नारीवाद मेरा फेमिनिस्ट जॉय: डर, संघर्ष और रूढ़ियों से परे जाकर स्वतंत्रता का अनुभव

मेरा फेमिनिस्ट जॉय: डर, संघर्ष और रूढ़ियों से परे जाकर स्वतंत्रता का अनुभव

मैंने भी घर में सबकी नाराज़गी के बावजूद दिल्ली यूनिवर्सिटी के रेगुलर कॉलेज में एडमिशन लिया। घरवालों ने साफ कह दिया था कि वे किसी भी तरह की आर्थिक मदद नहीं करेंगे।

मैं दिल्ली में पली-बढ़ी, 5 बहन-भाइयों में सबसे छोटी थी। मैं एक ऐसे परिवार में पैदा हुई थी, जहां लड़कियों की शादियां लगभग 14 साल की उम्र से ही शुरू हो जाती थीं। लड़कियों को ज्यादा से ज्यादा पांचवीं या आठवीं तक पढ़ाया जाता है या कई बार तो अनपढ़ रह जाने पर भी कोई दिक्कत नहीं समझी जाती। खुशकिस्मती ये थी कि हम दिल्ली में रहते थे। किराए के मकान में रहना होता था इसलिए माँ ने हमेशा सिखाया कि लड़कों से दूर रहना है, ज्यादा नहीं बोलना है और तेज नहीं हंसना है। स्कूल से सीधा घर और घर से सीधा स्कूल, बस यही ज़िंदगी थी हमारी। छठी कक्षा में पहुंची तो किशोरावस्था में कदम रखा। सबने कहना शुरू कर दिया अब ये बड़ी हो गई है। मेरे पिता से मेरी से दूरियां बढ़ा दी गईं, जिसका मुझे बहुत दुख हुआ।

पापा के साथ हंसना, खेलना सब बंद हो गया। लेकिन, फिर किराए के उस एक कमरे की चारदीवारी में कुछ ऐसा हुआ, जिसे मैं कभी समझ नहीं पाई और न ही किसी से कह पाई। मेरे साथ लगातार बारहवीं कक्षा तक यौन शोषण किया गया। हालांकि ये न मैं मेरी माँ को बता पाई, न पिता को और न किसी और को। जब बड़ी हुई और कॉलेज गई, तो पहली बार माँ को बताने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने मुझे ही गलत ठहराया और चुप रहने और किसी को कुछ बताने की हिदायत दी।

जैसे-तैसे मैंने घर में छिपाकर, झूठ बोलकर कि मैं स्किल इंडिया के तहत कंप्यूटर सीखने जा रही हूं, एक कॉल सेंटर में नौकरी शुरू की। उसी काम से मैंने कॉलेज की फीस के लिए पैसे जुटाए। उस समय मुझे बहुत खुशी और खुद पर गर्व महसूस हुआ कि मैं भी काम कर सकती हूं और अपने खर्च खुद उठा सकती हूं।

खुशी का पल बना मेरा खेल

मुझे एक खुशी का पल तब मिला जब छठी कक्षा में मेरी बहन ने मेरा नाम स्पोर्ट्स में लिखवा दिया। घर में सबने कहा कि महज खेलने भर से ही मेरी शक्ल पुरुषों जैसी हो जाएगी या मेरी शादी में दिक्कत हो सकती है। उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि खेलते हुए चोट लग गई तो इलाज कौन करेगा और कैसे होगा। फिर भी, मैंने हार नहीं मानी। मैं खेलने के लिए घरवालों से झगड़ा भी कर लेती थी। इसके बाद मेरी अगली महत्वपूर्ण लड़ाई शायद दसवीं कक्षा में हुई। मेरे एक ट्यूशन पढ़ाने वाले अध्यापक ने मुझे बताया कि अगर मैं आगे कुछ अच्छा करना चाहती हूं, तो मुझे रेगुलर कॉलेज में दाखिला लेना चाहिए। उस समय मुझे यह भी नहीं पता था कि रेगुलर कॉलेज क्या होता है। हालांकि इन सभी छोटी-बड़ी बातों में मुझे मेरी माँ का अनकहा साथ कभी मिलता तो कभी नहीं क्योंकि कहीं न कहीं वो भी पारिवारिक और सामाजिक पितृसत्तात्मक मानदंडों और बेड़ियों में बंधी हुई थी। 

