भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद के सामाजिक और राजनीतिक दौर में कई आंदोलन हुए हैं। लेकिन जब आजादी और समानता के लिए किए गए आंदोलनों को याद किया जाता है, तब हमेशा पुरुषों के योगदान को ज्यादा महत्व दिया जाता है। लेकिन इन आंदोलनों में कई ऐसी महिलाएं भी रही हैं, जिनके योगदान को अक्सर मुख्यधारा के इतिहास में जगह नहीं मिल पाई है। यह महिलाएं न केवल सत्ता के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय रहीं, बल्कि आजादी के बाद भी समाज में बराबरी, न्याय और अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाती रहीं। उन्हीं में एक थी विमला डांग, जो कि एक भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ थीं। जो डांग स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स की प्रतिपादक के रूप में भी जानी जाती थीं, जिसे ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के मूल्यों का पालन करने वाली राजनीति की एक धारा माना जाता है।भारत अंग्रेजों के शासन से आजाद तो हो गया था लेकिन हाशिए के समुदाय और महिलाओं के लिए आजादी नाम मात्र की थी।
उस दौर में महिलाओं के लिए घर की चारदीवारी से बाहर निकलना इतना आसान नहीं था। लेकिन विमला ने रूढ़िवादी नियमों को तोड़ते हुए सामाजिक कार्यों और आंदोलनों में बढ़- चढ़ कर भाग लिया। उन्होंने अपने जीवन में हाशिए पर रह रहे समुदायों के व्यक्तियों, खासकर मजदूरों, किसानों और आदिवासी समुदायों के अधिकारों के लिए काम किया। उनका संघर्ष इस बात का उदाहरण है कि आजादी केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता से भी जुड़ी होती है। उनका जीवन हर उस एक महिला के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है, जो पितृसत्तामक समाज के इन रूढ़िवादी नियमों को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ना चाहती हैं।
विमला डांग, जो कि एक भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ थीं। जो डांग स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स की प्रतिपादक के रूप में भी जानी जाती थीं।
शुरुआती जीवन और शिक्षा
वर्डप्रेस में छपे एक लेख के मुताबिक, विमला डांग का जन्म 26 दिसंबर 1926 को लाहौर में हुआ था। वे अवतार और कमला बकाये की तीसरी संतान थीं। उनकी माँ कमला बकाये देश की शुरुआती मोंटेसरी शिक्षिकाओं में से एक थीं।जब विमला सिर्फ तीन साल की थीं, तब उनकी माँ मोंटेसरी शिक्षिका बनने की ट्रेनिंग के लिए यूरोप चली गईं। उस समय किसी महिला के लिए ऐसा करना बहुत बड़ी और अनोखी बात थी।इस दौरान उनके पिता और इलाहाबाद में उनके ननिहाल ने बच्चों की देखभाल की और उनकी माँ को आगे बढ़ने के लिए पूरा समर्थन दिया।विमला के पिता, अवतार, भी राष्ट्रवादी थे।
विमला पर बचपन में उनके बड़े भाई शशि और रवि बकाये का गहरा प्रभाव पड़ा, जो लाहौर में वामपंथी आंदोलन से जुड़े हुए थे।चट्टोपाध्याय परिवार का भी उन पर गहरा प्रभाव था, खास तौर पर गंगा राम स्कूल की प्रधानाचार्य मृणालिनी चट्टोपाध्याय का, जहां विमला ने पढ़ाई की थी। मृणालिनी और सरोजिनी नायडू की सबसे छोटी बहन सुहासिनी चट्टोपाध्याय, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की पहली महिला सदस्य थीं, उनका बकाये परिवार पर गहरा प्रभाव था। खासकर विमला के बड़े भाई शशि बकाये उनके विचारों से काफी प्रभावित थे। इसके साथ ही वह छात्र राजनीति में शुरू से ही सक्रिय थीं और लाहौर छात्र संघ की सदस्य भी बनीं।
दूसरे विश्व युद्ध के कारण भारत में भारी उथल-पुथल मच गई थी और पूरे देश में, खासकर पंजाब और बंगाल जैसे इलाकों में, खाने-पीने की चीज़ों की भारी कमी हो गई थी। इसलिए वह साल 1943 के अकाल के दौरान सर्वाइवर व्यक्तियों की मदद करने के लिए पंद्रह दिनों के लिए बंगाल भी गईं। उन्होंने जो दुख और भूख देखी, खास तौर पर महिलाओं और बच्चों की, उसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
