समाजख़बर 70 फीसद गांवों में पानी लाने का काम महिलाओं का: संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट 

70 फीसद गांवों में पानी लाने का काम महिलाओं का: संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट 

जल संकट केवल पानी की कमी नहीं है, बल्कि यह समाज में मौजूद लैंगिक असमानताओं को भी सामने लाता है। आज भी पानी लाने और उसके प्रबंधन का सबसे बड़ा बोझ महिलाओं और लड़कियों पर है, जिसका असर उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर पड़ता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी दुनिया आज एक गंभीर जल संकट का सामना कर रही है, गौरतलब है कि यह संकट सभी के लिए समान नहीं है। महिलाओं पर इसका असर असमान रूप से देखा जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र (यूनेस्को) की हालिया रिपोर्ट वॉटर फॉर ऑल पीपल: इक्वल राइट्स एंड ऑपर्च्युनिटीज़ के मुताबिक, दशकों की प्रगति के बावजूद 21 बिलियन लोगों को अभी भी सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल नहीं मिल पा रहा है, जिसका सबसे अधिक बोझ महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है। महिलाएं और लड़कियां अक्सर अपने घरों के लिए पानी इकट्ठा करने और उसका प्रबंधन करने के लिए जिम्मेदार होती हैं।

जिससे वे शारीरिक तनाव, शिक्षा और आजीविका के नुकसान, स्वास्थ्य जोखिमों और लैंगिक हिंसा के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। खासतौर पर उन जगहों में जहां सेवाएं और सुविधाएं असुरक्षित होती हैं। यूनेस्को के महानिदेशक खालिद अल-एनानी का कहना है कि जल प्रबंधन और शासन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना प्रगति और सतत विकास का एक प्रमुख कारक है। हमें महिलाओं और लड़कियों की जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयासों को और मजबूत करने की ज़रूरत है। यह न केवल एक मूलभूत अधिकार है, बल्कि जब महिलाओं को जल की समान उपलब्धता प्राप्त होती है, तो सभी को लाभ होता है।

संयुक्त राष्ट्र (यूनेस्को) की हालिया रिपोर्ट वॉटर फॉर ऑल पीपल: इक्वल राइट्स एंड ऑपर्च्युनिटीज़ के मुताबिक, दशकों की प्रगति के बावजूद 21 बिलियन लोगों को अभी भी सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल नहीं मिल पा रहा है, जिसका सबसे अधिक बोझ महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है।

पानी लाना: एक ‘काम’ नहीं, एक अदृश्य बोझ

हमारे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के दैनिक घरेलू काम को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।हालांकि ग्रामीण इलाकों में पानी लाना अक्सर एक दैनिक दिनचर्या का हिस्सा माना जाता है, लेकिन यह काम शारीरिक रूप से कठिन और समय लेने वाला होता है। कई किलोमीटर दूर से भारी बर्तन उठाकर पानी लाना महिलाओं की दिनचर्या बन चुका है। लेकिन यह न केवल उनके स्वास्थ्य पर असर डालता है, बल्कि उनके समय और अवसरों को भी सीमित करता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों में जिन ग्रामीण घरों में नल और पानी की सुविधा नहीं है, उनमें से 70 फीसदी से ज्यादा घरों में पानी लाने का काम महिलाएं करती हैं। 

गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर महिलाएं और लड़कियां मिलकर रोज़ाना 250 करोड़ घंटे पानी लाने में व्यतीत करती हैं। जबकि यह समय शिक्षा, मनोरंजन या आय अर्जित करने वाली गतिविधियों में व्यतीत किया जा सकता था।15 साल से कम उम्र की 7 फीसदी लड़कियां पानी लाने का काम करती हैं, जबकि लड़कों में यह संख्या सिर्फ 4 फीसदी है। यानी लड़कियां, लड़कों की तुलना में ज्यादा पानी लाने का काम करती हैं। वे अक्सर अकेली होती हैं और उन पर हमले या अपहरण का खतरा बना रहता है। पानी लाने में लगने वाला समय उनके पढ़ाई के समय को छीन लेता है, जिससे वे बेहतर भविष्य के अवसरों से वंचित रह जाती हैं। जैसे-जैसे वे बड़ी होती हैं, लड़कियों को देखभाल करने का जीवन जीना पड़ता है, जो स्वच्छ और सुरक्षित पानी की कमी के कारण कहीं अधिक कठिन हो जाता है। 

रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों में जिन ग्रामीण घरों में नल और पानी की सुविधा नहीं है, उनमें से 70 फीसदी से ज्यादा घरों में पानी लाने का काम महिलाएं करती हैं। गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर महिलाएं और लड़कियां मिलकर रोज़ाना 250 करोड़ घंटे पानी लाने में व्यतीत करती हैं। जबकि यह समय शिक्षा, मनोरंजन या आय अर्जित करने वाली गतिविधियों में व्यतीत किया जा सकता था।

पानी और पितृसत्ता: संसाधनों पर महिलाओं की सीमित पहुंच

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, जल संकट और जल-मौसम संबंधी आपदाएं मौजूदा लैंगिक असमानताओं को और बढ़ा रही हैं, खासतौर पर जल संकट ग्रस्त और आपदा ग्रस्त क्षेत्रों में। हालांकि लैंगिक भेदभाव आज भी बहुत असर डालता है, इससे यह तय होता है कि कौन ज़्यादा खतरे में होगा और किसे समय पर जानकारी, मदद और रोज़गार के सुरक्षित मौके मिलेंगे। जलवायु संकट इस समस्या को और भी गंभीर बना रहा है, तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से महिला प्रधान परिवारों की आय पुरुष प्रधान परिवारों की तुलना में 34 फीसदी अधिक घट जाती है, साथ ही महिलाओं के साप्ताहिक श्रम घंटे पुरुषों की तुलना में औसतन 55 मिनट बढ़ जाते हैं। यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि स्वास्थ्य, खाना पकाने, स्वच्छता और कृषि के लिए पानी तक पहुंच के मामले में महिलाओं को गंभीर रूप से वंचित रखा गया है, और देश इन मुद्दों को हल करने में बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं।जल अधिकार अक्सर भूमि अधिकारों से जुड़े होते हैं, जिससे कृषि जैसे उत्पादक कार्यों के लिए जल की उपलब्धता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। भूमि स्वामित्व संबंधी कानून और नियम जो महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं, उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित कर देते हैं। कुछ देशों में, पुरुषों के पास महिलाओं की तुलना में दोगुनी से अधिक भूमि का स्वामित्व है। 

साइंस डायरेक्ट की साल 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में, जहां ग्रामीण महिला कामगारों में से 73 फीसदी कृषि क्षेत्र में कार्यरत थीं, वहीं इनमें से केवल लगभग 14 फीसदी महिलाएं ही कृषि भूमि की परिचालन धारक थीं। इससे साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि महिलाएं खेतों में पुरुषों की तुलना में ज़्यादा काम करती हैं, लेकिन आज भी महिलाओं को स्वामित्व का अधिकार नहीं है। यूएन-वॉटर के अध्यक्ष अल्वारो लारियो ने कहा कि, महिलाओं और पुरुषों को मिलकर जल का प्रबंधन करने की आवश्यकता है, क्योंकि यह एक साझा हित है, जिससे पूरे समाज को लाभ होता है। इसके साथ ही जल प्रबंधन और शासन में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का अभाव है, संयुक्त राष्ट्र में छपी  विश्व बैंक की साल 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 गरीब और मध्यम आय वाले देशों की 64 जल सेवाओं के डेटा से पता चला कि हर 5 में से 1 से भी कम कर्मचारी महिलाएं थीं, और उन्हें पुरुषों से कम वेतन मिलता था। जबकि 109 देशों में से 79 देशों में पानी और स्वच्छता (डब्ल्यूएएसएच ) से जुड़ी सरकारी नौकरियों में महिलाओं की संख्या आधे से कम थी, और लगभग एक-चौथाई देशों में यह 10 फीसदी  से भी कम थी। 

जलवायु संकट इस समस्या को और भी गंभीर बना रहा है, तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से महिला प्रधान परिवारों की आय पुरुष प्रधान परिवारों की तुलना में 34 फीसदी अधिक घट जाती है, साथ ही महिलाओं के साप्ताहिक श्रम घंटे पुरुषों की तुलना में औसतन 55 मिनट बढ़ जाते हैं।

