नौटंकी की ‘गुलाब बाई’ जिन्होंने अपनी कला के ज़रिये दी थी पितृसत्ता को चुनौतीBy Aashika Shivangi Singh 6 min read | Dec 22, 2022
कंचन सेंदरे: ग्रामीण इलाके में एक ट्रांस महिला के पत्रकार होने का संघर्षBy Pooja Rathi 7 min read | Dec 20, 2022
‘प्रेमाश्रम’ की नज़रों से देखें तो क्या यह हमारी विफलता है कि प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं?By Rupam Mishra 7 min read | Dec 15, 2022
तमाम संघर्षों के बीच कैसे अपने कोरकू समुदाय की लड़कियों को शिक्षा से जोड़ रही है गीताBy Heena Sonker 5 min read | Dec 5, 2022
मॉडलिंग और मातृत्व की ज़िम्मेदारियों के बीच आदिवासी होने का संघर्ष-अलीशा गौतम उरांवBy Asif Asrar 5 min read | Nov 28, 2022
टिकटशुदा रुक्का: ब्राह्मणवादी और पूंजीवादी व्यवस्था के भयावह स्वरूप का ज़रूरी दस्तावेज़By Rupam Mishra 8 min read | Nov 24, 2022
तारक मेहता का उल्टा चश्मा हमारे जातिवादी समाज के चश्मे की तरह उल्टा क्यों? By Heena Sonker 5 min read | Nov 23, 2022
मौजूदा दौर में क्यों प्रासंगिक है जातिवादी समाज के चेहरे को उधेड़ती फ़िल्म ‘दामुल’By Aashika Shivangi Singh 6 min read | Nov 21, 2022
जाति और जेंडर की परतों को उकेरती उमा चक्रवर्ती की किताब ‘जेंडरिंग कास्ट: थ्रू ए फेमिनिस्ट लेंस’By Shweta Singh 5 min read | Nov 14, 2022
सुकीरथरानीः जातिवादी समाज की हकीकत को अपनी कविताओं में दर्ज करने वाली दलित कवयित्रीBy Heena Sonker 5 min read | Nov 9, 2022
बुढ़न थियेटर: छारा समुदाय के प्रति रूढ़िवादी धारणा को तोड़ रहा है युवाओं का यह समूहBy Aashika Shivangi Singh 6 min read | Oct 27, 2022
बाबा साहब आंबेडकर की वे पांच किताबें जो सभी को पढ़नी चाहिएBy Aashika Shivangi Singh 5 min read | Oct 26, 2022