संस्कृतिख़ास बात बाल विवाह से लेकर घरेलू हिंसा, कठपुतली कॉलनी की मीना कैसे बनीं आज पूरे समुदाय की प्रेरणा

बाल विवाह से लेकर घरेलू हिंसा, कठपुतली कॉलनी की मीना कैसे बनीं आज पूरे समुदाय की प्रेरणा

32 वर्षीय मीना भट्ट राजीव नगर भोपाल, मध्यप्रदेश से आती हैं। उनका तालुक्क कठपुतली समुदाय से है। वह बताती हैं, "जब से होश संभाला अपने परिवार को अलग-अलग जगह जाकर ढोल बजाने का काम करते देखा है। हम लोग पीढ़ियों से शादी-विवाह में ढोल बजाने और कठपुतली नचाने का काम करते आए हैं।"

सामुदायिक/ जातिगत संघर्ष हो या फिर सिर्फ एक महिला होने का संघर्ष। महिलाओं के जीवन से जुड़े संघर्षों के व्यक्तिगत और साझे, संगठनात्मक फिर सामुदायिक। नारीवादी विचार का कोई फ्रेम फिक्स नहीं है। यह उत्पीड़न और गैरबराबरी के खिलाफ खड़े होने का जज्बा है। यह विचार जहां भी है वह अपनेआप बराबरी और हिंसा मुक्त समाज तैयार करने की तरफ़ जुड़ता चला जाता है। वे महिलाएं जो खुद अपने लिए और दूसरी महिलाओं के लिए रास्ते बना पाई हैं वे भी यह मानती हैं कि इनमें मुख्य रूप से महिलाओं और हाशिये के जेंडर से आनेवालों की भूमिका रही है और खासकर उन लोगों की जो लैंगिक आधार पर बराबरी का समाज चाहती है। ऐसी ही एक नारीवादी हैं मीना भट्ट।

32 वर्षीय मीना भट्ट राजीव नगर भोपाल, मध्यप्रदेश से आती हैं। उनका तालुक्क कठपुतली समुदाय से है। जीवन के अनेक संघर्षों से होकर आज मीना अपने समुदाय की औरतों की अलग-अलग तरीके से मदद करती हैं। वह कभी किसी औरत के सरकारी दस्तावेज़ बनाती दिख जाती हैं, कभी किसी की विधवा पेंशन बहाल करने निकल पड़ती हैं तो कभी किसी को बताती नज़र आती हैं कि औरतों का आर्थिक रूप से सक्षम होना क्यों ज़रूरी है। आज कठपुलती समुदाय की औरतें अपनी हर छोटी-बड़ी परेशानी के साथ आती हैं मीना दीदी के पास।

“जब से होश संभाला अपने परिवार को अलग-अलग जगह जाकर ढोल बजाने का काम करते देखा है। हम लोग पीढ़ियों से शादी-विवाह में ढोल बजाने और कठपुतली नचाने का काम करते आए हैं।” थोड़ी देर चुप होकर, सोचते हुए मीना आगे बताती हैं, हमारा परिवार राजस्थान से है लेकिन हम मध्यप्रदेश भी तो काम की तलाश में आए थे। मेरी माँ काफी अच्छा गाती थीं। तब जागरूकता अभियानों के जो भी कार्यक्रम होते थे तब उनमें माँ को गाने के काफ़ी मौके मिले। तब से हम भोपाल में ही रह गए। तब मेरी उम्र लगभग 10 वर्ष की रही होगी। तभी से मेरी माँ को मेरी चिंता सताने लगी और मेरी चल रही पढ़ाई को रोककर शादी तय कर दी परिवार के लोगों ने। उस समय हमारे समाज में बाल विवाह बहुत आम बात थी। हालांकि, अभी भी है। कभी-कभार कुछ लड़कियों का बाल विवाह हो ही जाता है हमारे समाज में। मैं पांचवी कक्षा में थी जब मेरी शादी कर दी गई थी। मैंने कई बार कहा कि मुझे आगे पढ़ाई करनी है लेकिन मेरे भाइयों का कहना था पढ़कर भी तो रोटी ही बनानी है तो अभी ही सही।”