छात्र आंदोलन और जनसंघर्षों में विमला की भूमिका
विमला लाहौर में अखिल भारतीय छात्र संघ (एआईएसएफ) की सक्रिय सदस्य थीं। इसके साथ ही वह गर्ल्स स्क्वाड का हिस्सा थीं, जिसके चलते विभाजन से पहले पंजाब में महिला आत्मरक्षा लीग (डब्ल्यूएसडीएल) की शुरुआत हुई।डब्ल्यूएसडीएल में कॉलेजों के शिक्षकों और विद्यार्थियों दोनों की पूर्ण रूप से भागीदारी थी। उन्होंने विभिन्न कॉलेजों की छात्राओं को जागरूक करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उन्हें दूसरे विश्व युद्ध, ब्रिटिश शासन, सोवियत संघ आदि के बारे में जागरूक किया। एक अन्य क्षेत्र था, जिसमें उन्होंने सक्रिय रूप से हस्तक्षेप किया, वह था विभिन्न शहरों के मोहल्लों में राशन दुकानों में खाने – पीने की चीजों की कमी और जमाखोरी का मुद्दा।
यह पंजाब में महिला आंदोलन के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के कारण भारत में भारी उथल-पुथल मच गई थी और पूरे देश में, खासकर पंजाब और बंगाल जैसे इलाकों में, खाने-पीने की चीज़ों की भारी कमी हो गई थी। इसलिए वह साल 1943 के अकाल के दौरान सर्वाइवर व्यक्तियों की मदद करने के लिए पंद्रह दिनों के लिए बंगाल भी गईं। उन्होंने जो दुख और भूख देखी, खास तौर पर महिलाओं और बच्चों की, उसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने साल 1943 में बॉम्बे में आयोजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पहले पार्टी कांग्रेस में भी भाग लिया।इसके बाद वह चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग चली गईं, जहां वे अंतर्राष्ट्रीय छात्र संघ (आईएसयू) में शामिल हुईं और कुछ सालों तक संगठन की गतिविधियों में सक्रिय रहीं।
पंजाब में भारतीय महिला राष्ट्रीय महासंघ(एनएफआईडब्ल्यू) की क्षेत्रीय इकाई, पंजाब स्त्री सभा ने विमला डांग के नेतृत्व में हड़ताल करने वालों की पत्नियों, माताओं और बहनों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसा करके वे एक विशाल आंदोलन खड़ा करने में सफल रहीं और जब महिलाओं ने कारावास स्वीकार किया, तो विमला सहित महिलाओं से बने कई अन्य जत्थों ने भी गिरफ्तारियों का सामना किया।
महिला आंदोलन और पंजाब में दहेज विरोधी संघर्ष में विमला डांग का योगदान
भारत आने के बाद, उन्होंने कई प्रकाशनों के लिए संवाददाता के रूप में काम किया। अप्रैल 1952 में, उन्होंने सतपाल डांग से शादी कर ली, जो एक कम्युनिस्ट विचारक और लाहौर से उनके परिचित थे। यह दंपति अमृतसर के उपनगर छेहरता साहिब में बस गए, जहां उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए अपना सामाजिक और राजनीतिक काम जारी रखा। उन्होंने छेहरथा की महिलाओं के बीच काम करते हुए एक सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत की। हालांकि, इन महिलाओं को संगठित करना आसान काम नहीं था। उनमें से अधिकांश घरों तक ही सीमित थीं और घूंघट पहनती थीं। काम की शुरुआत ट्रेड यूनियन हड़तालों और श्रमिक आंदोलनों के माध्यम से हुई। इन हड़तालों में महिलाओं ने भी अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने हड़ताल करने वालों के लिए भोजन तैयार किया और आम हड़तालों के दौरान धरने भी दिए जिस कारण उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया। पंजाब में भारतीय महिला राष्ट्रीय महासंघ (एनएफआईडब्ल्यू) की क्षेत्रीय इकाई, पंजाब स्त्री सभा ने विमला डांग के नेतृत्व में हड़ताल करने वालों की पत्नियों, माताओं और बहनों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसा करके वे एक विशाल आंदोलन खड़ा करने में सफल रहीं और जब महिलाओं ने कारावास स्वीकार किया, तो विमला सहित महिलाओं से बने कई अन्य जत्थों ने भी गिरफ्तारियों का सामना किया।