उड़ान भरने की ओर मेरी पहली कोशिश  

ऐसे समय पर मुझे मेरी बहन का साथ मिला और मैंने शायद सिस्ट्रहुड का मतलब भी समझा। मेरी बड़ी बहन ने रेगुलर कॉलेज में एडमिशन लिया था, और मैंने भी घर में सबकी नाराज़गी के बावजूद दिल्ली यूनिवर्सिटी के रेगुलर कॉलेज में एडमिशन लिया। घरवालों ने साफ कह दिया था कि वे किसी भी तरह की आर्थिक मदद नहीं करेंगे। कॉलेज की फीस भरने के लिए नौकरी करने की भी इजाज़त नहीं थी। जैसे-तैसे मैंने घर में छिपाकर, झूठ बोलकर कि मैं स्किल इंडिया के तहत कंप्यूटर सीखने जा रही हूं, एक कॉल सेंटर में नौकरी शुरू की। उसी काम से मैंने कॉलेज की फीस के लिए पैसे जुटाए। उस समय मुझे बहुत खुशी और खुद पर गर्व महसूस हुआ कि मैं भी काम कर सकती हूं और अपने खर्च खुद उठा सकती हूं। मेरे कॉलेज में एडमिशन के समय मेरे साथ घर से कोई नहीं गया। माता-पिता के हस्ताक्षर की जगह मैंने खुद ही अपने हस्ताक्षर किए।

मेरे साथ लगातार बारहवीं कक्षा तक यौन शोषण किया गया। हालांकि ये न मैं मेरी माँ को बता पाई, न पिता को और न किसी और को। जब बड़ी हुई और कॉलेज गई, तो पहली बार माँ को बताने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने मुझे ही गलत ठहराया और चुप रहने और किसी को कुछ बताने की हिदायत दी।

जब मेरा एक्सीडेंट हुआ

साल 2018 में जब कॉलेज के आखिरी साल में मैं दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी जा रही थी। सड़क पार करते समय मेरा स्कूटी से एक्सीडेंट हो गया और मैं चलने में असमर्थ हो गई। मेरे बाएं पैर की हड्डी टूट गई और लगभग 9 महीनों तक मैं ठीक से चल नहीं पाई। घरवाले मेरे अच्छे इलाज की जगह मेरी पढ़ाई छोड़ने और शादी की बातें करने लगे। माहौल मानसिक रूप से बहुत कठिन था। मुझे ताने भी सुनने पड़ते थे कि अगर मैं रेगुलर कॉलेज नहीं जाती तो यह एक्सीडेंट नहीं होता। इसी दौरान, बेड रेस्ट के समय मैंने ठान लिया कि मुझे कुछ अच्छा करके दिखाना है। मेरी बड़ी बहन और कॉलेज की सहेलियों ने मेरा पूरा साथ दिया। उनकी मदद से मैं अंतिम साल की परीक्षाएं दे पाई और अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। इसके बाद मैंने एंट्रेंस परीक्षा देकर अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में शहरी अध्ययन (Urban Studies) में पोस्ट ग्रेजुएशन में दाखिला लिया। यहां भी वर्ग और भाषा (हिंदी-अंग्रेज़ी) को लेकर संघर्ष हुआ, लेकिन प्रोफेसरों के सहयोग से यह रास्ता थोड़ा आसान हो गया।

दोस्ती और बड़ी बहन का साथ

मेरे घर का माहौल ऐसा नहीं था कि हम अपने दोस्तों को कभी घर ला सकें। लेकिन जब मेरा एक्सीडेंट हुआ, तब मेरी कॉलेज की दो सहेलियां हर रविवार मुझसे मिलने आती थीं। वे मेरी पसंद का खाना लाती थीं या फल लाती और मेरा ध्यान रखती थीं। उनके आने से मुझे भी बहुत अच्छा लगता था। वे मेरे क्लास के नोट्स लाती और परीक्षा के समय मुझे कॉलेज तक ले जाने में भी मदद करती थीं। जितना उनसे हो पाता, वे हर तरह से मेरी मदद करती थीं। घर में अक्सर कहा जाता था कि खून के रिश्ते से बढ़कर कुछ नहीं होता, लेकिन मेरे जीवन के अनुभव ने समझाया कि ये हमेशा सच नहीं होता। उस समय मुझे लगा कि मेरे परिवार से ज़्यादा मेरी सहेलियों और मेरी भाभी ने मुझे समझा। इसी अनुभव ने मुझे सिस्टरहुड का असली मतलब और ताकत समझाया। मैंने जाना कि अगर महिलाएं एक-दूसरे का साथ दें, तो वे बहुत कुछ कर सकती हैं। सिस्टरहुड की इसी भावना ने मुझे आगे बढ़ने की हिम्मत दी।