बाल विवाह, घरेलू हिंसा और बेटियों का जन्म

“मेरी शादी राजस्थान के एक गाँव के राजेश नाम के शख्स के की गई। मैं शादी करके सीकर गांव गई थी। मेरी पहली बेटी होने पर मेरे साथ मारपीट मानसिक प्रताड़ना दी जाती बात- बात पर ताने मारना हद तो तब हो गई जब मुझे घर से निकाल दिया गया। तब मैं इतनी पढ़ी-लिखी नहीं थी मुझे तो यह भी नहीं पता था कि यह भी अपराध है, इसकी कहीं शिकायत भी हो सकती है। इसकी वजह यह रही की मुझे बचपन से यही बताया गया कि पति परमेश्वर होता है वह कुछ भी करें हमें पलटकर जवाब नहीं देना। कभी मार भी दे तो बिलकुल चुपचाप रहना है। औरतों के साथ तो गाली-गलौच तो आम है। छोटी-छोटी बात पर लड़ाई औरतों को नहीं करनी चाहिए। तभी मुझे लगा कि कोई ‘भगवान’ इतना बुरा कैसे हो सकता है। इसके बाद मैं चुपचाप अपनी बेटी को लेकर भोपाल वापस आ गई।”

32 वर्षीय मीना भट्ट राजीव नगर भोपाल, मध्यप्रदेश से आती हैं। उनका तालुक्क कठपुतली समुदाय से है। जीवन के अनेक संघर्षों से होकर आज मीना अपने समुदाय की औरतों की अलग-अलग तरीके से मदद करती हैं। वह कभी किसी औरत के सरकारी दस्तावेज़ बनाती दिख जाती हैं, कभी किसी की विधवा पेंशन बहाल करने निकल पड़ती हैं तो कभी किसी को बताती नज़र आती हैं कि औरतों का आर्थिक रूप से सक्षम होना क्यों ज़रूरी है।

लेकिन मीना के साथ भी वही हुआ जो अक्सर घरेलू हिंसा के मामलों में देखने को मिलता है। उनके घरवालों ने उन्हें बहुत समझाया और हाथ-पैर जोड़कर ‘इज्ज़त’ का हवाला देकर कहा कि वह अपने पति के पास वापस चली जाएं। इस बात पर मीना कहती हैं, मुझे नहीं पता था कौन सी इज्ज़त बचानी थी। जो दिखती नहीं है, कैसी होती है, उसको बचाने की ज़िम्मेदारी अब मेरे सिर थी। मेरा पति उसी अकड़ में मुझे फिर से लेने आ गया मानो कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं। मेरे परिवार ने मुझे वापस भेजा बहुत खुशी-खुशी। किसी ने एक बार भी मुझसे नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूं। उस वक्त मैं बड़ा असहाय महसूस कर रही थी। कुछ ही महीने में मैं फिर से गर्भवती हो गई। साल दर साल बच्चे करना जैसे अनिवार्य था।”

लेकिन मीना के साथ हिंसा का चक्र फिर से तब शुरू हुआ जब दूसरी बार भी उन्हें बेटी पैदा हुई। वह बताती हैं कि उनके साथ तो हिंसा हुई ही लेकिन उसके साथ ही उनकी बेटी के साथ भी हिंसा शुरू हो गई। डिलीवरी के तुरंत बाद ही उनके साथ हिंसा शुरू हो गई, नवजात बच्ची को कभी तमाचे मारे जाते, कभी मुझे सिगरेट से जलाया जाता। उन्हें बार-बार शारीरिक और मानसिक आघात से गुजरना पड़ा। लेकिन इस बार वह फिर से अपनी दो बेटियों को लेकर वापस भोपाल आ गई। लेकिन फिर से उन्हें उनके परिवार ने ससुराल भेज दिया। इस बीच मीना तीसरी बार गर्भवती हुईं लेकिन तीसरी बार जब बेटा पैदा हुआ तब हॉस्पिटल से मुझे ससुराल बुलाया गया लेकिन वह नहीं गई। उन पर हर तरीके से दबाव बनाया गया कि वह वापस ससुराल चली जाएं या कम से कम अपना बेटा उन्हें सौंप दें। वह एक बार फिर वहां गई मगर हिंसा के कारण वह दोबारा मानसिक तनाव में चली गईं। इस बार समाज, परिवार की फ़िक्र किए बगैर उन्होंने एक फ़ैसला लिया और तब आखिरकार हमेशा के लिए उस घर को छोड़ दिया

