आज के दौर में सोशल मीडिया हर एक इंसान की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। हालांकि इंस्टाग्राम, फेसबुक और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स ने मनोरंजन, सूचना, बातचीत और जागरूकता को जगह दी है। इससे हम एक- दूसरे के बारे में आसानी से जान सकते हैं। लेकिन इसके साथ ही कई बार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे ट्रेंड भी उभर कर सामने आते हैं, जो सही नहीं होते या परेशान करने वाले होते हैं। हाल ही में इंस्टाग्राम पर एक ऐसा ही ट्रेंड देखा गया, जिसमें ईव‑टीज़िंग, स्टॉकिंग, मजाक और यौन हिंसा के वीडियो को ‘आओ हम तुमको सिखलाएं, सिविक सेंस होता है क्या ?’ जैसे गाने को बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ एडिट करके वायरल किया गया।
हालांकि इस तरह के वीडियो अक्सर कुछ सिखाने वाले कंटेंट की तरह दिखाए जाते हैं, जैसे कि इससे किसी को नागरिक समझ सिखाई जा रही हो। लेकिन असल में यह हिंसा को मनोरंजन पैकेजिंग में बदल देता है। यानी किसी व्यक्ति के साथ की गई हिंसा को बहुत आम या सामान्य बना देता है, जिससे यह डिजिटल मीडिया का कंटेंट भर नहीं रह जाता है, बल्कि किसी व्यक्ति के लिए सामाजिक और मानसिक तनाव का कारण भी बन सकता है। इससे यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि हमारे समाज में सहमति और लैंगिक संवेदनशीलता की समझ अभी बहुत सीमित है। इसलिए ऐसा कंटेंट दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा, सोशल मीडिया एल्गोरिदम इस तरह के कंटेंट को तेजी से वायरल करता है, जिससे लोग भी ज्यादा व्यूज़ और फॉलोवर्स बढाने के लिए इसकी और ज्यादा आकर्षित होते हैं।
हाल ही में इंस्टाग्राम पर एक ऐसा ही ट्रेंड देखा गया, जिसमें ईव‑टीज़िंग, स्टॉकिंग, मजाक और यौन हिंसा के वीडियो को ‘आओ हम तुमको सिखलाएं, सिविक सेंस होता है क्या ?’ जैसे गाने को बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ एडिट करके वायरल किया गया। इस तरह के वीडियो अक्सर कुछ सिखाने वाले कंटेंट की तरह दिखाए जाते हैं। लेकिन असल में यह हिंसा को मनोरंजन पैकेजिंग में बदल देता है।
जब यौन हिंसा ‘कंटेंट’ बन जाती है: हिंसा की खतरनाक नई पैकेजिंग
आजकल सोशल मीडिया में शॉर्ट-वीडियो प्लेटफॉर्म्स जैसे इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर क्रिएटर्स गंभीर अपराधों को हल्के-फुल्के, मजेदार या एस्थेटिक फॉर्मेट में पेश करते हैं, उदाहरण के लिए सिविक सेंस गाने के साथ बहुत से वीडियो सामने आ रहे हैं। हालांकि यह वीडियो सिविक सेंस से जुड़े हुए तो बिलकुल भी नहीं हैं, क्योंकि इनमें हिंसा को नॉर्मलाइज़ किया जा रहा है। द गार्डियन में छपे एक लेख के मुताबिक, कुछ दिन पहले इंस्टाग्राम पर एक वीडियो देखा गया, जिसमें एक युवती बता रही थी कि छह साल पहले उसके साथ बलात्कार हुआ था। उसके बाद उसने आत्महत्या से मौत के बारे में सोचा, लेकिन फिर उसने अपना जीवन दोबारा जीना शुरू किया। इस वीडियो में ज़्यादातर टिप्पणियां पुरुषों की थीं, जिनमें कुछ इस तरह की बातें थीं, चलो तुम्हें कुछ तो मिला, अरे नहीं उसके साथ बलात्कार हो ही नहीं सकता, उम्मीद है कि तुमने उस समय इतना कुछ नहीं कहा होगा जैसे हज़ारों लाइक्स और कई लड़कों की सहमति वाले कमेंट्स थे, जो बहुत ही परेशान करने वाले थे।
