समाजकानून और नीति भारत में एसिड अटैक सर्वाइवर्स की चुनौतियां और सुप्रीम कोर्ट की पहल

भारत में एसिड अटैक सर्वाइवर्स की चुनौतियां और सुप्रीम कोर्ट की पहल

दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 केवल उन सर्वाइवर्स को मान्यता देता है, जिनका चेहरा या शरीर तेजाब या इसी तरह के पदार्थ से स्पष्ट रूप से विकृत हो गया हो। इस कानून में उन लोगों का जिक्र नहीं है जिन्हें जबरन तेजाब पिलाया गया हो।

हाल ही में शाहीन मलिक केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक सर्वाइवर के पुनर्वास को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। बीते दिनों अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पूछा कि सरकारी विभागों या एजेंसियों में रोजगार के जरिए एसिड हमले के सर्वाइवर्स के पुनर्वास के लिए अब तक कोई ठोस योजना क्यों नहीं बनाई गई है। अदालत ने कहा कि सर्वाइवर को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अगर किसी कारण से एसिड अटैक सर्वाइवर को सरकारी नौकरी देना संभव नहीं है, तो राज्य सरकारें उनके लिए जीवन-निर्वाह भत्ता देने की नीति बना सकती हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि जब तक कोई स्थायी पुनर्वास व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक सर्वाइवर को आर्थिक सहायता के रूप में मानदेय देने पर भी सरकारों को विचार करना चाहिए। यह टिप्पणी अदालत ने एसिड हमले की सर्वाइवर शाहीन मलिक के दायर याचिका की सुनवाई के दौरान की। इस याचिका में सर्वाइवर्स के बेहतर पुनर्वास, कल्याण और अन्य जरूरी सहायता के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई है।

साल 2024 की एक रिपोर्ट भारत में तेजाब हमले का दायरा: पूर्वव्यापी डेटा रिकॉर्ड पर आधारित एक अध्ययन में साल 2017 से 2021 के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021 में एसिड अटैक के 600 लंबित मामलों में से केवल 15 मामलों का ही अदालतों में निपटारा हो पाया।

सुनवाई के दौरान शाहीन मलिक ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा को उनका वकील नियुक्त किया जाए क्योंकि वह सुप्रीम कोर्ट में मामलों की पैरवी के लिए वकीलों द्वारा ली जाने वाली भारी फीस देने में सक्षम नहीं हैं। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान ही सिद्धार्थ लूथरा से संपर्क किया। अदालत ने उनसे अनुरोध किया कि वे इस मामले में शाहीन मलिक की ओर से बिना किसी फीस के वकील के रूप में पैरवी करें।

अदालत के सुझाव के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने सर्वाइवर की मदद करने के लिए सहमति दे दी। उन्होंने कहा कि वह एसिड अटैक सर्वाइवर की ओर से इस मामले की पैरवी बिना किसी फीस के करेंगे और उन्हें न्याय दिलाने में पूरा सहयोग देंगे। शाहीन मलिक द्वारा दायर जनहित याचिका में एसिड हमले के सर्वाइवर्स से जुड़ी कई गंभीर समस्याएं उठाई गई हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग राज्यों में चल रहे ऐसे मामलों में मुकदमों में देरी, सर्वाइवर्स को मिलने वाले मुआवजे और पुनर्वास की व्यवस्था जैसे मुद्दों पर निगरानी शुरू की है।

सुनवाई के दौरान शाहीन मलिक ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा को उनका वकील नियुक्त किया जाए क्योंकि वह सुप्रीम कोर्ट में मामलों की पैरवी के लिए वकीलों द्वारा ली जाने वाली भारी फीस देने में सक्षम नहीं हैं। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान ही सिद्धार्थ लूथरा से संपर्क किया।