जहां राष्ट्रीय महिला आंदोलन में दहेज का मुद्दा साल 1970 के दशक में ही उभरा, वहीं एनएफआईडब्ल्यू की क्षेत्रीय शाखाओं ने इस मुद्दे पर साल 1950 के दशक से ही काम करना शुरू कर दिया था। इनमें पंजाब महिला सभा बहुत सक्रिय थी और आंदोलन का नेतृत्व विमला डांग ने किया था। इसके साथ ही उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों के बीच दहेज प्रथा के खिलाफ अभियान शुरू किया। विमला और उनके पति पुरुष कार्यकर्ताओं और उनके बेटों के साथ बैठकर उन्हें दहेज की बुराइयों के बारे में समझाते थे और इस प्रथा को छोड़ने के लिए प्रेरित करते थे।वह सिर्फ उन्हीं शादियों में शामिल होते थे जो बिना दहेज के होती थीं। शादी के दौरान वह यह भी बताते थे कि दूल्हे और उसके परिवार ने दहेज नहीं लिया है। असल में, पंजाब उन शुरुआती राज्यों में था जिसने साल 1976 में दहेज कानून में बदलाव किया। पंजाब, पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा उन पहले राज्यों में शामिल थे, जहां दहेज को अपराध माना गया। इसके साथ ही पंजाब भारत का पहला राज्य था, जहां यह कानून बनाया गया कि अगर किसी महिला की शादी के सात साल के भीतर मृत्यु हो जाए, तो उसका पोस्टमार्टम करना जरूरी होगा।
उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों के बीच दहेज प्रथा के खिलाफ अभियान शुरू किया। विमला और उनके पति पुरुष कार्यकर्ताओं और उनके बेटों के साथ बैठकर उन्हें दहेज की बुराइयों के बारे में समझाते थे और इस प्रथा को छोड़ने के लिए प्रेरित करते थे।वह सिर्फ उन्हीं शादियों में शामिल होते थे जो बिना दहेज के होती थीं।
उग्रवाद के दौर में साहस, सामाजिक एकता और जनसेवा का नेतृत्व
साल 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद का एक बहुत कठिन दौर आया, जिसने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया। इस समय ‘खालिस्तान’ की मांग भी काफी तेज हो गई थी।उस समय कुछ लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना इन मांगों का विरोध किया। इनमें विमला और सत्यपाल डांग प्रमुख थे।पंजाब स्त्री सभा के सदस्य उग्रवाद से प्रभावित गांवों में गए और लोगों को समझाने की कोशिश की। विमला ने विरोध प्रदर्शन किए और लोगों को एकजुट रखने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए। देशभर के एनएफआईडब्ल्यू के कार्यकर्ताओं ने इस आंदोलन का समर्थन किया। अरुणा आसफ अली भी उग्रवाद के दौर में शांतिपूर्ण जुलूस निकालने के लिए पंजाब गईं।इसी समय विमला ने उग्रवाद से प्रभावित परिवारों के लिए राहत कार्य शुरू किए।
इसके बाद पंजाब स्त्री सभा ट्रस्ट की स्थापना की गई, जिसमें उग्रवाद में अपने परिवार खो चुके बच्चों की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति और आर्थिक मदद दी। साल 1992 के चुनावों के दौरान, जब आतंकवाद अपने चरम पर था, तब उन्होंने अमृतसर पश्चिम से चुनाव लड़ने का फैसला किया। जब कई नेताओं ने डर के कारण चुनाव नहीं लड़ा, तब विमला ने हिम्मत दिखाते हुए चुनाव लड़ा। उन्होंने चुनाव जीता और विधायक के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के लिए काम करना जारी रखा। उनके अटूट साहस और निस्वार्थ सेवा के लिए, विमला डांग को साल 1991 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। विमला डांग साल 2009 के अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर पार्टी के छेहरथा कार्यालय में ध्वजारोहण समारोह में भाग लेने के बाद बीमार पड़ गईं और दस दिन बाद, 10 मई 2009 को 83 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। विमला डांग का जीवन इस बात का सशक्त उदाहरण है कि असली आज़ादी केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बराबरी से भी जुड़ी होती है। उन्होंने हर दौर में साहस और जनसेवा के साथ काम करते हुए महिलाओं और वंचित समुदायों की आवाज़ को मजबूत किया। उनका संघर्ष आज भी हमें एक अधिक न्यायपूर्ण और समान समाज बनाने की प्रेरणा देता है।