असल में यह यौन हिंसा का मामला है, लेकिन इसे नॉर्मल समझकर ‘फनी’ बना दिया जाता है और ट्रोल किया जाता है, जिससे दर्शक इसे एंटरटेनमेंट समझने लगते हैं, जिसका सीधा असर सर्वाइवर और उन व्यक्तियों पर भी पड़ता है, जो सोशल मिडिया पर ऐसा कंटेंट देखते हैं। डेटा पोर्टल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी साल 2025 में भारत में 491 मिलियन सक्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ता थे। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 18 साल और उससे अधिक उम्र के 444 मिलियन उपयोगकर्ता सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे थे, जो 18 साल और उससे अधिक उम्र की कुल जनसंख्या के 43.1 फीसदी के बराबर था। उस समय, भारत में सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं में से 34.5 फीसदी महिलाएं थीं, जबकि 65.5 फीसदी पुरुष शामिल थे। इससे यह देखा जा सकता है कि एक वीडियो एक साथ कितने लोगों को प्रभावित कर सकती है।
द गार्डियन में छपे एक लेख के मुताबिक, कुछ दिन पहले इंस्टाग्राम पर एक वीडियो देखा गया, जिसमें एक युवती बता रही थी कि छह साल पहले उसके साथ बलात्कार हुआ था। उसके बाद उसने आत्महत्या से मौत के बारे में सोचा, लेकिन फिर भी उसने अपना जीवन दोबारा जीना शुरू किया। इस वीडियो में ज़्यादातर टिप्पणियां पुरुषों की थीं, जिनमें कुछ इस तरह की बातें थीं, चलो तुम्हें कुछ तो मिला, अरे नहीं उसके साथ बलात्कार हो ही नहीं सकता।
ट्रेंड्स के नाम पर यौन हिंसा का मज़ाक और बायस्टैंडर सिंड्रोम का नॉर्मलाइज़ होना
आजकल सोशल मीडिया पर एडिटिंग और बैकग्राउंड म्यूजिक के माध्यम से किसी भी गंभीर घटना को हल्का और मज़ाकिया बनाया जा सकता है, इससे जो घटना असल में हुई होती है, उसे सामान्य मान लिया जता है। द गार्डियन में छपे लेख के मुताबिक, अगर कोई 15 साल की लड़की अपना कोई वीडियो ऑनलाइन पोस्ट करती है, तो कमेंट सेक्शन में उसके बारे में आपत्तिजनक और नफ़रत भरे कमेंट्स भर जाते हैं, चाहे उसके पोस्ट का विषय कुछ भी हो। अगर वह कुछ भी रिवीलिंग पहनती है, या उसकी ब्रेस्ट का अकार बड़ा हो, तो उस पर अभद्र टिप्पणियां की जाती हैं और उसका यौन शोषण किया जाता है। बिना किसी उकसावे के, सैकड़ों कमेंट्स में उसकी कुछ खास विशेषताओं का अपमान किया जाता है और उसकी खूबसूरती को 10 में से रेटिंग दी जाती है। यही नहीं कुछ ऐसे वीडियो भी होते हैं, जिनमें लड़के उनकी नजरों में कथित सुंदरता के ढांचे में फिट न बैठने वाली लड़की को आत्महत्या से मौत की सलाह देते हैं। इससे यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है, कि किस तरह यौन हिंसा को मजाक और नफरत की आड़ में सामन्य बना दिया गया है।
