका होगा। यह दृश्य दर्शकों को थोड़ी असहजता से भर देता है और उन्हें उस कठोर वास्तविकता से रूबरू कराता है, जिसे हम अक्सर आंकड़ों या अख़बारों की खबरों में पढ़कर भूल जाते हैं। फिल्म का शीर्षक अस्सी भी इसी सच्चाई की ओर संकेत करता है, क्योंकि भारत में हर दिन औसतन लगभग अस्सी से ज़्यादा महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। इस संवेदनशील विषय को निर्देशक ने अपने खास सामाजिक दृष्टिकोण के साथ पर्दे पर उतारा है। इसमें लेखन कार्य गौरव सोलंकी ने किया है, उनके बेहतरीन मोनोलॉग कोर्ट ड्रामा में देखे जा सकते हैं। फिल्म में वकील रावी की भूमिका तापसी पन्नू ने निभाई है। 

लेकिन असल भावनात्मक केंद्र सर्वाइवर परिमा का किरदार है, जिसे मलयालम अभिनेत्री कानी कुस्रुति ने निभाया है। इसलिए अगर फिल्म की नायिका केवल तापसी पन्नू को मान लिया जाए, तो यह कानी के किरदार के साथ कुछ हद तक बेईमानी होगी। फिल्म में सर्वाइवर की भावनाओं और दुखों को जिस तरीके से दिखाया जा सकता था, उन्हें दिखाने की कोशिश की गई है। ये फिल्म एक कोर्टरूम ड्रामा है, जो कि केवल यौन हिंसा तक ही केंद्रित नहीं रहती, बल्कि यह वकीलों के बीच होने वाले समझौतों, पुलिस के भ्रष्टाचार आदि पर भी सवाल उठाती है। कहानी को और करीब से समझने से पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि फिल्म में सीमा पाहवा, मोहम्मद जीशान अय्यूब, रेवती और मनोज पाहवा जैसे बड़े कलाकार हैं। साथ ही, नसीरुद्दीन शाह और सुप्रिया पाठक जैसे एक्टर्स ने भी भूमिका निभाई है। 

ये फिल्म एक कोर्टरूम ड्रामा है, जो कि केवल यौन हिंसा तक ही केंद्रित नहीं रहती, बल्कि यह वकीलों के बीच होने वाले समझौतों, पुलिस के भ्रष्टाचार आदि पर भी सवाल उठाती है।

साधारण जिंदगी से हिंसा और न्याय की लड़ाई तक का सफर 

फिल्म की कहानी दिल्ली जैसे बड़े शहर के एक छोटे से इलाके से शुरू होती है। इसमें परिमा एक स्कूल की अध्यापिका हैं, जो केरल से हैं। उनकी शादी दिल्ली में रहने वाले विनय (जीशान अय्यूब) से हुई और दोनों का एक छोटा बेटा भी है, जिसका नाम ध्रुव है। हालांकि परिमा का जीवन भारतीय समाज की उन करोड़ों महिलाओं जैसा है, जिनके हिस्से में स्कूल की नौकरी, घर की देखभाल और बच्चे की परवरिश जैसी कथित जिम्मेदारियां आती हैं। एक दिन शाम के समय वह एक फेयरवेल पार्टी से अकेली घर लौट रही होती है, तो उस समय कुछ लड़के गाड़ी में आते हैं और उसका अपहरण कर लेते हैं और उसके साथ गैंगरेप करते हैं, इसके साथ ही कथित तौर पर उसका वीडियो भी रिकॉर्ड करते हैं। चलती गाड़ी में किसी महिला के साथ यौन हिंसा का दृश्य और लगभग 18- 19 साल से लेकर 30 साल के लड़कों का बलात्कार करने का सीन बहुत भयावह और अमानवीय लगता है। आरोपी परिमा को कार से रेलवे पटरी पर छोड़ देते हैं, जैसे तैसे वह जिंदा बच तो जाती है। लेकिन इस घटना के बाद उसकी ज़िंदगी पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाती है।

