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एसिड अटैक इस आधुनिक युग का नया अपराध है जिसमें बाहरी शरीर से लेकर रूह तक झुलस जाती है। एसिड का इस्तेमाल किसी के जीवन को तहस-नहस करने के लिए किया जाएगा ऐसा शायद कभी किसी ने सोचा होगा, लेकिन आधुनिकता जब बदलाव लाती है तो उसमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों स्वरूप मौजूद होते है। आपराधिक सोच रखने वाले जब हिंसा के पुराने हथकंडों से उब गए तब नया हथकंडा अपनाया गया, शरीर की खाल को बाहर से मृत बनाकर उसपर रूह की सुंदरता का ढोंग रचाया गया पर सच्चाई तो यही है कि बाहरी सुंदरता आज भी हमारे समाज में महत्व रखती है तभी तो एसिड अटैक के खिलाफ सख्त कानून बनाए जाने के बावजूद इनकी संख्या थमने का नाम नहीं ले रही है।

महिला सशक्तिकरण को लेकर किए जाने वाले दावों के बीच एक बड़ी सच्चाई भी है जिसे हर वक़्त नजरअंदाज किया जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में साल 2014 से साल 2018 के बीच लगभग 700 एसिड अटैक की घटनाएं सामने आई जिसमें दिल्ली में 114, उत्तर प्रदेश में 260, हरियाणा में 46, पश्चिम बंगाल में 248, मध्य प्रदेश में 59, ओडिशा में 52, पंजाब में 50, आंध्र प्रदेश में 47, गुजरात में 37, बिहार में 39 मामले शामिल हैं। हालांकि यह वो आंकड़े है जो सरकारी फाइलों में दर्ज किए गए हैं। जबकि असल में इन घटनाओं की तादाद बहुत ज्यादा है। कुछ मामले दर्ज नहीं होते और कुछ पर दबाव बनाकर या धमकी के माध्यम से रोक दिया जाता है। एसिड अटैक के बढ़ते तादाद को देखते हुए सरकार ने अपराध कानून संसोधन एक्ट 2013 के जरिये भारतीय दंड संहिता में कुछ प्रावधानों को जोड़ा।

आईपीसी की धारा 326A: आईपीसी की धारा 326A के मुताबिक “किसी व्यक्ति ने किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर को नुकसान पहुंचाने के इरादे से अगर एसिड फेंका गया है जिसमें पीड़ित पूरी तरह या आंशिक रूप से जख्मी हुआ है, तो उसके द्वारा किया गया कृत्य गैर-ज़मानती अपराध की श्रेणी में आयेगा। धारा 326A के तहत दोषी को कम से कम 10 साल की सजा और अधिकतम उम्रकैद सहित जुर्माने का प्रावधान है।

आईपीसी की धारा 326B: यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर पर उसे ज़ख्मी करने के उद्देश्य से एसिड फेंकने का प्रयास करता है तो यह कृत्य भी गैर-ज़मानती अपराध की श्रेणी में आता है, जिसके तहत दोषी के लिए कम से कम 5 साल की सजा के साथ जुर्माने का प्रावधान है।

अपराध कानून संसोधन एक्ट 2013 में धारा 357B और धारा 357C को भी जोड़ा गया है, जिसके तहत एसिड अटैक पीड़िता को राज्य सरकार की तरफ से मुआवज़ा प्रदान किया जाएगा। यह मुआवज़ा आईपीसी की धारा 326A के तहत मिलने वाली जुर्माना राशि के अतिरिक्त होगा। इसी के साथ इसमें यह भी प्रावधान रखा गया है कि सरकार को एसिड अटैक पीड़िता को निशुल्क मेडिकल सुविधा भी मुहैया करानी होगी।

कभी किसी लड़की द्वारा शादी का प्रस्ताव ठुकराए जाने पर उस पर एसिड फेंक दिया जाता है तो, कभी किसी पुरानी रंजिश को पाले बैठे लोग मौका देखते ही अपना बदला लेते हैं।

