पीरियड्स को आज भी समाज में एक निजी और ‘छुपाने वाली’ बात के रूप में देखा जाता है, जबकि यह एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है। इसके बावजूद, कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में इससे जुड़ी ज़रूरतों को अक्सर नजरअंदाज़ कर दिया जाता है। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने देश में पीरियड लीव को लेकर एक बार फिर से बहस शुरू कर दी है। दरअसल कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए अनिवार्य पीरियड लीव की मांग करने वाली जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो तर्क दिए, उसने सिर्फ़ नीतियों को नहीं बल्कि समाज की सोच को भी उजागर करने का काम किया।
यहां मुद्दा केवल छुट्टी का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि क्या महिलाओं की जैविक ज़रूरतों को स्वीकार किया जाता है या उसे विशेष सुविधा माना जाता है? यह बहस न सिर्फ़ महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी है बल्कि रोजगार, गरिमा, समानता और न्याय का सवाल भी उठाती है। पीरियड केवल निजी या प्राकृतिक प्रक्रिया ही नहीं है बल्कि बहुत सारी महिलाओं के लिए यह शारीरिक और मानसिक तकलीफ़ का भी मसला है। इसकी अनदेखी महिलाओं के उस छुपे हुए संघर्ष को नज़रअंदाज करना है, जिसका सामना उन्हें हर महीने करना पड़ता है।
प्राइवेट हो या सरकारी सभी क्षेत्रों में हर महिला को पीरियड लीव मिलना चाहिए। यह कोई विशेषाधिकार या रियायत नहीं है बल्कि बेसिक ह्यूमन राइट है। इस दौरान ज़्यादातर महिलाओं को इस दौरान एक से दो दिनों तक अत्यधिक दर्द सहना पड़ता है।
क्या है पूरा मामला?
द न्यू फेमिनिस्ट में छपी एक खबर के मुताबिक, वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की थी। इसके माध्यम से उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को पीरियड लीव को अनिवार्य करने से जुड़ी राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की थी।इसके साथ ही अपनी याचिका में उन्होंने पीरियड से जुड़ी समस्याओं जैसे डिस्मेनोरिया (पीरियड पेन), एंडोमेट्रियोसिस जैसी समस्याओं का हवाला दिया था। साथ ही उन्होंने याचिका में ‘मातृत्व लाभ अधिनियम’1961 को भी ठीक तरीके से लागू करने की मांग की थी।
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने तीसरी बार यह जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने याचिका का निपटारा किया।इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका ख़ारिज करते हुए यह दलील दी कि अगर पीरियड लीव को अनिवार्य बना दिया, तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बचेंगे, जिससे महिलाओं के करियर को ही नुकसान होगा। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि अब तक किसी महिला ने निजी तौर पर कोर्ट के सामने यह मांग नहीं रखी थी।
वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट को पीरियड लीव को अनिवार्य करने से जुड़ी राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की थी।बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने याचिका का निपटारा किया।इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका ख़ारिज करते हुए यह दलील दी कि अगर पीरियड लीव को अनिवार्य बना दिया, तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बचेंगे, जिससे महिलाओं के करियर को ही नुकसान होगा।
अदालत की बैकफायर की दलील: रोजगार बनाम अधिकार
सुप्रीम कोर्ट की यह दलील कि पीरियड लीव को अनिवार्य बना दिया गया तो लोग महिलाओं को नौकरियां देने से बचेंगे, कुछ हद तक हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है। देश में पहले ही कार्य बल में महिलाओं की भागीदारी कम है। निजी क्षेत्र में नियोक्ता ज़्यादातर कर्मचारियों के मामले में जोख़िम नहीं लेना चाहते, बल्कि कम पैसों में ज़्यादा से ज़्यादा काम करवाना चाहते हैं। ऐसे में हर महीने पीरियड लीव अनिवार्य होने से उन्हें महिला कर्मचारियों के मामले में थोड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। निजी क्षेत्र, जहां कंपनी का हित सबसे बढ़कर होता है, वहां व्यावहारिक तौर पर ऐसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या इसका मतलब यह है कि महिलाओं से स्वास्थ्य के अधिकार छीन लिए जाएं, जिससे वे नौकरी के लिए ‘सुविधाजनक’ बन सकें? ज़ाहिर है यह कोई समाधान नहीं है।
