आंध्र प्रदेश के तटीय इलाके में, प्रकाशम जिले का करमचेडु गाँव बड़ा और समृद्ध था। गाँव में खेतों की भरमार थी। खासकर कपास और तंबाकू के और यह समृद्धि लोगों के घरों, सड़कों और वाहनों में साफ दिखती थी। गाँव के लोग अपने पक्के घरों, टीवी एंटीना और ट्रैक्टर-मोटरसाइकिल से खुश थे। लेकिन, इसी समृद्धि के पीछे सामाजिक असमानता गहरी जड़ें जमाए बैठी थी। 17 जुलाई साल 1985 को हुआ करमचेडु नरसंहार में हालांकि पुलिस और मीडिया का एक हिस्सा तथ्यों और सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर इसे सिर्फ एक दंगा बता रहा था। लेकिन, असल में जो हुआ वह एकतरफा नरसंहार था, जहां निर्दोष और हथियारहीन दलितों पर सवर्ण कम्मा जाति के जमींदारों ने क्रूर हमला किया। इस दिन कथित ऊंची कम्मा जाति के लोगों ने दलित समुदाय पर संगठित हमला किया।
इस हमले में कई लोग मारे गए, घर जला दिए गए और लोगों को डर और अशांति के माहौल में धकेल दिया गया। यह घटना उस सामाजिक असमानता और अन्याय की सच्चाई को उजागर करती है, जो आर्थिक प्रगति के बावजूद गहरी जड़ें जमाए हुए थी। करमचेडु नरसंहार केवल हिंसा की घटना नहीं थी, बल्कि यह दलितों के अधिकारों और गरिमा के संघर्ष का प्रतीक बन गया। अमूमन संसाधनों जैसे पानी, खेत, शिक्षा या चिकित्सकीय सुविधा तक पहुंच का अधिकार जातिगत असमानता का हिस्सा रहे हैं। महज आर्थिक समृद्धि या आधुनिक घर और गाड़ियां ही किसी समाज की पूरी तस्वीर नहीं बताते। सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इस हत्याकांड और हिंसा के विवरण विभिन्न तथ्य जांच समितियों और मीडिया रिपोर्टों में विस्तार से दर्ज है। इस नरसंहार में कुल 6 दलित मारे गए, 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना हुई और कई गंभीर रूप से घायल हुए।
करमचेडु नरसंहार की घटना
करमचेडु गाँव में सवर्ण कम्मा जाति जो आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त थे, उनका वर्चस्व था। वहीं दलित गाँववाले, जो अधिकतर कम्मा जमींदारों के खेतों में मजदूरी करके भी बेहद कम मजदूरी पाते थे, सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित थे। 16 जुलाई साल 1985 को करमचेडु गाँव में एक मामूली विवाद ने बेहद खतरनाक रूप ले लिया। उस दिन एक कम्मा लड़का अपने भैंस को उस पानी के टैंक के पास धो रहा था, जहां दलित समुदाय अपना पीने का पानी लेते थे। भैंस धोने की प्रक्रिया में वह गंदा पानी टैंक में चला गया। जब इसे रोकने के लिए एक मदिगा लड़के ने घटना का विरोध किया, तो कम्मा जाति के मौजूदा वर्चस्व के कारण उस लड़के ने इसे एक सामाजिक विरोध के तौर पर लिया, और उस किसान को अपनी भैंस की चाबुक से पीटना शुरू कर दिया। इसी बीच, पानी लेने आई एक मदिगा महिला ने भी इस मारपीट का विरोध किया। लेकिन, घटना में उस महिला के साथ भी शरीरिक हिंसा की गई।
हालांकि ये लड़ाई थोड़ी देर चली लेकिन आखिरकार वह लड़का दलित गाँव वालों को चेतावनी देकर वहां से चला गया। इस छोटी दिखने वाली घटना ने कम्माओं के न सिर्फ सामाजिक बल्कि राजनीतिक सत्ता को चुनौती दी। ऐसे में उन्होंने मदिगाओं को ‘सबक सिखाने’ के लिए एक संगठित हमला करने की योजना बनाई और 17 जुलाई की सुबह कम्मा जाति के हजारों लोग हथियारों से लैस होकर मदिगा बस्ती पर अचानक हमला कर दिया। विभिन रिपोर्ट बताती है कि पूरे मोहल्ले को तबाह कर दिया गया था। गर्भवती महिलाएं और छोटे बच्चों की माँओं को भी नहीं बख्शा गया। उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर के. श्रीनिवासुलु अपनी किताब ‘आंध्र प्रदेश भारत में जाति, वर्ग और सामाजिक अभिव्यक्ति’ में बताते हैं कि यह हमला अच्छी तरह से योजना बनाकर किया और घंटों तक चलाया गया। मदिगाओं को उम्र और जेंडर की परवाह किए बिना उनके घरों से भगाया गया। कम्माओं ने स्कूटर, ट्रैक्टर और अन्य साधनों का इस्तेमाल किया। वहीं मदिगा अपनी जान बचाने के लिए खेतों में बने गद्दी वामुलु (चराई के ढेरों) में छिपने लगे। लेकिन, दुर्भाग्य से वहां भी उन्हें नहीं छोड़ा गया।
