संस्कृतिकिताबें मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ उपन्यास: कबूतरा आदिवासी महिलाओं के शोषण और प्रतिरोध की कहानी

मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ उपन्यास: कबूतरा आदिवासी महिलाओं के शोषण और प्रतिरोध की कहानी

मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ उपन्यास, बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश) के कबूतरा आदिवासी समुदाय की तीन पीढ़ियों की महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखा गया है। इसमें लेखिका ने तीन अलग-अलग समय के सत्ता और राजनीतिक परिवर्तन के बीच मौजूद जाति, वर्ग और जेंडर की गहरी और जटिल सामाजिक असमानताओं को सामने लाने की कोशिश की है।

मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ उपन्यास बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश) के कबूतरा आदिवासी समुदाय की तीन पीढ़ियों की महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखा गया है। इसमें लेखिका ने तीन अलग-अलग समय के सत्ता और राजनीतिक परिवर्तन के बीच मौजूद जाति, वर्ग और जेंडर की गहरी और जटिल सामाजिक असमानताओं को सामने लाने की कोशिश की है। लेखिका ने कहानी में साल 1857 के झांसी की रानी के विद्रोह से लेकर ब्रिटिश भारत के साल 1871 के क्रिमिनल ट्राइब ऐक्ट और आजाद भारत यानी पंडित नेहरू के राजनीतिक परिवेश तक कबूतरा समुदाय के सत्ता और राजनीति समीकरण के बीच जटिल जीवन संघर्ष को बखूबी लिखा है। उन्होंने अपने लेखन में भूरी, कदमबाई और अल्मा जैसी तीन मजबूत महिलाओं के माध्यम से इस समुदाय के साथ लंबे समय से हो रहे जातिगत, लैंगिक और सामाजिक शोषण की सच्चाई को सामने रखा है।इन महिलाओं के माध्यम से लेखिका दिखाती हैं कि कैसे बुंदेलखंड के इस समुदाय की महिलाएं शारीरिक शोषण, सामाजिक बहिष्कार और यौन हिंसा के चक्र में फंसी रहती हैं, और उसी के भीतर प्रतिरोध की ताकत भी पैदा करती हैं। 

मैत्रेयी पुष्पा के बारे में अगर सरल शब्दों में बात की जाए तो, वह हिन्दी की एक जानी-मानी लेखिका हैं, उन्होंने 14 से अधिक किताबें लिखी हैं, जो खासतौर पर महिलाओं को केंद्र में रखकर नारीवादी नजरिए से लिखी गई हैं। उनका जन्म 30 नवम्बर, 1944 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ ज़ि‍ले के सिकुर्रा गाँव में हुआ था, उन्होंने अपना शुरुआती जीवन झांसी के खिल्ली गाँव में रह कर बिताया और यहीं अपनी तालीम भी हासिल की। उन्होंने अपने एम.ए. (हिन्दी साहित्य) की पढ़ाई भी बुंदेलखंड कॉलेज झांसी से पूरी की। इसके साथ ही उन्होंने बुंदेलखंड की कबूतरा आदिवासी समुदाय की महिलाओं के जीवन संघर्ष को बहुत करीब से देखा और बहुत गहराई से उनके बारे में लिखा। उनके लेखन में नारीवादी दृष्टिकोण साफ दिखाई देता है, क्योंकि उनके उपन्यास के मुख्य किरदारों की महिलाएं अपने साथ कथित सभ्य समाज के लोगों के किए जाने वाले शारीरिक और यौन शोषण को चुपचाप सहती हुई नहीं, बल्कि कभी अपने स्त्री हठ तो कभी अपने स्वाभिमान के लिए मजबूती से प्रतिरोध करते हुए दिखाई देती हैं। 

मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ उपन्यास, बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश) के कबूतरा आदिवासी समुदाय की तीन पीढ़ियों की महिलाओं को केंद्र में रखकर लिखा गया है। इसमें लेखिका ने तीन अलग-अलग समय के सत्ता और राजनीतिक परिवर्तन के बीच मौजूद जाति, वर्ग और जेंडर की गहरी और जटिल सामाजिक असमानताओं को सामने लाने की कोशिश की है।

रानी पद्मिनी की विरासत से लेकर क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट तक का संघर्ष

