घर से बाहर निकलना हर इंसान के लिए एक सामान्य बात होनी चाहिए, लेकिन महिलाओं के लिए यह अक्सर कई अनकही चिंताओं से भरा होता है। काम, पढ़ाई या किसी जरूरी काम के लिए निकलते समय उनके मन में सिर्फ मंज़िल तक पहुंचने की चिंता नहीं होती, बल्कि रास्ते में होने वाली छोटी-छोटी लेकिन अहम परेशानियां भी उन्हें लगातार सोचने पर मजबूर करती हैं। इन्हीं में से एक ऐसी समस्या है सार्वजनिक शौचालय की कमी। जब कोई महिला अपने ऑफिस या कॉलेज जाने की योजना बनाती है, तो उसकी एक बड़ी चिंता यह होती है कि अगर रास्ते में उसे टॉयलेट जाना पड़े, तो वह क्या करेगी? यह बात सुनने में किसी को छोटी या मामूली लग सकती है, लेकिन हकीकत में यह समस्या एक महिला की पूरी दिनचर्या को प्रभावित करती है। सामान्य जीवन से जुड़ी बात जैसे कि पूरे दिन अच्छे से पानी पीना, शौचालय का इस्तेमाल या खान-पान भी अमूमन इस सोच के साथ जुड़ी होती है कि रास्ते में शौचालय है या नहीं और अगर है तो क्या वे कारगर हैं।
ये सभी सवाल उसके मन में एक तरह का डर और तनाव पैदा करते हैं। इसका असर पूरी दिनचर्या पर पड़ता है। भारत में महिलाओं के लिए साफ और सुरक्षित सार्वजनिक शौचालयों की कमी एक बड़ी समस्या है, लेकिन लोग इसके बारे में खुलकर बात नहीं करते। अक्सर इसे छोटी या सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जबकि यह मुद्दा महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान से गहराई से जुड़ा हुआ है। साल 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 732 मिलियन ऐसे थे जिनके पास टॉयलेट की सुविधा नहीं थी। वॉटरएड की रिपोर्ट ‘आउट ऑफ़ ऑर्डर: द स्टेट ऑफ़ द वर्ल्ड्स टॉयलेट्स 2017’, में बताया गया था कि 355 मिलियन महिलाओं और लड़कियों के पास शौचालय की सुविधा नहीं थी।
मैं दिनभर सड़क पर काम करती हूं। आस-पास कोई महिला शौचालय नहीं है, इसलिए मैं पानी कम पीती हूं ताकि बार-बार जाना न पड़े। इससे मेरी सेहत पर बुरा असर पड़ा है, लेकिन मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
पब्लिक टॉयलेट के इस्तेमाल में दिक्कतें
महिलाएं पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल इसलिए नहीं करतीं क्योंकि वहां साफ़-सफ़ाई की कमी होती है। टॉयलेट सीट का गंदा होना, फ़र्श पर पेशाब का होना, बदबू आना और कुल मिलाकर साफ़-सफ़ाई का अभाव एक बड़ी समस्या है। कई जगहों पर सफ़ाई का शेड्यूल ठीक नहीं होता और वहां ठीक से रखरखाव करने वाला स्टाफ़ भी नहीं होते। अन्य कारणों में सुरक्षा की कमी का एहसास होना भी शामिल है। शौचालयों में रोशनी कम होना, दरवाज़ों के टूटे ताले, महिलाओं के टॉयलेट के पास पुरुष केयरटेकर या दूसरे लोगों का घूमते रहना, और उत्पीड़न या हिंसा का खतरा महिलाओं को शौचालयों इस्तेमाल करने से रोकती है। कुछ महिलाएं सार्वजनिक शौचालयों में अकेले जाने के बजाय किसी साथी या ग्रुप के साथ जाना ज़्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं। जब शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा भी आसानी से उपलब्ध नहीं होती, तो इसका असर सिर्फ शरीर पर ही नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। इससे महिलाओं का आत्मविश्वास कम होता है, उनकी आज़ादी सीमित होती है और उनके मन में लगातार एक झिझक बनी रहती है।
सार्वजनिक शौचालयों की सच्चाई
साल 2021 के विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की संयुक्त निगरानी कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में आज भी लाखों लोग ‘सुरक्षित स्वच्छता सुविधाओं’ से वंचित हैं। इसका मतलब यह है कि शौचालय तो बनाए गए हैं, लेकिन उनकी हालत इतनी खराब होती है कि उनका उपयोग करना संभव नहीं होता। सार्वजनिक शौचालय बनाते समय महिलाओं की जरूरतों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है, लेकिन अक्सर इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। विश्व बैंक की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के लिए शौचालयों में गोपनीयता, सुरक्षा, अच्छी रोशनी और सेनेटरी पैड के निपटान की सुविधा होना बेहद जरूरी है। लेकिन अधिकतर सार्वजनिक शौचालय इन बुनियादी मानकों पर खरे नहीं उतरते।
