इतिहास वेलु नचियार: ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ युद्ध छेड़ने वाली पहली भारतीय रानी| #IndianWomenInHistory

वेलु नचियार: ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ युद्ध छेड़ने वाली पहली भारतीय रानी| #IndianWomenInHistory

वेलु नचियार, जिन्हें भारत की ‘जोन ऑफ आर्क’ भी कहा जाता है, का जन्म साल 1730 में रामनाथपुरम में हुआ था। उनके पिता का नाम चेल्लमुथु सेतुपति और माता का नाम सक्कंधी मुथथल नाचियार था। वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं। राज्य में कोई पुरुष उत्तराधिकारी न होने के कारण उनके पिता ने उन्हें बेटे की तरह पाला और शासन की सभी जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल 1857 से शुरू नहीं होता, बल्कि उससे बहुत पहले ही कई वीर योद्धाओं और वीरांगनाओं ने विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया था। उन्हीं में से एक थीं वेलु नचियार—एक ऐसी साहसी रानी जिन्होंने न सिर्फ अंग्रेज़ों को चुनौती दी, बल्कि उन्हें हराकर अपने राज्य को वापस हासिल किया। वे भारत की पहली ऐसी महिला मानी जाती हैं जिन्होंने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ संगठित युद्ध छेड़ा। उनकी वीरता, नेतृत्व क्षमता और अदम्य साहस ने उन्हें इतिहास में एक विशिष्ट स्थान दिलाया, हालांकि आज भी उनका नाम उतनी प्रसिद्धि नहीं पा सका जितनी वह हकदार हैं। वेलु नचियार, जिन्हें भारत की ‘जोन ऑफ आर्क’ भी कहा जाता है, का जन्म साल 1730 में रामनाथपुरम में हुआ था। उनके पिता का नाम चेल्लमुथु सेतुपति और माता का नाम सक्कंधी मुथथल नाचियार था। वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं। राज्य में कोई पुरुष उत्तराधिकारी न होने के कारण उनके पिता ने उन्हें बेटे की तरह पाला और शासन की सभी जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया।

बचपन से ही उन्हें युद्धकला का प्रशिक्षण दिया गया। वे तलवार चलाने, वलारी और शिलंबम जैसे हथियारों के उपयोग में निपुण थीं। इसके अलावा वे घुड़सवारी और तीरंदाजी में भी माहिर थीं। रानी वेलु नचियार को युद्धकला के साथ-साथ पढ़ाई में भी गहरी रुचि थी। वे तमिल के अलावा फ्रेंच, अंग्रेज़ी, उर्दू, मलयालम और तेलुगु जैसी कई भाषाएं जानती थीं। उन्होंने तमिल साहित्य के कई महत्वपूर्ण ग्रंथों, जैसे पट्टू पट्टू, एटुटोगई, सिलप्पथिकारम, मणिमेगलाई, सिवागा सिंथमणि, कुंडलकेसी और वलयापति का अध्ययन किया था। उस समय शाही परिवार के उत्तराधिकारियों को युद्धकला के साथ-साथ साहित्य और महाकाव्यों का ज्ञान देना एक परंपरा थी, और वेलु नचियार इस परंपरा पर पूरी तरह खरी उतरीं।

उन्होंने तमिल साहित्य के कई महत्वपूर्ण ग्रंथों, जैसे पट्टू पट्टू, एटुटोगई, सिलप्पथिकारम, मणिमेगलाई, सिवागा सिंथमणि, कुंडलकेसी और वलयापति का अध्ययन किया था। उस समय शाही परिवार के उत्तराधिकारियों को युद्धकला के साथ-साथ साहित्य और महाकाव्यों का ज्ञान देना एक परंपरा थी, और वेलु नचियार इस परंपरा पर पूरी तरह खरी उतरीं।

अंग्रेज़ों और नवाबों से टकराव

दक्षिण भारत का मरावा समुदाय अपनी बहादुरी और युद्ध कौशल के लिए प्रसिद्ध था। नायक काल में रामनाद और शिवगंगा इस समुदाय के प्रमुख क्षेत्र थे, जो एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और बाहरी खतरों का सामना मिलकर करते थे। इसी माहौल में वेलु नचियार का विवाह 1746 में शिवगंगा के राजा मुथु वदुगनाथ पेरिया ओदया थेवर से हुआ। वे केवल एक रानी ही नहीं थीं, बल्कि अपने पति की सच्ची सहयोगी और सलाहकार भी थीं। विवाह के बाद वे शिवगंगा में रहने लगीं और राज्य के प्रशासन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगीं। इसी दौरान उनकी एक पुत्री हुई, जिसका नाम वेल्लाची नाचियार रखा गया। उस समय शिवगंगा का राजमहल “गौरी विलासम” के नाम से जाना जाता था, जो सत्ता और मजबूत शासन व्यवस्था का प्रतीक था।