समाज और परिवार, जिनसे सहारे की उम्मीद होती है, वही उसे सवालों के कटघरे में खड़ा कर देते हैं। विडंबना यह है कि जो सवाल असल में आरोपियों से पूछे जाने चाहिए थे, वही सवाल बार-बार उससे पूछे जाते हैं। यहां तक कि कोर्ट के वकील भी कथित रूप से उसके कपड़ों और रात के समय बाहर होने पर ही दोष डालते हैं। फिल्ममेकरों ने अतिरिक्त बैकग्राउंड म्यूजिक, अनावश्यक शोर-शराबा या एक्शन का सहारा नहीं लिया है, बल्कि घटनाओं को सामान्य और वास्तविक प्रतिक्रिया की तरह प्रस्तुत किया है। कहीं-कहीं कोर्टरूम ड्रामा तथ्यों से हटकर थोड़ा भावनात्मक हो जाता है। लेकिन ज्यादातर जगहों पर फिल्म दर्शकों को वास्तविकता से जोड़े रखती है। फिल्म के कुछ ग्राफिक्स इतने जीवंत और वास्तविक हैं,  कि वो गुस्सा और घुटन पैदा करते हैं। फिल्म सिर्फ यौन हिंसा को नहीं दिखाती, बल्कि यौन हिंसा होने के बाद की जद्दोजहद को सामने रखती है। साल 2012 के निर्भया रेप केस को लगभग 8 साल लग गए कोर्ट को न्याय देने में जबकि आरोपियों के बारे में जानकारी कुछ दिनों में मिल गई थी। फिल्म की स्क्रिप्ट भी कुछ ऐसी ही है, आरोपियों के बारे में पता होने बाद भी सबूत न होने पर उन्हें बार -बार रियायत मिलती रहती है।

चलती गाड़ी में किसी महिला के साथ यौन हिंसा का दृश्य और लगभग 18- 19 साल से लेकर 30 साल के लड़कों का बलात्कार करने का सीन बहुत भयावह और अमानवीय लगता है। आरोपी परिमा को कार से रेलवे पटरी पर छोड़ देते हैं, जैसे तैसे वह जिंदा बच तो जाती है। लेकिन इस घटना के बाद उसकी ज़िंदगी पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाती है।

सिस्टम की विफलता और बदले की राजनीति

फ़िल्म में एक ऐसा किरदार भी है, जो भले ही आपको पूरी तरह वास्तविकता से न जोड़े, लेकिन समाज में फैले भ्रष्टाचार और न्याय व्यवस्था की कमजोरियों की याद जरूर दिलाता है। यह किरदार विनय का दोस्त कार्तिक है। वह समाज और सिस्टम की न्याय प्रणाली से गहरी नफरत करता है। उसकी इस नफरत की जड़ उसकी पत्नी कावेरी की दुर्घटना में हुई मौत है, जिसे न्याय नहीं मिल पाया। इसी वजह से वह अपने दोस्त की पत्नी परिमा के दोषियों को सज़ा दिलाने के लिए ‘छतरी मैन’ का रूप धारण कर लेता है। उसका इरादा उन आरोपियों को मार डालने का होता है, और वह दो आरोपियों को मार भी देता है।फ़िल्म का यह मोड़ दर्शकों को असमंजस में डाल देता है। एक तरफ कार्तिक का गुस्सा कहीं न कहीं दर्शकों के भीतर के गुस्से से मेल खाता है, लेकिन दूसरी तरफ उसकी प्रतिक्रिया को किसी भी तरह से नैतिक या संवैधानिक रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता। फ़िल्म आज के दौर में सोशल मीडिया की भूमिका और सनसनी फैलाने वाली खबरों की प्रवृत्ति की ओर भी ध्यान दिलाती है। यह दिखाती है कि कैसे ‘छतरी मैन’ के नाम से फेक सोशल मीडिया अकाउंट्स बन जाते हैं और उन पर लाखों की संख्या में दर्शक जुड़ जाते हैं।