इस हत्याकांड और हिंसा के विवरण विभिन्न तथ्य जांच समितियों और मीडिया रिपोर्टों में विस्तार से दर्ज है। इस नरसंहार में कुल 6 दलित मारे गए, 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना हुई और कई गंभीर रूप से घायल हुए। असल में यह घटना केवल हिंसा नहीं थी; यह जातिवाद और शक्ति के असंतुलन का भयानक प्रमाण थी, जिसने पूरे देश में दलित अधिकारों की लड़ाई को और तेज कर दिया। करमचेडु नरसंहार सिर्फ हिंसा की कहानी नहीं है। यह उस सामाजिक असमानता, भय और शक्ति के असंतुलन की कहानी है जो हमारे गाँवों और शहरों में आज भी महसूस की जा सकती है। यह हमें याद दिलाता है कि सशक्त होना और आवाज उठाना, चाहे कितना भी छोटा संघर्ष क्यों न लगे, कभी-कभी बड़े बदलाव की शुरुआत बन जाता है। इस हिंसा के 23 साल बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना के लिए अंतिम फैसला सुनाया, जिसमें एक व्यक्ति को उम्रकैद की सजा दी गई और 30 अन्य लोगों को तीन-तीन साल की जेल की सजा मिली। करमचेडु नरसंहार बताती है कि आज भी भारतीय समाज में जातिगत असमानता और हिंसक प्रवृत्तियां मौजूद हैं। इस घटना ने राज्य के दलित कार्यकर्ताओं में व्यापक आक्रोश पैदा किया और नतीजन आंध्र प्रदेश दलित महासभा का गठन हुआ।
यह संगठन डॉ. भीमराव आंबेडकर के आदर्शों से प्रेरित था, और दलितों के अधिकारों के लिए और सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ लड़ाई लड़ता रहा। आंध्र प्रदेश नागरिक स्वतंत्रता समिति का करमचेडु नरसंहार पर जारी किए गए एक रिपोर्ट अनुसार यह हत्याकांड पहले से निर्धारित, जानबूझकर और बर्बर था, जिसे निर्दिष्ट उद्देश्य के साथ अंजाम दिया गया ताकि भूमिहीन मजदूरों को भयभीत करके उनकी अधीनता में ला दिया जा सके। रिपोर्ट बताती है कि हालांकि इस घटना का तात्कालिक कारण 16 तारीख़ की शाम के हालात थे, लेकिन यह मान लेना गलत होगा कि केवल यही छोटा सा घटनाक्रम इस अमानवीय नरसंहार को उत्पन्न करने का कारण था। इस क्रूर हमले की वजह मुख्य रूप से असमान भूमि संबंध था, जिन्हें पुराने और शोषक जाति नियमों से बने पूर्वाग्रह और मजबूत कर रहे थे।
इस हिंसा के 23 साल बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना के लिए अंतिम फैसला सुनाया, जिसमें एक व्यक्ति को उम्रकैद की सजा दी गई और 30 अन्य लोगों को तीन-तीन साल की जेल की सजा मिली। करमचेडु नरसंहार ने यह उजागर किया कि आज भी भारतीय समाज में जातिगत असमानता और हिंसक प्रवृत्तियां मौजूद हैं।
भारत में दलितों के खिलाफ हिंसा
भारत में दलितों के खिलाफ हिंसा एक रोज़मर्रा की सामाजिक सच्चाई है। जातिगत हिंसा कोई नई बात नहीं है। यह उतनी ही पुरानी है जितनी खुद जाति व्यवस्था। देश में दलितों के साथ अत्याचार, अपमान, भेदभाव और शोषण लंबे समय से हो रहे हैं। इतिहास में जाएं तो किल्वेनमनी, करमचेड़ु, त्सुंदूर, बेलची, खैरलांजी जैसे कई जगह दलितों पर हुए अत्याचारों के कारण जाने जाते हैं। ये घटनाएं विभिन्न जगहों पर हुई अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह दिखाती हैं कि समाज में ऊंची जातियों का वर्चस्व दलितों पर किस तरह बना हुआ है। चाहे गांव हो या शहर, विश्वविद्यालय हो या दफ्तर, मंदिर हो या सड़क, कहीं भी आज भी दलित, बहुजन और आदिवासी समुदाय के लोगों की बराबरी और उनकी पहचान को आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता। जब भी दलित समुदाय अपने अधिकारों और सम्मान के लिए खड़े होते हैं, तो अक्सर उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है।