मैत्रेयी पुष्पा, कबूतरा आदिवासी समुदाय के ऐतिहासिक योगदान और उत्पत्ति को कज्जा (कथित सभ्य समाज) की दृष्टि से नहीं, बल्कि कुनबी लोग यानी कबूतरा समुदाय की दृष्टि से लिखती हैं। कबूतरा समुदाय अपनी उत्पत्ति रानी पद्मिनी से जोड़ता है, जिन्होंने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के चलते जौहर नहीं किया, बल्कि अपनी रानी राक्काशाओं और सैनिको के साथ जंगल की तरफ सुल्तान से बच कर भाग निकली थी। खुद को और अपने लोगों को जीवित रखने के लिए, उन्होंने अपने सैनिकों और सेविकाओं को आदेश दिया कि पीछा करती हुई, सुल्तान की सैनिक टुकड़ियों से छापामारी तरीके से लड़ाई करो, चलाकी से सुल्तान की सेना की राशद लूट लो, महिलाओं से कहा कि सुल्तान के सैनिकों को रिझा कर मौका पाते ही मार दो और हथियार लूट लो। इस तरह कबूतरा समुदाय अपने जीवन संघर्ष को रानी पद्मिनी से जोड़ता हुआ जीता रहा है।अपने इस जुझारू छापामार युद्ध कौशल और मजबूत हुनर के बल पर उन्होंने साल 1857 की क्रांति में झांसी की रानी के साथ मिलकर ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। रानी की मौत और क्रांति के असफल होने के बाद वे अंग्रेजों से बचने के लिए बुंदेलखंड के बीहड़ों में इधर-उधर बिखर गए, वहां उनका जीवन संघर्ष भरा रहा, जैसे रानी पद्मिनी ने सुल्तान से बचने के लिए कठिन हालात में जीवन बिताया था।

जिंदा रहने और पेट भरने के लिए कबूतरा समुदाय के पुरुष चोरी और लूटमार करने लगे। जबकि महिलाएं कच्ची शराब बनाती थीं। उनके इन कामों के कारण उन्हें साल 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत ‘अपराधी जनजाति’, यानी जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज़ादी के बाद और क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के खत्म होने के बावजूद, कबूतरा आदिवासी समुदाय के खिलाफ सामाजिक पूर्वाग्रह बने रहे। कथित ‘सभ्य’ समाज से लेकर प्रशासन,चाहे पुलिस हो या नेता सभी ने समय-समय पर उनका शोषण किया और उन्हें संसाधनों से लेकर शिक्षा तक लंबे समय तक वंचित रखा। इसके चलते सबसे ज़्यादा शारीरिक और यौन शोषण का सामना कबूतरी महिलाओं को करना पड़ा। कभी पुलिस-प्रशासन ने तो कभी कथित ‘सभ्य’ यानी कज्जा समाज के सूरजभान और मंसाराम जैसे लोगों ने उनका शोषण किया। उपन्यास की कहानी में मंसाराम खुद मानता है, कि उसने कदमबाई के साथ बलात्कार किया।हालांकि बाद में उसे इस बात का पछतावा होता है और वह कदमबाई और कबूतरा समुदाय के प्रति अपना फर्ज निभाने की कोशिश करता हुआ दिखाई देता है।

रानी पद्मिनी की मौत और क्रांति के असफल होने के बाद वे अंग्रेजों से बचने के लिए बुंदेलखंड के बीहड़ों में इधर-उधर बिखर गए, वहां उनका जीवन संघर्ष भरा रहा जिंदा रहने और पेट भरने के लिए कबूतरा समुदाय के पुरुष चोरी और लूटमार करने लगे। जबकि महिलाएं कच्ची शराब बनाती थीं, उनके इन कामों के कारण उन्हें साल 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत ‘अपराधी जनजाति’, यानी जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया।

देह, दमन और शिक्षा की जंग में कबूतरी महिलाओं का संघर्ष

मैत्रेयी पुष्पा लिखती हैं कि ‘कबूतरा आदिवासी महिलाएं या तो शराब की भट्टी पर दिखाई देंगी या मर्दों के बिस्तर पर।’ इस लाइन से वह गहरे सामाजिक सत्ता समीकरण को बताती हैं कि किस तरह आदिवासी कबूतरी महिलाएं जीवन जीने और पेट भरने के लिए काम करती हैं। क्रिमिनल ट्राइब ऐक्ट खत्म होने के बाद भी कबूतरा आदिवासी समुदाय के लिए मौजूद सामाजिक रूढ़िवादी पूर्वाग्रह जटिलता से समाज में असमानता को गहरा करते हैं। इससे निकलने के लिए भूरी कबूतरी अपने बेटे रामसिंह कबूतरा को पढ़ाने और शिक्षित बनाने के लिए लंबे समय तक यौन शोषण का सामना करती है। वहीं कदम बाई का पति जंगलिया सत्ता समीकरण और लोकल राजनीति के चलते मार दिया जाता है।