पीरियड लीव के बारे में बात करते हुए लखनऊ के प्राइवेट सेक्टर में डाटा एंट्री ऑपरेटर पूजा यादव ने कहा, “ प्राइवेट हो या सरकारी सभी क्षेत्रों में हर महिला को पीरियड लीव मिलना चाहिए। यह कोई विशेषाधिकार या रियायत नहीं है बल्कि बेसिक ह्यूमन राइट है। इस दौरान ज़्यादातर महिलाओं को इस दौरान एक से दो दिनों तक अत्यधिक दर्द सहना पड़ता है। इसके अलावा इस दौरान लीकेज की टेंशन, मूड स्विंग, कॉन्सटिपेशन भी आम है। जहां तक बात है कि इससे नौकरियों में महिलाओं को किनारे कर दिया जाएगा, तो उसके लिए भी नीतियां बनाई जा सकती हैं। आरक्षण की तर्ज़ पर भागीदारी की कोई व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है। क्योंकि दुरुपयोग के डर से क़ानून ही न बनाना कोई समाधान नहीं है।”
मैंने बिहार के शिक्षा विभाग में नौकरी करते हुये माँ को महीने में दो दिन की नेचुरल लीव मिलते देखा था। आज जब मैं सार्वजनिक क्षेत्र में काम कर रहीं हूं और समाज को काफ़ी विकसित माना जा रहा है। आज हम वर्किंग वुमन सहानुभूति नहीं बल्कि समानुभूति की मांग करते हैं।
‘नॉर्मल’ कहकर पीरियड्स के दर्द को कम आंकना
पीरियड्स के दौरान ज़्यादातर महिलाओं को पेट, कमर पैरों में दर्द का एहसास होता है। कुछ महिलाओं में बेचैनी, उल्टी, सर दर्द जैसी समस्याएं भी होती हैं। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के अनुसार, 10 में से 1 महिला को यह दर्द इतना ज़्यादा होता है कि हर महीने पीरियड्स के दौरान एक से तीन दिन तक वह अपना डेली रूटीन भी ठीक से नहीं कर पाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ें में पाया गया कि प्रजनन आयु की 10 से 13 फीसद महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) पाया जाता है, जो कि पीरियड से जुड़ी स्थित है, जिसमें महिलाओं को और भी ज़्यादा समस्याएं झेलनी पड़ती हैं। इन सबके बावजूद पीरियड्स को अक्सर ‘नॉर्मल’ कहकर उसकी समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इस तरह ‘नॉर्मल’ कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से पीछा छुड़ा लिया जाता है और पूरी तरह से महिलाओं को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।
इस बारे में देश के एक प्रतिष्ठित सार्वजनिक बैंक में कार्यरत सुहानी (बदला हुआ नाम) कहती हैं, “मैंने बिहार के शिक्षा विभाग में नौकरी करते हुये माँ को महीने में दो दिन की नेचुरल लीव मिलते देखा था। आज जब मैं सार्वजनिक क्षेत्र में काम कर रहीं हूं और समाज को काफ़ी विकसित माना जा रहा है। आज हम वर्किंग वुमन सहानुभूति नहीं बल्कि समानुभूति की मांग करते हैं। घर और दफ़्तर का हर काम मुस्कुराते हुए सुचारू रूप से चले, इसलिए ज़रूरी है मानसिक और शारीरिक रूप से हम स्वस्थ रहें। पीरियड लीव अनिवार्य होने से कामकाजी महिलाएं न सिर्फ़ अपने को समाज से जुड़ा महसूस करेंगी बल्कि ख़ुद को मानसिक रूप से भी स्वस्थ और तरोताजा भी महसूस करेंगी। ऐसा होने से कार्यालय में उनका प्रदर्शन भी बेहतर होगा।”
पीरियड्स के दौरान सभी महिलाओं को दर्द से गुज़रना पड़ता है, भले ही उसका टाइप और इंटेंसिटी अलग-अलग हो। दिल्ली के स्कूलों में पीरियड लीव की सुविधा नहीं है, जिस वजह से बहुत सारी समस्याएं उठानी पड़ती हैं। हमारा स्कूल तीन मंजिला है और यहां लिफ्ट या एस्केलेटर का कोई इंतज़ाम नहीं है, जहां आम दिनों में ही सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल होता है फिर पीरियड्स के दौरान तो हालत और खराब हो जाती है।
वर्कप्लेस की सच्चाई: पॉलिसी है, पर पहुंच नहीं
