वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की हालिया रिपोर्ट बताती है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में होने वाले कुल निजी निवेश का लगभग 6 फ़ीसद ही महिलाओं के स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। दुनिया भर में महिलाओं की स्वास्थ्य से संबंधित ज़रूरतें कई स्तरों पर अलग और जटिल होती हैं। इसमें आमतौर पर होने वाली बीमारियों के साथ ही महिलाओं की अलग शारीरिक संरचना से जुड़े जोख़िम भी शामिल हैं। ऐसे में इनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए ख़ासतौर पर देखभाल की ज़रूरत होती है। लेकिन कई सारे रिसर्च में यह सामने आया है कि महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों पर अब भी उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है। न तो महिला स्वास्थ्य के क्षेत्र में ज़रूरी निवेश ही किया जा रहा न ही इनके लिए अलग से रिसर्च को बढ़ावा दिया जा जा रहा है। महिलाओं की सेहत निजी या पारिवारिक मुद्दा नहीं है बल्कि यह सार्वजनिक नीति, निवेश और मानवाधिकार का सवाल भी है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के हालिया आंकड़े
महिलाओं के स्वास्थ्य के क्षेत्र में भेदभाव और ग़ैर बराबरी का असर केवल सेहत तक सीमित नहीं है बल्कि इससे जीवन के दूसरे क्षेत्रों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। खराब सेहत की वजह से दुनिया भर में महिलाओं की ज़िन्दगी से करीब 75 मिलियन यानी 7.5 करोड़ साल कम हो जाते हैं जो वे बेहतर स्वास्थ्य के साथ जी सकती थीं। यह केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की कमज़ोरी को ही नहीं दिखाता बल्कि दुनिया भर में मौजूद लैंगिक ग़ैर बराबरी को भी सामने लाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश कम हो रहा है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि 2020 से 2025 के बीच में स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगभग 2.87 ट्रिलियन डॉलर का रहा। लेकिन इनमें से सिर्फ़ 175 बिलुयन डॉलर महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं पर खर्च हुआ, जो कि कुल राशि का महज़ 6 फ़ीसद था।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि 2020 से 2025 के बीच में स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगभग 2.87 ट्रिलियन डॉलर का रहा। लेकिन इनमें से सिर्फ़ 175 बिलुयन डॉलर महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं पर खर्च हुआ, जो कि कुल राशि का महज़ 6 फ़ीसद था।
इसमें भी जो निवेश महिलाओं के नाम पर किया जाता है उसका ज़्यादातर हिस्सा प्रेग्नेंसी, प्रजनन स्वास्थ्य और मातृत्व देखभाल तक सीमित रहता है। इस तरह से देखा जाए तो महिलाओं को मुख्य रूप से मां बनने वाले शरीर के रूप में देखा जा रहा है। इससे महिलाओं की सेहत संबंधी दूसरी ज़रूरतें और समस्याएं पीछे छूट जा रही हैं। निवेश का कुछ हिस्सा महिलाओं से जुड़ी बीमारियों जैसे ब्रेस्ट कैंसर और ओवेरियन कैंसर पर लगाया गया। लेकिन जब हम महिलाओं की दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं की ओर देखते हैं तो नतीजे हैरान कर देने वाले मिलते हैं।
प्रजनन से आगे भी है महिलाओं का स्वास्थ्य
महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रेग्नेंसी, प्रजनन और मातृत्व तक ऐसे सीमित कर दिया जाता है जैसे मां बनने के अलावा महिला की किसी तरह की सेहत संबंधी ज़रूरतें या समस्याएं ही नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ें में पाया गया कि प्रजनन आयु की 10 से 13 फीसद महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) पाया जाता है। इससे भी ज़्यादा हैरानी की बात यह है की पीसीओएस से ग्रस्त 70 फीसद महिलाओं को इसके बारे में पता ही नहीं होता। पीसीओएस एक ऐसी हार्मोनल गड़बड़ी है जिसमें एंड्रोजन हार्मोन का स्तर सामान्य से ज़्यादा हो जाता है। इसकी वजह से महिलाओं में अनियमित पीरियड्स, चेहरे और शरीर पर बहुत ज़्यादा बाल और एक्ने जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। पीसीओएस की वजह से इन्सुलिन रेजिस्टेंस, टाइप2 डायबिटीज, ओबेसिटी, खराब मेटाबॉलिज्म जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं, जो लंबे समय में स्ट्रेस और डिप्रेशन का जोख़िम बढ़ाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ही एक आंकड़े के अनुसार दुनिया में हर 2 मिनट में एक महिला को प्रेग्नेंसी या बच्चों को जन्म देने से जुड़ी जटिलताओं की वजह से जान गंवानी पड़ती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के ही एक आंकड़े के अनुसार दुनिया में हर 2 मिनट में एक महिला को प्रेग्नेंसी या बच्चों को जन्म देने से जुड़ी जटिलताओं की वजह से जान गंवानी पड़ती है।
इसके अलावा सामान्य तौर पर होने वाली दूसरी बीमारियों जैसे कि हार्ट डिजीज, ऑस्टियोपोरोसिस अल्जाइमर के मामले में रिसर्च करते समय आमतौर पर पुरुषों को ध्यान में रखा जाता है। जबकि यह सारी बीमारियां किसी भी जेंडर के व्यक्ति को हो सकती हैं। यही नहीं हार्ट डिजीज को एक समय तक ‘पुरुषों की बीमारी’ मानी जाती थी जबकि महिलाओं में इससे होने वाली मौत की दर काफ़ी ज़्यादा है। इसका नतीजा यह हुआ कि महिलाओं में इनके लक्षण, जोख़िम और इलाज पर ठीक तरीके से रिसर्च नहीं हुआ जिस वजह से इलाज के दौरान इन्हें सटीक उपचार नहीं मिल पाता है। शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य के मामले में भी महिलाओं की स्थिति बेहतर नहीं है। महिलाओं में स्ट्रेस, तनाव, डिप्रेशन की वजह काफ़ी हद तक संरचनात्मक होती हैं और इन्हें रोका जा सकता है, लेकिन इस पर कोई ख़ास काम नहीं किया गया है। इसी तरह बच्चे जन्म देने के बाद होने वाला पोस्टपार्टम डिप्रेशन महिलाओं में बेहद आम है फिर भी इसके लिए महिला केंद्रित मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहद कमी है।
मेडिकल रिसर्च में महिलाओं की अनदेखी
महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं की एक बड़ी वजह मेडिकल रिसर्च में मौजूद लैंगिक भेदभाव है। लंबे समय तक मेडिकल रिसर्च में पुरुष शरीर को ही मानक माना गया यहां तक कि अब भी दुनिया भर में ज़्यादातर दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल पुरुषों पर होते आ रहे हैं। कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में पाया गया है कि 770 से अधिक बीमारियों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में औसतन 4 साल देर से निदान मिल पाता है। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि एंडोमेट्रियोसिस के मामले में बीमारी का पता चलने में ही औसतन 7 साल तक का समय लग जाता है। इस इस दौरान महिलाओं को लंबे समय तक दर्द, असुविधा और तनाव से गुजरना पड़ता है।
कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में पाया गया है कि 770 से अधिक बीमारियों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में औसतन 4 साल देर से निदान मिल पाता है। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि एंडोमेट्रियोसिस के मामले में बीमारी का पता चलने में ही औसतन 7 साल तक का समय लग जाता है। इस इस दौरान महिलाओं को लंबे समय तक दर्द, असुविधा और तनाव से गुजरना पड़ता है।