इतिहास में खासकर साल 1980 के बाद कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिन्होंने दलित आंदोलन और राजनीति को नया रूप दिया। दलितों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं देशभर में दर्ज होती रही हैं और यह समस्या लगातार बनी हुई है। सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि दलितों के खिलाफ अपराध बड़ी संख्या में होते हैं। हर दिन मारपीट, हत्या, बलात्कार या घर जलाने जैसी घटनाएं सामने आती हैं। निराश करने वाली बात ये है कि कई मामले दर्ज भी नहीं हो पाते। हालांकि, अमूमन ऊंची जातियों की जाने वाली जातिगत हिंसा कई बार संगठित और योजना के साथ होती है। इसमें केवल व्यक्तियों को नहीं, बल्कि पूरे समुदाय को निशाना बनाया जाता है ताकि समुदायीक रूप से कथित निम्न जाति आगे न बढ़ सके।
अक्सर इस कोशिश में घर जलाए जाते हैं, आजीविका छीन ली जाती है और महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा का सहारा लिया जाता है। अपनी किताब ‘द अनटचेबल्स: हू वर दे एंड व्हाई दे बिकेम अनटचेबल्स?’ में डॉ. बी.आर. अंबेडकर उन ऐतिहासिक और सामाजिक कारकों की पड़ताल करते हैं जिनके कारण भारत में कथित ‘अछूत’ वर्ग का उदय हुआ। उनका तर्क है कि इनका उदय योजना के साथ की गई भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के कारण हुआ, जिसकी जड़ें प्राचीन भारतीय समाज में विकसित हुई कठोर जाति-व्यवस्था में मौजूद थीं। अंबेडकर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कथित तौर पर अछूत जन्म से हीन नहीं थे; बल्कि उन्हें सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों और जाति-आधारित पहचान थोपे जाने के कारण हाशिए पर धकेल दिया गया था, जिसने उन्हें मुख्यधारा के समाज से अलग-थलग कर दिया। यह तर्क हाशिये के समुदायों की दुर्दशा और देश में जातिगत भेदभाव के ऐतिहासिक संदर्भ को समझने के लिए बेहद जरूरी है।
हिंसा का सामाजिक संदर्भ और सत्ता से संबंध
हिंसा को समझने के लिए उसे सामाजिक संदर्भ और सत्ता संबंधों के भीतर देखना ज़रूरी है। जातिगत हिंसा; संरचनात्मक हिंसा का एक रूप है। इसमें अमूमन सत्ताधारी या प्रभावशाली वर्ग का जाति के नाम पर कमजोर और वंचित लोगों के खिलाफ भेदभाव, अपमान और शोषण शामिल होता है। यह हिंसा शारीरिक और मानसिक दोनों हो सकती है। लेकिन, यह एक राजनीतिक टूल है, जिसका इस्तेमाल आज तक हाशिये पर रहे लोगों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए किया जाता है। आंध्र प्रदेश में दलित आंदोलन के लिए करमचेड़ु नरसंहार बहुत महत्वपूर्ण घटना थी।
इस घटना के बाद एक नया दलित आंदोलन शुरू हुआ, जो जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ रहा था। इसी समय दलित महासभा बनी, जो लोगों की आज़ादी और बराबरी के लिए काम करती थी। डॉ. आंबेडकर इस आंदोलन के मुख्य प्रेरणा स्रोत बने। यह घटना हमें जाति, वर्ग और दलित विचारधारा को समझने में मदद करती है। करमचेडु नरसंहार यह दिखाता है कि आर्थिक प्रगति के बावजूद समाज में गहरी जातिगत असमानता और हिंसा आज भी मौजूद है। यह घटना दलित अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष की अहम कड़ी बनी। साथ ही, यह हमें बराबरी और सम्मान के लिए लगातार आवाज उठाने की ज़रूरत की याद दिलाती है।