इससे उनकी एजेंसी को भी हानि पहुंचती है और जब इस तरह के वीडियो वायरल होते हैं, तो सर्वाइवर को बार-बार अपनी ट्रॉमा दोहरानी पड़ती है। इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है। यही नहीं आजकल कई सर्वाइवर भी अपने साथ होने वाली घटनाओं की वीडियो को सोशल मीडिया में डालते हैं। ऐसा ही एक वीडियो बेंगलोर में रहने वाली एक सर्वाइवर का भी सामने आया था, जिसमें उन्होंने अपने साथ हुई यौन हिंसा की पूरी वीडियो साझा की, वीडियो में दिखाया गया था कि किस तरह से 10 से 12 साल की उम्र के लड़के साइकिल से जाते हुए, उन्हें गलत तरीके से छु कर चले गए। यह बहुत परेशान करने वाला वीडियो था। इसके साथ ही इस ट्रेंड का एक कारण बायस्टैंडर सिंड्रोम भी है, जिसे सोशल मीडिया ने और भी ज्यादा बढ़ावा दिया है। पहले लोग इस तरह की घटनाओं पर चुप रहते थे। लेकिन अब वे इस तरह के कंटेंट पर लाइक, शेयर और कमेंट करते हैं, लेकिन किसी की मदद नहीं करते, केवल वीडियो रिकॉर्ड करते हैं, ताकि सोशल मीडिया पर डाला जा सके और ट्रोल किया जा सके।
द गार्डियन में छपे लेख के मुताबिक, अगर कोई 15 साल की लड़की अपना कोई वीडियो ऑनलाइन पोस्ट करती है, तो कमेंट सेक्शन में उसके बारे में आपत्तिजनक और नफ़रत भरे कमेंट्स भर जाते हैं, चाहे उसके पोस्ट का विषय कुछ भी हो। अगर वह कुछ भी रिवीलिंग पहनती है, या उसकी ब्रेस्ट का अकार बड़ा हो, तो उस पर अभद्र टिप्पणियां की जाती हैं और उसका यौन शोषण किया जाता है।
एल्गोरिदम, जवाबदेही की कमी और बच्चों के लिए बढ़ते डिजिटल खतरे
एनडीटीवी में छपी खबर के मुताबिक, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विज्ञापन-आधारित मॉडल पर काम करते हैं, जहां एल्गोरिदम अक्सर नैतिक परिणामों की परवाह किए बिना, अधिक जुड़ाव वाली सामग्री को प्राथमिकता देते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों में जवाबदेही की कमी के कारण हिंसा, अश्लीलता, गलत सूचना और साइबर अपराध से संबंधित सामग्री का अनियंत्रित प्रसार हुआ है। एल्गोरिदम संवेदनशील समुदायों को आपत्तिजनक सामग्री के प्रति असमान रूप से उजागर करते हैं। यह बहुत ही चिंताजनक है, क्योंकि बच्चे और किशोर डिजिटल उपभोक्ताओं का एक बड़ा हिस्सा हैं।भारत के एक हालिया मामले के अध्ययन में यह सामने आया है कि व्हाट्सएप चैट ग्रुप का इस्तेमाल बाल पोर्नोग्राफी के वितरण के लिए किया जा रहा था, जिससे मैसेजिंग एप्लिकेशन की एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन नीतियों में एक गंभीर कमी उजागर हुई है।
साउथ फर्स्ट में छपी साल 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक में कोविड के दौरान बढ़े स्क्रीन टाइम और डिजिटल सुरक्षा की कमी के कारण बच्चों को ऑनलाइन गंभीर खतरों पर एक सर्वेक्षण किया गया, इसमें 900 से ज्यादा स्कूली बच्चों, 300 अभिभावकों और 60 शिक्षकों का साक्षात्कार लिया गया, जिन बच्चों ने असुरक्षित या शर्मनाक ऑनलाइन अनुभवों की शिकायत की, उनमें 77 फीसदी मामलों में इंस्टाग्राम सबसे प्रमुख प्लेटफॉर्म रहा। इनमें से 53 फीसदी ने बताया कि अपराधी अजनबी था, 35 फीसदी ने कहा कि वह कोई जान-पहचान का व्यक्ति था, जबकि 12 फीसदी ने दोनों तरह के लोगों की बात कही।इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह थी कि 15-18 साल की उम्र के 16 फीसदी किशोरों ने ऑनलाइन अजनबियों से दोस्ती की थी, और उनमें से 10 फीसदी उन अजनबियों से व्यक्तिगत रूप से मिले थे। इसके अलावा 15 फीसदी किशोरों के लिए यह अनुभव नुकसानदायक रहा।
साउथ फर्स्ट में छपी साल 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक में कोविड के दौरान बढ़े स्क्रीन टाइम और डिजिटल सुरक्षा की कमी के कारण बच्चों को ऑनलाइन गंभीर खतरों पर एक सर्वेक्षण किया गया, इसमें 900 से ज्यादा स्कूली बच्चों, 300 अभिभावकों और 60 शिक्षकों का साक्षात्कार लिया गया, जिन बच्चों ने असुरक्षित या शर्मनाक ऑनलाइन अनुभवों की शिकायत की, उनमें 77 फीसदी मामलों में इंस्टाग्राम सबसे प्रमुख प्लेटफॉर्म रहा।
बदलाव और बचाव के लिए क्या कदम उठए जा सकते हैं?
स्कूलों में वुमन सेफ्टी और सहमति के नाम पर सिर्फ एक दिन का प्रोग्राम और हैशटैग कैंपेन चलते हैं, लेकिन जमीनी तौर पर इसके बारे में कोई बातचीत नहीं होती है।इसलिए सभी के लिए डिजिटल साक्षरता बहुत ज़रूरी है, स्कूली पाठ्यक्रम में इससे जुड़े हुए सुरक्षा मॉड्यूल तैयार किए जाने चाहिए। इसके साथ ही शिक्षकों को इसके बारे में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय गैर सरकारी संगठनों और युवा समूहों को जागरूकता फैलाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके साथ ही स्क्रीन-टाइम मॉनिटरिंग टूल्स को प्रोत्साहित करना, लेकिन साथ ही माता-पिता को यह भी सिखने की ज़रूरत है, कि वे अपने बच्चों से बिना किसी डर या शर्म के कैसे बात करें। इसके साथ ही सर्वाइवर के लिए जिला स्तरीय हेल्पलाइन, प्रशिक्षित सहायता कर्मी और मनोवैज्ञानिक परामर्श मुहैया करवाया जाना चाहिए। ताकि इस तरह की घटनाओं में उन्हें मदद मिल सके।
सोशल मीडिया के इस दौर में यह सवाल और भी जरूरी हो जाता है कि हम किस तरह का डिजिटल समाज बना रहे हैं। एक ऐसा समाज जहां यौन हिंसा और ट्रॉमा को कंटेंट बनाकर देखा जाए, या एक ऐसा समाज जहां संवेदनशीलता, सहमति और सम्मान को प्राथमिकता दी जाए। आज जिस तरह से हिंसा को रील्स, मीम्स और ट्रेंड्स के माध्यम से सामान्य बनाया जा रहा है।वह केवल ऑनलाइन समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक सोच और मूल्यों को भी प्रभावित कर रहा है।यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इसमें केवल कंटेंट क्रिएटर्स ही नहीं, बल्कि दर्शक, प्लेटफॉर्म और पूरी डिजिटल संस्कृति शामिल है। जब हम ऐसे वीडियो को देखते, लाइक करते और शेयर करते हैं, तो हम अनजाने में इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं।इसलिए अब जरूरत केवल आलोचना की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी लेने की है।बदलाव तभी संभव है जब हम दर्शक बनने के बजाय सक्रिय नागरिक बनें।