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दुकानों पर एसिड रखने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने कई दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं जिनका पालन करने पर ही एसिड रखने की मंजूरी मिलेगी। एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल ने पीआईएल दायर करते हुए सुप्रीम कोर्ट से एसिड की बिक्री को लेकर कानून बनाने की गुहार लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जारी निर्देश के मुताबिक :

1. एसिड की बिक्री के लिए विक्रेता को खरीददार से जुड़ी सारी जानकारी एक रिकॉर्ड में रखना अनिवार्य है।

2.  विक्रेता को भी एसिड स्टॉक से जुड़ी जानकारी 15 दिनों के अंदर एसडीएम के सामने पेश करनी होगी। स्टॉक की गलत जानकारी या किसी तरह का हेर-फेर पाए जाने पर विक्रेता पर 50 हज़ार तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

3. विक्रेता उसी स्थिति में ही एसिड की बिक्री करेगा जब खरीददार उसके सामने हो। खरीददार को एक फोटो सहित आईडी कार्ड भी दिखाना होगा, जिसमें उसका पता भी लिखा हो। साथ ही एसिड खरीदने का कारण भी बताना अनिवार्य है।

4. विक्रेता किसी नाबालिग को एसिड नहीं बेच सकता, ऐसा करना गैर-कानूनी है।

कोर्ट द्वारा जारी की गई गाइडलाइन के अनुसार स्कूल और कॉलेज की प्रयोगशालाओं में प्रयोग होने वाले एसिड के संबंध में स्कूल/कॉलेज के प्रशासन को एसडीएम को जानकारी देते हुए सभी नियमों का पालन करना होगा।

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एसिड अटैक के मामलों में एक ऐसी घटना भी सामने आ चुकी है जिसमें दोषी को उम्रकैद के बजाय मौत की सजा सुनाई गई थी। यह केस प्रीति नामक लड़की से जुड़ा है। मुंबई के प्रीति एसिड अटैक केस में आरोपी ने पीड़िता पर उस समय एसिड फेंका, जब वह बांद्रा टर्मिनल के प्लेटफॉर्म पर खड़ी थीं। एसिड अटैक के बाद लगभग 30 दिनों तक दर्द से कराहने के बाद प्रीति ने अपनी आंखों की रोशनी खो दी। चेहरा तो बुरी तरह झुलस ही गया था, लेकिन सीना और फेफड़े भी बुरी तरह प्रभावित हुए थे, जिसके कारण प्रीति को सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी। इस भयावह कृत्य को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस अपराध के लिए दोषी को मौत की सजा सुनाई थी।

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कभी किसी लड़की द्वारा शादी का प्रस्ताव ठुकराए जाने पर उस पर एसिड फेंक दिया जाता है तो, कभी किसी पुरानी रंजिश को पाले बैठे लोग मौका देखते ही अपना बदला लेते हैं। जुर्म करने वाले लोगों को कानून का खौफ नहीं क्योंकि बदला लेने की प्रवृति ही इतनी भयावह है कि परिणामों की चिंता नहीं करती। सख्त कानून बनाए जाने और एसिड की बिक्री पर कई तरह की पाबंदी के बावजूद ये घटनाएं आम हो चुकी है क्योंकि इन्हीं के बीच एक ऐसा तंत्र भी मौजूद है जो कहीं न कहीं इस तरह की घटना में मानसिकता के माध्यम से ही सही अपराधी का साथ देता है। एसिड अटैक किसी का जीवन बर्बाद करने के समान है इसलिए ज़रूरत है उन कानून और नियमों पर फिर से गौर करने की।

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तस्वीर साभार : dnaindia

पंजाब केसरी दिल्ली समूह के साथ कार्यरत श्वेता गार्गी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स में ग्रेजुएट है तथा जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकी हैं। घर और समाज में मौजूद विभेद के चलते उनका समावेशी नारीवाद की ओर झुकाव अधिक है। साथ ही उन्हें सामाजिक - आर्थिक - राजनैतिक और लैंगिक समानता से जुड़े विषयों पर लिखना बेहद पसंद है।

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