साल 1992 में बिहार सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए महीने में 2 दिनों का पीरियड लीव लागू किया था। इसके साथ ही बिहार पीरियड लीव देने वाला देश का पहला राज्य भी बन गया था। इसी तरह हाल के वर्षों में ओडिशा और कर्नाटक की सरकारों ने महिला कर्मचारियों के लिए महीने में एक दिन के पीरियड लीव का प्रावधान किया। जबकि केरल ने उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्राओं के लिए पीरियड लीव की शुरुआत की। पीरियड लीव की मांग केवल सुविधा या स्वास्थ्य से जुड़ा मसला ही नहीं है, बल्कि यह संविधान में मौजूद अवसर की समानता और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार के रूप में भी देखा जा सकता है। कुछ राज्यों में पीरियड लीव की सुविधा होने के बावजूद महिलाएं इसका खुलकर इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं। क्योंकि समस्या सिर्फ़ पॉलिसी में नहीं है बल्कि सामाजिक सोच में भी है। ऐसे में वर्कप्लेस पर पीरियड की वजह से छुट्टी लेने के बारे में महिलाएं अक्सर संकोच कर जाती हैं। उन्हें डर होता है कि इस वजह से जज किया जाएगा या फिर कम प्रोफेशनल समझ जाएगा।
दिल्ली के एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका नूरजहां कहती हैं, “पीरियड्स के दौरान सभी महिलाओं को दर्द से गुज़रना पड़ता है, भले ही उसका टाइप और इंटेंसिटी अलग-अलग हो। दिल्ली के स्कूलों में पीरियड लीव की सुविधा नहीं है, जिस वजह से बहुत सारी समस्याएं उठानी पड़ती हैं। हमारा स्कूल तीन मंजिला है और यहां लिफ्ट या एस्केलेटर का कोई इंतज़ाम नहीं है, जहां आम दिनों में ही सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल होता है फिर पीरियड्स के दौरान तो हालत और खराब हो जाती है। फिर पूरे दिन खड़े रहकर पढ़ाना भी तकलीफ़देह होता है। हम यह दर्द झेल लेते हैं इसका मतलब यह नहीं है कि हमें इसे झेलना ही पड़े। जिस तरह से मैटर्निटी लीव और चाइल्ड केयर लीव मिलती है, उसी तरह पीरियड लीव भी उतनी ही जायज़ मांग है। इसे हर सेक्टर में लागू करना चाहिए। रही बात इसकी कि इससे महिलाओं को नौकरियां मिलने में दिक्कत होगी तो इसके लिए भी नियम क़ायदे बनाए जा सकते हैं।”
हम यह दर्द झेल लेते हैं इसका मतलब यह नहीं है कि हमें इसे झेलना ही पड़े। जिस तरह से मैटर्निटी लीव और चाइल्ड केयर लीव मिलती है, उसी तरह पीरियड लीव भी उतनी ही जायज़ मांग है। इसे हर सेक्टर में लागू करना चाहिए। रही बात इसकी कि इससे महिलाओं को नौकरियां मिलने में दिक्कत होगी तो इसके लिए भी नियम क़ायदे बनाए जा सकते हैं।
इक्विटी बनाम इक्वलिटी: पीरियड लीव की बहस का असली सवाल
पीरियड लीव पर होने वाली बहस अक्सर समानता के सवाल पर अटक जाती है। सुप्रीम कोर्ट का हालिया फ़ैसला हमारे सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या समानता का मतलब है सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करना या सभी को बराबरी से मौका मिलना? जब यह तर्क दिया जाता है कि महिलाओं को पीरियड लीव देना वर्कप्लेस पर बराबरी (इक्वलिटी) के ख़िलाफ़ है। वहां पर इक्विटी का कॉन्सेप्ट समझना ज़रूरी हो जाता है। इक्विटी और इक्वलिटी दोनों का आमतौर पर मतलब बराबरी है, लेकिन इनमें बहुत बड़ा फ़र्क है। इक्वलिटी में सभी को एक बराबर मान लिया जाता है और उसी अनुसार उनके साथ व्यवहार किया जाता है।जबकि इक्विटी मानती है कि समाज में हर इंसान की परिस्थितियां और ज़रूरतें अलग होती हैं इसलिए उन्हें बराबरी पर लाने के लिए कुछ विशेष सुविधाएं दी जानी चाहिए।
इस तरह पीरियड लीव अनिवार्य करना दरअसल बराबरी के लिए ही है। स्पेन, जापान, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में महिलाओं को पीरियड लीव पहले से ही मिल रही है।पीरियड लीव की बहस दरअसल छुट्टी की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो महिलाओं के शरीर को ‘नॉर्मल’ कहकर उनकी तकलीफ़ को अदृश्य बना देती है। जब तक नीतियों के साथ-साथ समाज की मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक बराबरी का दावा अधूरा ही रहेगा। सवाल यह नहीं है कि पीरियड लीव से महिलाओं को नौकरी मिलेगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम एक ऐसा कार्यस्थल बना पा रहे हैं, जहां महिलाएं बिना किसी डर और संकोच के अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे सकें।