मुझे रोज़ 20 किलोमीटर का सफर करना पड़ता है, लेकिन रास्ते में एक भी शौचालय नहीं है। इस वजह से मुझे बार-बार पेशाब रोकना पड़ता है और मुझे अक्सर यूटीआई की समस्या हो जाती है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव: एक चिंताजनक स्थिति
सार्वजनिक शौचालयों की कमी का सबसे बड़ा असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जब किसी महिला को समय पर शौचालय नहीं मिल पाता, तो उसे पेशाब रोकना पड़ता है। लंबे समय तक ऐसा करने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। 32 वर्षीय राधा वर्मा जो एक स्कूल टीचर हैं, कहती हैं, “मुझे रोज़ 20 किलोमीटर का सफर करना पड़ता है, लेकिन रास्ते में एक भी शौचालय नहीं है। इस वजह से मुझे बार-बार पेशाब रोकना पड़ता है और मुझे अक्सर यूटीआई की समस्या हो जाती है।”
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक पेशाब रोकना यूटीआई के खतरे को बढ़ा सकता है और यह गंभीर समस्या बन सकती है। शौचालय की कमी के डर से कई महिलाएं पानी कम पीती हैं, ताकि उन्हें बार-बार टॉयलेट न जाना पड़े। 40 वर्षीय नसीमा खान जो सब्जी बेचने का काम करती हैं, कहती हैं, “मैं दिनभर सड़क पर काम करती हूं। आस-पास कोई महिला शौचालय नहीं है, इसलिए मैं पानी कम पीती हूं ताकि बार-बार जाना न पड़े। इससे मेरी सेहत पर बुरा असर पड़ा है, लेकिन मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।”
कम पानी पीने से शरीर में पानी की कमी, थकान और किडनी से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। यह आदत धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है, लेकिन मजबूरी में महिलाएं इसे अपनाने पर विवश होती हैं। पीरियड्स के समय साफ और सुरक्षित शौचालय का होना बहुत जरूरी होता है। लेकिन कई स्कूलों और कॉलेजों में शौचालयों की हालत इतनी खराब होती है कि लड़कियों को वहां जाना मुश्किल हो जाता है। कई रिपोर्ट्स के अनुसार, साफ और सुरक्षित शौचालयों की कमी के कारण लड़कियां पीरियड्स के दौरान स्कूल या कॉलेज नहीं जातीं। 21 वर्षीय शालिनी मिश्रा कहती हैं, “हमारे कॉलेज में शौचालय तो हैं, लेकिन उनकी हालत बहुत खराब है। कभी पानी नहीं होता, तो कभी सीट जाम होती है। गंदगी के कारण उनका इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है। पीरियड्स के दौरान स्थिति और भी खराब हो जाती है, इसलिए हमें कई बार कॉलेज नहीं जाना पड़ता।” इसके अलावा, इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड के सही निपटान की सुविधा न होना इस समस्या को और गंभीर बना देता है।
हमारे कॉलेज में शौचालय तो हैं, लेकिन उनकी हालत बहुत खराब है। कभी पानी नहीं होता, तो कभी सीट जाम होती है। गंदगी के कारण उनका इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है। पीरियड्स के दौरान स्थिति और भी खराब हो जाती है, इसलिए हमें कई बार कॉलेज नहीं जाना पड़ता।
हर जगह है शौचालय की समस्या
यह समस्या सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों में हालात और भी खराब हैं। कई गांवों में महिलाएं आज भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ जाते हैं। शहरों में जहां शौचालय होते भी हैं, वहां अक्सर गंदगी और खराब रखरखाव की समस्या होती है। वहीं गांवों में कई जगह शौचालय की सुविधा ही नहीं होती। हाल के आंकड़ों के अनुसार, भारत के लगभग 12.5 प्रतिशत परिवार, जिनमें अधिकतर ग्रामीण क्षेत्र के हैं, आज भी शौचालय से वंचित हैं। एक तरफ शौचालय बनाने पर जोर दिया जाता है, लेकिन उनकी सफाई, रखरखाव और महिलाओं की जरूरतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
जवाबदेही और निगरानी की कमी के कारण स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हो पाता। जब महिलाएं घर से निकलते समय यह सोचने को मजबूर हों कि रास्ते में शौचालय मिलेगा या नहीं, तो यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता है। सार्वजनिक शौचालयों की कमी महिलाओं की आजादी को सीमित कर देती है। उन्हें अपनी दिनचर्या बदलनी पड़ती है और कई बार अपने स्वास्थ्य से समझौता करना पड़ता है। इसलिए, जरूरी है कि इस मुद्दे को गंभीरता से समझा जाए और शौचालयों की उपलब्धता के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा पर भी बराबर ध्यान दिया जाए।