मरने वाले कज्जा मांसाराम उसकी पत्नी कदमबाई का यौन शोषण करते हैं, जिसे मन ही मन वो खुद मानते है कि उनसे एक बलात्कार हुआ है। उस यौन शोषण से जन्मा बच्चा राणा, जो आधा कुनबी  और आधा कज्जा लड़का होता है, उसके लिए मांसाराम अपना फर्ज पूरा करने की कोशिश करते हैं। वह बाकि कबूतरा लड़कों की तरह चोरी-लूटमार नहीं करना चाहता, बल्कि कज्जा करण की तरह स्कूल जाना चाहता है। उसके लिए कज्जा मांसाराम स्कूल में नाम लिखवा कर स्कूल मास्टर से कबूतरा बच्चे को पढ़ने की सिफारिश करते हैं। इसके बाबजूद राणा को स्कूल में जातिगत भेदभाव और कबूतरा समुदाय के लिए बनी गलत सामाजिक धारणाओं को सहना पड़ता है, जो उसके बाल मन को बहुत चोट पहुंचाता है। 

क्रिमिनल ट्राइब ऐक्ट खत्म होने के बाद भी कबूतरा आदिवासी समुदाय के लिए मौजूद सामाजिक रूढ़िवादी पूर्वाग्रह जटिलता से समाज में असमानता को गहरा करते हैं। इससे निकलने के लिए भूरी कबूतरी अपने बेटे रामसिंह कबूतरा को पढ़ाने और शिक्षित बनाने के लिए लंबे समय तक यौन शोषण का सामना करती है। वहीं कदम बाई का पति जंगलिया सत्ता समीकरण और लोकल राजनीति के चलते मार दिया जाता है।

शोषण के बीच उभरता प्रतिरोध 

इस उपन्यास की महिलाएं किरदार पारंपरिक रूढ़िवादी त्याग की मूर्ति नहीं बल्कि अपने हठ, इच्छाओं और स्वाभिमान के लिए संघर्ष और प्रतिरोध करते हुए दिखाई देती हैं। भूरी कबूतरी के स्त्री हठ के चलते ही तो राजा (पंडित नेहरू) ने कहा था कि अब कोई भी जनजाति अपराधिक नहीं है। वह पूरी निष्ठा से अपने बेटे रामसिंह कबूतरा, को पढ़ाने के हठ को पकड़कर अपने आदिवासी समुदाय से विरोध करती है और उसे शिक्षक बना देती है, जिसके लिए भले ही उसे सत्ता समीकरण के हर शोषण से क्यों न गुजरना पड़ा हो। उसने पूरे प्रतिरोध से अपने स्त्री हठ को पूरा किया। हालांकि आगे चलकर रामसिंह की बेटी अल्मा कबूतरी और उसकी पोती अपनी शिक्षा और प्रण ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ जो उसे रामसिंह ने सिखाया था। इसे प्रण मान कर बड़ी चालाकी और शिक्षा के दम पर राजनीति में अपनी जगह बनाती है। अल्मा के पिता रामसिंह कबूतरा को प्रशासन के भ्रष्टाचार और सत्ता समीकरण में सिर्फ इसलिए मारना पड़ता है, क्योंकि वह कबूतरा समुदाय से होता है। उसका कबूतरा होना उसे शिक्षक बनने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता है। 

पुलिस प्रशासन किसी कज्जा व्यक्ति को रिहा करने के लिए किसी कबूतरा का कभी फेंक एन्काउंटर करती है, तो कभी सलाखों के पीछे डाल देती है। इस तरीके की साजिश का शिकार रामसिंह भी होता है। उसके मरने के बाद अल्मा कबूतरी को सूरजभान जैसे लोग खरीद लेते हैं और उसका यौन शोषण करते हैं। इसके साथ ही उसे अपनी राजनीतिक सफलता के लिए यौन बाज़ार में धकेलने की कोशिश की जाती है। लेकिन अल्मा कबूतरी, अपने जैसे पढ़े-लिखे कज्जा धीरज की मदद से वहां से भाग निकलती है। धीरज, पढ़ा-लिखा होने के बावजूद, देश में बेरोज़गारी की मार के कारण सूरजभान के यहां अल्मा की पहरेदारी की नौकरी करने को मजबूर है। यही नहीं अल्मा कबूतरी के भागने की सज़ा के रूप में, सूरजभान के लोग उसके साथ सामूहिक बलात्कार करते हैं। इस तरह से भूरी, कदमबाई और अल्मा कबूतरी के माध्यम से लेखिका ने समाज में मौजूद सत्ता समीकरण के कई जटिल समस्याओं को दिखाने की कोशिश की है। इसलिए मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’ उपन्यास कबूतरा आदिवासी महिलाओं के शोषण, संघर्ष और प्रतिरोध की सशक्त कहानी है। यह उपन्यास दिखाता है कि जाति, वर्ग और जेंडर के दमन के बीच भी महिलाएं शिक्षा, साहस और स्वाभिमान के सहारे बदलाव की राह बनाती हैं और हाशिए  से उठकर अपनी पहचान गढ़ती हैं।

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content