संघर्ष के बाद का सफर

उनके वापस आने पर उनके परिवार का व्यवहार भी बदल गया। कोई उनसे ठीक से बात न करता और किसी ने भी उनकी आर्थिक मदद भी नहीं की की और न ही किसी ने रहने को जगह दी। इस स्थिति से परेशान होकर मीना ने काम की तलाश शुरू की। तब परिवार के लोगों ने फिर इज्ज़त की दुहाई दी। उनका कहना था बहन काम करने जाएगी तो उनकी इज्ज़त खराब होगी। “तुम हमारी नाक कटवाने आई हो क्या?” ऐसे कई ताने दिनभर सुनने को मिलते थे मानो कोई तानों का रेडियो सुन रही थी। तब मैंने वापस पढ़ाई शुरू करने की सोची। पांचवी से आठवीं के पेपर दिए और अभी वर्तमान में मैं दसवी कक्षा में हूं। अपने बच्चों का दाखिला भी स्कूल में करवाया। आज 12 साल से अपने बच्चों का पालन पोषण में ख़ुद कर रही हूं। अपने घर चलाने के लिए पहले हाथी-घोड़े बनाना सीखे, शुरू में तो मुझसे ये बनते नहीं थे लेकिन धीरे-धीरे सफाई से बनने लगे। उसके बाद कठपुतली बनाने लगी। मैंने अब बस्ती के बाहर हाथ से बनाए सामान बेचना शुरू किया तो बहुत ख़ुशी हुई। उस दिन से मैं अपनी कमाई के दम पर अपने बच्चों के खाने-पीने का इंतिज़ाम कर पाई। वह दिन मुझे आज भी याद है, कहते हुए मीना भावुक हो जाती हैं।

मीना के वापस आने पर उनके परिवार का व्यवहार भी बदल गया। कोई उनसे ठीक से बात न करता और किसी ने भी उनकी आर्थिक मदद भी नहीं की की और न ही किसी ने रहने को जगह दी। इस स्थिति से परेशान होकर मीना ने काम की तलाश शुरू की। तब परिवार के लोगों ने फिर इज्ज़त की दुहाई दी।

मीना आगे बताती हैं, दुकान लगाकर लगा मैंने दुनिया जीत ली। रोज एक-दो सामान बिक जाते थे मगर वह काफी नहीं था। मैंने सामान बनाना जारी रखा और अपनी पढ़ाई भी। साथ ही मैंने काम ढूंढना भी शुरू कर दिया। धीरे-धीरे मैंने अलग-अलग संस्थाओं के लिए सर्वे आदि का काम करना शुरू किया। पिछले दो वर्ष मैंने एक संस्था में नौकरी कर ली। उसके जरिए भोपाल की अलग-अलग बस्तियों में लोगों की मदद करने का काम किया। चूंकि यह सामाजिक बदलाव के क्षेत्र का काम है तो मैंने सोचा कि मैं अपनी जैसी दूसरी औरतों की जितनी हो सकेगी उतनी मदद करूंगी। मैंने कई महिलाओं को उनके दस्तावेज बनवाने में मदद की। ऐसी महिलाएं जो विधवा हो गई हैं उनको काम करने के लिए जागरूक कर रही हूं। मैं सोचती हूं कि हर महिला अपने आप अपने लिए रास्ते बनाए न कि किसी आदमी के सहारे का इंतज़ार करे। मैं सोचती हूं कि शादी या प्रेम किसी आदमी से सहारे के लिए कतई नहीं होना चाहिए। मैं अपने अनुभव से कहती हूं कि हर महिला अपने आप में वैसे ही सक्षम है सब करने के लिए। मैं अपनी दोनों बेटियों को इस सोच के साथ बड़ा करने की कोशिश कर रही हूं।”


About the author(s)

मैं सबा हूँ। बचपन से मेरी पहली पसंद किताबें रहीं हैं। वर्तमान में समुदायों में बच्चों और औरतों के लिए पुस्तकालयों के माध्यम से किताबों तक पहुँच बनाने की कोशिश कर रही हूँ। दुनिया में अमन और हक़ों की बराबरी हो यही मेरा ख्व़ाब है। वंचित और हशियेकृत लोगों के बीच से जब उनकी अवाज़ों को सुनती हूँ तब मुझे लगता है कि उनकी अवाज़ों को सब तरफ़ सुना जाना चाहिए। मैं तमाम ज़िन्दगी विविध समुदायों कि ज़मीनी तहज़ीब को जानते जाना चाहती हूँ।

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