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की हालिया रिपोर्ट में पाया गया कि क्लिनिकल ट्रायल में सिर्फ़ 5 फीसद मामलों में ही जेंडर के आधार पर अलग-अलग डाटा रिपोर्ट किया जाता है। इसका मतलब यह है कि लगभग 95 फीसद क्लिनिकल ट्रायल में यह पता ही नहीं होता है कि कोई दवा महिलाओं पर किस तरह से असर करेगी या असर करेगी भी या नहीं। इस वजह से महिलाओं में होने वाली बीमारियों का पता भी देर से चल पाता है और पता चलने के बाद सटीक इलाज और दवाईयों की सही खुराक नहीं मिल पाती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि इलाज का असर ठीक तरीके से नहीं होता है। मेडिकल रिसर्च की फील्ड, स्वास्थ्य नीति और निवेश के फ़ैसले लेने वाली जगहों में में महिलाओं की भागीदारी भी सीमित है जिस वजह से उनकी ज़रूरतें अक्सर पीछे रह जाती हैं।
भारत में महिला स्वास्थ्य की स्थिति
भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां कई स्तरों पर मौजूद हैं। पित्तृसत्तात्मक सामाजिक संरचना में महिलाओं को पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं में भी सबसे आख़िर में जगह मिलती है। सीमित संसाधन होने पर पुरुषों की तुलना में महिलाओं के स्वास्थ्य पर कम ध्यान दिया जाता है और उनकी समस्याओं को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-5) के अनुसार देश की लगभग 57 फीसद महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। इसके बावजूद घर में मौजूद संसाधनों पर पहला हक़ परिवार के पुरुष सदस्यों का होता है।
प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की रिपोर्ट में भी यह देखा गया कि आज भी 1 लाख बच्चों के जन्म पर लगभग 97 महिलाओं की मौत हो जाती है, इसके बावजूद इसके लिए कोई ख़ास कदम नहीं उठाए जाते। सोशल कंडीशनिंग की वजह से महिलाएं ख़ुद भी अपने स्वास्थ्य को महत्त्व नहीं दे पाती हैं। क्योंकि उन्हें हमेशा से यही सिखाया गया है कि परिवार के लिए त्याग, समर्पण और सेवा ख़ुद से बढ़कर है, जबकि अपने बारे में सोचना स्वार्थी होना है। इस तरह की ग़लत धारणाओं की वजह से महिलाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं मिल पाती है। पोषण की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सीमित होना, समाज में मौजूद लैंगिक भेदभाव और ग़ैर बराबरी समस्या को और बढ़ाने का काम करती हैं।
महिलाओं के स्वास्थ्य में निवेश केवल सामाजिक समानता का ही सवाल नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद ज़रूरी है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और मैकिन्से हेल्थ इंस्टिट्यूट की साझा रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अगर दुनिया भर में महिलाओं के स्वास्थ्य निवेश में मौजूद अंतर कम होता है तो 2040 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त फ़ायदा हो सकता है। स्वस्थ महिलाएं न सिर्फ़ अपने लिए बल्कि परिवार, समाज, देश और दुनिया के विकास के लिए बेहद ज़रूरी हैं। महिलाओं के स्वास्थ्य में निवेश की कमी केवल तकनीक या आर्थिक समस्या नहीं है बल्कि यह लंबे समय से चली आ रही पितृसत्तात्मक ग़ैर बराबरी का नतीजा है। इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाने की ज़रूरत है। महिलाओं के स्वास्थ्य पर अधिक रिसर्च और निवेश की ज़रूरत है। साथ ही मेडिकल रिसर्च की फील्ड में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए। क्लिनिकल ट्रायल में जेंडर के आधार पर डाटा सेलेक्शन की ज़रूरत है, जिससे महिला केंद्रित स्वास्थ्य को बढ़ावा मिल सके। अगर हम अधिक समावेशी न्यायपूर्ण और बराबरी पर आधारित समाज बनाना चाहते हैं तो महिलाओं के स्वास्थ्य में पॉलिसी, रिसर्च और निवेश तीनों पर बराबर ध्यान देना पड़ेगा।