उस समय दक्षिण भारत की राजनीति तेजी से बदल रही थी। ईस्ट इंडिया कंपनी और नवाब आर्कोट जैसे शक्तिशाली शासक स्थानीय राज्यों पर अपना दबाव बढ़ा रहे थे। जब शिवगंगा और रामनाद के शासकों ने नवाब को कर देने से इनकार किया, तो संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई। वर्ष 1772 में अंग्रेज़ों और नवाब की संयुक्त सेना ने शिवगंगा पर हमला कर दिया। इस हमले में वेलु नचियार के पति की मृत्यु हो गई और दुश्मनों ने राज्य पर कब्ज़ा कर लिया। यह केवल सत्ता की लड़ाई नहीं थी, बल्कि इसमें बड़े पैमाने पर हिंसा और लूटपाट भी हुई, जिससे हजारों लोगों को नुकसान उठाना पड़ा। इस कठिन समय में वेलु नचियार को अपनी बेटी के साथ राज्य छोड़ना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने इसे एक नई शुरुआत के रूप में लिया और अपने राज्य को वापस पाने का संकल्प किया।

वर्ष 1772 में अंग्रेज़ों और नवाब की संयुक्त सेना ने शिवगंगा पर हमला कर दिया। इस हमले में वेलु नचियार के पति की मृत्यु हो गई और दुश्मनों ने राज्य पर कब्ज़ा कर लिया। यह केवल सत्ता की लड़ाई नहीं थी, बल्कि इसमें बड़े पैमाने पर हिंसा और लूटपाट भी हुई, जिससे हजारों लोगों को नुकसान उठाना पड़ा।

शिवगंगा पर हमला और निर्वासन

शिवगंगा पर हमले के बाद अंग्रेज़ों और नवाब की सेना ने शहर को लूट लिया और भारी नुकसान पहुंचाया। राज्य पर नवाब का नियंत्रण स्थापित कर दिया गया और शिवगंगा का नाम बदलकर “हुसैन नगर” रख दिया गया। इस कठिन समय में वेलु नचियार अपनी बेटी वेल्लाची नचियार के साथ डिंडीगुल के पास विरुपाक्षी में गोपाल नायक्कर की सुरक्षा में रहने लगीं। उनकी सेना ने अंग्रेज़ों से बदला लेने का संकल्प लिया। इस कठिन दौर में उनके साथ वेल्ला मरुदु और चिन्ना मरुदु जैसे विश्वस्त सहयोगी भी जुड़ गए। इन सभी ने मिलकर यह तय किया कि वे अंग्रेज़ों से अपना राज्य वापस लेकर ही रहेंगे। निर्वासन के समय वेलु नचियार ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी ताकत को दोबारा संगठित करना शुरू किया। उन्होंने हैदर अली से मदद मांगी, जिन्होंने उन्हें सैनिक सहायता और हथियार दिए। इसके बाद वेलु नचियार ने अपनी सेना तैयार करनी शुरू की। उन्होंने युवाओं के साथ-साथ महिलाओं की भी एक अलग सेना बनाई। उस समय यह एक बहुत ही साहसिक और अनोखा कदम था, जिसमें महिलाएँ भी युद्ध का प्रशिक्षण लेती थीं और हथियार चलाना सीखती थीं।

उदयाल का बलिदान और महिला सेना

इसी दौरान एक महत्वपूर्ण घटना हुई। जब वेलु नचियार छिपी हुई थीं, तब एक चरवाहा महिला ने उन्हें देखने के बावजूद अंग्रेज़ों को इसकी जानकारी नहीं दी। इससे नाराज़ होकर अंग्रेज़ों ने उस महिला की हत्या कर दी। उस बहादुर महिला का नाम उदयाल था। उनके बलिदान के सम्मान में वेलु नचियार ने अपनी महिला सेना का नाम “उदयाल महिला सेना” रखा। यह केवल एक सेना नहीं थी, बल्कि महिलाओं के साहस और योगदान का प्रतीक भी थी। वेलु नचियार की सेना में कूयिली नाम की एक वीर सेनापति भी थीं। उन्होंने अंग्रेज़ों के हथियारों के भंडार को नष्ट करने के लिए अपने शरीर पर तेल लगाया और खुद को आग के हवाले कर शस्त्रागार में कूद गईं। यह घटना भारतीय इतिहास में एक अनोखी सैन्य रणनीति के रूप में जानी जाती है, जिसने अंग्रेज़ों की ताकत को बहुत कमजोर कर दिया।

उन्होंने युवाओं के साथ-साथ महिलाओं की भी एक अलग सेना बनाई। उस समय यह एक बहुत ही साहसिक और अनोखा कदम था, जिसमें महिलाएँ भी युद्ध का प्रशिक्षण लेती थीं और हथियार चलाना सीखती थीं।