कौन हैं शाहीन मलिक और क्या है मामला

42 वर्षीय शाहीन मलिक पिछले लगभग एक दशक से एसिड अटैक सर्वाइवर्स के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। दूसरों की मदद करने का उनका संकल्प उनके अपने अनुभव से जुड़ा है, क्योंकि वह खुद भी एसिड हमले की सर्वाइवर रह चुकी हैं। साल 2009 में हरियाणा में अपने कार्यस्थल के बाहर उनके चेहरे पर एसिड से हमला किया गया था। इस हमले के बाद उन्हें करीब 25 सर्जरी से गुजरना पड़ा और उनकी बाईं आंख की रोशनी भी चली गई। उस समय उनकी उम्र लगभग 20 साल थी। करीब 16 साल तक चली कानूनी लड़ाई में उन्होंने आरोपियों को सजा दिलाने के लिए लगातार प्रयास किया। हालांकि पिछले साल दिसंबर में निचली अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया। इस फैसले से वह दुखी जरूर हैं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी है। शाहीन कहती हैं कि उन्होंने अपने लिए न्याय की लड़ाई लड़ी है, लेकिन अब वो दूसरे सर्वाइवर्स और दुर्व्यवहार का सामना कर रहे लोगों के लिए भी लड़ रही हैं। वो चाहती हैं कि उनका मामला एक मिसाल बने, ताकि अपराधी खुलेआम न घूमें और उन्हें अपने किए की सजा मिले।

क्या कानूनी संरक्षण काफी है

शाहीन अपने साथ-साथ अन्य एसिड अटैक सर्वाइवर महिलाओं के अधिकारों के लिए भी लड़ाई लड़ रही हैं। जिन सर्वाइवर्स की वह मदद कर रही हैं, उनमें से एक रूमान भी हैं। रूमान का आरोप है कि साल 2019 में घरेलू हिंसा की एक घटना के दौरान उनके पति ने उनके साथ शारीरिक हिंसा की और जबरन तेजाब पिला दिया। इस घटना से उन्हें गंभीर आंतरिक चोटें आईं और उनकी भोजन नली बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। बाद में डॉक्टरों को कृत्रिम तरीके से उनकी भोजन नली का पुनर्निर्माण करना पड़ा, ताकि वह दोबारा खाना खा सकें। कई सालों तक इलाज कराने के बावजूद रूमान को आज भी खाना निगलने में बहुत परेशानी होती है और वह बहुत कम खा पाती हैं।

28 साल की उम्र में उनका वजन सिर्फ 21 किलो है, जो आठ साल की बच्ची के औसत वजन से भी कम है। शौचालय जाने जैसे सामान्य काम भी उन्हें बहुत थका देते हैं और उन्हें लगातार डॉक्टरों की निगरानी में रहना पड़ता है। अपनी इतनी गंभीर स्थिति के बावजूद रूमान भारत के विकलांगता कानून के तहत एसिड अटैक सर्वाइवर्स को मिलने वाले मुआवजे और पुनर्वास के लाभ नहीं ले पा रही हैं। इसकी वजह यह है कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 केवल उन सर्वाइवर्स को मान्यता देता है, जिनका चेहरा या शरीर तेजाब या इसी तरह के पदार्थ से स्पष्ट रूप से विकृत हो गया हो। इस कानून में उन लोगों का जिक्र नहीं है जिन्हें जबरन तेजाब पिलाया गया हो।

दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 केवल उन सर्वाइवर्स को मान्यता देता है, जिनका चेहरा या शरीर तेजाब या इसी तरह के पदार्थ से स्पष्ट रूप से विकृत हो गया हो। इस कानून में उन लोगों का जिक्र नहीं है जिन्हें जबरन तेजाब पिलाया गया हो।

इसी मुद्दे को उठाते हुए दिसंबर में शाहीन मलिक ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने कहा कि विकलांगता कानून में रूमान जैसे सर्वाइवर्स को भी शामिल किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि जब किसी को जबरन तेजाब पिलाया जाता है, तो शरीर की क्षति अक्सर अंदरूनी होती है और बाहर से तुरंत दिखाई नहीं देती। लेकिन, ऐसे सर्वाइवर्स का जीवन बेहद कठिन हो जाता है, क्योंकि कई ऑपरेशन के बाद भी उन्हें सांस लेने, बोलने और खाना निगलने में दिक्कत होती है। याचिका में यह भी दलील दी गई है कि ऐसे मामलों को दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 में शामिल किया जाना चाहिए। फिलहाल इस कानून की अनुसूची-I में एसिड फेंकने का जिक्र तो है, लेकिन किसी को जबरन तेजाब पिलाने की स्थिति का उल्लेख नहीं किया गया है।

