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स्कूली शिक्षा के दौरान अगर स्कूलों में किशोरी छात्राओं के लिए शौचालय मौजूद न हो तो वह किस तरह लैंगिक समानता और उनकी शिक्षा को प्रभावित कर सकता है इसे हम आज इस लेख के ज़रिये समझने की कोशिश करेंगे। यहां यह भी समझने की आवश्यकता है जो बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ने आ रहे हैं उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि क्या है? सरकारी विद्यालय और जेंडर का क्या संबंध है? साथ ही लड़कियों की शिक्षा और लैंगिक समानता को शौचालय की मौजूदगी और गैरमौजूदगी कैसे प्रभावित कर सकती हैं? यहां यह समझने की जरूरत है कि जो किशोरी छात्रा स्कूल तक पहुंच गई है वे स्कूल में किन चुनौतियों का सामना करने के लिए विवश हैं। छात्राओं के स्कूल छोड़ने की दर प्रारंभिक शिक्षा के बाद ज्यादा देखने को मिलती है। छात्राओं का शौचालय तक पहुंच न होने के कारण किस तरह मुश्किलों का सामना करना पड़ता है उसकी चर्चा हम आज इस लेख में करेंगे।

सरकारी स्कूलों में पढ़ने आने वाले बच्चे अधिकांश गरीब और दलित समुदाय, शोषित, वंचित परिवार के होते हैं और उनकी पारिवारिक आय बहुत कम होती है। इसीलिए ये परिवार प्राइवेट स्कूलों की महंगी शिक्षा का खर्च उठाने में असमर्थ होते हैं। प्राइवेट स्कूल की फीस बहुत महंगी होती है, पुस्तकें और वर्दी भी सरकारी स्कूलों की तुलना में बहुत महंगी होती है। गरीब परिवारों को अगर अवसर मिलता है तो वे अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का तो वह सबसे पहले अपने बेटे को वरीयता देते हैं। लड़कियों की शिक्षा को आज भी अधिक गंभीरता से नहीं लिया जाता। सरकारी स्कूलों की योजनाएं जैसे मुफ्त किताबें, वर्दी, नाम मात्र की फीस, मीड डे मील योजना, स्कॉलरशिप लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करती है। ये योजनाएं गरीब परिवारों की लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए उत्साहित करती हैं। गरीब परिवार के बच्चों के पास खासकर लड़कियों के पास पहले से ही सीमित संसाधन और अवसर होते है, इसलिए उन परिवार को अपने बच्चों विशेषकर लड़कियों का नामांकन सरकारी स्कूलों में करवाना पड़ता है। गरीबी और लैंगिक असमानता के कारण ही लड़कियों का शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच लड़कों के मुकाबले कम होती है।

लैंगिक असमानता के कारण लड़कियां अपनी प्रारंभिक शिक्षा खत्म होने से पहले ही स्कूल छोड़ देती हैं। लड़कियों का अपनी शिक्षा समाप्त न कर पाना और स्कूल बीच में ही छोड़ना एक चिंता का विषय है। लड़कियां अपनी शिक्षा पूरी न कर पाने के कई कारण सामने आए हैं जैसे अपने छोटे बहन-भाई की देखभाल करना, स्कूल का लड़कियों के घर से दूर होना, स्कूल जाने के लिए कोई साथी का न मिलना, स्कूल का प्रतिकूल वातावरण, घरेलू कामों की जिम्मेदारियों, विवाह, लड़कियों को घर की देखभाल करने वाले सदस्य के रूप में देखना, स्कूलों में भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण स्कूल छोड़ना आदि। साथ ही स्कूलों में शौचालय का न होना भी एक बड़ी वजह है।

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बच्चों खासकर लड़कियों का स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारणों में स्कूलों में आधारभूत संरचनाओं का अभाव भी शामिल है। शौचालय और पानी की सुविधाओं की कमी के कारण बच्चे स्कूल जाना पंसद नहीं करते और स्कूल छोड़ देते हैं। गंदे शौचालय और पानी का अभाव लड़कियों की शिक्षा और स्वास्‍थ्‍य को प्रभावित करता है। शौचालय और पेयजल के अभाव में स्कूल गंदगी का ढेर बन जाते हैं, जो बच्चे के विकास पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। ऐसे गंदगी के ढेर के माहौल में बच्चों का कुपोषित और बीमार होने का डर रहता है। शौचालय के संचालन और सुविधाओं के सभी रख-रखाव न होने के कारण छोटे बच्चे खुले में शौच करने को मजबूर होते हैं। शौचालय न होने के कारण किशोरियों को पीरियड्स के दौरान भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

शौचालय और पानी की आवश्यकता सभी बच्चों की बुनियादी और जैविक ज़रूरत है। बच्चे स्कूल में 5 से 6 घंटे बिताते हैं। यह एक लंबी अवधि है इसलिए बच्चों का शौचालय का इस्तेमाल करना स्वाभाविक है। सरकारी स्कूलों में शौचालय उपलब्धता के साथ-साथ ये भी देखने की आवश्यकता है कि शौचालय स्वच्छ है या नहीं, शौचालय की सफाई इन 5-6 घंटों में कितनी बार होती है, पर्याप्त पानी की व्यवस्था है या नहीं, लड़कियों के शौचलायों में सैनेटरी पैड फेंकने की व्यवस्था है या नहीं, साबुन की व्यवस्था है या नहीं। अगर ये सुविधाएं स्कूल के शौचालय में उपलब्ध नहीं होंगी या इनका अभाव होगा तो लड़कों से अधिक लड़कियों पर इसका प्रभाव पड़ेगा। क्योंकि जब लड़कियों को पीरियड्स शुरू होता है तब शौचालय की ज़रूरत उनके लिए और अधिक बढ़ जाती है। शौचालय स्वच्छता के अभाव में किशोरियां पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं आएंगी, इसका प्रभाव उनकी शिक्षा पर पड़ेगा। कुछ स्कूलों में केवल एक ही शौचालय है वो भी साफ नहीं है नतीजतन लड़कियां खासकर किशोरी लड़कियां पीरियड्स के दौरान शौचालय में पर्याप्त सुविधा न होने के कारण स्कूल छोड़ देती हैं।