 खराब स्वच्छता सुविधाएं और महिलाओं पर इसका प्रभाव 

रिपोर्ट के मुताबिक, खराब स्वच्छता सुविधाओं का सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है, खासकर शहरी झुग्गी-झोपड़ियों और ग्रामीण क्षेत्रों में। शौचालयों और मेन्स्ट्रुअल स्वच्छता के लिए पानी की कमी शर्मिंदगी और अनुपस्थिति का कारण बनती है। एक अध्ययन में शामिल निम्न आय वाले 41 देशों में अनुमानित 1 करोड़ किशोरियों ने साल 2016 से 2022 के बीच शौचालयों की कमी के कारण स्कूल, काम या सामाजिक गतिविधियों में भाग नहीं लिया। वहीं साल 2024 में, जिस साल के आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें 21 बिलियन से अधिक लोगों के पास सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल नहीं था और 34 बिलियन लोगों के पास सुरक्षित रूप से प्रबंधित स्वच्छता की सुविधा नहीं थी। इसके साथ ही 1.7 बिलियन लोगों के पास घर पर बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं नहीं थीं।

वाटरएड नामक चैरिटी संस्था में जन स्वास्थ्य नीति की प्रमुख हेलेन हैमिल्टन ने कहा कि, क्लीनिकों में पानी और स्वच्छता की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण प्रसव के दौरान महिलाओं की अनावश्यक मृत्यु हो रही है, और पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करने पर महिलाओं को लैंगिक हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। यह रिपोर्ट एक घोर अन्याय को उजागर करती है, वैश्विक जल संकट का सबसे भारी बोझ महिलाओं और लड़कियों पर पड़ रहा है। स्वच्छ पानी, अच्छे शौचालय और अच्छी स्वच्छता विलासिता नहीं हैं, ये स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक अवसरों की नींव हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, खराब स्वच्छता सुविधाओं का सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है, खासकर शहरी झुग्गी-झोपड़ियों और ग्रामीण क्षेत्रों में। शौचालयों और मेन्स्ट्रुअल स्वच्छता के लिए पानी की कमी शर्मिंदगी और अनुपस्थिति का कारण बनती है। एक अध्ययन में शामिल निम्न आय वाले 41 देशों में अनुमानित 1 करोड़ किशोरियों ने साल 2016 से 2022 के बीच शौचालयों की कमी के कारण स्कूल, काम या सामाजिक गतिविधियों में भाग नहीं लिया।

जल तक पहुंच और नेतृत्व में लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए कदम 

रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं को जल, भूमि और सेवाओं में बराबरी दिलाने के लिए कानूनी, संस्थागत और वित्तीय बाधाओं को हटाया जाना चाहिए। लिंग-संवेदनशील बजट और जवाबदेही को मजबूत किया जाए, और जल क्षेत्र के वैज्ञानिक और तकनीकी कामों में महिलाओं की भागीदारी, नेतृत्व और क्षमता को बढ़ाया जाना चाहिए।योजना, मूल्य निर्धारण और निवेश के फैसलों में महिलाओं के जल से जुड़े अवैतनिक श्रम की अहमियत को समझना ज़रूरी है।इसके साथ ही जल क्षेत्र के वैज्ञानिक और तकनीकी कामों में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को बढ़ाना, और कम लागत वाले समाधानों से आगे बढ़ना जो असमानता को बढ़ाते हैं। इससे ही लैंगिक असमानता को कम किया जा सकता है और पानी तक पहुंच की एक रणनीति बनाई जा सकती है।जब महिलाओं की समस्याओं को पहचाना जाता है, तो पूरे समुदाय को लाभ मिल सकता है।

जल संकट केवल पानी की कमी नहीं है, बल्कि यह समाज में मौजूद लैंगिक असमानताओं को भी सामने लाता है। आज भी पानी लाने और उसके प्रबंधन का सबसे बड़ा बोझ महिलाओं और लड़कियों पर है, जिसका असर उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर पड़ता है। उनका यह काम अक्सर अनदेखा और अवैतनिक रह जाता है, जिससे वे आगे बढ़ने के कई मौकों से वंचित रह जाती हैं। जब तक महिलाओं को पानी जैसे बुनियादी संसाधनों तक बराबर पहुंच नहीं मिलेगी और उन्हें जल प्रबंधन से जुड़े फैसलों में शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसलिए ज़रूरी है कि नीतियों और योजनाओं में महिलाओं के अनुभव, उनकी ज़रूरतों और उनके काम को केंद्र में रखा जाए। पानी को केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि एक बुनियादी अधिकार के रूप में समझते हुए ही हम एक अधिक समान और न्यायपूर्ण समाज की ओर बढ़ सकते हैं।

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