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से एसिड अटैक के मामलों का विवरण

इस रिट याचिका में उठाए गए दूसरे मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विस्तृत जानकारी देने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि राज्यों को एसिड अटैक की घटनाओं का साल-वार डेटा देना होगा। इसमें यह भी बताया जाए कि कितने मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई, कितने मामलों का ट्रायल चल रहा है और कितने मामले अपील के स्तर पर लंबित हैं। कोर्ट ने यह भी कहा था कि हर सर्वाइवर की पूरी जानकारी दी जाए। इसमें उनकी शिक्षा, रोज़गार, वैवाहिक स्थिति, मेडिकल इलाज और इलाज पर राज्य सरकारों द्वारा किए गए खर्च जैसी जानकारी शामिल हो।

साथ ही डेटा में उन सर्वाइवर्स की जानकारी अलग से देने को कहा गया, जिन्हें ज़बरदस्ती एसिड पिलाया गया। हालांकि दो महीने बीत जाने के बाद भी कोर्ट को बताया गया कि ज़्यादातर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। इस पर अदालत ने उन्हें एक और मौका दिया है। कोर्ट ने चिंता जताते हुए यह भी दोहराया कि केंद्र सरकार को ज़रूरी कानूनी संशोधन करने होंगे, ताकि जिन लोगों को ज़बरदस्ती एसिड पिलाया गया है, उन्हें भी ‘दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम’ के तहत शामिल किया जा सके।

इस रिट याचिका में उठाए गए दूसरे मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विस्तृत जानकारी देने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि राज्यों को एसिड अटैक की घटनाओं का साल-वार डेटा देना होगा। इसमें यह भी बताया जाए कि कितने मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई, कितने मामलों का ट्रायल चल रहा है और कितने मामले अपील के स्तर पर लंबित हैं।

एसिड अटैक के बढ़ते मामले

साल 2024 की एक रिपोर्ट भारत में तेजाब हमले का दायरा: पूर्वव्यापी डेटा रिकॉर्ड पर आधारित एक अध्ययन में साल 2017 से 2021 के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021 में एसिड अटैक के 600 लंबित मामलों में से केवल 15 मामलों का ही अदालतों में निपटारा हो पाया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में एसिड अटैक के 703 लंबित मामलों में से केवल 43 मामलों का ही निपटारा हुआ और इनमें से सिर्फ 16 मामलों में दोषसिद्धि हुई। इसी बीच देश में एसिड अटैक के मामलों की संख्या भी बढ़ रही है। एनसीआरबी के अनुसार 2021 में 176, 2022 में 202 और 2023 में 207 मामले दर्ज किए गए। एसिड अटैक किसी इंसान को सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी गहराई से प्रभावित करता है। सरकार के कड़े कानून बनाए जाने के बावजूद भारत में एसिड अभी भी आसानी से उपलब्ध है। कई बार निर्माता और दुकानदार तय किए गए नियमों का पालन नहीं करते। हालात यह हैं कि कागज़ों पर एसिड की बिक्री को नियंत्रित करने के लिए नियम बने हुए हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि कई जगहों पर आज भी बहुत कम कीमत में एसिड खरीदा जा सकता है।  

इन घटनाओं और आंकड़ों से यह साफ होता है कि एसिड अटैक के खिलाफ कानून मौजूद होने के बावजूद सर्वाइवर्स के पुनर्वास, न्याय और सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। केवल सख्त कानून बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि यह भी जरूरी है कि उन्हें ज़मीन पर सही तरीके से लागू किया जाए और सर्वाइवर्स को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त सहायता मिले। साथ ही, कानूनी ढांचे में मौजूद कमियों को दूर करना और ऐसे मामलों को स्पष्ट रूप से शामिल करना भी जरूरी है, जैसे जबरन एसिड पिलाए जाने की घटनाएं। जब तक न्याय व्यवस्था तेज नहीं होगी, पुनर्वास की ठोस योजनाएं नहीं बनेंगी और एसिड की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होगा, तब तक इस समस्या को पूरी तरह से रोकना मुश्किल रहेगा।

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