कई छात्राएं पीरियड्स के दौरान स्कूलों से 5-6 दिनों के लिए अनुपस्थित हो सकती हैं और यह हर महीने होता है। इस तरह छात्राओं की हाजिरी दर कम होने के साथ उनकी कक्षा पढ़ाई भी छूटती जाएगी।

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कई रिसर्च ये बतातें हैं कि शौचालय की सफाई को लेकर लैंगिक और जातिगत भेदभाव स्कूलों में बहुत अधिक हो रहा है। कई ऐसी खबरें आई हैं जहां शौचालय की सफाई के लिए सफाई कर्मचारी होने के बावजूद छात्राओं से विशेषकर अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाली शौचालय की सफाई करवाई जाती है। अध्ययन बताते हैं कि दलित बच्चों के साथ सरकारी स्कूलों में शौचालय के संबंध में और अन्य गतिविधियों के संबंध में छूआछूत और भेदभाव का व्यवहार किया जा रहा है। स्कूल में दलित बच्चों से शौचालय और कक्षा की सफाई कराई जाती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि हमारे स्कूल न तो लैंगिक रूप से संवेदनशील हैं न ही जातिगत भेदभाव से मुक्त। जाति और जेंडर आपस में जुड़कर शिक्षा असमानता को अधिक जटिल और गंभीर बना देते हैं। इसलिए स्कूल शौचालय को लड़कियों के अनुकूल और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। गंदे शौचालय या शौचालय की खराब या जर्जर स्थिति न केवल छात्राओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं बल्कि छात्राओं की शिक्षा की एकाग्रता और गंभीरता को भी प्रभावित करते हैं।

शौचलाय गंदा होने की स्थिति में या तो अधिकतर छात्राएं स्कूलों के गंदे शौचालय का प्रयोग नहीं करेंगी और पेशाब को मूत्राशय में ही रोके रखेगी जो खुद में ही एक बड़ी समस्या है। कई छात्राएं पीरियड्स के दौरान स्कूलों से 5-6 दिनों के लिए अनुपस्थित हो सकती हैं और यह हर महीने होता है। इस तरह छात्राओं की हाजिरी दर कम होने के साथ उनकी कक्षा पढ़ाई भी छूटती जाएगी। उनकी सीखने की क्रिया में अंतर आने से वो स्कूल भी छोड़ सकती हैं। या छात्राएं गंदे शौचालयों का प्रयोग करने के लिए मजबूर होंगी। ऐसी स्थिति में छात्राओं को संक्रमण और बीमारी होने का डर रहेगा। 

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इस प्रकार स्कूल में आधारभूत शैक्षणिक ढांचा लैंगिक संवेदनशील न होने के कारण एक माहौल तैयार करते हैं, छात्राओं को स्कूल से बाहर करने का या उनकी शिक्षा की एकाग्रता/गंभीरता को भंग करने का। लैंगिक भेदभाव के कारण महिलाओं और लड़कियों की पहुंच संसाधनों पर असमान होती है लेकिन लैंगिक भेदभाव में जब जातिगत भेदभाव जुड़ जाता है तो दलित महिला की स्थिति बहुत ही चुनौतीपूर्ण हो जाती है। दलित महिला एक साथ तीन स्तर पर शोषित है प्रथम जाति आधारित शोषण, दूसरा श्रमिक के रूप में, तीसरा स्त्री के रूप।

शिक्षा में लैंगिक समानता को बढ़ावा देना, शिक्षा के उद्देश्य को स्त्री और पुरूषों के लिए अलग-अलग न होकर एक समान रखना, महिला संबंधित अलग पाठयक्रम और अलग लैंगिक गतिविधियों को जगह देना और शिक्षा को अधिक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बनाना।  शिक्षा महिलाओं की स्थिति में बड़ा परिवर्तन ला सकती है लेकिन शिक्षा को लैंगिक रूप से संवेदनशील होने की जरूरत है। गरीब और वंचित समूह के बच्चों को जीवन में शिक्षा में पहले ही सीमित अवसर मिलते हैं उनमें से लड़कियों के लिए और भी कम अवसर मिलते हैं, समान अवसर तो दूर की बात है। लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाजें या तो बंद रहते हैं या उन्हें सरकारी स्कूलों में ही जाने का मौका मिलता है। शिक्षा पूरी होने से पूर्व ही बीच में ही स्कूल छोड़ना पड़ जाता है। इसीलिए खासकर सरकारी स्कूलों के संबंध में ऐसी नीति की आवश्यकता है कि स्कूलों का भौतिक ढांचा जैसे शौचालय के संदर्भ में लैंगिक रूप से संवेदनशील हो, पाठ्य पुस्तक की विषयवस्तु लैंगिक समानता पर आधारित हो। इसलिए स्कूलों का संपूर्ण वातावरण जेंडर दृष्टिकोण से अनुकूल होना आवश्यक है।

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तस्वीर साभार : telegraph india

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