घर से दूर पहली बार मुझे अकेले सफर करके एक वर्कशॉप में जाना था। यह पहली बार था जब मैं अकेले सफर करके हिमाचल गई। उस समय मुझे बहुत खुशी महसूस हो रही थी और अंदर से बहुत हिम्मत भी आई कि मैं अकेले भी यात्रा कर सकती हूं।

जब मैंने की एकल ट्रेन यात्रा  

घर से दूर पहली बार मुझे अकेले सफर करके एक वर्कशॉप में जाना था। यह पहली बार था जब मैं अकेले सफर करके हिमाचल गई। उस समय मुझे बहुत खुशी महसूस हो रही थी और अंदर से बहुत हिम्मत भी आई कि मैं अकेले भी यात्रा कर सकती हूं। मेरा एक और डर भी उस दिन खत्म हो गया। उसी वर्कशॉप में मुझे गांधी फेलोशिप के बारे में जानकारी मिली। मैंने इसमें आवेदन किया और सिलेक्शन होने के बाद मैं दिल्ली से सीधे ओडिशा के नबरंगपुर ज़िले चली गई। यह सब मेरी लगातार मेहनत और अपने अधिकारों के लिए लड़ने का नतीजा था। उस दिन मेरी आँखों के सामने एक नया रास्ता खुल गया था, और फिर भी मुझे यकीन नहीं हो रहा था।

मैंने दो साल तक फेलोशिप पूरी की। अभी मैं अपनी जिंदगी से जुड़े हर फैसले स्वतंत्र रूप से खुद लेती हूं। जब भी मन होता है, किसी नए शहर या नए अनुभव के लिए निकल जाती हूं। अलग-अलग संस्कृति और भाषाओं से जुड़े लोगों से मिलना मुझे पसंद है। मुझे लैंगिक भेदभाव को खत्म करने के लिए लगातार प्रयास करना अच्छा लगता है। आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं, तो लगता है कि यह सिर्फ मुश्किलों की कहानी नहीं है, बल्कि अपने लिए खड़े होने की कहानी है, जहां मैंने अपने फैसले खुद लिए। हर रुकावट के बावजूद मैंने आगे बढ़ना और अपनी जगह बनाना सीखा।

इस सफर में मुझे सिर्फ संघर्ष नहीं, बल्कि फेमिनिस्ट जॉय का भी अनुभव हुआ। यह वह खुशी है जो अपने अधिकार पाने, अपनी आवाज़ खोजने और सीमाओं को तोड़ने से मिलती है। यह खुशी उस आज़ादी से आती है जिसमें मैं अपने जीवन के फैसले खुद ले पाती हूं, अपने सपनों को चुन पाती हूं और बिना डर के आगे बढ़ पाती हूं। मेरे लिए यह यात्रा सिर्फ दर्द और कठिनाइयों की नहीं थी, बल्कि अपने अस्तित्व को समझने, अपने शरीर और जीवन पर अधिकार पाने और दूसरी महिलाओं के साथ जुड़कर ताकत महसूस करने की भी थी। यही सिस्टरहुड और फेमिनिस्ट जॉय मेरी सबसे बड़ी ताकत बना।

About the author(s)

मेरा नाम ममता है। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक और अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली से शहरी अध्ययन में स्नातकोत्तर किया है। मैंने पीरामल फाउंडेशन से उड़ीसा में दो साल की गांधी फेलोशिप पूर्ण की है। मुझे जाति, महिला और लैंगिक भेदभाव से जुड़े मुद्दों पर काम करना और संवाद करना विशेष रूप से रुचिकर लगता है। साथ ही, मुझे विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ घुलना-मिलना और उनसे सीखना भी बेहद पसंद है।

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