जब भी हम स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं, तो अक्सर कई वीर पुरुषों के नाम सामने आते हैं।लेकिन कई ऐसी महिलाएं भी रही हैं, जिनका योगदान इतिहास में उतनी प्रमुखता से दर्ज नहीं हो पाया। इन महिलाओं ने न केवल आज़ादी की लड़ाई में भाग लिया, बल्कि अपने साहस और योगदान से समाज में बदलाव लाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं में से एक थीं एस. अंबुजम्मल, जिनका नाम इतिहास के पन्नों में कहीं खो सा गया है।वे एक प्रसिद्ध महिला अधिकार कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं के सशक्तिकरण और शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्होंने न केवल एक आज़ाद और उज्ज्वल भारत की कल्पना की, बल्कि उसे साकार करने के लिए निरंतर प्रयास भी किए, उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। इसके साथ ही उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया और महिलाओं को शिक्षा और आत्मनिर्भरता की ओर प्रेरित किया।यह वह दौर था जब महिलाओं को केवल घर की चारदीवारी के भीतर सीमित करके रखा जाता था।लेकिन अम्बुजम्मल ने अपने साथ – साथ अन्य महिलाओं के अधिकारों के लिए भी आवाज़ उठाई और महिलाओं को जागरूक करने का प्रयास किया, ताकि वह अपने अधकारों के लिए खुद लड़ सकें।
एस. अंबुजम्मल एक प्रसिद्ध महिला अधिकार कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं के सशक्तिकरण और शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। इसके साथ ही उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया और महिलाओं को शिक्षा और आत्मनिर्भरता की ओर प्रेरित किया।
शुरुआती जीवन, शिक्षा और सामाजिक सफर
एस.अंबुजम्मल का जन्म 1899 में हुआ था, उनके पिता का नाम एस. श्रीनिवास अयंगर और माता का नाम रंगनायकी था।अंबुजम्मल की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, हालांकि बाद में उन्होंने स्थानीय स्कूलों में भी पढ़ाई की जहां उन्होंने भाषण और सामाजिक विषयों में गहरी रुचि हुई। उन्होंने हिंदी में भी दक्षता हासिल की थी और कई प्रसिद्ध हिंदी लेखकों की कहानियों का तमिल में अनुवाद किया था। लेकिन उनका झुकाव समाज सेवा की ओर अधिक था। उन्होंने महिला सशक्तिकरण और राष्ट्र की सेवा का मार्ग चुना।हालांकि उनके परिवार के रूढ़िवादी मानसिकता वाले माहौल में उन्हें कमतर समझा गया। यहां तक कि उनकी शादी भी बहुत कम उम्र में हो गई थी, जो कि उस समय एक आम बात थी। हालांकि देसीकाचारी से उनकी तयशुदा शादी सफल नहीं रही। लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और संघर्ष करना नहीं छोड़ा, उन्होंने सामाजिक कार्यों की ओर कदम रखा।
इसके साथ ही अक्सर महिलाओं की शिक्षा उनके अधिकारों और उनके सामाजिक सम्मान के लिए काम करती रहीं।अपने जीवन के आरंभ में ही वे महात्मा गांधी के विचारों, खासतौर पर उनके रचनात्मक सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम से बहुत ज्यादा प्रभावित थीं। सिस्टर सुब्बुलक्ष्मी , डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी औरमार्गरेट कजिन्स के संपर्क में आने से उनकी यह रुचि और भी प्रबल हुई। उन्होंने अध्यापन की योग्यता प्राप्त की और शारदा बालिका विद्यालय में अंशकालिक रूप से पढ़ाया। वे साल 1929 से 1936 तक शारदा महिला संघ की समिति सदस्य रहीं। इसके साथ ही उन्होंने सिस्टर सुब्बुलक्ष्मी के साथ मिलकर काम किया। साल 1929 में उन्हें मद्रास स्थित महिला स्वदेशी लीग का कोषाध्यक्ष बनाया गया। यह लीग कांग्रेस से जुड़ी एक गैर-राजनीतिक इकाई थी, जो गांधी जी के सामाजिक और आर्थिक कार्यक्रमों को लागू करती थी।
उन्होंने अध्यापन की योग्यता प्राप्त की और शारदा बालिका विद्यालय में अंशकालिक रूप से पढ़ाया। वे साल 1929 से 1936 तक शारदा महिला संघ की समिति सदस्य रहीं। इसके साथ ही उन्होंने सिस्टर सुब्बुलक्ष्मी के साथ मिलकर काम किया। साल 1929 में उन्हें मद्रास स्थित महिला स्वदेशी लीग का कोषाध्यक्ष बनाया गया।
अंबुजम्मल के जीवन में गांधी का प्रभाव
अंबुजम्मल के जीवन में महात्मा गांधी का बहुत प्रभाव देखने को मिलता है। उनका राजनीतिक जीवन में प्रवेश 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान हुआ। इसके साथ ही उन्होंने सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन में कई बार भाग लिया, उन्होंने न केवल नमक सत्याग्रह में भाग लिया, बल्कि कई युवा और मध्यम आयु वर्ग की महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित भी किया। उन्होंने अपने सभी गहने महात्मा गांधी के सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को दान कर दिए। इसके साथ ही उन्होंने रेशमी वस्त्र पहनना बंद कर दिया और केवल खादी की साड़ियां ही धारण करने लगीं। इस प्रकार उन्हें विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की वकालत करने का नैतिक अधिकार प्राप्त हो गया।