फ़िल्म यह भी दिखाती है कि टीवी और मीडिया किस तरह टीआरपी के लिए इस पूरे मामले का फायदा उठाता है। कहानी में एक ऐसा दृश्य भी आता है, जहां दर्शकों और सर्वाइवर दोनों को न्याय की उम्मीद बंधती है। इसी क्रम में वकील रावी आरोपियों में से एक आरोपी के पिता के घर जाती है।यह दृश्य दिखाता है कि कई बार पैसों के दम पर न्याय की प्रक्रिया भी भ्रष्टाचार के साए में आ जाती है। जब एक पक्ष आर्थिक रूप से अधिक ताकतवर होता है, तो वह अपने प्रभाव और धन के बल पर वकीलों को खरीदने और न्याय की दिशा को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करता है। फ़िल्म पुलिस व्यवस्था के भीतर जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार को भी पर्दे पर लाती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे परिमा की लैब रिपोर्ट के साथ अदला-बदली की जाती है, जिससे न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इस पूरे घटनाक्रम के ज़रिए सिस्टम की भूमिका और उसकी कमजोरियों को भी सामने लाने की कोशिश की गई है।

समाज और परिवार, जिनसे सहारे की उम्मीद होती है, वही उसे सवालों के कटघरे में खड़ा कर देते हैं। विडंबना यह है कि जो सवाल असल में आरोपियों से पूछे जाने चाहिए थे, वही सवाल बार-बार उससे पूछे जाते हैं। यहां तक कि कोर्ट के वकील भी कथित रूप से उसके कपड़ों और रात के समय बाहर होने पर ही दोष डालते हैं।

सोशल मीडिया और बच्चों की बदलती मानसिकता

परिमा एक स्कूल अध्यापिका थी, लेकिन बलात्कार की घटना के बाद उसकी नौकरी छूट जाती है। कुछ समय बाद वह दोबारा अपने काम पर लौटना चाहती है। इसी इच्छा के साथ वह स्कूल की प्रिंसिपल से मिलती है और अपनी बात रखती है। लेकिन प्रिंसिपल, उसकी भावनाओं और इच्छाओं को समझने के बजाय समाज का हवाला देते हुए उसे वापस काम पर आने से मना कर देती है। बार-बार पूछने पर प्रिंसिपल आखिरकार मना करने का कारण बताती हैं और कहती हैं कि कक्षा 9 के बच्चों के एक ग्रुप में उसके साथ हुई घटना का मज़ाक बनाया जा रहा है। विडंबना यह है कि ये वही बच्चे हैं, जिन्हें कभी परिमा ने बचपन में पढ़ाया था। प्रिंसिपल बताती हैं कि कुछ बच्चे उस घटना का वीडियो तक मांग रहे हैं, तो कुछ यह कह रहे हैं कि यौन हिंसा के समय उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया। कक्षा 9 में पढ़ने वाले बच्चों के नाबालिग होने की पूरी संभावना है, लेकिन उनकी भाषा और व्यवहार में जो अश्लीलता और असंवेदनशीलता दिखती है, वह बिल्कुल भी बच्चों जैसी नहीं लगती।

यह स्थिति हमें सोशल मीडिया की उस हकीकत की भी याद दिलाती है, जहां कम उम्र के बच्चों तक भी अश्लील और संवेदनशील जानकारियां आसानी से पहुंच जाती हैं। असल ज़िंदगी में भी महिलाएं अक्सर ऐसी ही असंवेदनशीलता, मज़ाक और हिंसा का सामना करती हैं, जो यह दिखाता है कि डिजिटल स्पेस में फैल रही अश्लीलता और हिंसक सामग्री समाज की सोच को किस तरह प्रभावित कर रही है।‘अस्सी’ केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि हमारे समाज की कई परतों को उजागर करने वाली कहानी है। यह यौन हिंसा की घटना से आगे बढ़कर उस सामाजिक सोच, न्याय व्यवस्था की जटिलताओं, मीडिया की सनसनीखेज प्रवृत्ति और डिजिटल स्पेस में फैल रही असंवेदनशीलता पर भी सवाल उठाती है। फिल्म यह दिखाती है कि हिंसा केवल घटना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसके बाद सर्वाइवर को समाज, सिस्टम और अपने ही आसपास के लोगों से लगातार संघर्ष करना पड़ता है। अनुभव सिन्हा की यह फिल्म दर्शकों को असहज जरूर करती है, लेकिन यही असहजता हमें उस सच से सामना कराती है, जिसे अक्सर हम अनदेखा कर देते हैं। इसी वजह से अस्सी एक जरूरी और सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्म बनकर सामने आती है।

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