इसके बाद वेलु नचियार और उनकी सेना ने एक खास योजना बनाई। विजयादशमी के अवसर पर वे मंदिर में प्रवेश कर अंग्रेज़ों पर हमला करने में सफल रहीं। लगभग आठ वर्षों की तैयारी और संघर्ष के बाद, साल 1780 में उन्होंने अंग्रेज़ों को हराकर शिवगंगा पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया। इस तरह वे भारत की पहली महिला शासकों में से एक बनीं, जिन्होंने अंग्रेज़ों को हराकर अपना राज्य वापस प्राप्त किया। सत्ता में लौटने के बाद वेलु नचियार ने राज्य में स्थिरता स्थापित की और जनकल्याण पर ध्यान दिया। उन्होंने अपनी बेटी को उत्तराधिकारी बनाया और शासन में मरुदु भाइयों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपीं। शिवगंगा के पुनर्निर्माण के दौरान मरुदु भाइयों को मंत्री बनाया गया और राज्य के प्रशासन को मजबूत किया गया।

अंतिम वर्ष और पारिवारिक संकट

वेलु नचियार की बेटी वेल्लाची नचियार का विवाह वेंगई पेरिया उदयन राजा से हुआ। उन्होंने 1791 में शासन संभाला और 1792 में उनकी एक बेटी हुई। हालांकि, वेंगई पेरिया उदयन राजा केवल नाम के शासक थे और असली सत्ता मरुदु भाइयों के हाथ में थी। साल 1793 में वेल्लाची नचियार और उनकी नवजात बेटी की मृत्यु हो गई। इस दुखद घटना ने वेलु नचियार को गहरा आघात पहुंचाया और उनके स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा। उन्हें हृदय संबंधी बीमारी हो गई। बाद में वेंगई पेरिया उदयन थेवर ने मुथाथल से विवाह किया, जो वेल्लई मरुदु की बेटी थीं। मरुदु भाई सत्ता पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने किले पर कब्ज़ा कर लिया। इन परिस्थितियों के कारण वेलु नचियार की तबीयत और बिगड़ गई।  

साल 1780 में उन्होंने अंग्रेज़ों को हराकर शिवगंगा पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया। इस तरह वे भारत की पहली महिला शासकों में से एक बनीं, जिन्होंने अंग्रेज़ों को हराकर अपना राज्य वापस प्राप्त किया। सत्ता में लौटने के बाद वेलु नचियार ने राज्य में स्थिरता स्थापित की और जनकल्याण पर ध्यान दिया।

उनका इलाज कराने के लिए जोस-दे-प्रे उन्हें फ्रांस ले गए, जहां उनके दिल का ऑपरेशन सफलतापूर्वक किया गया। फ्रांस में रहते हुए वेलु नचियार ने वहां के राजा की बेटी को एक पारंपरिक हथियार वलारी चलाने का प्रशिक्षण भी दिया। उन्होंने वहां के राजनीतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। लगभग छह महीने बाद वे वापस शिवगंगा लौट आईं। आखिरकार 25 दिसंबर 1796 को वेलु नचियार का निधन हो गया। उनके बारे में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनका जीवन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि एक विचार है, जिसमें प्रतिरोध, रणनीति और स्त्री नेतृत्व का उदाहरण देखने को मिलता है।

इसके बावजूद, वेलु नचियार का नाम मुख्यधारा के इतिहास में अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। इसका कारण इतिहास लेखन का सीमित दृष्टिकोण, क्षेत्रीय असंतुलन और महिलाओं के योगदान की उपेक्षा है। जब हम स्वतंत्रता संग्राम को केवल कुछ घटनाओं तक सीमित कर देते हैं, तो हम उन अनगिनत संघर्षों को भुला देते हैं, जिन्होंने इस देश की आज़ादी की नींव रखी। आज, जब हम महिलाओं के अधिकार, नेतृत्व और समानता की बात करते हैं, तो वेलु नचियार की कहानी और भी प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने यह साबित किया कि महिलाएं केवल संघर्ष का हिस्सा नहीं, बल्कि उसके नेतृत्व की केंद्रबिंदु हो सकती हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि साहस केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने में भी शामिल होता है। वेलु नचियार केवल इतिहास की एक भूली-बिसरी रानी नहीं हैं, बल्कि वे उस परंपरा की प्रतिनिधि हैं जो अन्याय के खिलाफ खड़ी होती है और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती है। अब समय है कि हम उन्हें इतिहास के हाशिये से निकालकर केंद्र में लाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि स्वतंत्रता की कहानी कई आवाज़ों, कई संघर्षों और कई अनसुनी कहानियों से मिलकर बनी है।

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