इस उद्देश्य के प्रचार के लिए उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा। साल 1932 में उन्हें कांग्रेस की ‘तीसरी तानाशाह’ के रूप में सराहा गया और उन्होंने सत्याग्रहियों का नेतृत्व करते हुए विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया। इसके साथ ही वह साल 1934 से 1938 तक दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की प्रबंध समिति की सदस्य रहीं और हिंदी के प्रचार में अहम भूमिका निभाती रहीं। इसी काम के तहत उन्होंने साल 1934 में बंबई में हुए कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लिया, और नवंबर 1934 से जनवरी 1935 तक वह गांधी जी के साथ वर्धा आश्रम में भी रहीं। बाद में साल 1936 से मायलापुर लेडीज क्लब की सचिव रहते हुए उन्होंने हिंदी की कक्षाएं भी संचालित की।
उन्होंने रेशमी वस्त्र पहनना बंद कर दिया और केवल खादी की साड़ियां ही धारण करने लगीं। इस प्रकार उन्हें विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की वकालत करने का नैतिक अधिकार प्राप्त हो गया।इस उद्देश्य के प्रचार के लिए उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा। साल 1932 में उन्हें कांग्रेस की ‘तीसरी तानाशाह’ के रूप में सराहा गया और उन्होंने सत्याग्रहियों का नेतृत्व करते हुए विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया।
महिला सशक्तिकरण में अंबुजम्मल का योगदान और पुरस्कार
अंबुजम्मल महिला सशक्तिकरण की एक मजबूत आवाज होने के साथ-साथ भारतीय महिला संघ ( डब्ल्यूआईए) की महत्वपूर्ण सदस्य थीं, उन्होंने इस संगठन में सचिव और कोषाध्यक्ष के रूप में कार्य किया इसलिए लोग उन पर भरोसा करते थे। हालांकि उस समय भारत में बाल विवाह होना एक आम बात थी, जिसमें छोटी उम्र में ही लड़कियों की शादी कर दी जाती थी। उनका भी बाल विवाह हुआ था, इसलिए वह इससे होने वाले परिणामों से बेहतर तरीके से परिचित थीं। उन्होंने भारत में फैली ऐसी कई कुप्रथाओं जैसे बहु विवाह (एक से ज्यादा शादी), देवदासी प्रथा के खिलाफ कार्य किया और उनको खत्म करने का प्रयास किया।
इस दौरान डब्ल्यूआईए की ओर से उन्हें मद्रास निगम के लिए मनोनीत किया गया था, जो यह दिखाता है कि उनके काम को सरकार और समाज दोनों ने सराहा। साल 1947 में मद्रास में आयोजित अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में वे स्वागत समिति की अध्यक्ष बनीं। इस सम्मेलन के माध्यम से उन्होंने देशभर की महिलाओं को एक साथ लाने और उनकी समस्याओं को सामने रखने में मदद की। इसके साथ ही वह 1948 से श्रीनिवास गांधी निलयम की अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष रहीं, जिसे उन्होंने खुद शुरू किया था। यह संस्थान गरीब लड़कियों को मुफ्त शिक्षा देता था और इसमें एक मुफ्त औषधालय था और साथ ही अपने प्रिंटिंग प्रेस में महिलाओं को प्रशिक्षण और रोजगार भी प्रदान किया जाता था। इस तरह अंबुजम्मल ने समाज, कानून और राजनीति तीनों स्तरों पर काम करके महिलाओं को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह हिंदी और तमिल की विद्वान थीं। उन्होंने गांधी जी पर तमिल में तीन पुस्तकें लिखी हैं।
इसके साथ ही साल 1964 में उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह ताउम्र सामाजिक कार्यों में योगदान देती रहीं, साल 1983 में उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि आज वो जीवित नहीं हैं, लेकिन अपने संघर्षों और योगदान के लिए वो हमेशा याद की जाती रहेंगी। आज जब हम महिला सशक्तिकरण और समानता की बात करते हैं, तो यह याद रखना ज़रूरी है कि इसकी नींव उन महिलाओं ने रखी थी, जिनके संघर्ष को इतिहास में अक्सर भुला दिया गया। एस. अंबुजम्मल उन्हीं अनदेखी नायिकाओं में से एक थीं, जिन्होंने न केवल आज़ादी की लड़ाई में योगदान दिया, बल्कि समाज में महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा के लिए भी निरंतर काम किया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि बदलाव केवल बड़े मंचों पर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सामाजिक प्रयासों से भी लाया जा सकता है।

